घर में हूँ या मैं किसी मज़ार में हूँ!

मकाँ है क़ब्र जिसे लोग ख़ुद बनाते हैं,
मैं अपने घर में हूँ या मैं किसी मज़ार में हूँ|

मुनीर नियाज़ी

ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं!

इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं,
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बा’द|

कैफ़ी आज़मी