चेहरा अपना भी ख़ुदा का होता!

क्यूँ मिरी शक्ल पहन लेता है छुपने के लिए,
एक चेहरा कोई अपना भी ख़ुदा का होता|

गुलज़ार

जो भी देगा वही ख़ुदा देगा!

आदमी आदमी को क्या देगा,
जो भी देगा वही ख़ुदा देगा|

सुदर्शन फ़ाकिर

रहे सामने और दिखाई न दे!

ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है,
रहे सामने और दिखाई न दे|

बशीर बद्र

कहाँ हूँ कहीं नहीं हूँ मैं!

वो ज़र्रे ज़र्रे में मौजूद है मगर मैं भी,
कहीं कहीं हूँ कहाँ हूँ कहीं नहीं हूँ मैं|

राहत इन्दौरी

मंदिर!

लंबे समय के बाद आज फिर से मैं छायावाद युग के प्रमुख कवि स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी की अनेक रचनाएं राष्ट्र की धरोहर हैं| इस कविता में ईश्वर के प्रति, आस्था के प्रति प्रश्न उठाने वाले लोगों को प्रसाद जी ने समुचित उत्तर दिया है, भले ही वह आस्था किसी भी धर्म से जुड़ी हो|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह कविता –

जब मानते हैं व्यापी जलभूमि में अनिल में
तारा-शशांक में भी आकाश मे अनल में
फिर क्यो ये हठ है प्यारे ! मन्दिर में वह नहीं है
वह शब्द जो ‘नही’ है, उसके लिए नहीं है

जिस भूमि पर हज़ारों हैं सीस को नवाते
परिपूर्ण भक्ति से वे उसको वहीं बताते
कहकर सइस्त्र मुख से जब है वही बताता
फिर मूढ़ चित्त को है यह क्‍यों नही सुहाता

अपनी ही आत्मा को सब कुछ जो जानते हो
परमात्मा में उसमें नहिं भेद मानते हो
जिस पंचतत्व से है यह दिव्य देह-मन्दिर
उनमें से ही बना है यह भी तो देव-मन्दिर

उसका विकास सुन्दर फूलों में देख करके
बनते हो क्यों मधुव्रत आनन्द-मोद भरके
इसके चरण-कमल से फिर मन क्यों हटाते हो
भव-ताप-दग्ध हिय को चन्दन नहीं चढ़ाते


प्रतिमा ही देख करके क्यों भाल में है रेखा
निर्मित किया किसी ने इसको, यही है रेखा
हर-एक पत्थरो में वह मूर्ति ही छिपी है
शिल्पी ने स्वच्छ करके दिखला दिया, वही है

इस भाव को हमारे उसको तो देख लीजे
धरता है वेश वोही जैसा कि उसको दिजे
यों ही अनेक-रूपी बनकर कभी पुजाया
लीला उसी की जग में सबमें वही समाया

मस्जिद, पगोडा, गिरजा, किसको बनाया तूने
सब भक्त-भावना के छोटे-बड़े नमूने
सुन्दर वितान कैसा आकाश भी तना है
उसका अनन्त-मन्दिर, यह विश्‍व ही बना है|

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता!

जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ,
यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता|

कैफ़ी आज़मी

ख़ुद को इंसान कर लिया है!

सब लोग इससे पहले कि देवता समझते,
हमने ज़रा सा ख़ुद को इंसान कर लिया है|

राजेश रेड्डी

अन्वेषण!

आज फिर से मैं श्री रामनरेश त्रिपाठी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| त्रिपाठी जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि और स्वाधीनता सेनानी भी थे| उनकी कुछ कविताओं का प्रार्थना के रूप में प्रयोग किया जाता है| जैसे- ‘हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए, शीघ्र सारे दुर्गुणों से दूर हमको कीजिए’ अथवा ‘मैं ढूँढता तुझे था जब कुंज और वन में, तू खोजता मुझे था तब दिन के सदन में|’
श्री रामनरेश त्रिपाठी जी के बारे में एक प्रसंग मैंने पढ़ा था, श्री रामनरेश त्रिपाठी जी की एक प्रसिद्ध कविता है- ‘जन को जन के आगे कर फैलाते देखा’| एक बार की बात है कि वे और नेहरू जी एक ही जेल में बंद थे, और कोई उनका भक्त व्यक्ति उनको पंखा झल रहा था| इस पर नेहरू जी ने उनको कविता की एक पंक्ति सुनाई- ‘जन को जन के आगे विजन डुलाते देखा|’
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्री रामनरेश त्रिपाठी जी की यह रचना –

हृदय को हम सदा तेरे लिए तैयार करते हैं।
तुझे आनंद-सा सुख-सा सदा हम प्यार करते हैं॥

तुझे हँसता हुआ देखें किसी दुखिया के मुखड़े पर।
इसी से सत्पुरुष प्रत्येक का उपकार करते हैं॥

बताते हैं पता तारे गगन में और उपवन में,
सुमन संकेत तेरी ओर बारंबार करते हैं॥

अनोखी बात है तेरे निराले प्रेम बंधन में
उलझकर भक्त उलझन से जगत को पार करते हैं॥

न होती आह तो तेरी दया का क्या पता होता।
इसीसे दीन जन दिनरात हाहाकार करते हैं॥

हमें तू सींचने दे आँसुओं से पंथ जीवन का
जगत के ताप का हम तो यही उपचार करते हैं॥


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सदियों तक यह खेल रचाना है!

हम लोग खिलौना हैं एक ऎसे खिलाड़ी का,
जिसको अभी सदियों तक यह खेल रचाना है|

साहिर लुधियानवी

हैसियत क्या मेरी इकाई की!

अज़्मतें सब तेरी ख़ुदाई की,
हैसियत क्या मेरी इकाई की|

बशीर बद्र