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शाश्वतता की कगार – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Brink Of Eternity’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


शाश्वतता की कगार


हताशा से भरा मैं बेचैन होकर उसको खोजता हूँ
अपने घर के हर कोने में;
लेकिन उसको नहीं खोज पाता|


मेरा घर छोटा सा है
और जो कुछ एक बार यहाँ से चला जाए, उसे फिर से नहीं पाया जा सकता|

परंतु तुम्हारी हवेली तो अनंत है मेरे प्रभु,
और उसको खोजता हुआ, मैं आया हूँ तुम्हारे द्वार पर|


मैं तुम्हारे सांध्य-आकाश की सुनहरी छतरी के नीचे खड़ा हूँ
और अपनी जिज्ञासु निगाहें तुम्हारे चेहरे की तरफ उठाता हूँ|

मैं शाश्वतता की कगार पर आ गया हूँ, जहां से कुछ भी नष्ट नहीं होता
—न कोई आशा, न खुशी, और न ही किसी चेहरे की झलक, आंसुओं के बीच से देखी गई|


ओह, मेरे रिक्त जीवन को उस समुद्र में डुबो दो,
इसको गहनतम पूर्णता में डूब जाने दो|
मुझको एक बार फिर, वह खो चुका मधुर स्पर्श महसूस करने दो,
ब्रह्माण्ड की समग्रता में|


-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-




Brink Of Eternity



In desperate hope I go and search for her
in all the corners of my room;
I find her not.

My house is small
and what once has gone from it can never be regained.


But infinite is thy mansion, my lord,
and seeking her I have to come to thy door.

I stand under the golden canopy of thine evening sky
and I lift my eager eyes to thy face.


I have come to the brink of eternity from which nothing can vanish
—no hope, no happiness, no vision of a face seen through tears.

Oh, dip my emptied life into that ocean,
plunge it into the deepest fullness.
Let me for once feel that lost sweet touch
in the allness of the universe.

-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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चिड़ियों को दाने, बच्चों को, गुड़धानी दे मौला!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुराना ब्लॉग –

इंटरनेट पर ज्ञान देने वाले तो भरे पड़े हैं, पर मैं अज्ञान का ही पक्षधर हूँ। जो व्यक्ति आज भी दिमाग के स्थान पर दिल पर अधिकतम भरोसा करते हैं, उनमें कवि-शायर काफी बड़ी संख्या में आते हैं। वहाँ भी सभी ऐसे हों, ऐसा नहीं है।


आज मन हो रहा है निदा फाज़ली साहब की शायरी के बारे में कुछ बात करूं। इस इंसान ने कितना अच्छा लिखा है, देख-सुनकर आश्चर्य होता है, पूरी तरह ज़मीन से जुड़े हुए व्यक्ति थे निदा फाज़ली साहब। अपने दोहों में ही उन्होंने आत्मानुभूति का वो अमृत उंडेला है कि सुनकर मन तृप्त हो जाता है।शुरू में तो उसी गज़ल के अमर शेर प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिससे शीर्षक लिया है-

गरज-बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला,
चिड़ियों को दाने, बच्चों को, गुड़धानी दे मौला।

फिर मूरत से बाहर आकर, चारों ओर बिखर जा,
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला।


दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है,
सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला।


और कितनी सादगी से कितनी बड़ी बात कहते हैं, कुछ गज़लों से कुछ शेर यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ-

उसको रुखसत तो किया था, मुझे मालूम न था,
सारा घर ले गया, घर छोड़ के जाने वाला।

एक मुसाफिर के सफर जैसी है सबकी दुनिया,
कोई जल्दी तो कोई देर में जाने वाला।


************
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हम हैं,
रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं।
*************

घर से मस्ज़िद है बहुत दूर चलो यूं कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।

************

बच्चों के छोटे हाथों को, चांद सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़कर ये भी, हम जैसे हो जाएंगे।
************

दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है,
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।

