खंडहर के प्रति- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

छायावाद युग के एक स्तंभ महाप्राण निराला, जी हाँ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| निराला जी का काव्य और उनका रचनाकाल हिन्दी कविता के विकास क्रम में एक महत्वपूर्ण समय है| निराला जी की अनेक कविताएं हमें याद आती हैं जैसे भिक्षुक के बारे में उनकी कविता- ‘वह आता, दो टूक कलेजे के करता, पछताता पथ पर आता’, ‘वह तोड़ती पत्थर’ आदि| उनकी रचना ‘राम की शक्ति-पूजा’ तो हिन्दी कविता के इतिहास में एक मील का पत्थर है|

लीजिए आज प्रस्तुत है निराला जी की यह कविता, जिसमें उन्होंने ‘खंडहर’ के बहाने से हमारे आप्त-पुरुषों को याद किया है –

खंडहर! खड़े हो तुम आज भी?
अदभुत अज्ञात उस पुरातन के मलिन साज!
विस्मृति की नींद से जगाते हो क्यों हमें–
करुणाकर, करुणामय गीत सदा गाते हुए?

पवन-संचरण के साथ ही
परिमल-पराग-सम अतीत की विभूति-रज-
आशीर्वाद पुरुष-पुरातन का
भेजते सब देशों में;
क्या है उद्देश तव?
बन्धन-विहीन भव!
ढीले करते हो भव-बन्धन नर-नारियों के?
अथवा,
हो मलते कलेजा पड़े, जरा-जीर्ण,
निर्निमेष नयनों से
बाट जोहते हो तुम मृत्यु की
अपनी संतानों से बूँद भर पानी को तरसते हुए?


किम्बा, हे यशोराशि!
कहते हो आँसू बहाते हुए–
“आर्त भारत! जनक हूँ मैं
जैमिनि-पतंजलि-व्यास ऋषियों का;
मेरी ही गोद पर शैशव-विनोद कर
तेरा है बढ़ाया मान
राम-कॄष्ण-भीमार्जुन-भीष्म-नरदेवों ने।
तुमने मुख फेर लिया,
सुख की तृष्णा से अपनाया है गरल,
हो बसे नव छाया में,
नव स्वप्न ले जगे,
भूले वे मुक्त प्राण, साम-गान, सुधा-पान।”
बरसो आसीस, हे पुरुष-पुराण,
तव चरणों में प्रणाम है।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सखि वसन्त आया!

हिन्दी काव्य के गौरव और छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| ऐसा भी माना जाता है कि निराला जी के काव्य में कविता के आने वाले दौर के, नवगीत के भी अंकुर शामिल थे| निराला जी ने कविता में बहुत प्रयोग किए और अनेक कालजयी रचनाएं दीं, जिनमें ‘राम की शक्ति पूजा’ भी शामिल थी|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी द्वारा रचित, वसंत का वर्णन अपने विशिष्ट अन्दाज़ में प्रस्तुत करने वाली यह कविता –

सखि वसन्त आया ।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया ।
किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका,
मधुप-वृन्द बन्दी–
पिक-स्वर नभ सरसाया ।

लता-मुकुल-हार-गंध-भार भर,
बही पवन बंद मंद मंदतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया ।

आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे,
केशर के केश कली के छुटे,
स्वर्ण-शस्य-अंचल
पृथ्वी का लहराया ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तुमको ही याद किया, तुमको भुलाने के लिए!

आज मैं स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब की एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ | निदा फ़ाज़ली साहब की शायरी में एक सधुक्कड़ी अंदाज़ देखने को मिलता है| मैंने पहले भी निदा साहब की बहुत सी रचनाएं शेयर की हैं, क्या ग़ज़ब की शायरी और दोहे हैं निदा साहब के-

मैं रोया परदेस में, भीगा मां का प्यार, दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार’,

‘घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए’,

‘दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है, सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला’,

मैं इस प्रकार सैंकड़ों उदाहरण दे सकता हूँ लेकिन फिलहाल एक ही और दूंगा

दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब की यह ग़ज़ल –

हम हैं कुछ अपने लिए कुछ हैं ज़माने के लिए,
घर से बाहर की फ़ज़ा हँसने-हँसाने के लिए|

