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नए तीर हैं, निशाने ढूँढते हैं !

प्रसिद्ध शायर अहमद फ़राज़ साहब की एक गजल आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| फ़राज़ साहब भारतीय उपमहाद्वीप के बहुत मशहूर शायर हैं, वैसे विभाजन के बाद वे पाकिस्तान में रहते थे |

शायरी की दुनिया में फ़राज़ साहब बहुत मशहूर हैं और उनकी अनेक गज़लें जगजीत सिंह जी और गुलाम अली जी ने भी गायी हैं-


किताबों में मेरे फ़साने ढूँढते हैं,
नादां हैं गुज़रे ज़माने ढूँढते हैं ।

जब वो थे, तलाशे-ज़िंदगी भी थी,
अब तो मौत के ठिकाने ढूँढते हैं ।


कल ख़ुद ही अपनी महफ़िल से निकाला था,
आज हुए से दीवाने ढूँढते हैं ।

मुसाफ़िर बे-ख़बर हैं तेरी आँखों से,
तेरे शहर में मैख़ाने ढूँढते हैं ।

तुझे क्या पता ऐ सितम ढाने वाले,
हम तो रोने के बहाने ढूँढते हैं ।


उनकी आँखों को यूँ ना देखो ’फ़राज़’,
नए तीर हैं, निशाने ढूँढते हैं ।



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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अपनी रात की छत पर, कितना तन्हा होगा चांद!

प्रसिद्ध लेखक, उपन्यासकार, पटकथा लेखक और गीतकार स्वर्गीय डॉक्टर राही मासूम रज़ा साहब की एक प्रसिद्ध ग़ज़ल मैं आज शेयर कर रहा हूँ| उनके उपन्यास – आधा गाँव, दिल एक सादा कागज, टोपी शुक्ला, मैं एक फेरीवाला आदि बहुत प्रसिद्ध हुए थे और बड़ी भावुकता और राजनीति पर पैनी दृष्टि के साथ उन्होंने ये उपन्यास लिखे हैं| उनको पद्मश्री, पद्मभूषण आदि प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया था| उनके लिखे कई गीत भी काफी लोकप्रिय हुए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है डॉक्टर राही मासूम रज़ा साहब की ये खूबसूरत ग़ज़ल, जिसे जगजीत सिंह जी ने भी गाया है-

हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद,
अपनी रात की छत पर, कितना तन्हा होगा चांद|

जिन आँखों में काजल बनकर, तैरी काली रात,
उन आँखों में आँसू का इक, कतरा होगा चांद|

रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर,
आँगन वाले नीम में जाकर, अटका होगा चांद|

चांद बिना हर दिन यूँ बीता, जैसे युग बीते,
मेरे बिन किस हाल में होगा, कैसा होगा चांद|



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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मोहब्बत रास्ता ही रास्ता है!

आज मैं प्रसिद्ध उर्दू शायर जनाब असद भोपाली जी की एक खूबसूरत सी ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| इस छोटी सी ग़ज़ल में कुछ असरदार शेरों के माध्यम से शायर ने मुहब्बत के जज़्बे और हौसले को अभिव्यक्त किया है|

लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत ग़ज़ल-

न साथी है न मंज़िल का पता है,
मोहब्बत रास्ता ही रास्ता है|

वफ़ा के नाम पर बर्बाद होकर,
वफ़ा के नाम से दिल काँपता है|

मैं अब तेरे सिवा किसको पुकारूँ,
मुक़द्दर सो गया ग़म जागता है|

वो सब कुछ जानकर अनजान क्यूँ हैं,
सुना है दिल को दिल पहचानता है|


ये आँसू ढूँढता है तेरा दामन,
मुसाफ़िर अपनी मंज़िल जानता है|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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इन दिलों में कौन सा दिल है !

आज अकबर इलाहाबादी साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| लफ्जों की कारीगरी जो कविता/ग़ज़ल में होती है वह इसमें बाकायदा मौजूद है|
प्रस्तुत है यह ग़ज़ल-


कहाँ ले जाऊँ दिल, दोनों जहाँ में इसकी मुश्क़िल है ।
यहाँ परियों का मज़मा है, वहाँ हूरों की महफ़िल है ।

इलाही कैसी-कैसी सूरतें तूने बनाई हैं,
हर सूरत कलेजे से लगा लेने के क़ाबिल है।

ये दिल लेते ही शीशे की तरह पत्थर पे दे मारा,
मैं कहता रह गया ज़ालिम, मेरा दिल है, मेरा दिल है ।

जो देखा अक्स आईने में अपना बोले झुँझलाकर,
अरे तू कौन है, हट सामने से क्यों मुक़ाबिल है ।

हज़ारों दिल मसल कर पाँवों से झुँझला के फ़रमाया,
लो पहचानो तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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तू मुझे मेरे ही साये से डराता क्या है!

