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तुझे भी अपने पे ये ऐतबार है कि नहीं!

आज बिना किसी भूमिका के जनाब कैफ़ी आज़मी साहब की एक प्रसिद्ध ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जो एक फिल्म में उनकी ही बेटी शबाना आज़मी पर फिल्माई गई थी|


मन की स्थितियों को, भावनाओं को किस प्रकार ज़ुबान दी जाती है ये कैफ़ी साहब बहुत अच्छी तरह जानते थे और शायरी के मामले में वो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं|

लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारी सी ग़ज़ल-



झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं,
दबा दबा ही सही दिल में प्यार है कि नहीं |

तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता,
मेरी तरह तेरा दिल बे-क़रार है कि नहीं |

वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है,
उस एक पल का तुझे इंतज़ार है कि नहीं|


तेरी उमीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को,
तुझे भी अपने पे ये ऐतबार है कि नहीं
|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार

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ये आप हैं तो आप पे क़ुर्बान जाइये!

कविता- शायरी, गीत-ग़ज़ल आदि अभिव्यक्ति के नायाब नमूने होते हैं| वैसे तो हमारे नेता लोग जो भाषण में माहिर होते हैं, वे भाषा के अच्छे उदाहरण प्रस्तुत करते हैं| उपन्यास-कहानी आदि में भी हम बहुत सुंदर अभिव्यक्तियाँ पाते हैं| परंतु कविता-गीत-ग़ज़ल आदि में विशेष बात होती है| यहाँ बहुत ज्यादा शब्द नहीं होते| यहाँ कम शब्दों में ‘दिव्य अर्थ प्रतिपादन’ की शर्त होती है| ज़रूरी नहीं कि कविता-ग़ज़ल आदि बड़ी हो, थोड़े शब्दों में ही ये ज्यादा बड़ी अभिव्यक्ति करते हैं|


आज प्रस्तुत है क़तील शिफ़ाई जी की एक खूबसूरत ग़ज़ल, जिसमें कम शब्दों में ही बहुत सुंदर बात की गई है-


पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाइये,
फिर जो निगाह-ए-यार कहे मान जाइये|

पहले मिज़ाज-ए-राहगुज़र जान जाइये,
फिर गर्द-ए-राह जो भी कहे मान जाइये|

कुछ कह रही हैं आपके सीने की धड़कनें,
मेरी सुनें तो दिल का कहा मान जाइये|

इक धूप सी जमी है निगाहों के आस पास,
ये आप हैं तो आप पे क़ुर्बान जाइये|

शायद हुज़ूर से कोई निस्बत हमें भी हो,
आँखों में झाँक कर हमें पहचान जाइये|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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नीम का पौधा हूँ, आँगन में लगा लो मुझको

प्रसिद्ध शायर और फिल्मी गीतकार नक़्श लायलपुरी जी की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| फिल्मों में उन्होंने बहुत प्यारे गीत लिखे हैं, जैसे- ‘मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा’, ‘ये मुलाक़ात इक बहाना है’, ‘उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ’ आदि-आदि|


लीजिए आज प्रस्तुत है नक़्श लायलपुरी जी की यह ग़ज़ल-

अपनी भीगी हुई पलकों पे सजा लो मुझको,
रिश्ता-ए-दर्द समझकर ही निभा लो मुझको|

चूम लेते हो जिसे देख के तुम आईना,
अपने चेहरे का वही अक्स बना लो मुझको|

मैं हूँ महबूब अंधेरों का मुझे हैरत है,
कैसे पहचान लिया तुमने उजालो मुझको|


छाँव भी दूँगा, दवाओं के भी काम आऊँगा,
नीम का पौधा हूँ, आँगन में लगा लो मुझको|

दोस्तों शीशे का सामान समझकर बरसों,
तुमने बरता है बहुत अब तो संभालो मुझको|

गए सूरज की तरह लौट के आ जाऊँगा,
तुमसे मैं रूठ गया हूँ तो मना लो मुझको|


एक आईना हूँ ऐ ‘नक़्श’ मैं पत्थर तो नहीं,
टूट जाऊँगा न इस तरह उछालो मुझको|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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ये बिल्ली जाने कब से मेरा रस्ता काट जाती है!

