शायर तेरा, ‘इन्शा’ तेरा!

बेदर्द, सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल,
आशिक़ तेरा, रुसवा तेरा, शायर तेरा, ‘इन्शा’ तेरा।

इब्ने इंशा

बस्ती तेरी, सहरा तेरा!

कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएं मगर,
जंगल तेरे, पर्वत तेरे, बस्ती तेरी, सहरा तेरा।

इब्ने इंशा

हर शख़्स दीवाना तेरा!

इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें,
हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा।

इब्ने इंशा

मंज़ूर था परदा तेरा!

हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किए,
हम हँस दिए, हम चुप रहे, मंज़ूर था परदा तेरा।

इब्ने इंशा

शब भर रहा चर्चा तेरा!

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा।
कुछ ने कहा ये चांद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा।

इब्ने इंशा

अब तक वो ठिकाना याद है!

चोरी-चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह,
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है|

हसरत मोहानी

नंगे पाँव आना याद है!

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए,
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है|

हसरत मोहानी

मुझको भी रुलाना याद है!

आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्रे-फ़िराक़,
वो तेरा रो-रो के मुझको भी रुलाना याद है|

हसरत मो
हानी

हाले दिल बातों ही बातों में–

तुझको जब तन्हा कभी पाना तो अज़ राहे-लिहाज़,
हाले दिल बातों ही बातों में जताना याद है|

हसरत मोहानी

मुँह छुपाना याद है!

खेंच लेना वो मेरा परदे का कोना दफ़अतन,
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छुपाना याद है|

हसरत मोहानी