ईश्वर!

आज एक बार फिर मैं स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| जैसे ईश्वर हर जगह पहुँचने के लिए स्वतंत्र होते हैं उसी प्रकार कवि की स्वतंत्रता भी अनंत है| अब इस कविता में ही देखी सर्वेश्वर जी ने ईश्वर को कौन सी ड्रेस पहना दी और उससे क्या काम करवा लिया| एक अलग अंदाज़ में सर्वेश्वर जी ने इस कविता में अपनी बात काही है
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता –


बहुत बडी जेबों वाला कोट पहने
ईश्वर मेरे पास आया था,
मेरी मां, मेरे पिता,
मेरे बच्चे और मेरी पत्नी को
खिलौनों की तरह,
जेब में डालकर चला गया
और कहा गया,
बहुत बडी दुनिया है
तुम्हारे मन बहलाने के लिए।

मैंने सुना है,
उसने कहीं खोल रक्खी है
खिलौनों की दुकान,
अभागे के पास
कितनी जरा-सी पूंजी है
रोजगार चलाने के लिए।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मैं शिवालों को क्या करूँ!

दिल ही बहुत है मेरा इबादत के वास्ते,
मस्जिद को क्या करूँ मैं शिवालों को क्या करूँ|

राजेश रेड्डी

इस तरह माँगा मुझे!

तुमने देखा है किसी मीरा को मंदिर में कभी,
एक दिन उसने ख़ुदा से इस तरह माँगा मुझे|

बशीर बद्र

ख़ुदा ने दे दिया क्या-क्या मुझे!

चाँद चेहरा, जुल्फ दरिया, बात खुशबू, दिल चमन,
ये तुम्हें देकर ख़ुदा ने दे दिया क्या-क्या मुझे|

बशीर बद्र

क्या जाने किस भेस में बाबा!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी फिल्म जगत के एक अनूठे गीतकार स्वर्गीय पंडित भरत व्यास जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| भरत व्यास जी ने हिन्दी फिल्मों को कुछ बहुत प्यारे गीत दिए हैं, जैसे- ‘आधा है चंद्रमा, रात आधी’, ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम’, ‘आ लौट के आ जा मेरे मीत’, ‘ज्योत से ज्योत जलाते चलो’ आदि-आदि|

लीजिए आज प्रस्तुत है पंडित भरत व्यास जी का यह गीत-

बड़े प्यार से मिलना सबसे
दुनिया में इंसान रे
क्या जाने किस भेस में बाबा
मिल जाए भगवान रे|

कौन बड़ा है कौन है छोटा
ऊँचा कौन और नीचा
प्रेम के जल से सभी को सींचा
यह है प्रभू का बग़ीचा|
मत खींचों तुम दीवारें
इंसानों के दरमियान रे
क्या जाने किस भेस में बाबा
मिल जाए भगवान रे|


ओ महंत जी
तुम महंत जी खोज रहे
उन्हें मोती की लड़ियों में,
प्रभू को मोती की लड़ियों में|
कभी उन्हें ढूँढा क्या
ग़रीबों की अँतड़ियों में|
दीन जनों के अँसुवन में,
क्या कभी किया है स्नान रे|

क्या जाने किस भेस में बाबा
मिल जाए भगवान रे|


क्या जाने कब श्याम मुरारी
आ जावे बन कर के भिखारी|
लौट न जाए कभी द्वार से,
बिना लिए कुछ दान रे|
क्या जाने किस भेस में बाबा
मिल जाए भगवान रे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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किसी टूटे हुए दिल में होगा!

वो ख़ुदा है किसी टूटे हुए दिल में होगा,
मस्जिदों में उसे ढूँढो न कलीसाओं में|

क़तील शिफ़ाई

बिना सवाल के चल!

कि उसके दर पे बिना माँगे सब ही मिलता है,
चला है रब की तरफ़ तो बिना सवाल के चल।

कुँअर बेचैन

उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे!

उसके बंदों को देखकर कहिये,
हमको उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे|

जावेद अख़्तर

कब ख़ुदा होने से डरता है!

न बस में ज़िन्दगी इसके न क़ाबू मौत पर इसका,
मगर इन्सान फिर भी कब ख़ुदा होने से डरता है|

राजेश रेड्डी