उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो!

यूँ ही बे-सबब न फिरा करो, कोई शाम घर में भी रहा करो,
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो|

बशीर बद्र

हिन्दी मुस्कुराती है!

लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है,
मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है|

मुनव्वर राना

तेरे शहर के लोग!

आज मोहसिन नक़वी जी की लिखी एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| इस ग़ज़ल को जगजीत सिंह जी ने गाया था| कई बार यही खयाल आता है कि श्री जगजीत सिंह जी जैसे लोकप्रिय गायक यदि नहीं होते तो इन महान शायरों की शायरी हम सब तक कैसे पहुँच पाती?

एक प्रसंग याद या रहा है मेरे प्रिय गायक मुकेश जी किसी नगर में शो कर रहे थे, उनसे एक गीत की फरमाइश की गई, मुकेश जी जानते थे कि उस गीत को लिखने वाले शायर उसी शहर में रहते हैं जिनको वहाँ की जनता नहीं जानती थी, मुकेश जी ने उन शायर महोदय को बुलाया और जनता को यह बताते हुए कि यह गीत इनका ही लिखा हुआ है, उसको गाया| इस तरह उन शायर महोदय को उनके शहर के लोगों ने जान लिया|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं, जगजीत सिंह जी द्वारा गाई गयी इस ग़ज़ल के बोल:

तुझसे मिलने की सज़ा देंगे तेरे शहर के लोग
ये वफ़ाओं का सिला देंगे तेरे शहर के लोग|

क्या ख़बर थी तेरे मिलने पे क़यामत होगी
मुझको दीवाना बना देंगे तेरे शहर के लोग,
मुझको दीवाना बना देंगे तेरे शहर के लोग
तुझसे मिलने की सज़ा देंगे तेरे शहर के लोग|

तेरी नज़रों से गिराने के लिये जान-ए-हयात
मुझको मुजरिम भी बना देंगे तेरे शहर के लोग,
मुझको मुजरिम बना देंगे तेरे शहर के लोग|
तुझसे मिलने की सज़ा देंगे तेरे शहर के लोग|


कह के दीवाना मुझे मार रहे हैं पत्थर,
कह के दीवाना मुझे मार रहे हैं पत्थर,
और क्या इसके सिवा देंगे तेरे शहर के लोग|
तुझसे मिलने की सज़ा देंगे तेरे शहर के लोग|
ये वफ़ाओं का सिला देंगे तेरे शहर के लोग|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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बस तेरा नाम ही लिखा देखा!

आज स्वर्गीय सुदर्शन फ़ाकिर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| सुदर्शन फ़ाकिर जी ने कुछ बहुत सुंदर रचनाएं हमें दी हैं| जगजीत सिंह जी और अन्य अनेक गायकों ने फ़ाकिर जी की रचनाओं को गाया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है सुदर्शन फ़ाकिर जी की एक बहुत लोकप्रिय और प्रभावशाली ग़ज़ल, इस ग़ज़ल को भी जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की जोड़ी ने गाया था–

दिल की दीवार-ओ-दर पे क्या देखा,
बस तेरा नाम ही लिखा देखा|

तेरी आँखों में हमने क्या देखा,
कभी क़ातिल कभी ख़ुदा देखा|

अपनी सूरत लगी पराई सी,
जब कभी हमने आईना देखा|

हाय अंदाज़ तेरे रुकने का,
वक़्त को भी रुका रुका देखा|

तेरे जाने में और आने में,
हमने सदियों का फ़ासला देखा|

फिर न आया ख़याल जन्नत का,
जब तेरे घर का रास्ता देखा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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नाव जर्जर ही सही!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक प्रमुख कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमायर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ | दुष्यंत जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि थे, लेकिन वे जनकवि तब बने जब आपातकाल के दौरान उनकी एक के बाद एक ग़ज़लें सामने आईं, प्रारंभ में कमलेश्वर जी ने कथा पत्रिका सारिका में उनकी कुछ ग़ज़लें प्रकाशित कीं और बाद में इन ग़ज़लों को ‘साये में धूप’ नामक संकलन में प्रकाशित किया गया|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की यह ग़ज़ल –


इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है|

एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो,
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है|

एक खंडहर के हृदय-सी,एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूँगी ही सही, गाती तो है|

एक चादर सांझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है|

निर्वसन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से ओट में जा-जा के बतियाती तो है|

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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एक क़तरे को समुंदर नज़र आएं कैसे!