यूँ लुटाते न फिरो मोतियों वाले मौसम,
ये नगीने तो हैं रातों को सजाने के लिए|

अब जहाँ भी हैं वहीं तक लिखो रूदाद-ए-सफ़र,
हम तो निकले थे कहीं और ही जाने के लिए|

मेज़ पर ताश के पत्तों-सी सजी है दुनिया,
कोई खोने के लिए है कोई पाने के लिए|

तुमसे छुट कर भी तुम्हें भूलना आसान न था,
तुमको ही याद किया तुमको भुलाने के लिए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मैं सांसों के दो तार लिए फिरता हूँ!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी काव्य जगत के अनूठे कवि, किसी समय मंचों की शोभा बढ़ाने वाले और श्रोताओं को झूमने के लिए मजबूर करने वाले, स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसे उन्होंने आत्म-परिचय के रूप में प्रस्तुत किया है|

एक बार फिर से मुझे आकाशवाणी के लिए बच्चन जी का एक इंटरव्यू याद आ रहा है, जिसमें उनके साथ मैं भी मौजूद था| साक्षात्कारकर्ता सुश्री कमला शास्त्री ने कहा कि आपके गीत शायद इसलिए बहुत लोकप्रिय हैं क्योंकि इनकी भाषा बहुत सरल है|


इस पर बच्चन जी ने कहा था कि भाषा का सरल होना इतना आसान नहीं है, इसके लिए इंसान को भीतर से बच्चा बनना पड़ता है| खैर आज प्रस्तुत है बच्चन जी का यह गीत-


मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्‍यार लिए फिरता हूँ;
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
मैं सासों के दो तार लिए फिरता हूँ!



मैं स्‍नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्‍यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा है उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!


मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;
है यह अपूर्ण संसार ने मुझको भाता
मैं स्‍वप्‍नों का संसार लिए फिरता हूँ!


मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,
सुख-दुख दोनों में मग्‍न रहा करता हूँ;
जग भ्‍ाव-सागर तरने को नाव बनाए,
मैं भव मौजों पर मस्‍त बहा करता हूँ!

मैं यौवन का उन्‍माद लिए फिरता हूँ,
उन्‍मादों में अवसाद लए फिरता हूँ,
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,
मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ!


कर यत्‍न मिटे सब, सत्‍य किसी ने जाना?
नादन वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!
फिर मूढ़ न क्‍या जग, जो इस पर भी सीखे?
मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भूलना!

मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;
जग जिस पृथ्‍वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्‍वी को ठुकराता!


मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिसपर भूपों के प्रसाद न्यौछावर,
मैं उस खंडर का भाग लिए फिरता हूँ!

मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;
क्‍यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!

मैं दीवानों का एक वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ;
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्‍ती का संदेश लिए फिरता हूँ!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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हरी हरी दूब पर!

आज मैं भारत के पूर्व प्रधान मंत्री, महान राजनेता, अनूठे वक्ता और एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय वाजपेयी जी ने हर भूमिका में अपनी अमिट छाप छोड़ी है| जहां आज भी हम उनके ऐतिहासिक भाषणों को यदा-कदा सुनते रहते हैं वहीं उनकी कविताएं भी हमें उस महान व्यक्तित्व की याद दिलाती रहती हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता-


हरी हरी दूब पर
ओस की बूंदें
अभी थीं,
अभी नहीं हैं|
ऐसी खुशियाँ
जो हमेशा हमारा साथ दें
कभी नहीं थी,
कहीं नहीं हैं|


क्काँयर की कोख से
फूटा बाल सूर्य,
जब पूरब की गोद में
पाँव फैलाने लगा,
तो मेरी बगीची का
पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,
मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ
या उसके ताप से भाप बनी,
ओस की बूंदों को ढूंढूँ?


सूर्य एक सत्य है
जिसे झुठलाया नहीं जा सकता
मगर ओस भी तो एक सच्चाई है
यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है
क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ?
कण-कण में बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ?


सूर्य तो फिर भी उगेगा,
धूप तो फिर भी खिलेगी,
लेकिन मेरी बगीची की
हरी-हरी दूब पर,
ओस की बूंद
हर मौसम में नहीं मिलेगी|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तू भी सो जा, सो गई रंग भरी शाम!

