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फिर सुशांत की बात!

आज एक बार फिर से सुशांत सिंह राजपूत के बारे में बात करने का मन हो रहा है| सुशांत की मौत को दो महीने से ज्यादा समय बीत चुका है और समय बीतने के साथ यह तो स्पष्ट होता जा रहा है कि सुशांत जी ने आत्महत्या तो नहीं ही की है| कौन लोग थे इस हत्या के पीछे, उसके लिए तो सीबीआई इस मामले को देखेगी, क्योंकि मुंबई पुलिस के रुख से ऐसा बिलकुल नहीं लगता कि वे सच्चाई का पता लगाना चाहते हैं| अब ऐसा क्यों है, यह तो सही जांच होने पर ही पता चल पाएगा|


कौन इस घटना के दोषी हैं, इस बारे में तो मेरे पास कहने को कुछ नहीं है, क्योंकि मेरी ऐसी खोजी प्रवृत्ति नहीं है| मैं तो सुशांत सिंह राजपूत के बारे में ही कुछ बात करना चाहता हूँ| मुंबई फिल्म नगरी की दुनिया ही ग्लैमर की दुनिया है| बहुत समय से यहाँ बाहर वालों का प्रवेश काफी कठिन होता गया है| फिर जो लोग प्रवेश कर पाते हैं और हीरो बनने जैसी स्थिति में भी पहुँच पाते हैं, उनको यहाँ पहले से जमे हुए लोगों, उनके शक्तिशाली समूह से बनाकर रखनी पड़ती है, उनकी हाँ में हाँ मिलानी पड़ती है और ऐसा भी कहा जाता है कि वहाँ माफिया की शरण में रहना पड़ता है|


हम, फिल्मी कलाकारों के जीवन काल में उनके ग्लैमर, उनकी सफल भूमिकाओं और वे अपने साक्षात्कारों आदि में जो कुछ अपने बारे में बताते हैं, वही जानते हैं| सुशांत सिंह राजपूत की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु के बाद उनके बारे में अनेक बातें मालूम हुईं, जो उनकी फिल्मी भूमिकाओं से अलग हैं|


यह तो हम जानते हैं कि फिल्मी दुनिया में लोग पढ़ाई में कमाल करने वाले बहुत कम होते हैं| किसी जमाने में बलराज साहनी जैसे कुछ पढे-लिखे लोग थे| आज के समय में जो कुछ पढे-लिखे लोग फिल्मों में रहे हैं उनमें सुशांत सिंह राजपूत एक हैं, इतना ही नहीं वे टॉपर भी रहे, उन्होंने एक विशेष दूरबीन भी ली हुई थी, जिससे वे नक्षत्रों को देखते थे| बाकायदा योजना बनाकर वे निरंतर आगे बढ़ रहे थे| वे बहुत उदार और आस्थावान भी थे, बहुत से लोगों की उन्होंने ऐसी मदद की जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती| उनकी लिव-इन पार्टनर ने भी उनका भरपूर फायदा उठाया और उनके पैसे से बनी कंपनी में अपने परिवार को सारे अधिकार सौंप दिए और उनके खर्च पर पर दुनिया घूम ली|


ऐसी अनेक बातें सुशांत जी की मृत्यु के बाद पता चल रही हैं कि वे कितने उदार, खुशदिल और आस्थावान मनुष्य थे| यह सब जानने के बाद हर किसी की यह और भी इच्छा है कि इस मामले के दोषियों को कड़ी सज़ा दी जाए और यदि वहाँ कोई दुष्ट माफिया काम कर रहा है, जो प्रतिभाशाली लोगों के विरुद्ध काम करता है तो उसको जड़ से उखाड़ फेंका जाए|


आज एक बार फिर उस प्रतिभाशाली कलाकार और एक उम्दा इंसान का आदरपूर्वक स्मरण करने का मन हो रहा है, काश ऐसी प्रतिभा के अंत के पीछे जो लोग हैं उन्हें ऐसा दंड मिले कि वे फिर से किसी प्रतिभा का गला नहीं घोट पाएँ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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मुंबई फिर एक बार!

लंबे समय के बाद एक बार फिर मुंबई जा रहा हूँ। बहुत पहले मुंबई में दो बार रहा हूँ, एक बार 2000 से 2001 तक, एक वर्ष अंधेरी (पूर्व) में, पवई में रहा था और उसके बाद 2012 में शायद 3 महीने तक अंधेरी (पश्चिम) में रहा था। तब मैं ब्लॉग नहीं लिखता था, इसलिए इस बार विशेष रूप से एक नई निगाह से फिल्म नगरी, माया नगरी, भारतवर्ष की आर्थिक राजधानी मुंबई को देखने के लिए कम से कम 4 दिन का समय निकाल रहा हूँ, देखें क्या कुछ कवर कर पाता हूँ, इस नगरी से, जिसका बहुत मोह रहा है।

जीवन का अधिकांश समय दिल्ली, एनसीआर, यूपी, एमपी, बिहार और राजस्थान में बिताया, जो सभी समुद्र से दूर थे। आज से तीन वर्ष पहले गोवा आ गया, जहाँ कितनी समुद्री ‘बीच’ हैं कहना मुश्किल है, समुद्र का दृश्य अपने घर से ही दिखाई देता है। हाँ इससे पहले समुद्र का अनुभव मुंबई में ही मिला था, अब तक वह समय याद आता है।

हाँ तो इसके बाद कुछ दिन यात्रा संबंधी ब्लॉगिंग के लिए समर्पित होंगे, जिसके अंतर्गत मैं मुंबई और हैदराबाद जाऊंगा और शायद बंगलौर भी थोड़ा-बहुत कवर कर सकूं।

आज के लिए इतना ही, एक पुराना गीत याद आ रहा है, फिल्म- 1956 में रिलीज़ हुई सीआईडी के लिए मजरूह सुल्तानपुरी साहब के लिखे इस गीत को रफी साहब और गीता दत्त जी ने गाया था, हाँ उस समय मुंबई का नाम- बंबई या बॉम्बे हुआ करता था, और हाँ इस महानगर का चरित्र तो लगभग ऐसा ही था, जिसे इस गीत में बखूबी दर्शाया गया है-

 

 

ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ
ज़रा हट के, ज़रा बच के
ये है बॉम्बे मेरी जाँ

 

कहीं बिल्डिंग, कहीं ट्रामे, कहीं मोटर, कहीं मिल
मिलता है यहाँ सब कुछ, इक मिलता नहीं दिल
इन्साँ का नहीं कहीं नाम-ओ-निशाँ
ज़रा हट के…

 

कहीं सट्टा, कहीं पत्ता, कहीं चोरी, कहीं रेस
कहीं डाका, कहीं फाँका, कहीं ठोकर, कहीं ठेस
बेकारों के हैं कई काम यहाँ
ज़रा हट के…

 

बेघर को आवारा यहाँ कहते हँस-हँस
खुद काटे गले सबके, कहे इसको बिज़नस
इक चीज़ के है कई नाम यहाँ
ज़रा हट के…

 

बुरा दुनिया को है कहता, ऐसा भोला तो ना बन
जो है करता, वो है भरता, है यहाँ का ये चलन
दादागिरी नहीं चलने की यहाँ
ये है बॉम्बे…
ऐ दिल है मुश्किल…

 

ऐ दिल है आसाँ जीना यहाँ
सुनो मिस्टर, सुनो बन्धु
ये है बॉम्बे मेरी जाँ। 

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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