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जो लेके एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते!

वसीम बरेलवी साहब आज के एक मशहूर शायर हैं जो अपने सहज भाव से कही गए, गहराई से भरे शेरों से जनता को बांध लेते हैं| मैंने भी अपने संस्थान के लिए किए गए आयोजनों में दो बार उनको आमंत्रित किया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है, जनाब वसीम बरेलवी साहब की यह ग़ज़ल–

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते,
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते|

मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है,
ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते|

जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का,
उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते|


ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना,
बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते|

बिसात-ए-इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता,
यह और बात कि बचने के घर नहीं आते|

‘वसीम’ जहन बनाते हैं तो वही अख़बार,
जो ले के एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते!

अकबर इलाहाबादी साहब एक महान शायर थे जिन्होंने मजाहिया से लेकर गंभीर तक, सभी प्रकार की शायरी की है| जैसे- ‘क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ’ से लेकर ‘हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है’ तक|

लीजिए आज प्रस्तुत है, अकबर इलाहाबादी साहब की यह ग़ज़ल–

आँखें मुझे तल्वों से वो मलने नहीं देते,
अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते
|

ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते,
सच है कि हमीं दिल को संभलने नहीं देते|

किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल,
तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते|

परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले,
क्यों हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते|

हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्ज़-ए-तमन्ना,
दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते|

दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त,
हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते|

गर्मी-ए-मोहब्बत में वो है आह से माने,
पंखा नफ़स-ए-सर्द का झलने नहीं देते|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार

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तनहाइयों के पेड़ से अटकी पतंग हूँ!

सूर्यभानु गुप्त जी की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| सूर्यभानु जी की ग़ज़लों में वह चमत्कार अक्सर शामिल होता है, जिसकी अच्छी कविता से उम्मीद की जाती है|

उनकी एक बहुत खूबसूरत ग़ज़ल जो मैंने पहले शेयर की है, उसका एक शेर दोहराना चाहूँगा-

एक अच्छा शेर कह के मुझको ये महसूस हुआ,
बहुत दिनों के लिए, फिर से मर गया हूँ मैं|


अभिव्यक्ति की ईमानदारी और प्रभाविता के लिए प्रतिबद्ध शायर ही यह बात कह सकता है|
लीजिए आज सूर्यभानु गुप्त जी की इस ग़ज़ल का आनंद लेते हैं-

हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ,
मैं भी किसी क़मीज़ के कॉलर का रंग हूँ|

मोहरा सियासतों का, मेरा नाम आदमी,
मेरा वुजूद क्या है, ख़लाओं की जंग हूँ|

रिश्ते गुज़र रहे हैं लिए दिन में बत्तियाँ,
मैं बीसवीं सदी की अँधेरी सुरंग हूँ|

निकला हूँ इक नदी-सा समन्दर को ढूँढ़ने,
कुछ दूर कश्तियों के अभी संग-संग हूँ|


माँझा कोई यक़ीन के क़ाबिल नहीं रहा,
तनहाइयों के पेड़ से अटकी पतंग हूँ|

ये किसका दस्तख़त है, बताए कोई मुझे,
मैं अपना नाम लिख के अँगूठे-सा दंग हूँ |


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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रेत पे क्या लिखते रहते हो!

आज मोहसिन नक़वी साहब की एक ग़ज़ल के कुछ शेर, शेयर कर रहा हूँ, इसके कुछ शेर ग़ुलाम अली साहब ने भी गाए हैं|

ग़ज़ल में कुछ बहुत सुंदर शेर हैं और ग़ुलाम अली साहब की अदायगी तो लाजवाब है ही| लीजिए इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-

इतनी मुद्दत बाद मिले हो,
किन सोचों में गुम रहते हो|

तेज़ हवा ने मुझ से पूछा,
रेत पे क्या लिखते रहते हो|

काश कोई हम से भी पूछे,
रात गए तक क्यूँ जागे हो|

मैं दरिया से भी डरता हूँ ,
तुम दरिया से भी गहरे हो|

कौन सी बात है तुम में ऐसी ,
इतने अच्छे क्यूँ लगते हो|

पीछे मुड़ कर क्यूँ देखा था,
पत्थर बन कर क्या तकते हो|

जाओ जीत का जश्न मनाओ,
मैं झूठा हूँ तुम सच्चे हो|

अपने शहर के सब लोगों से,
मेरी ख़ातिर क्यूँ उलझे हो |

कहने को रहते हो दिल में,
फिर भी कितने दूर खड़े हो|

रात हमें कुछ याद नहीं था,
रात बहुत ही याद आए हो|

हम से न पूछो हिज्र के क़िस्से,
अपनी कहो अब तुम कैसे हो|

‘मोहसिन’ तुम बदनाम बहुत हो,
जैसे हो फिर भी अच्छे हो|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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एक मुट्ठी धान में!

आज मैं प्रसिद्ध कवि और पूर्व सांसद- श्री उदय प्रताप सिंह जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| माननीय उदय प्रताप जन प्रतिनिधि हैं और सामान्य जन की चिंताओं से उनका सीधा सरोकार भी है| श्री उदय प्रताप सिंह जी संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य के रूप में मेरे पूर्व संस्थान – एनटीपीसी में भी आए थे और वहां आयोजित कवि-सम्मेलन में उनका काव्य पाठ सुनने का सुअवसर भी मुझे मिला था|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री उदय प्रताप सिंह जी की यह ग़ज़ल –

ये रोज कोई पूछता है मेरे कान में
हिंदोस्ताँ कहाँ है अब हिंदोस्तान में।

इन बादलों की आँख में पानी नहीं रहा
तन बेचती है भूख एक मुट्ठी धान में।

तस्वीर के लिये भी कोई रूप चाहिये
ये आईना अभिशाप है सूने मकान में।

जनतंत्र में जोंकों की कोई आस्था नहीं
क्या फ़ायदा संशोधनों से संविधान में।


मानो न मानो तुम ’उदय’ लक्षण सुबह के हैं
चमकीला तारा कोई नहीं आसमान में।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा !

विख्यात फिल्म अभिनेत्री मीना कुमारी जी एक अच्छी शायरा भी थीं और कविता की कद्रदान भी थीं| वास्तव मेँ कवि नीरज जी को फिल्मी दुनिया मेँ ले जाने वाली भी वही थीं |

आज मैं मीना कुमारी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ-, प्रस्तुत है यह ग़ज़ल-

चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा,
दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा|

बुझ गई आस, छुप गया तारा,
थरथराता रहा धुआँ तन्हा|

ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं,
जिस्म तन्हा है और जाँ तन्हा
|

हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी,
दोनों चलते रहें कहाँ तन्हा|

जलती-बुझती-सी रोशनी के परे,
सिमटा-सिमटा-सा एक मकाँ तन्हा|

राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएँगे ये जहाँ तन्हा।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मुझको ये वहम नहीं है कि खु़दा है मुझमें !

अभिव्यक्ति की- गीत, कविता, शायरी की दुनिया कितनी व्यापक है, ज़िंदगी के कितने रंग हम इसमें देख सकते हैं, यह वास्तव में अद्वितीय है| इसी क्रम में आज मैं राजेश रेड्डी जी की एक और ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है, श्री राजेश रेड्डी जी की यह ग़ज़ल-


आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है मुझमें,
मुझको ये वहम नहीं है कि खु़दा है मुझमें|

मेरे चहरे पे मुसलसल हैं निगाहें उसकी,
जाने किस शख़्स को वो ढूँढ रहा है मुझमें|

हँसना चाहूँ भी तो हँसने नहीं देता मुझको,
ऐसा लगता है कोई मुझसे ख़फ़ा है मुझमें|

मैं समुन्दर हूँ उदासी का अकेलेपन का,
ग़म का इक दरिया अभी आके मिला है मुझमें|


इक ज़माना था कई ख्वाबों से आबाद था मैं,
अब तो ले दे के बस इक दश्त बचा है मुझमें|

किसको इल्ज़ाम दूँ मैं किसको ख़तावार कहूँ,
मेरी बरबादी का बाइस तो छुपा है मुझमें|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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दुख के मुका़बिल खड़े हुए हैं!

आज श्री राजेश रेड्डी जी एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, राजेश जी एक विख्यात शायर हैं और अनेक ग़ज़ल गायकों ने भी उनकी ग़ज़लें गयी हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत श्री राजेश रेड्डी जी की एक ग़ज़ल-

दुख के मुका़बिल खड़े हुए हैं,
हम गुर्बत में बड़े हुए हैं|

मेरी मुस्कानों के नीचे,
ग़म के खज़ाने गड़े हुए हैं|

जीवन वो ज़ेवर है, जिसमें,
अश्क के मोती जड़े हुए हैं|


जा पहुँचा मंज़िल पे ज़माना,
हम सोचों में पड़े हुए हैं|

दुनिया की अपनी इक ज़िद है,
हम अपनी पर अड़े हुए हैं|

कुछ दुख हम लेकर आए थे,
कुछ अपने ही गढ़े हुए हैं|


जो ख़त वो लिखने वाला है,
वो ख़त मेरे पढ़े हुए हैं |


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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तेरे घर में आईना भी है!

आज मैं स्वर्गीय राहत इन्दौरी साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| ग़ज़ल की खूबसूरती इसमें होती है कि कम शब्दों में सादगी के साथ बड़ी बात कह दी जाती है और राहत इन्दौरी साहब इस काम में पूरी तरह माहिर थे|

लीजिए प्रस्तुत है ज़नाब राहत इन्दौरी साहब की यह ग़ज़ल-

जो मेरा दोस्त भी है, मेरा हमनवा भी है,
वो शख्स, सिर्फ भला ही नहीं, बुरा भी है|

मैं पूजता हूँ जिसे, उससे बेनियाज़ भी हूँ,
मेरी नज़र में वो पत्थर भी है खुदा भी है|

सवाल नींद का होता तो कोई बात ना थी,
हमारे सामने ख्वाबों का मसअला भी है|


जवाब दे ना सका, और बन गया दुश्मन,
सवाल था, के तेरे घर में आईना भी है?

ज़रूर वो मेरे बारे में राय दे लेकिन,
ये पूछ लेना कभी मुझसे वो मिला भी है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ऐसे हिज्र के मौसम अब कब आते हैं!

शहरयार जी भारतवर्ष के एक नामी शायर रहे हैं, जिनके गीतों ने फिल्मों में भी स्थान पाया और प्रसिद्ध गजल गायकों ने भी उनकी ग़ज़लों को गाया है|
लीजिए आज प्रस्तुत है शहरयार जी की यह ग़ज़ल-


ऐसे हिज्र के मौसम अब कब आते हैं,
तेरे अलावा याद हमें सब आते हैं|

जज़्ब करे क्यों रेत हमारे अश्कों को,
तेरा दामन तर करने अब आते हैं|

अब वो सफ़र की ताब नहीं बाक़ी वरना,
हम को बुलावे दश्त से जब-तब आते हैं|

जागती आँखों से भी देखो दुनिया को,
ख़्वाबों का क्या है वो हर शब आते हैं|

काग़ज़ की कश्ती में दरिया पार किया,
देखो हम को क्या-क्या करतब आते हैं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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