ग़लत समय में सही बयानी!

अपनी युवावस्था में, जब मैं दिल्ली-शाहदरा में रहता था, नई नई नौकरी शुरू की थी और कविता का शौक भी नया नया था| उस समय जिन कवियों को अक्सर गोष्ठियों आदि में सुनने का मौका मिल जाता था, उनमें शेरजंग गर्ग जी भी शामिल थे| मैंने पहले भी शायद उनकी एक-दो रचनाएं शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी की यह ग़ज़ल –

ग़लत समय में सही बयानी
सब मानी निकले बेमानी

जिसने बोया, उसने काटा
हुई मियाँ यह बात पुरानी

किसको ज़िम्मेदारी सौंपे
हर सूरत जानी पहचानी

कौन बनाए बिगड़ी बातें
सीख गए सब बात बनानी

कुछ ही मूल्य अमूल्य बचे हैं
कौन करे उनकी निगरानी

आन-मान पर जो न्यौछावर
शख्स कहाँ ऐसे लासानी

जीना ही दुश्वार हुआ है
मरने में कितनी आसानी

विद्वानों के छक्के छूटे
ज्ञान बघार रहे अज्ञानी

जबसे हमने बाज़ी हारी
उनको आई शर्त लगानी

कुर्सी-कुर्सी होड़ लगी है
दफ्तर-दफ्तर खींचा-तानी

जन-मन-गण उत्पीड़ित पीड़ित
जितनी व्यर्थ गई कुरबानी

देश बड़ा हैं, देश रहेगा
सरकारे तो आनी-जानी

हम न सुनेंगे, हम न कहेंगे
कोउ नृप होय,हमै का हानी?


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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उँगलियाँ थाम के खुद!

कल मैंने अपने अग्रज और गुरु तुल्य स्वर्गीय डॉक्टर कुंअर बेचैन जी का जिक्र किया था, उनके बहुत से गीत और कविताएं मैं पहले शेयर की हैं, जब कविता नई नई रुचि पैदा हुई थी तब हम डॉक्टर कुंअर बेचैन जी को बड़े चाव से सुनते थे और अक्सर कवि गोष्ठियों और कवि सम्मेलनों में इसका अवसर मिलता रहता था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुंअर बेचैन जी की यह ग़ज़ल –

उँगलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे
राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे

उसने पोंछे ही नहीं अश्क मेरी आँखों से
मैंने खुद रोके बहुत देर हँसाया था जिसे


बस उसी दिन से खफा है वो मेरा इक चेहरा
धूप में आइना इक रोज दिखाया था जिसे

छू के होंठों को मेरे वो भी कहीं दूर गई
इक गजल शौक से मैंने कभी गाया था जिसे

दे गया घाव वो ऐसे कि जो भरते ही नहीं
अपने सीने से कभी मैंने लगाया था जिसे

होश आया तो हुआ यह कि मेरा इक दुश्मन
याद फिर आने लगा मैंने भुलाया था जिसे

वो बड़ा क्या हुआ सर पर ही चढ़ा जाता है
मैंने काँधे पे `कुँअर’ हँस के बिठाया था जिसे


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तुझे आइने में उतार लूँ!

अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ,
मिरा लफ़्ज़ लफ़्ज़ हो आईना तुझे आइने में उतार लूँ|

बशीर बद्र

लहजा बदल के देखते हैं!

अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं,
‘फ़राज़’ अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं|

अहमद फ़राज़

ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं!

आज मैं मुशायरों और कवि सम्मेलनों की मशहूर शायरा सुश्री अंजुम रहबर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| अंजुम जी का अंदाज़ ए बयां अलग तरह का रहा है| उनकी एक रचना काफी प्रसिद्ध है- ‘छुक-छुक, छुक-छुक रेल चली है जीवन की’|

लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री अंजुम रहबर जी यह ग़ज़ल –

कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं
यूँ देखती है जैसे मुझे जानती नहीं

वो बे-वफ़ा जो राह में टकरा गया कहीं
कह दूँगी मैं भी साफ़ कि पहचानती नहीं

समझाया बार-हा कि बचो प्यार-व्यार से
लेकिन कोई सहेली कहा मानती नहीं

मैं ने तुझे मुआ’फ़ किया जा कहीं भी जा
मैं बुज़दिलों पे अपनी कमाँ तानती नहीं

‘अंजुम’ पे हँस रहा है तो हँसता रहे जहाँ
मैं बे-वक़ूफ़ियों का बुरा मानती नहीं।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तुमने लफ़्ज़ों से बेवफ़ाई की!

