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खामोशी पहचाने कौन!

एक बार फिर से आज मैं अपने अत्यंत प्रिय शायरों में से एक, स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे जगजीत सिंह-चित्रा सिंह की सुरीली जोड़ी ने बहुत खूबसूरत अंदाज में गाया है|

निदा फ़ाज़ली साहब ने कुछ बेमिसाल गीत, ग़ज़लें और दोहे लिखे हैं और यह भी उनमें शामिल है| इंसानी भावनाओं को बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति निदा साहब की रचनाओं में मिलती है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, निदा फ़ाज़ली साहब का यह सुंदर गीत –

मुँह की बात सुने हर कोई
दिल के दर्द को जाने कौन,
आवाज़ों के बाज़ारों में
ख़ामोशी पहचाने कौन।

सदियों-सदियों वही तमाशा
रस्ता-रस्ता लम्बी खोज
लेकिन जब हम मिल जाते हैं
खो जाता है जाने कौन।


जाने क्या-क्या बोल रहा था
सरहद, प्यार, किताबें, ख़ून
कल मेरी नींदों में छुपकर
जाग रहा था जाने कौन।

मैं उसकी परछाई हूँ या
वो मेरा आईना है
मेरे ही घर में रहता है
मेरे जैसा जाने कौन।


किरन-किरन अलसाता सूरज
पलक-पलक खुलती नींदें
धीमे-धीमे बिखर रहा है
ज़र्रा-ज़र्रा जाने कौन।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार

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तुम हो जाओ अविचल!

आज मैं पुनः अपनी एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहरा रहा हूँ|

आज मैं विख्यात कवि, नोबेल पुरस्कार विजेता- श्री पाब्लो नेरुदा की मूल रूप से ‘स्पेनिश’ भाषा में लिखी गई एक कविता के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर उसका भावानुवाद और उसके बाद अंग्रेजी में अनूदित कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-


पाब्लो नेरुदा


मैं चाहता हूँ कि तुम हो जाओ अविचल



मैं चाहता हूँ कि तुम रहो अविचल- स्थिर, शांत
जैसे कि तुम यहाँ हो ही नहीं
और तुम सुनो मेरी आवाज, बहुत दूर से
और मेरी आवाज तुम्हे छू नहीं पाए,
ऐसा लगे कि जैसे तुम्हारे नेत्र कहीं उड़ गए हों,
और ऐसा लगता है कि किसी चुंबन ने तुम्हारे मुंह को बंद कर दिया है,
जैसे सभी पदार्थ, मेरी आत्मा से भरे हैं
और तुम उन पदार्थों से बाहर निकलती हो,
मेरी आत्मा से भरी हुई,
तुम मेरी आत्मा की तरह हो,
स्वप्न की एक तितली,
और तुम इस एक शब्द की तरह हो: अवसाद,


मैं चाहता हूँ कि तुम रहो अविचल- स्थिर, शांत
और तुम बहुत दूर लगती हो,
ऐसा लगता है जैसे तुम विलाप कर रही हो,
एक तितली, कपोत की तरह गुटर-गूं कर रही है,
और तुम मुझे बहुत दूर से सुनती हो,
और मेरी आवाज तुम तक नहीं पहुंचती है,
मुझे आने दो, जिससे मैं तुम्हारे मौन में स्थिर हो जाऊं,
और मुझे बात करने दो तुमसे, तुम्हारे मौन के माध्यम से,
यह एक दमकता दीप है,
सरल, जैसे एक अंगूठी
तुम एक रात की तरह हो,
अपनी स्थिरता और चमकते नक्षत्रों के साथ,

तुम्हारा मौन एक सितारे का मौन है,
उतना ही सुदूर और खरा।


मैं चाहता हूँ कि तुम रहो अविचल- स्थिर, शांत
ऐसे कि जैसे तुम यहाँ हो ही नहीं,
बहुत दूर हो और उदासी से भरी,
मानो तुम मर गई होती,
और फिर एक शब्द, एक मुस्कान काफी है,
मैं खुश हूँ;
क्योंकि यह सच नहीं है।


और अब वह अंग्रेजी अनुवाद, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



Pablo Neruda


I Like For You To Be Still


I like for you to be still
It is as though you are absent
And you hear me from far away
And my voice does not touch you
It seems as though your eyes had flown away
And it seems that a kiss had sealed your mouth
As all things are filled with my soul
You emerge from the things
Filled with my soul
You are like my soul
A butterfly of dream

And you are like the word: Melancholy

I like for you to be still
And you seem far away
It sounds as though you are lamenting
A butterfly cooing like a dove
And you hear me from far away
And my voice does not reach you
Let me come to be still in your silence
And let me talk to you with your silence
That is bright as a lamp
Simple, as a ring
You are like the night
With its stillness and constellations
Your silence is that of a star

As remote and candid

I like for you to be still
It is as though you are absent
Distant and full of sorrow
So you would’ve died
One word then, One smile is enough
And I’m happy;
Happy that it’s not true


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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सुख से डर!