आज जनकवि शैलेन्द्र जी का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ| अभी 30 अगस्त को ही उनकी जन्मतिथि थी| शैलेन्द्र जी राजकपूर जी की टीम में थे और उन्होंने उनकी फिल्मों के लिए और अन्य कलाकारों के लिए भी अनेक यादगार गीत लिखे|

शैलेन्द्र एक ऐसे सृजनशील रचनाकार थे जिनको फिल्मी दुनिया की चकाचौंध बिल्कुल प्रभावित नहीं कर पाई| उन्होंने अपने गीतों में सामान्य जन के भावों को अभिव्यक्त किया और अंत में फणीश्वर नाथ रेणु जी की कहानी पर ‘तीसरी कसम’ फिल्म बनाई जिसे बनाना बहुत साहस की बात थी, इस फिल्म को अनेक पुरस्कार मिले लेकिन उस समय परदे पर यह फिल्म सफल नहीं हुई और शायद इसका धक्का ही उनके लिए प्राणघातक सिद्ध हुआ|

लीजिए आज उस महान रचनाकार की स्मृति में प्रस्तुत है उनका यह गीत, जो 1964 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘बेटी-बेटे, में फिल्माया गया था –


आज कल में ढल गया
दिन हुआ तमाम
तू भी सो जा सो गई
रंग भरी शाम|

साँस साँस का हिसाब ले रही है ज़िन्दगी
और बस दिलासे ही दे रही है ज़िन्दगी
रोटियों के ख़्वाब से चल रहा है काम|
तू भी सोजा ….

रोटियों-सा गोल-गोल चांद मुस्‍कुरा रहा
दूर अपने देश से मुझे-तुझे बुला रहा
नींद कह रही है चल, मेरी बाहें थाम|
तू भी सोजा…


गर कठिन-कठिन है रात ये भी ढल ही जाएगी
आस का संदेशा लेके फिर सुबह तो आएगी
हाथ पैर ढूंढ लेंगे , फिर से कोई काम|
तू भी सोजा…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तुम प्राणों की अगन हरो तो!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

एक बार फिर से आज मैं हिन्दी के दुलारे गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक प्रेम की गहनता और पवित्रता से भरा गीत शेयर कर रहा हूँ| भावुकता और समर्पण वैसे तो जीवन में कठिनाई से ही कहीं काम आते हैं, आजकल बहुत कम मिलते हैं इनको समझने वाले, परंतु कवि-गीतकारों के लिए तो यह बहुत बड़ी पूंजी होती है, अनेक गीत इनके कारण ही जन्म लेते हैं|

लीजिए प्रस्तुत है भारत भूषण जी का यह खूबसूरत गीत-

सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ
प्रिय मिलने का वचन भरो तो !
पलकों-पलकों शूल बुहारूँ
अँसुअन सींचू सौरभ गलियाँ,
भँवरों पर पहरा बिठला दूँ
कहीं न जूठी कर दें कलियाँ|
फूट पड़े पतझर से लाली
तुम अरुणारे चरन धरो तो !
रात न मेरी दूध नहाई
प्रात न मेरा फूलों वाला,
तार-तार हो गया निमोही
काया का रंगीन दुशाला|
जीवन सिंदूरी हो जाए
तुम चितवन की किरन करो तो !
सूरज को अधरों पर धर लूँ
काजल कर आँजूँ अँधियारी,
युग-युग के पल छिन गिन-गिनकर
बाट निहारूँ प्राण तुम्हारी|
साँसों की जंज़ीरें तोड़ूँ
तुम प्राणों की अगन हरो तो|


इस गीत के साथ मैं उस महान गीतकार का विनम्र स्मरण करता हूँ।

नमस्कार
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जग से परिचय, तुमसे परिणय!

कविताएं शेयर करने के क्रम में, मैं सामान्यतः आधुनिक कवियों की रचनाएँ शेयर करता हूँ और इसमें फिल्मों से जुड़े रचनाकारों को भी शामिल कर लेता हूँ, क्योंकि फिल्मों में भी अनेक श्रेष्ठ रचनाकारों ने अपना योगदान दिया है|


आज मैं छायावाद युग के एक स्तंभ रहे स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| वास्तव में कविता का प्रत्येक युग एक महत्वपूर्ण पड़ाव है|

आज की रचना, उस युग में प्रेम की अभिव्यक्ति का एक सुंदर उदाहरण है, लीजिए प्रस्तुत है-

खिल उठा हृदय,
पा स्पर्श तुम्हारा अमृत अभय!

खुल गए साधना के बंधन,
संगीत बना, उर का रोदन,
अब प्रीति द्रवित प्राणों का पण,
सीमाएँ अमिट हुईं सब लय।

क्यों रहे न जीवन में सुख दुख
क्यों जन्म मृत्यु से चित्त विमुख?
तुम रहो दृगों के जो सम्मुख
प्रिय हो मुझको भ्रम भय संशय!

तन में आएँ शैशव यौवन
मन में हों विरह मिलन के व्रण,
युग स्थितियों से प्रेरित जीवन
उर रहे प्रीति में चिर तन्मय!