बरसात का बादल तो, दीवाना है क्या जाने,
किस राह से बचना है, किस छत को भिगोना है।

***********

वृंदाबन के कृष्ण कन्हैया अल्ला हू,
बंसी, राधा, गीता, गैया अल्ला हू।

एक ही दरिया नीला, पीला, लाल, हरा,
अपनी अपनी सबकी नैया अल्ला हू।

मौलवियों का सज़दा, पंडित की पूजा,
मज़दूरों की हैया हैया, अल्ला हू।

***********
दुनिया न जीत पाओ तो हारो न खुद को तुम,
थोड़ी बहुत तो ज़ेहन में नाराज़गी रहे।
***********

हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी,
जिसको भी देखना हो, कई बार देखना।


मुझको निदा जी के जो शेर बहुत अच्छे लगते हैं, उन सभी को लिखना चाहूं तो दस-बीस ब्लॉग तो उसमें निकल जाएंगे, मैंने कुछ गज़लों से एक- या दो शेर लिखे हैं, लेकिन उनमें से कोई शेर भी छोडने योग्य नहीं है।


अंत में उनके कुछ दोहे, जिनमें बड़ी सादगी से गहरा दर्शन प्रस्तुत किया गया है-

मैं रोया परदेस में, भीगा मां का प्यार,
दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार।

छोटा करके देखिए जीवन का विस्तार,
आंखों भर आकाश है, बांहों भर संसार।

सबकी पूजा एक सी, अलग अलग हर रीत,
मस्ज़िद जाए मौलवी, कोयल गाए गीत।


सपना झरना नींद का, जागी आंखें प्यास,
पाना, खोना, खोजना, सांसों का इतिहास।


मैंने कुछ शेर यहाँ दिए, क्योंकि यहाँ लिखने की कुछ सीमाएं हैं। इन कुछ उद्धरणों के माध्यम से मैं उस महान शायर को याद करता हूँ, जिसने हिंदुस्तानी शायरी में अपना अनमोल योगदान किया है।

नमस्कार।


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भिक्षुक हृदय – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Beggarly Heart’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


भिक्षुक हृदय


जब मेरा हृदय कठोर और शुष्क हो गया हो,
तब मेरे ऊपर दया की वृष्टि करते हुए आना|

जब जीवन से कृपा लुप्त हो गई हो,
तब एक गीत की गूंज के साथ आना|

जब काम की आपाधापी मुझे पूरी तरह, बाहरी जगत से काट दे,
तब मेरे पास आना, मौन के देवता, अपनी शांति और चैन के साथ|


जब मेरा भिक्षुक हृदय सिर झुकाकर बैठा हो, बंद कमरे के एक कोने में,
तब मेरे सम्राट, द्वार तोड़कर अंदर, एक सम्राट की आनबान के साथ आना|

जब कामनाएँ मुझे अंधा कर दें, मायाजाल और धूल फैलाकर, ओ मेरे पवित्र प्रभु,
सबको जागृत करने वाले, अपने प्रकाश और गर्जना के साथ आना|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-




Beggarly Heart


When the heart is hard and parched up,
come upon me with a shower of mercy.

When grace is lost from life,
come with a burst of song.

When tumultuous work raises its din on all sides shutting me out from
beyond, come to me, my lord of silence, with thy peace and rest.


When my beggarly heart sits crouched, shut up in a corner,
break open the door, my king, and come with the ceremony of a king.

When desire blinds the mind with delusion and dust, O thou holy one,
thou wakeful, come with thy light and thy thunder


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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लो,एक बजा दोपहर हुई!

हिन्दी मंचों पर गीतों के दिव्य हस्ताक्षर स्वर्गीय भारत भूषण जी, जो मेरठ, उत्तर प्रदेश से थे और उनके अनेक गीत मैं हमेशा गुनगुनाता रहा हूं, जैसे – चक्की पर गेहूं लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा-उखाड़ा, क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई’, मैं बनफूल, भला मेरा- कैसा खिलना, क्या मुरझाना’ आदि-आदि| मैं सभी गीतों के मुखड़े लिखूंगा तब भी यह आलेख पूरा हो जाएगा|


आज मैं उनका एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो गर्मी की दोपहर के कुछ दृश्य प्रस्तुत करता है, काफी प्रायोगिक किस्म का गीत है यह| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण जी का ये गीत-



लो
एक बजा दोपहर हुई,
चुभ गई हृदय के बहुत पास
फिर हाथ घड़ी की
तेज सुई|

पिघली
सड़कें झरती लपटें
झुँझलाईं लूएँ धूल भरी,
किसने देखा किसने जाना
क्यों मन उमड़ा क्यों
आँख चुई|