अब तरसते रहो ग़ज़ल के लिए,
तुमने लफ़्ज़ों से बेवफ़ाई की|

बशीर बद्र

याद तुझको दिलाएं तेरा पैमां जाना!

आज प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट|

भारतीय उपमहाद्वीप में उर्दू के जो सर्वश्रेष्ठ शायर हुए हैं, उनमें से एक रहे हैं जनाब अहमद फराज़, वैसे तो श्रेष्ठ कवियों/शायरों के लिए सीमाओं का कोई महत्व नहीं होता, लेकिन यह बता दूँ कि फराज़ साहब पाकिस्तान में थे और उनमें इतना साहस था कि उन्होंने वहाँ मिलिटरी शासन का विरोध किया था|
फराज़ साहब की अनेक गज़लें भारत में भी लोगों की ज़ुबान पर रहती हैं| इस ग़ज़ल के कुछ शेर भी गुलाम अली साहब ने गाये हैं| वैसे मैं भी ग़ज़ल के कुछ चुने हुए शेर ही दे रहा हूँ, जिनमें थोड़ी अधिक कठिन उर्दू है, उनको मैंने छोड़ दिया है|

लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारी सी ग़ज़ल–

अब के तज्दीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जाना,
याद क्या तुझको दिलाएँ तेरा पैमाँ जाना|

यूँ ही मौसम की अदा देख के याद आया है,
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्सां जाना|

ज़िन्दगी तेरी अता थी सो तेरे नाम की है,
हमने जैसे भी बसर की तेरा एहसां जाना|

दिल ये कहता है कि शायद हो फ़सुर्दा तू भी,
दिल की क्या बात करें दिल तो है नादां जाना|

अव्वल-अव्वल की मुहब्बत के नशे याद तो कर,
बे-पिये भी तेरा चेहरा था गुलिस्ताँ जाना|

मुद्दतों से यही आलम न तवक़्क़ो न उम्मीद,
दिल पुकारे ही चला जाता है जाना जाना|

हम भी क्या सादा थे हमने भी समझ रखा था,
ग़म-ए-दौराँ से जुदा है, ग़म-ए-जाना जाना|


हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है,
हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जानाँ|

जिसको देखो वही ज़न्जीर-ब-पा लगता है,
शहर का शहर हुआ दाख़िल-ए-ज़िन्दाँ जाना|

अब तेरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आये,
और से और हुआ दर्द का उन्वाँ जाना|

हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे,
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जाना|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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हमेशा की तरह!

एक बार फिर से मैं आज श्रेष्ठ गीत कवि और बहुत अच्छे इंसान, मेरे लिए बड़े भाई की तरह रहे स्वर्गीय किशन सरोज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| किशन सरोज जी के कुछ गीत तो ऐसे हैं कि उनको सुनकर आँखों में आँसू आ जाते हैं और हम बहुत कुछ सोचने को मजबूर हो जाते हैं|
लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी की यह ग़ज़ल जो सामाजिक सरोकार से जुड़ी है –

गालियाँ, गोलियाँ सब ओर हमेशा की तरह,
और चुपचाप हैं कमज़ोर हमेशा की तरह ।

काली मारूति में उठा ले गए फिर एक लड़की,
झुग्गियों में, लो मचा शोर हमेशा की तरह ।

गांव जा पाऊँ तो पूछूँ कि छत्तों पर अब भी,
नाचने आते हैं क्या मोर हमेशा की तरह ।

बेटियों से भी हमें आँख मिलाने की न ताब,
दिल में बैठा है कोई चोर हमेशा की तरह ।

कैसी घड़ियों में लड़ी प्रीति तुम्हारी ऐ किशन !
आज तक गीले हैं दृग-कोर हमेशा की तरह ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो!

यूँ ही बे-सबब न फिरा करो, कोई शाम घर में भी रहा करो,
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो|

बशीर बद्र