जो नित्य अनित्य जगत का क्रम
वह रहे, न कुछ बदले, हो कम,
हो प्रगति ह्रास का भी विभ्रम,
जग से परिचय, तुमसे परिणय!

तुम सुंदर से बन अति सुंदर
आओ अंतर में अंतरतर,
तुम विजयी जो, प्रिय हो मुझ पर
वरदान, पराजय हो निश्चय!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सागर किनारे – अज्ञेय

आज हिन्दी साहित्य के एक विराट व्यक्तित्व – सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|


अज्ञेय जी ने वैसे तो साहित्य की हर विधा में अपनी छाप छोड़ी है परंतु हिन्दी कविता को नया स्वरूप प्रदान करने वालों में उनकी प्रमुख भूमिका थी|


लीजिए प्रस्तुत है अज्ञेय जी की एक कविता-

सागर के किनारे
तनिक ठहरूँ, चाँद उग आये, तभी जाऊँगा वहाँ नीचे
कसमसाते रुद्ध सागर के किनारे। चाँद उग आये।
न उसकी बुझी फीकी चाँदनी में दिखें शायद

वे दहकते लाल गुच्छ बुरूँस के जो
तुम हो। न शायद चेत हो, मैं नहीं हूँ वह डगर गीली दूब से मेदुर,
मोड़ पर जिसके नदी का कूल है, जल है,
मोड़ के भीतर-घिरे हों बाँह में ज्यों-गुच्छ लाल बुरूँस के उत्फुल्ल।


न आये याद, मैं हूँ किसी बीते साल के सीले कलेंडर की
एक बस तारीख, जो हर साल आती है।
एक बस तारीख-अंकों में लिखी ही जो न जावे
जिसे केवल चन्द्रमा का चिह्न ही बस करे सूचित-

बंक-आधा-शून्य; उलटा बंक-काला वृत्त,
यथा पूनो-तीज-तेरस-सप्तमी,
निर्जला एकादशी-या अमावस्या।
अँधेरे में ज्वार ललकेगा-


व्यथा जागेगी। न जाने दीख क्या जाए जिसे आलोक फीका
सोख लेता है। तनिक ठहरूँ। कसमसाते रुद्ध सागर के किनारे
तभी जाऊँ वहाँ नीचे-चाँद उग आये।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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स्वतन्त्रता- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Freedom’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

स्वतंत्रता!

भय से मुक्ति ही वह स्वतंत्रता है
जिसकी मैं अपनी मातृभूमि के लिए मैं मांग करता हूँ!
युगों-युगों के उस भार से मुक्ति, जो आपके शीश को झुकाता है,
आपकी कमर तोड़ता है, आपकी आँखों को भविष्य की मांग दर्शाते संकेत
देखने में असफल बना देता है;
निद्रा के बंधनों से मुक्ति, जहां आप स्वयं को रात्रि की
निश्‍चलता के बंधनों को सौंप देते हो,
उस सितारे पर अविश्वास करते हुए, जो सत्य के साहसिक पथ और
प्रारब्ध की अराजकता से मुक्ति के बारे मे बताता है,
सभी नौकाएँ कमजोर होकर दिशाहीन अनिश्चित हवाओं के हवाले हो जाती हैं,
और ऐसे हाथ में पड़ जाती हैं जो सदा मृत्यु की तरह कठोर और ठंडे रहते हैं|
कठपुतलियों की दुनिया में रहने के अपमान से मुक्ति,
जहां सभी गतिविधियां मस्तिष्कहीन तारों के माध्यम से प्रारंभ होती हैं,
और फिर जड़बुद्धि आदतों के माध्यम से दोहराई जाती हैं,
जहां आकृतियाँ धैर्य और आज्ञाकारिता के साथ,
प्रदर्शन के स्वामी की प्रतीक्षा करते हैं,
कि वह उनको हिला-डुलाकर जीवन स्वांग प्रस्तुत करे|


-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Freedom

Freedom from fear is the freedom
I claim for you my motherland!
Freedom from the burden of the ages, bending your head,
breaking your back, blinding your eyes to the beckoning
call of the future;
Freedom from the shackles of slumber wherewith
you fasten yourself in night’s stillness,
mistrusting the star that speaks of truth’s adventurous paths;
freedom from the anarchy of destiny
whole sails are weakly yielded to the blind uncertain winds,
and the helm to a hand ever rigid and cold as death.
Freedom from the insult of dwelling in a puppet’s world,
where movements are started through brainless wires,
repeated through mindless habits,
where figures wait with patience and obedience for the
master of show,
to be stirred into a mimicry of life.



-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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