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किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्सां जाना !

भारतीय उपमहाद्वीप में उर्दू के जो सर्वश्रेष्ठ शायर हुए हैं, उनमें से एक रहे हैं जनाब अहमद फराज़, वैसे तो श्रेष्ठ कवियों/शायरों के लिए सीमाओं का कोई महत्व नहीं होता, लेकिन यह बता दूँ कि फराज़ साहब पाकिस्तान में थे और उनमें इतना साहस था की उन्होंने वहाँ मिलिटरी शासन का विरोध किया था|
फराज़ साहब की अनेक गज़लें भारत में भी लोगों की ज़ुबान पर रहती हैं| इस ग़ज़ल के कुछ शेर भी गुलाम ली साहब ने गाये हैं| वैसे मैं भी ग़ज़ल के कुछ चुने हुए शेर ही दे रहा हूँ, जिनमें थोड़ी अधिक कठिन उर्दू है, उनको मैंने छोड़ दिया है|


लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारी सी ग़ज़ल–

अब के तज्दीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जाना,
याद क्या तुझ को दिलाएँ तेरा पैमाँ जाना|

यूँ ही मौसम की अदा देख के याद आया है,
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्सां जाना|

ज़िन्दगी तेरी अता थी सो तेरे नाम की है,
हमने जैसे भी बसर की तेरा एहसां जाना|


दिल ये कहता है कि शायद हो फ़सुर्दा तू भी,
दिल की क्या बात करें दिल तो है नादां जाना|

अव्वल-अव्वल की मुहब्बत के नशे याद तो कर,
बे-पिये भी तेरा चेहरा था गुलिस्ताँ जाना|

मुद्दतों से यही आलम न तवक़्क़ो न उम्मीद,
दिल पुकारे ही चला जाता है जाना जाना|


हम भी क्या सादा थे हमने भी समझ रखा था,
ग़म-ए-दौराँ से जुदा है, ग़म-ए-जाना जाना|

हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है,
हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जानाँ|

जिसको देखो वही ज़न्जीर-ब-पा लगता है,
शहर का शहर हुआ दाख़िल-ए-ज़िन्दाँ जाना|

अब तेरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आये,
और से और हुआ दर्द का उन्वाँ जाना|


हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे,
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जाना|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –



आज गुलाम अली जी का गाया हुआ एक गीत याद आ रहा है, जिसे आनंद बक्षी जी ने लिखा है और इसका संगीत अनु मलिक जी ने तैयार किया है।


यह गीत वैसे ही सुंदर लिखा गया है और गुलाम अली जी की गायकी ने इसको अमर बना दिया है। मूल बात जो इसमें है, वो यह कि इंसान का आचरण, उसका किरदार उसको कहीं से कहीं ले जाता है, ऊंचाइयों पर भी और बर्बादी के रास्ते पर भी! लेकिन इसमें तक़दीर का, परिस्थितियों का भी बहुत बड़ा हाथ होता है।


लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए और गुलाम अली साहब की अदायगी को याद कीजिए-


चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला
बड़ा दिलकश, बड़ा रँगीन, है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हज़ारों घर, घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर की गलियों का बंजारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…


मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर, दिन रात रोता हूँ
खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…


मेरे मालिक, मेरा दिल क्यूँ तड़पता है, सुलगता है
तेरी मर्ज़ी, तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल, किसी को तूने अंगारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…

यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था, मुझे नाकाम होना था
मेरी तक़दीर ने मुझको, तक़दीर का मारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…


आज के लिए इतना ही, नमस्कार।



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मैं तैनू पीना के तू मैंनू पीनी?