रिक्शेवालों की
टोली में पत्ते कटते पुल के नीचे,
ले गई मुझे भी ऊब वहीं कुछ सिक्के मुट्ठी में भींचे,
मैंने भी एक दाँव खेला, इक्का माँगा पर
पर खुली दुई|

सहसा चिंतन को
चीर गई, आँगन में उगी हुई बेरी,
बह गई लहर के साथ लहर, कोई मेरी कोई तेरी।
फिर घर धुनिये की ताँत हुआ फिर प्राण हुए
असमर्थ रुई|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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जो पुल बनाएँगे – अज्ञेय

आज एक छोटी सी कविता शेयर कर रहा हूँ, अज्ञेय जी की यह कविता छोटी सी है परंतु बड़ी बात कहती है| अज्ञेय जी हिन्दी साहित्य का ऐसा युगांतरकारी व्यक्तित्व थे, वे भारत में प्रयोगवाद और नई कविता के प्रणेता रहे| हाँ वे विशेष रूप से कम्युनिस्टों के निशाने पर रहते थे| कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृतांत, निबंध आदि हर क्षेत्र में अज्ञेय जी ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है|

लीजिए प्रस्तुत है अज्ञेय जी की यह कविता-

 

 

जो पुल बनाएँगे
वे अनिवार्यतः
पीछे रह जाएँगे।

 

सेनाएँ हो जाएँगी पार
मारे जाएँगे रावण
जयी होंगे राम;
जो निर्माता रहे
इतिहास में बंदर कहलाएँगे।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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जंगल के राजा सावधान!

आज मैं हिन्दी कविता के एक महान स्तंभ स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बातचीत के लहजे में कविता लिखने के लिए प्रसिद्ध थे| आपातकाल में वे प्रतिदिन तीन रचनाएँ लिखते थे, जिसे ‘त्रिकाल संध्या’ नाम से संकलित किया गया| मेरा सौभाग्य है कि मुझे दिल्ली की एक काव्य गोष्ठी में उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर मिला| फिल्मों में गीत लिखने के अनुभव को लेकर लिखी गई उनकी कविता – ‘गीत फ़रोश’ विशेष रूप से लोकप्रिय हुई थी|

आजकल तो जीवों के प्रति दया के बहुत अभियान चल रहे हैं, बड़े-बड़े फिल्मी कलाकार भी इस मामले में अदालतों के चक्कर काट रहे हैं| भवानी दादा ने बहुत पहले अपने मनोरंजन के लिए जीवों का शिकार करने की इस प्रवृत्ति के विरुद्ध यह कविता लिखी थी|

 

 

जंगल के राजा, सावधान !
ओ मेरे राजा, सावधान !

 

कुछ अशुभ शकुन हो रहे आज l
जो दूर शब्द सुन पड़ता है,
वह मेरे जी में गड़ता है,
रे इस हलचल पर पड़े गाज l

 

ये यात्री या कि किसान नहीं,
उनकी-सी इनकी बान नहीं,
चुपके चुपके यह बोल रहे ।
यात्री होते तो गाते तो,
आगी थोड़ी सुलगाते तो,
ये तो कुछ विष-सा बोल रहे ।

 

वे एक एक कर बढ़ते हैं,
लो सब झाड़ों पर चढ़ते हैं,
राजा ! झाड़ों पर है मचान ।
जंगलके राजा, सावधान !
ओ मेरे राजा, सावधान !

 

राजा गुस्से में मत आना,
तुम उन लोगों तक मत जाना ;
वे सब-के-सब हत्यारे हैं ।
वे दूर बैठकर मारेंगे,
तुमसे कैसे वे हारेंगे,
माना, नख तेज़ तुम्हारे हैं ।
“ये मुझको खाते नहीं कभी,
फिर क्यों मारेंगे मुझे अभी ?”
तुम सोच नहीं सकते राजा ।

 

तुम बहुत वीर हो, भोले हो,
तुम इसीलिए यह बोले हो,
तुम कहीं सोच सकते राजा ।
ये भूखे नहीं पियासे हैं,
वैसे ये अच्छे खासे हैं,
है ‘वाह वाह’ की प्यास इन्हें ।

 

ये शूर कहे जायँगे तब,
और कुछ के मन भाएँगे तब,
है चमड़े की अभिलाष इन्हें,
ये जग के, सर्व-श्रेष्ठ प्राणी,
इनके दिमाग़, इनके वाणी,
फिर अनाचार यह मनमाना !
राजा, गुस्से में मत आना,
तुम उन लोगों तक मत जाना|

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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वह अट्टहासों का धनी, अब मुस्कुराता तक नहीं!