हिन्दी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा का कविता लेखन का अपना अलग ही अंदाज़ था, अक्सर वे बातचीत के लहज़े में कविता लिखते थे| भारतीय ज्ञानपीठ सहित अनेक साहित्यिक और राष्ट्रीय पुरस्कारों से विभूषित भवानी दादा हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं|

आज की इस रचना में भी आप उनकी रचनाधर्मिता की बानगी पाएंगे, जहां कवि ‘सुख’ से डरता है| लीजिए इस रचना का आनंद लीजिए-


जिन्दगी में कोई बड़ा सुख नहीं है,
इस बात का मुझे बड़ा दु:ख नहीं है,
क्योंकि मैं छोटा आदमी हूँ,
बड़े सुख आ जाएं घर में
तो कोई ऐसा कमरा नहीं है जिसमें उसे टिका दूं।


यहां एक बात
इससे भी बड़ी दर्दनाक बात यह है कि,
बड़े सुखों को देखकर
मेरे बच्चे सहम जाते हैं,
मैंने बड़ी कोशिश की है उन्हें
सिखा दूं कि सुख कोई डरने की चीज नहीं है।


मगर नहीं
मैंने देखा है कि जब कभी
कोई बड़ा सुख उन्हें मिल गया है रास्ते में
बाजार में या किसी के घर,
तो उनकी आँखों में खुशी की झलक तो आई है,
किंतु साथ साथ डर भी आ गया है।


बल्कि कहना चाहिये
खुशी झलकी है, डर छा गया है,
उनका उठना, उनका बैठना
कुछ भी स्वाभाविक नहीं रह पाता,
और मुझे इतना दु:ख होता है देख कर
कि मैं उनसे कुछ कह नहीं पाता।


मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि बेटा यह सुख है,
इससे डरो मत बल्कि बेफिक्री से बढ़ कर इसे छू लो।
इस झूले के पेंग निराले हैं
बेशक इस पर झूलो,
मगर मेरे बच्चे आगे नहीं बढ़ते
खड़े खड़े ताकते हैं,
अगर कुछ सोचकर मैं उनको उसकी तरफ ढकेलता हूँ।


तो चीख मार कर भागते हैं,
बड़े बड़े सुखों की इच्छा
इसीलिये मैंने जाने कब से छोड़ दी है,
कभी एक गगरी उन्हें जमा करने के लिये लाया था
अब मैंने वह फोड़ दी है।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आज रात मैं लिख सकता हूँ!


आज भी मैं विख्यात कवि नोबेल पुरस्कार विजेता- श्री पाब्लो नेरुदा की जो मूलतः चिले से थे, की मूल रूप से ‘स्पेनिश’ भाषा में लिखी गई कविता, के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर उसका भावानुवाद और उसके बाद अंग्रेजी में अनूदित मूल कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

आज रात मैं लिख सकता हूँ

आज रात मैं लिख सकता हूँ, सर्वाधिक उदास पंक्तियां।
जैसे मैं लिख सकता हूँ, कि तारों से सजी है रात,
तारे नीले हैं और दूर-दूर कांप रहे हैं।’

आसमान में रात की हवा घूमती है और गाती है।

आज रात मैं लिख सकता हूँ, सर्वाधिक उदास पंक्तियां।
मैंने उसे प्रेम किया, और कभी-कभी उसने भी मुझे प्रेम किया।

आज जैसी रातों में, मैंने उसे अपनी बांहों में लिए रखा।
अनंत आकाश के तले मैं उसे बारबार चूमता रहा।

उसने मुझे प्यार किया, कभी-कभी मैंने भी उसे प्यार किया।
कोई कैसे उसकी अति सुंदर स्थिर आंखों को प्यार न करता।

आज रात मैं लिख सकता हूँ, सर्वाधिक उदास पंक्तियां।
मुझे लगता है कि मैं उसे प्यार नहीं करता, यह महसूस करने के लिए मैंने उसे खो दिया।

घनघोर रात की ध्वनियां सुनने को, जो और भी घनघोर है, उसके बिना,
और ये काव्य पंक्तियां पड़ती हैं आत्मा पर, जैसे ओस गिरती है घास पर।