वसीम बरेलवी साहब उर्दू शायरी का एक जाना-माना नाम हैं और अनेक खूबसूरत ग़ज़लें, नज़्में उन्होंने हमे दी हैं| वैसे तो दूरदर्शन आदि पर अनेक मुशायरों और कवि सम्मेलनों में उनको सुना है, एक बार मैंने अपने आयोजन में, ऊंचाहार में आयोजित कवि-सम्मेलन में उनको बुलाया था और जी भरकर उनको सुना था|

लीजिए आज प्रस्तुत है वसीम बरेलवी साहब की यह ग़ज़ल –


अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएं कैसे,
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएं कैसे|

घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है,
पहले ये तय हो कि इस घर को बचाएं कैसे|

लाख तलवारें बढ़ी आती हों गर्दन की तरफ़,
सर झुकाना नहीं आता तो झुकाएं कैसे|

क़हक़हा आंख का बरताव बदल देता है,
हँसने वाले तुझे आँसू नज़र आएँ कैसे|

फूल से रंग जुदा होना कोई खेल नहीं,
अपनी मिट्टी को कहीं छोड़ के जाएं कैसे|

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा,
एक क़तरे को समुंदर नज़र आएं कैसे|

जिस ने दानिश्ता किया हो नज़र-अंदाज़ ‘वसीम’,
उस को कुछ याद दिलाएं तो दिलाएं कैसे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कभी पहले जैसे, मिला न हो!

डॉक्टर बशीर बद्र, आज की उर्दू शायरी में एक जाना-पहचाना नाम है| उनको विशेष रूप से शायरी में एक्सपेरीमेंट करने के लिए जाना जाता है| अनेक शेर उनके लोगों के ज़ेहन में छाए रहते हैं, जैसे ‘उजाले अपनी यादों के, हमारे साथ रहने दो’, ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो’, ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुमको डर नहीं लगता, बस्तियां जलाने में‘ आदि |

लीजिए आज प्रस्तुत है डॉक्टर बशीर बद्र की यह ग़ज़ल –


कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत, कोई ख़ौफ़ दिल में ज़रा न हो,
मुझे अपनी कोई ख़बर न हो, तुझे अपना कोई पता न हो|

वो फ़िराक़ हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन,
वो ग़ुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग़ बन के जला न हो|

कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिलो-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं,
मगर उस नगर में न क़ैद कर, जहाँ ज़िन्दगी की हवा न हो|

वो हज़ारों बाग़ों का बाग़ हो, तेरी बरक़तों की बहार से,
जहाँ कोई शाख़ हरी न हो, जहाँ कोई फूल खिला न हो|

तेरे इख़्तियार में क्या नहीं, मुझे इस तरह से नवाज़ दे,
यूँ दुआयें मेरी क़ुबूल हों, मेरे दिल में कोई दुआ न हो|

कभी हम भी जिस के क़रीब थे, दिलो-जाँ से बढ़कर अज़ीज़ थे,

मगर आज ऐसे मिला है वो, कभी पहले जैसे मिला न हो|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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शायद अपनी शिद्दत-ए-इज़हार थोड़ी कम रही!