आज मैं एक बार फिर से अपने प्रिय कवियों में से एक रहे, स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, ये बात मुझे बार-बार बतानी अच्छी लगती है कि मैंने कई बार उनको अपने आयोजनों में बुलाया था और वे बड़े आत्मीय भाव से गले मिलते थे| एक बात और बता दूँ, मैं अपने एक निकट संबंधी की मृत्यु का समाचार पाकर वहाँ जा रहा था| तभी ट्रेन में यात्रा करते समय मुझे किशन जी की मृत्यु का समाचार ज्ञात हुआ, कुमार विश्वास जी के द्वारा लिखा गया पोस्ट पढ़कर| यह पढ़कर मेरी स्थिति ऐसी हो गई कि मुझे लगा कि अगर मैं यहाँ ट्रेन में ही रोने लगा तो लोग क्या कहेंगे|

 

खैर आप किशन सरोज जी का, गीत कवि की व्यथा से जुड़ा यह भावुक सा गीत पढ़िए-

 

इस गीत कवि को क्या हुआ,
अब गुनगुनाता तक नहीं|

 

इसने रचे जो गीत जग ने
पत्रिकाओं में पढ़े,
मुखरित हुए तो भजन जैसे
अनगिनत होंठों चढ़े|

 

होंठों चढ़े, वे मन बिंधे,
अब गीत गाता तक नहीं|

 

अनुराग, राग विराग
सौ सौ व्यंग-शर इसने सहे,
जब जब हुए गीले नयन
तब तब लगाये कहकहे|

 

वह अट्टहासों का धनी
अब मुस्कुराता तक नहीं|

 

मेलों तमाशों में लिये
इसको फिरी आवारगी,
कुछ ढूँढती सी दॄष्टि में
हर शाम मधुशाला जगी|

 

अब भीड़ दिखती है जिधर,
उस ओर जाता तक नहीं|

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

 

 

आज वसीम बरेलवी साहब की एक गज़ल याद आ रही है, बस उसके शेर एक-एक करके शेयर कर लेता हूँ। बड़ी सादगी के साथ बड़ी सुंदर बातें की हैं, वसीम साहब ने इस गज़ल में। पहला शेर तो वैसा ही है, जैसा हम कहते हैं, कोई बहुत सुंदर हो तो उसको देखकर-

आपको देख कर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया।

ये बात तो उनकी हुई, कि उन्होंने अपनी झलक से जैसे मंत्रमुग्ध कर दिया हो, अब आपके पास क्या है मियां? आपकी बातें, आपके जज़्बात, आपका अंदाज-ए-बयां। उसके दम पर ही आपको तो अपनी छाप छोड़नी होगी न! आपने अपनी सारी प्रतिभा, सारी ईमानदारी, सब कुछ लगा दिया उसको प्रभावित करने में, लेकिन आखिर में हुआ तो बस इतना-

आते-आते मेरा नाम-सा रह गया
उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया।

अब ये सब कैसे समझाया जाए कि जहाँ पर तबीयत जम जाए, ऐसा लगता है कि वो तो बस सामने ही रहे और हम उसको देखते रहें, लेकिन ऐसे में अचानक ऐसा होता है, और हम फिर से देखते ही रह जाते हैं-