आज प्रस्तुत कर रहा हूँ ज़नाब शहजाद अहमद जी की एक खूबसूरत ग़ज़ल, इस गजल के कुछ शेर गुलाम अली साहब ने भी गाए हैं|


लीजिए प्रस्तुत है यह सुंदर ग़ज़ल –

अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है,
एक नज़र मेरी तरफ भी, तेरा जाता क्या है|

मेरी रुसवाई में तू भी है बराबर का शरीक़,
मेरे किस्से मेरे यारों को सुनाता क्या है|

पास रहकर भी न पहचान सका तू मुझको,
दूर से देखकर अब हाथ हिलाता क्या है|

सफ़र-ए-शौक में क्यूँ कांपते हैं पाँव तेरे,
आँख रखता है तो फिर आँख चुराता क्या है|


उम्र भर अपने गरीबां से उलझने वाले,
तू मुझे मेरे ही साये से डराता क्या है|

मर गए प्यास के मारे तो उठा अब्र-ए-करम,
बुझ गयी बज़्म तो अब शम्मा ज़लाता क्या है|

मैं तेरा कुछ भी नहीं हूँ मगर इतना तो बता,
देखकर मुझको तेरे ज़ेहन में आता क्या है|

तुझमें जो बल है तो दुनिया को बहाकर लेजा,
चाय की प्याली में तूफ़ान उठाता क्या है|


तेरी आवाज़ का जादू न चलेगा उन पर,
जागने वालो को ‘शहजाद’ जगाता क्या है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा !

हिन्दी काव्य मंचों की शान रहे स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी की एक हिन्दी ग़ज़ल आज प्रस्तुत कर रहा हूँ|


कविता अपनी बात स्वयं कहती है और नीरज जी भी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं| लीजिए प्रस्तुत है यह ग़ज़ल और नीरज जी के शब्दों में कहें तो ‘गीतिका’-


बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा,
वो आदमी भी यहाँ हम ने बद-चलन देखा|

ख़रीदने को जिसे कम थी दौलत-ए-दुनिया,
किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा|


मुझे मिला है वहाँ अपना ही बदन ज़ख़्मी,
कहीं जो तीर से घायल कोई हिरन देखा|

बड़ा न छोटा कोई फ़र्क़ बस नज़र का है,
सभी पे चलते समय एक सा कफ़न देखा|

ज़बाँ है और बयाँ और उस का मतलब और,
अजीब आज की दुनिया का व्याकरण देखा|


लुटेरे डाकू भी अपने पे नाज़ करने लगे,
उन्होंने आज जो संतों का आचरण देखा|

जो सादगी है कुहन में हमारे ऐ ‘नीरज’,
किसी पे और भी क्या ऐसा बाँकपन देखा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की!

हिन्दुस्तानी उर्दू शायरी के एक प्रसिद्ध हस्ताक्षर हैं- ज़नाब बशीर बद्र जी| वे शायरी में एक्सपेरीमेंट करने के लिए जाने जाते हैं| मुशायरों को लूटने वाले बशीर जी की गज़लें अक्सर लोग गुनगुनाते हैं|

उनका यह शेर –‘उजाले अपनी यादों के हमारे पास रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए’, यह शेर एक मुहावरा बन गया है| एक और शेर मुझे अभी याद आ रहा है- ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो’|


बशीर जी की अनेक गज़लें बहुत लोकप्रिय हैं और अनेक गायकों ने उनको गाया है|
आज की यह ग़ज़ल भी बहुत खूबसूरत है, आइए आज इस ग़ज़ल का आनंद लेते हैं –

न जी भर के देखा न कुछ बात की,
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की|

उजालों की परियाँ नहाने लगीं,
नदी गुनगुनाई ख़यालात की|


मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई,
ज़ुबां सब समझते हैं जज़्बात की|


मुक़द्दर मेरी चश्म-ए-पुर-आब का,
बरसती हुई रात बरसात की|


कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं,
कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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तुझे भी अपने पे ये ऐतबार है कि नहीं!

