मंज़िल थे बजाए ख़ुद भी!

यूँ तुझे ढूँढ़ने निकले के न आए ख़ुद भी,
वो मुसाफ़िर कि जो मंज़िल थे बजाए ख़ुद भी|

अहमद फ़राज़