इससे क्या फर्क पड़ता है कि मेरा प्रेम उसे अपने पास नहीं रख पाया।
रात तारों से भरी है और वह मेरे पास नहीं है।

यही सब है, दूर कहीं कोई गीत गा रहा है दूर कहीं।
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं है कि इसने उसे खो दिया।

मेरी दृष्टि प्रयास करती है उसे खोजने का, जैसे उसे पास लाने का।
मेरी आत्मा उसे खोजती है, और वह मेरे पास नहीं है।

वही रात, वही उन्हीं पेड़ों का सफेद हो जाना,
लेकिन उस समय के हम, हम अब वही नहीं हैं।

मैं अब उसे प्यार नहीं करता, यह तो निश्चित है, लेकिन मैं कैसे उसे प्यार करता था।
मेरी आवाज़ ने प्रयास किया कि हवा को खोज ले, जो उसके सुनते हुए, उसे स्पर्श करे।

किसी और की, वह होगी किसी और की, जैसे कि वह मेरे चुंबनों से पहले थी।
उसकी आवाज़, उसका दमकता बदन। उसकी असीम आंखें।

मैं अब उसे प्रेम नहीं करता, यह निश्चित है, लेकिन शायद मैं उसे प्यार करता हूँ।
प्रेम की उम्र इतनी कम है और भूलना होता है इतनी देर तक!

क्योंकि आज जैसी रातों में मैं उसे, अपनी बांहों में भरे रहता था,
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं है कि मैंने उसे खो दिया है।

यद्यपि यह शायद अंतिम दर्द हो, जो उसने मुझे दिया है,
और यह अंतिम कविता जो मैं उसके लिए लिख रहा हूँ।

पाब्लो नेरूदा

अंग्रेजी अनुवाद- डब्लू. एस. मेर्विन

और अब वह अंग्रेजी अनुवाद, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Tonight I Can Write

Tonight I can write the saddest lines.

Write, for example, ‘The night is starry
and the stars are blue and shiver in the distance.’

The night wind revolves in the sky and sings.

Tonight I can write the saddest lines.
I loved her, and sometimes she loved me too.

Through nights like this one I held her in my arms.
I kissed her again and again under the endless sky.

She loved me, sometimes I loved her too.
How could one not have loved her great still eyes.

Tonight I can write the saddest lines.
To think that I do not have her. To feel that I have lost her.

To hear the immense night, still more immense without her.
And the verse falls to the soul like dew to the pasture.

What does it matter that my love could not keep her.
The night is starry and she is not with me.

This is all. In the distance someone is singing. In the distance.
My soul is not satisfied that it has lost her.

My sight tries to find her as though to bring her closer.
My heart looks for her, and she is not with me.

The same night whitening the same trees.
We, of that time, are no longer the same.

I no longer love her, that’s certain, but how I loved her.
My voice tried to find the wind to touch her hearing.

Another’s. She will be another’s. As she was before my kisses.
Her voice, her bright body. Her infinite eyes.

I no longer love her, that’s certain, but maybe I love her.
Love is so short, forgetting is so long.

Because through nights like this one I held her in my arms
my soul is not satisfied that it has lost her.

Though this be the last pain that she makes me suffer
and these the last verses that I write for her.
Pablo Neruda
Translated in English by W.S. Merwin

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|
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वह चलती है, सुंदरता बिखेरते हुए!

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

पिछले कुछ दिनों में मैंने लॉर्ड बॉयरन की कुछ कविताओं का भावानुवाद प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। कविता में एक खूबसूरती यह भी होती है कि हर कोई उसे अपनी तरह से समझ सकता है। आज फिर से एक बार, अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि लॉर्ड बॉयरन की एक प्रसिद्ध कविता –‘शी वॉक्स इन ब्यूटी’ का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

वह चलती है, सुंदरता बिखेरते हुए!

वह चलती है सुंदरता बिखेरते, जैसे रात-
बिना बादलों के परिवेश में, और फिर तारों से भरा आकाश,
और उसकी निगाहों के पहलू में अंधकार और प्रकाश-
दोनों के सर्वश्रेष्ठ स्वरूप घुलते-मिलते:
निर्मल प्रकाश के नाज़ुक स्वरूप के साथ,
जो ऊपर वाला, किसी गर्वीले दिन को भी नहीं देता है।


रंग की एक कूची अधिक, एक किरण कम,
जिन्होंने उस अनाम मोहकता को मात दे दी,
जो प्रत्येक कलमुहे पेड़ में लहराती है,
अथवा कोमलता से उसके चेहरे पर पड़कर फीकी हो जाती है;
जहाँ विचार शांतिपूर्वक मधुर अभिव्यक्ति देते हैं,
कि उनका वह ठिकाना- कितना पवित्र, कितना प्यारा है।


और वह कपोल, आंख की भौंह,
कितने कोमल, कितने शांत, फिर भी कितना बतियाते,
वे मुस्कान जो जीत लेती हैं, वह आभा जो चमचमाती है,
परंतु वे बताते हैं उन दिनों के बारे में, जो अच्छाई से बिताए गए,
एक मस्तिष्क जिसका शरीर के साथ सामंजस्य है,
एक हृदय जो एकदम भोला है!


