कौन थकान हरे जीवन की?

अज्ञेय जी द्वारा संपादित तारसप्तक के माध्याम से हिन्दी में नई कविता का युग प्रारंभ हुआ था, इसमें संकलित कवियों के संबंध मे अज्ञेय जी ने लिखा था कि वे एक दूसरे से और एक दूसरे के कुत्तों से भी नफरत करते हैं, परंतु वे सभी कविता के नए युग के प्रतिनिधि हैं| तारसप्तक के बाद अज्ञेय जी ने ‘दूसरा सप्तक’ और ‘तीसरा सप्तक’ के माध्यम से भी उस समय के अनेक प्रतिनिधि कवियों को प्रस्तुत किया था| आज मैं ‘तारसप्तक’ में शामिल रहे स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूं| गिरिजा कुमार जी का गीत ‘छाया मत छूना मन’ बहुत नाज़ुक मनोभावों को प्रस्तुत करता है|

गिरिजा कुमार माथुर जी के लिखे प्रेरणा गीत ‘हम होंगे कामयाब‘ जो कि अंग्रेजी गीत ‘वी शेल ओवरकम’ का अनुवाद है, उससे तो सभी लोग परिचित हैं|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी की यह कविता –

कौन थकान हरे जीवन की?
बीत गया संगीत प्यार का,
रूठ गयी कविता भी मन की ।

वंशी में अब नींद भरी है,
स्वर पर पीत सांझ उतरी है
बुझती जाती गूंज आखिरी
इस उदास बन पथ के ऊपर
पतझर की छाया गहरी है,
अब सपनों में शेष रह गई
सुधियां उस चंदन के बन की ।

रात हुई पंछी घर आए,
पथ के सारे स्वर सकुचाए,
म्लान दिया बत्ती की बेला
थके प्रवासी की आंखों में
आंसू आ आ कर कुम्हलाए,
कहीं बहुत ही दूर उनींदी
झांझ बज रही है पूजन की ।

कौन थकान हरे जीवन की?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

गीत भी कहीं न सो जाए!

आज मैं स्वर्गीय अज्ञेय जी द्वारा संपादित- काव्य संकलन- तारसप्तक में सम्मिलित प्रमुख कवि- स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| तारसप्तक हिन्दी कविता की विकास यात्रा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज था|

लीजिए प्रस्तुत है गिरिजाकुमार माथुर जी का यह गीत –


इतना मत दूर रहो
गंध कहीं खो जाए
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

देखा तुमको मैंने कितने जन्मों के बाद
चम्पे की बदली सी धूप-छाँह आसपास
घूम-सी गई दुनिया यह भी न रहा याद
बह गया है वक़्त लिए मेरे सारे पलाश!


ले लो ये शब्द
गीत भी कहीं न सो जाए
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

उत्सव से तन पर सजा ललचाती मेहराबें
खींच लीं मिठास पर क्यों शीशे की दीवारें
टकराकर डूब गईं इच्छाओं की नावें
लौट-लौट आई हैं मेरी सब झनकारें|


नेह फूल नाजुक
न खिलना बन्द हो जाए
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

क्या कुछ कमी थी मेरे भरपूर दान में
या कुछ तुम्हारी नज़र चूकी पहचान में
या सब कुछ लीला थी तुम्हारे अनुमान में
या मैंने भूल की तुम्हारी मुस्कान में|


खोलो देह-बंध
मन समाधि-सिंधु हो जाए|
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

इतना मत दूर रहो
गंध कहीं खो जाए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
********