ज़नाब बेकल उत्साही जी भी किसी समय कवि-सम्मेलनों की शान हुआ कराते थे| आजकल तो लगता है कि उस तरह के कवि-सम्मेलन ही नहीं होते, वैसे भी मैं काफी समय पहले हिन्दी भाषी इलाका छोड़कर गोवा में आ गया हूँ, अब यहाँ कवि सम्मेलन की उम्मीद, वो भी इस कोरोना काल में! खैर पुराना समय याद आता है, जब विशेष रूप में दिल्ली में कवि सम्मेलनों का आनंद मिलता था|

आइए आज ज़नाब बेकल उत्साही जी की इस ग़ज़ल का आनंद लेते हैं-

ये दुनिया तुझसे मिलने का वसीला काट जाती है,
ये बिल्ली जाने कब से मेरा रस्ता काट जाती है|

पहुँच जाती हैं दुश्मन तक हमारी ख़ुफ़िया बातें भी,
बताओ कौन सी कैंची लिफ़ाफ़ा काट जाती है|

अजब है आजकल की दोस्ती भी, दोस्ती ऐसी,
जहाँ कुछ फ़ायदा देखा तो पत्ता काट जाती है|

तेरी वादी से हर इक साल बर्फ़ीली हवा आकर,
हमारे साथ गर्मी का महीना काट जाती है|

किसी कुटिया को जब “बेकल”महल का रूप देता हूँ,
शंहशाही की ज़िद्द मेरा अंगूठा काट जाती है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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और फिर मानना पड़ता है, ख़ुदा है मुझ में

आज उर्दू शायरी के एक और सिद्धहस्त हस्ताक्षर स्वर्गीय कृष्ण बिहारी ‘नूर’ जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| नूर साहब भी अपने अलग अंदाज़ के लिए जाने जाते थे|

आइए आज इस अलग क़िस्म की ग़ज़ल का आनंद लेते हैं-



आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझ में|
और फिर मानना पड़ता है , ख़ुदा है मुझ में|

अब तो ले-दे के वही शख़्स बचा है मुझ में,
मुझको मुझ से जुदा करके जो छुपा है मुझ में|

मेरा ये हाल उभरती सी तमन्ना जैसे,
वो बड़ी देर से कुछ ढूंढ रहा है मुझ में|

जितने मौसम हैं सभी जैसे कहीं मिल जायें,
इन दिनों कैसे बताऊँ जो फ़ज़ा है मुझ में|

आईना ये तो बताता है कि मैं क्या हूँ लेकिन,
आईना इस पे है ख़मोश कि क्या है मुझ में|

अब तो बस जान ही देने की है बारी ऐ “नूर”,
मैं कहाँ तक करूँ साबित कि वफ़ा है मुझ में|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मकान ख़ाली हुआ है, तो कोई आएगा!

आज उर्दू शायरी में अपनी अलग पहचान बनाने वाले, डॉक्टर बशीर बद्र जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| बशीर बद्र जी शायरी में प्रयोग करने के लिए विख्यात हैं|


आज मैं उनकी जो ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, वह एक रूमानी ग़ज़ल है| हमेशा सीरियस बातें तो ठीक नहीं हैं, इसलिए आज इस रूमानी ग़ज़ल का आनंद लीजिए-



अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा,
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा|

तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा,
मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा|

न जाने कब तेरे दिल पर नई सी दस्तक हो,
मकान ख़ाली हुआ है तो कोई आएगा |

मैं अपनी राह में दीवार बन के बैठा हूँ ,
अगर वो आया तो किस रास्ते से आएगा |

तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है,
तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सताएगा |

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्सां जाना !

भारतीय उपमहाद्वीप में उर्दू के जो सर्वश्रेष्ठ शायर हुए हैं, उनमें से एक रहे हैं जनाब अहमद फराज़, वैसे तो श्रेष्ठ कवियों/शायरों के लिए सीमाओं का कोई महत्व नहीं होता, लेकिन यह बता दूँ कि फराज़ साहब पाकिस्तान में थे और उनमें इतना साहस था की उन्होंने वहाँ मिलिटरी शासन का विरोध किया था|
फराज़ साहब की अनेक गज़लें भारत में भी लोगों की ज़ुबान पर रहती हैं| इस ग़ज़ल के कुछ शेर भी गुलाम ली साहब ने गाये हैं| वैसे मैं भी ग़ज़ल के कुछ चुने हुए शेर ही दे रहा हूँ, जिनमें थोड़ी अधिक कठिन उर्दू है, उनको मैंने छोड़ दिया है|


लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारी सी ग़ज़ल–

अब के तज्दीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जाना,
याद क्या तुझ को दिलाएँ तेरा पैमाँ जाना|

यूँ ही मौसम की अदा देख के याद आया है,
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्सां जाना|

ज़िन्दगी तेरी अता थी सो तेरे नाम की है,
हमने जैसे भी बसर की तेरा एहसां जाना|


दिल ये कहता है कि शायद हो फ़सुर्दा तू भी,
दिल की क्या बात करें दिल तो है नादां जाना|

अव्वल-अव्वल की मुहब्बत के नशे याद तो कर,
बे-पिये भी तेरा चेहरा था गुलिस्ताँ जाना|

मुद्दतों से यही आलम न तवक़्क़ो न उम्मीद,
दिल पुकारे ही चला जाता है जाना जाना|


हम भी क्या सादा थे हमने भी समझ रखा था,
ग़म-ए-दौराँ से जुदा है, ग़म-ए-जाना जाना|

हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है,
हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जानाँ|

जिसको देखो वही ज़न्जीर-ब-पा लगता है,
शहर का शहर हुआ दाख़िल-ए-ज़िन्दाँ जाना|

अब तेरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आये,
और से और हुआ दर्द का उन्वाँ जाना|


हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे,
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जाना|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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जिसको भी पास से देखोगे अकेला होगा!

आज मैं एक बार फिर से अपने प्रिय शायरों में से एक रहे, स्वर्गीय निदा फाज़ली साहब की एक गज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ| निदा साहब अपनी काव्य शैली के अनूठेपन के लिए विख्यात थे, उसके अनेक शेर बरबस होठों पर आ जाते हैं, जैसे – ‘दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है’ अथवा ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए’ और ‘मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार, दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार’ आदि-आदि|


आज की यह गज़ल भी उनकी काव्य शैली की अलग पहचान प्रस्तुत करती है –



उसके दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा,
वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा |

इतना सच बोल कि होंठों का तबस्सुम न बुझे
रौशनी ख़त्म न कर आगे अँधेरा होगा|

प्यास जिस नहर से टकराई वो बंजर निकली,
जिसको पीछे कहीं छोड़ आए वो दरिया होगा|

मेरे बारे में कोई राय तो होगी उसकी,
उसने मुझको भी कभी तोड़ के देखा होगा|


एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक,
जिसको भी पास से देखोगे अकेला होगा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा !

एक बार फिर से मैं, हिन्दी काव्य मंचों और फिल्मी दुनिया, दोनों क्षेत्रों में अपनी रचनाधर्मिता की अमिट छाप छोड़ने वाले स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी की एक हिन्दी गजल, जिसे वे ‘गीतिका’ कहते थे प्रस्तुत कर रहा हूँ| नीरज जी जहां कवि सम्मेलनों में बहुत लोकप्रिय थे, वहीं उन्होंने हमारी फिल्मों में भी अनेक साहित्यिक गरिमा से युक्त गीत लिखे|


आज की यह गजल भी उनकी एक अलग पहचान प्रस्तुत करती है –

तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा ।
सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा ।

वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में,
हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा ।

तू ढूँढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में,
वो श्याम तो किसी मीरा की चश्म-ए-तर में रहा ।


वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की,
मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा ।

हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में,
उसे न कुछ भी मिला, जो अगर-मगर में रहा ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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वो कुछ इस सादगी से मिलता है!

आज मैं उर्दू के प्रसिद्ध शायर जिगर मुरादाबादी साहब की एक गज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ| उस्ताद शायरों का अंदाज़ ए बयां क्या होता है, ये ऐसे माहिर शायरों की शायरी को सुन कर मालूम होता है, मामूली सी बात उनके अशआर में ढलकर लाजवाब बन जाती है|


आइए आज इस गज़ल का आनंद लेते हैं-



आदमी आदमी से मिलता है,
दिल मगर कम किसी से मिलता है|

भूल जाता हूँ मैं सितम उसके,
वो कुछ इस सादगी से मिलता है|

आज क्या बात है कि फूलों का,
रंग तेरी हँसी से मिलता है|

मिल के भी जो कभी नहीं मिलता,
टूट कर दिल उसी से मिलता है|

कारोबार-ए-जहाँ सँवरते हैं,
होश जब बेख़ुदी से मिलता है|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|



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