– लॉर्ड बॉयरन


और अब मूल अंग्रेजी कविता-

She Walks In Beauty

She walks in beauty, like the night
Of cloudless climes and starry skies;
And all that’s best of dark and bright
Meet in her aspect and her eyes:
Thus mellowed to that tender light
Which heaven to gaudy day denies.


One shade the more, one ray the less,
Had half impaired the nameless grace
Which waves in every raven tress,
Or softly lightens o’er her face;
Where thoughts serenely sweet express
How pure, how dear their dwelling place.


And on that cheek, and o’er that brow,
So soft, so calm, yet eloquent,
The smiles that win, the tints that glow,
But tell of days in goodness spent,
A mind at peace with all below,
A heart whose love is innocent!

– Lord Byron


नमस्कार।


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अणु-अणु का कंपन जान चली!

मैंने छायावाद युग के कीर्तिस्तंभ रहे महाकवियों पंत, प्रसाद और निराला जी की एक-एक रचना शेयर करते हुए उस युग की एक झलक दिखाने का प्रयास किया था| बाद में मुझे खयाल आया कि महादेवी जी को शामिल किए बिना तो छायावाद युग की एक झलक देना भी संभव नहीं है| फिर जैसे मैंने निराला जी की उदारता और फक्कड़पन का उल्लेख किया था, उनको इस फक्कड़पन के बावजूद संभाले रखने में भी महादेवी जी का बहुत बड़ा हाथ है| उनके बीच जैसा स्नेह था, वैसा आज के कवियों के बीच कम ही देखने को मिलता है|
महादेवी जी की आज की इस रचना में उन्होंने जीवन के सभी पक्षों के आस्वादन के अनुभव का बहुत सुंदर वर्णन किया है –



अलि, मैं कण-कण को जान चली
सबका क्रन्दन पहचान चली|

जो दृग में हीरक-जल भरते
जो चितवन इन्द्रधनुष करते,
टूटे सपनों के मनकों से
जो सूखे अधरों पर झरते|


जिस मुक्ताहल में मेघ भरे
जो तारों के तृण में उतरे,
मैं नभ के रज के रस-विष के
आँसू के सब रंग जान चली।

जिसका मीठा-तीखा दंशन,
अंगों मे भरता सुख-सिहरन,
जो पग में चुभकर, कर देता
जर्जर मानस, चिर आहत मन;


जो मृदु फूलों के स्पंदन से
जो पैना एकाकीपन से,
मैं उपवन निर्जन पथ के हर
कंटक का मृदु मत जान चली।

गति का दे चिर वरदान चली।
जो जल में विद्युत-प्यास भरा
जो आतप में जल-जल निखरा,
जो झरते फूलो पर देता
निज चंदन-सी ममता बिखरा;


जो आँसू में धुल-धुल उजला;
जो निष्ठुर चरणों का कुचला,
मैं मरु उर्वर में कसक भरे
अणु-अणु का कंपन जान चली,
प्रति पग को कर लयवान चली।

नभ मेरा सपना स्वर्ण रजत
जग संगी अपना चिर विस्मित
यह शूल-फूल कर चिर नूतन
पथ, मेरी साधों से निर्मित,


इन आँखों के रस से गीली
रज भी है दिल से गर्वीली
मैं सुख से चंचल दुख-बोझिल
क्षण-क्षण का जीवन जान चली!
मिटने को कर निर्माण चली!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जब हम दोनो ज़ुदा हुए


आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|


आज फिर से अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि लॉर्ड बॉयरन की एक और कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

हम दोनो जब ज़ुदा हुए
खामोशी और आंसुओं के बीच,
टूटे हुए दिल के साथ,
बरसों तक दूर रहने के लिए,
तुम्हारे गाल पीले और ठंडे हो गए थे,
तुम्हारा चुंबन भी बहुत ठंडा हो गया था,
बेशक वह घड़ी जाहिर कर रही थी
इसके लिए अफसोस।