आज एक अलग तरह का गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे ज़नाब गुलाम अली जी ने अनोखे अंदाज़ में गाया है। श्री शिव कुमार बटालवी जी ने इस गीत को लिखा है।

अक्सर कवि-शायर लोग शराब की तारीफ में बहुत सी कविताएं और गीत लिखते हैं। आज का यह गीत शराब के वीभत्स रूप को प्रदर्शित करता है। यह भी सच्चाई है कि अमीर लोग ज्यादातर गुणवत्ता वाली शराब पीते हैं, ज्यादातर लिमिट में पीते है और उसका आनंद लेते हैं।

ज्यादातर गरीब ही सस्ती शराब की लत के शिकार होते हैं और उनके परिवारों को इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ता है। लीजिए प्रस्तुत हैं इस पंजाबी गीत के बोल-

 

 

दस नी शराब दी ए बोतल-ए-कमीनी!
मैं तैनू पीना के तू मैंनू पीनी?

 

कुछ ते गमां ने मेरे दिल नू उजाड़ेया,
कुछ तेरे नशे मेरी जिंदड़ी नू सारेया,
कख वी न रेह्या पल्ले, धाधिये शौकीनी!
मैं तैनू पीना के तू मैंनू पीनी?
दस नी शराब दी ए बोतल-ए-कमीनी!

 

मिलेया ना प्यार ते मैं तैनू गले ला लेया!
भुलेया ना पहला गम, दूजा पल्ले पा लेया।
दोवां गम विच मेरा डूबना यकीनी।

 

दस नी शराब दी ए बोतल-ए-कमीनी!
मैं तैनू पीना के तू मैंनू पीनी?

 

लुक्के होये दुख मेरे कोई ना पिछानदा,
जिदे लायी मैं रुलेया, शराबी ओह वी जानदा,
मेरे लायी ते आज सारी दुनिया नबीनी।

 

दस नी शराब दी ए बोतल-ए-कमीनी!
मैं तैनू पीना के तू मैंनू पीनी?

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला!

आज गुलाम अली साहब का गाया हुआ एक गीत याद आ रहा है, जिसे 1990 में रिलीज़ हुई फिल्म- आवारगी में फिल्माया गया था, गीत को लिखा है- आनंद बक्षी जी ने और संगीत अनु मलिक जी का है। कुल मिलाकर यह गीत गुलाम अली जी ने बड़े सुंदर ढंग से गाया है और बहुत सुंदर बन पड़ा है।

गीत में जो कहा गया है वह तो स्पष्ट है ही कि किसी मनुष्य का पूरा जीवन, उसके सभी गुण कभी-कभी उसकी आवारगी की भेंट चढ़ जाते हैं। लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारा सा गीत-

 

चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला,
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला।

 

बड़ा दिलकश, बड़ा रँगीन, है ये शहर कहते हैं,
यहाँ पर हैं हज़ारों घर, घरों में लोग रहते हैं,
मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ,
न मुझसे बन सका छोटा सा घर, दिन रात रोता हूँ,
खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

मेरे मालिक, मेरा दिल क्यूँ तड़पता है, सुलगता है,
तेरी मर्ज़ी, तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है,
किसी को गुल, किसी को तूने अंगारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था,
मुझे बरबाद होना था, मुझे नाकाम होना था,
मुझे तक़दीर ने, तक़दीर का मारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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थोड़ी दूर साथ चलो!

आज ज़नाब अहमद फराज़ साहब की लिखी एक गज़ल याद आ रही है, जिसे गुलाम अली साहब ने बहुत सुंदर ढंग से गाया है। इस छोटी सी गज़ल में बहुत गहरी बात,अहमद फराज़ साहब ने बहुत सरल अंदाज़ में कह दी हैं, आइए इस गज़ल का आनंद लेते हैं-

 

कठिन है राह-गुज़र थोड़ी देर साथ चलो।
बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी देर साथ चलो।

 

तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है,
ये जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो।

 

नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं,
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो।

 

ये एक शब की मुलाक़ात भी गनीमत है,
किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो।

 

तवाफ़-ए-मंज़िल-ए-जाना हमें भी करना है
‘फ़राज़’ तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो।

 

अंतिम शेर में ‘तवाफ’ का अर्थ है ‘चक्कर लगाना/घूमकर आना’, बाकी सब तो स्पष्ट ही है।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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