वो मेरे सामने ही गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया।

होता यह भी है आज के समय में कि जब आप अपनी खूबियों से, जो आपके अंदर हैं, उनसे लोगों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, वहीं आज का समय ऐसा है, ऐसे लोग आज उभरकर सामने आते हैं कि उनके भीतर भले ही कुछ न हो, वे स्वयं को शाहरुख खान की तरह, मतलब कि जहाँ जैसी जरूरत है, जैसी डिमांड है, उस रूप में प्रस्तुत कर देंगे। गज़लों में अक्सर आशिक़-माशूक़ के रूप में बातें रखी जाती हैं, लेकिन वास्तविक ज़िंदगी में वह कोई भी हो सकता है, आपका बॉस भी हो सकता है! जिसे आप अपनी भीतरी खूबसूरती से, अपनी प्रतिभा से, अपनी सच्चाई से प्रभावित करना चाहते हैं, और दूसरे लोग उसको अपने प्रेज़ेंटेशन से प्रभावित कर लेते हैं, और ऐसा बार-बार होता है, क्योंकि आपको तो अपनी सच्चाई पर ही भरोसा है-

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये
और मैं था कि सच बोलता रह गया।

अब आखिर में अचानक, मुझे डॉ. धर्मवीर भारती की लिखी एक कहानी याद आ रही है- ‘गुलकी बन्नो’, वैसे मुझको इसका ताना-बाना कुछ याद नहीं है, बस इतना है कि एक कन्या, जो बहू बनकर आई थी मुहल्ले के एक गरीब परिवार में, उस पर इतनी मुसीबतें आती हैं, इतनी बार वह टूटती है, मुसीबतें झेलती है, कुछ बार बहुत दिन तक नहीं दिखती, लेखक सोचता है कि मर-खप गई है, फिर अचानक दिखाई दे जाती है, शरीर कंकाल हो चुका है, लेकिन वही मुस्कान, दांत निपोरती हुई पहले की तरह्।
सच्चे लोगों की परीक्षा ज़िंदगी कुछ ज्यादा ही लेती है, और आखिरी शेर इस गज़ल का प्रस्तुत है-

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया।

आज वसीम बरेलवी साहब की इस गज़ल के बहाने आपसे कुछ बातें हो गईं।

नमस्कार।

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वो सांवली सी एक लड़की!

आज फिर से मैं अपने एक प्रिय शायर स्व. निदा फाज़ली जी की रचना शेयर कर रहा हूँ। उनकी रचनाओं में, गज़लों में, दोहों में एक अलग तरह की रवानी, सादगी, ताज़गी और मिट्टी का सौंधापन देखने को मिलता है।

कल मैने ‘मां’ के बारे में उनकी एक रचना शेयर की थी, बाद में याद आया कि यह रचना मैं पहले भी शेयर कर चुका था।
आज जो रचना शेयर कर रहा हूँ, वो इस बात की बानगी है कि एक सच्चा रचनाकार अपने परिवेश से इस क़दर जुड़ा होता है, कि मानो आस-पास जो कुछ है, वो उसके व्यक्तित्व का ही एक हिस्सा है। लीजिए प्रस्तुत है उनकी यह रचना-

 

 

वो शोख शोख नज़र सांवली सी एक लड़की,
जो रोज़ मेरी गली से गुज़र के जाती है।
सुना है
वो किसी लड़के से प्यार करती है।

 

बहार हो के, तलाश-ए-बहार करती है।
न कोई मेल न कोई लगाव है लेकिन न जाने क्यूँ,
बस उसी वक़्त जब वो आती है
कुछ इंतिज़ार की आदत सी हो गई है
मुझे,
एक अजनबी की ज़रूरत हो गई है मुझे।

 

मेरे बरांडे के आगे यह फूस का छप्पर
गली के मोड पे खडा हुआ सा
एक पत्थर
वो एक झुकती हुई बदनुमा सी नीम की शाख
और उस पे जंगली कबूतर के घोंसले का निशाँ,
यह सारी चीजें कि जैसे मुझी में शामिल हैं,
मेरे दुखों में मेरी हर खुशी में शामिल हैं,
मैं चाहता हूँ कि वो भी यूं ही गुज़रती रहे,
अदा-ओ-नाज़ से लड़के को प्यार करती रहे।

निदा फ़ाज़ली

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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श्रीराम की जलसमाधि – भारत भूषण

आज फिर से मैं अपने प्रिय कवि/गीतकारों में से एक स्व. भारत भूषण जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इस रचना में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जलसमाधि का प्रसंग प्रस्तुत किया गया है। श्रीराम जो शिखर पर हैं, लोगों के प्रभु हैं, अयोध्या के नरेश हैं, जब प्रसंग के अनुसार वे जल-समाधि लेते हैं, वे किसी से कोई शिकायत नहीं कर सकते, शिखर पर व्यक्ति कितना अकेला होता है, वह ईश्वर का अवतार ही क्यों न हो!