आज बिना किसी भूमिका के जनाब कैफ़ी आज़मी साहब की एक प्रसिद्ध ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जो एक फिल्म में उनकी ही बेटी शबाना आज़मी पर फिल्माई गई थी|


मन की स्थितियों को, भावनाओं को किस प्रकार ज़ुबान दी जाती है ये कैफ़ी साहब बहुत अच्छी तरह जानते थे और शायरी के मामले में वो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं|

लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारी सी ग़ज़ल-



झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं,
दबा दबा ही सही दिल में प्यार है कि नहीं |

तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता,
मेरी तरह तेरा दिल बे-क़रार है कि नहीं |

वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है,
उस एक पल का तुझे इंतज़ार है कि नहीं|


तेरी उमीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को,
तुझे भी अपने पे ये ऐतबार है कि नहीं
|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार

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ये आप हैं तो आप पे क़ुर्बान जाइये!

कविता- शायरी, गीत-ग़ज़ल आदि अभिव्यक्ति के नायाब नमूने होते हैं| वैसे तो हमारे नेता लोग जो भाषण में माहिर होते हैं, वे भाषा के अच्छे उदाहरण प्रस्तुत करते हैं| उपन्यास-कहानी आदि में भी हम बहुत सुंदर अभिव्यक्तियाँ पाते हैं| परंतु कविता-गीत-ग़ज़ल आदि में विशेष बात होती है| यहाँ बहुत ज्यादा शब्द नहीं होते| यहाँ कम शब्दों में ‘दिव्य अर्थ प्रतिपादन’ की शर्त होती है| ज़रूरी नहीं कि कविता-ग़ज़ल आदि बड़ी हो, थोड़े शब्दों में ही ये ज्यादा बड़ी अभिव्यक्ति करते हैं|


आज प्रस्तुत है क़तील शिफ़ाई जी की एक खूबसूरत ग़ज़ल, जिसमें कम शब्दों में ही बहुत सुंदर बात की गई है-


पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाइये,
फिर जो निगाह-ए-यार कहे मान जाइये|

पहले मिज़ाज-ए-राहगुज़र जान जाइये,
फिर गर्द-ए-राह जो भी कहे मान जाइये|

कुछ कह रही हैं आपके सीने की धड़कनें,
मेरी सुनें तो दिल का कहा मान जाइये|

इक धूप सी जमी है निगाहों के आस पास,
ये आप हैं तो आप पे क़ुर्बान जाइये|

शायद हुज़ूर से कोई निस्बत हमें भी हो,
आँखों में झाँक कर हमें पहचान जाइये|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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नीम का पौधा हूँ, आँगन में लगा लो मुझको

प्रसिद्ध शायर और फिल्मी गीतकार नक़्श लायलपुरी जी की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| फिल्मों में उन्होंने बहुत प्यारे गीत लिखे हैं, जैसे- ‘मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा’, ‘ये मुलाक़ात इक बहाना है’, ‘उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ’ आदि-आदि|


लीजिए आज प्रस्तुत है नक़्श लायलपुरी जी की यह ग़ज़ल-

अपनी भीगी हुई पलकों पे सजा लो मुझको,
रिश्ता-ए-दर्द समझकर ही निभा लो मुझको|

चूम लेते हो जिसे देख के तुम आईना,
अपने चेहरे का वही अक्स बना लो मुझको|

मैं हूँ महबूब अंधेरों का मुझे हैरत है,
कैसे पहचान लिया तुमने उजालो मुझको|


छाँव भी दूँगा, दवाओं के भी काम आऊँगा,
नीम का पौधा हूँ, आँगन में लगा लो मुझको|

दोस्तों शीशे का सामान समझकर बरसों,
तुमने बरता है बहुत अब तो संभालो मुझको|

गए सूरज की तरह लौट के आ जाऊँगा,
तुमसे मैं रूठ गया हूँ तो मना लो मुझको|


एक आईना हूँ ऐ ‘नक़्श’ मैं पत्थर तो नहीं,
टूट जाऊँगा न इस तरह उछालो मुझको|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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