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कर दिए लो आज गंगा में प्रवाहित – -किशन सरोज

प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनके कुछ गीत शेयर करने के क्रम में आज प्रस्तुत है उनका एक और प्रसिद्ध गीत। किशन सरोज जी प्रेम के और विरह के गीतों के सुकुमार बादशाह थे, किशन सरोज जी का एक ऐसा ही प्रेम-विरह का गीत आज प्रस्तुत है-

 

 

कर दिए लो आज गंगा में प्रवाहित,
सब तुम्हारे पत्र, सारे चित्र, तुम निश्चिन्त रहना।

 

धुंध डूबी घाटियों के इंद्रधनु तुम
छू गए नत भाल पर्वत हो गया मन,
बूंद भर जल बन गया पूरा समंदर
पा तुम्हारा दुख तथागत हो गया मन,
अश्रु जन्मा गीत कमलों से सुवासित
यह नदी होगी नहीं अपवित्र, तुम निश्चिन्त रहना।

 

दूर हूँ तुमसे न अब बातें उठें
मैं स्वयं रंगीन दर्पण तोड़ आया,
वह नगर, वे राजपथ, वे चौंक-गलियाँ
हाथ अंतिम बार सबको जोड़ आया।
थे हमारे प्यार से जो-जो सुपरिचित,
छोड़ आया वे पुराने मित्र, तुम निश्चिंत रहना।

 

लो विसर्जन आज वासंती छुअन का
साथ बीने सीप-शंखों का विसर्जन,
गुँथ न पाए कनुप्रिया के कुंतलों में
उन अभागे मोर पंखों का विसर्जन,
उस कथा का जो न हो पाई प्रकाशित
मर चुका है एक-एक चरित्र, तुम निश्चिंत रहना।

 

-किशन सरोज

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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ले न पाए हम प्रशंसा-पत्र कोई भीड़ से – किशन सरोज

भारतीय गणतंत्र दिवस के अवसर पर सभी को हार्दिक बधाई।

कल ही मैंने प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनका एक गीत शेयर किया था, आज मन हो रहा है कि उनका एक और गीत शेयर कर लूं। प्रेम के और विरह के गीतों के सुकुमार बादशाह, किशन सरोज जी का एक और गीत प्रस्तुत है-

 

 

बाँह फैलाए खड़े,
निरुपाय, तट के वृक्ष हम
ओ नदी! दो चार पल, ठहरो हमारे पास भी ।

 

चाँद को छाती लगा
फिर सो गया नीलाभ जल
जागता मन के अंधेरों में
घिरा निर्जन महल
और इस निर्जन महल के
एक सूने कक्ष हम
ओ भटकते जुगनुओ ! उतरो हमारे पास भी ।

 

मोह में आकाश के
हम जुड़ न पाए नीड़ से
ले न पाए हम प्रशंसा-पत्र
कोई भीड़ से
अश्रु की उजड़ी सभा के,
अनसुने अध्यक्ष हम
ओ कमल की पंखुरी! बिखरो हमारे पास भी ।

 

लेखनी को हम बनाए
गीतवंती बाँसुरी
ढूंढते परमाणुओं की
धुंध में अलकापुरी
अग्नि-घाटी में भटकते,
एक शापित यक्ष हम
ओ जलदकेशी प्रिये! सँवरो हमारे पास भी ।

 

-किशन सरोज

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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