आज एक बार फिर से मैं श्रेष्ठ शेयर और ग़ज़ल लेखक राजेश रेड्डी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| राजेश जी की कुछ ग़ज़लें मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज की ग़ज़ल में उन्होंने यह व्यक्त किया है कि वर्तमान समय में लोगों को प्रभावित करने के लिए सच में झूठ की मिलावट बहुत जरूरी है और लोगों को खुद्दारी की काफी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है|

लीजिए आज प्रस्तुत है राजेश रेड्डी जी की यह ग़ज़ल-


अपने सच में झूठ की मिक्दार थोड़ी कम रही ।
कितनी कोशिश की, मगर, हर बार थोड़ी कम रही ।

कुछ अना भी बिकने को तैयार थोड़ी कम रही,
और कुछ दीनार की झनकार थोड़ी कम रही ।

ज़िन्दगी ! तेरे क़दम भी हर बुलन्दी चूमती,
तू ही झुकने के लिए तैयार थोड़ी कम रही ।

सुनते आए हैं कि पानी से भी कट जाते हैं संग,
शायद अपने आँसुओं की धार थोड़ी कम रही ।

या तो इस दुनिया के मनवाने में कोई बात थी,
या हमारी नीयत-ए-इनकार थोड़ी कम रही ।

रंग और ख़ुशबू का जादू अबके पहले सा न था,
मौसम-ए-गुल में बहार इस बार थोड़ी कम रही ।


आज दिल को अक़्ल ने जल्दी ही राज़ी कर लिया
रोज़ से कुछ आज की तकरार थोड़ी कम रही ।

लोग सुन कर दास्ताँ चुप रह गए, रोए नहीं,
शायद अपनी शिद्दत-ए-इज़हार थोड़ी कम रही ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आखिर यही होता क्यों है!



भारतीय शायरों में अपनी एक खास पहचान रखने वाले ज़नाब कैफ़ी आज़मी साहब की लिखी एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| इस ग़ज़ल को जगजीत सिंह जी ने कुलदीप सिंह जी के संगीत निर्देशन में गाया है और फिल्म ‘अर्थ’ में इसे बड़ी खूबसूरती के साथ फिल्माया गया है|

ज़िंदगी में कब कौन और कैसे अकेलापन महसूस करता है, इसका अनुभव दूसरों को होना मुश्किल होता है और इसको बयान भी आसानी से नहीं किया जा सकता|

लीजिए प्रस्तुत है कैफ़ी आज़मी साहब की यह ग़ज़ल –


कोई ये कैसे बता ये के वो तन्हा क्यों है ?
वो जो अपना था वोही और किसी का क्यों है ?
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों है ?
यही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों है ?

एक ज़रा हाथ बढ़ा, दे तो पकड़ले दामन
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन
इतनी कुर्बत हैं तो फिर फ़ासला इतना क्यों है ?

दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
एक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोई
आस जो टूट गयी फिर से बंधाता क्यों है ?

तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता
हैं जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है ?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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तुमको ही याद किया, तुमको भुलाने के लिए!

आज मैं स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब की एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ | निदा फ़ाज़ली साहब की शायरी में एक सधुक्कड़ी अंदाज़ देखने को मिलता है| मैंने पहले भी निदा साहब की बहुत सी रचनाएं शेयर की हैं, क्या ग़ज़ब की शायरी और दोहे हैं निदा साहब के-

मैं रोया परदेस में, भीगा मां का प्यार, दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार’,

‘घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए’,

‘दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है, सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला’,

मैं इस प्रकार सैंकड़ों उदाहरण दे सकता हूँ लेकिन फिलहाल एक ही और दूंगा

दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब की यह ग़ज़ल –

हम हैं कुछ अपने लिए कुछ हैं ज़माने के लिए,
घर से बाहर की फ़ज़ा हँसने-हँसाने के लिए|

यूँ लुटाते न फिरो मोतियों वाले मौसम,
ये नगीने तो हैं रातों को सजाने के लिए|

अब जहाँ भी हैं वहीं तक लिखो रूदाद-ए-सफ़र,
हम तो निकले थे कहीं और ही जाने के लिए|

मेज़ पर ताश के पत्तों-सी सजी है दुनिया,
कोई खोने के लिए है कोई पाने के लिए|

तुमसे छुट कर भी तुम्हें भूलना आसान न था,
तुमको ही याद किया तुमको भुलाने के लिए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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