श्रीराम की जल समाधि के प्रसंग में, वे जब जल में क्रमशः डूबते जाते हैं, तब उनके मन में क्या-क्या आता है, इसका बहुत सुंदर वर्णन स्व. भारत भूषण जी ने अपनी रचना में किया है। लीजिए प्रस्तुत है यह अति सुंदर रचना-

 

 

पश्चिम में ढलका सूर्य उठा वंशज सरयू की रेती से,
हारा-हारा, रीता-रीता, निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम,
निःशब्द अधर पर रोम-रोम था टेर रहा सीता-सीता।

 

किसलिए रहे अब ये शरीर, ये अनाथ मन किसलिए रहे,
धरती को मैं किसलिए सहूँ, धरती मुझको किसलिए सहे।
तू कहाँ खो गई वैदेही, वैदेही तू खो गई कहाँ,
मुरझे राजीव नयन बोले, काँपी सरयू, सरयू काँपी,
देवत्व हुआ लो पूर्णकाम, नीली माटी निष्काम हुई,
इस स्नेहहीन देह के लिए, अब सांस-सांस संग्राम हुई।

 

ये राजमुकुट, ये सिंहासन, ये दिग्विजयी वैभव अपार,
ये प्रियाहीन जीवन मेरा, सामने नदी की अगम धार,
माँग रे भिखारी, लोक माँग, कुछ और माँग अंतिम बेला,
इन अंचलहीन आँसुओं में नहला बूढ़ी मर्यादाएँ,
आदर्शों के जलमहल बना, फिर राम मिलें न मिलें तुझको,
फिर ऐसी शाम ढले न ढले।

 

ओ खंडित प्रणयबंध मेरे, किस ठौर कहां तुझको जोडूँ,
कब तक पहनूँ ये मौन धैर्य, बोलूँ भी तो किससे बोलूँ,
सिमटे अब ये लीला सिमटे, भीतर-भीतर गूँजा भर था,
छप से पानी में पाँव पड़ा, कमलों से लिपट गई सरयू,
फिर लहरों पर वाटिका खिली, रतिमुख सखियाँ, नतमुख सीता,
सम्मोहित मेघबरन तड़पे, पानी घुटनों-घुटनों आया,
आया घुटनों-घुटनों पानी। फिर धुआँ-धुआँ फिर अँधियारा,
लहरों-लहरों, धारा-धारा, व्याकुलता फिर पारा-पारा।

 

फिर एक हिरन-सी किरन देह, दौड़ती चली आगे-आगे,
आँखों में जैसे बान सधा, दो पाँव उड़े जल में आगे,
पानी लो नाभि-नाभि आया, आया लो नाभि-नाभि पानी,
जल में तम, तम में जल बहता, ठहरो बस और नहीं कहता,
जल में कोई जीवित दहता, फिर एक तपस्विनी शांत सौम्य,
धक धक लपटों में निर्विकार, सशरीर सत्य-सी सम्मुख थी,
उन्माद नीर चीरने लगा, पानी छाती-छाती आया,
आया छाती-छाती पानी।

 

आगे लहरें बाहर लहरें, आगे जल था, पीछे जल था,
केवल जल था, वक्षस्थल था, वक्षस्थल तक केवल जल था।
जल पर तिरता था नीलकमल, बिखरा-बिखरा सा नीलकमल,
कुछ और-और सा नीलकमल, फिर फूटा जैसे ज्योति प्रहर,
धरती से नभ तक जगर-मगर, दो टुकड़े धनुष पड़ा नीचे,
जैसे सूरज के हस्ताक्षर, बांहों के चंदन घेरे से,
दीपित जयमाल उठी ऊपर,

 

सर्वस्व सौंपता शीश झुका, लो शून्य राम लो राम लहर,
फिर लहर-लहर, सरयू-सरयू, लहरें-लहरें, लहरें- लहरें,
केवल तम ही तम, तम ही तम, जल, जल ही जल केवल,
हे राम-राम, हे राम-राम
हे राम-राम, हे राम-राम ।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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