सुबह की ओस
मेरी भौंह पर जम गई-
मुझे लगा जैसे उस भवितव्य की चेतावनी दे रही हो
जो मुझे अब महसूस हो रहा है।
तुम्हारी कसमें सभी टूट चुकी हैं,
और प्रकाश की तरह तुम्हारी ख्याति है,
मैं सुनता हूँ लोगों को तुम्हारा नाम पुकारते,
और उसकी शर्म में डूब जाता हूँ।


वे मेरे सामने तुम्हारा नाम लेते हैं,
जिसकी गूंज मुझे झकझोर जाती है,
मुझे कंपकंपी सी आ जाती है-
तुम इतनी प्यारी क्यों थीं?
वे नहीं जानते हमारे संबंध के बारे में,
तुमको इतनी अच्छी तरह कौन जानता था-
मैं बहुत लंबे समय तक तुम्हारे लिए पछताता रहूंगा,
इतनी गहराई से कि मैं कह नहीं सकता।


हम गुप्त रूप से मिले-
और खामोशी में हम दुखी होते हैं,
कि तुम्हारा दिल भूल जाए,
तुम्हारी आत्मा धोखा न दे दे,
अगर मैं तुम्हें फिर से मिलूं
बहुत बरसों। के बाद,
तो किस तरह मैं तुम्हारा स्वागत करूंगा?-
खामोशी और आंसुओं के साथ।


– लॉर्ड बॉयरन

और अब मूल अंग्रेजी कविता-

When We Two Parted

When we two parted
In silence and tears,
Half broken-hearted,
To sever for years,
Pale grew thy cheek and cold,
Colder thy kiss;
Truly that hour foretold
Sorrow to this.


The dew of the morning
Sank chill on my brow—
It felt like the warning
Of what I feel now.
Thy vows are all broken,
And light is thy fame:
I hear thy name spoken,
And share in its shame.


They name thee before me,
A knell to mine ear;
A shudder comes o’er me—
Why wert thou so dear?
They know not I knew thee,
Who knew thee too well:—
Long, long shall I rue thee
Too deeply to tell.


In secret we met—
In silence I grieve
That thy heart could forget,
Thy spirit deceive.
If I should meet thee
After long years,
How should I greet thee?—
With silence and tears.


– Lord Byron


नमस्कार।
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बीती विभावरी जाग री!

दो दिन पहले ही मैंने छायावाद युग के एक स्तंभ रहे स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक रचना शेयर की थी| आज इसी युग के एक और महाकवि जयशंकर प्रसाद जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी को उनके महाकाव्य- ‘कामायनी’ के लिए विशेष रूप से जाना जाता है|


आज की इस रचना में सुबह होने का वर्णन उन्होंने किस तरीके से किया है, इसका आनंद लीजिए-



बीती विभावरी जाग री!

अंबर पनघट में डुबो रही
तारा-घट ऊषा नागरी!

खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर ला‌ई-
मधु मुकुल नवल रस गागरी|

अधरों में राग अमंद पिए,
अलकों में मलयज बंद किए,
तू अब तक सो‌ई है आली,
आँखों में भरे विहाग री!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

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मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो !

आज मैं फिर से अपने प्रिय शायरों में से एक स्व. निदा फाज़ली जी की एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ। निदा साहब बड़ी सादगी से बहुत बड़ी बात कह देते थे। यह गज़ल को भी उनकी इस अनूठी प्रतिभा का परिचय देती है।

इसमें बताया गया है कि ज़िंदगी में चुनौतियां तो आती ही रहेंगी, लेकिन साहस के साथ हम हर चुनौती का मुक़ाबला कर सकते हैं।
लीजिए प्रस्तुत है यह बेहतरीन गज़ल-

 

 

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो,
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो।

 

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं,
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो।

 

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता,
मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो ।

 

कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा,
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो।

 

यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें,
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

***

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वह विशाल मन दो- रामधारी सिंह ‘दिनकर’ !

आज मैं भारतवर्ष में हिंदी के एक महान कवि, जिन्हें ओज और शृंगार दोनो प्रकार की कविताओं में महारत हासिल थी, वे सांसद भी रहे लेकिन उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। ऐसे महान रचनाकार स्व. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ, आइए देखें कि वे इस कविता में ईश्वर से क्या मांगते हैं-

 

 

जो त्रिकाल-कूजित संगम है, वह जीवन-क्षण दो,
मन-मन मिलते जहाँ देवता! वह विशाल मन दो।

 

माँग रहा जनगण कुम्हलाया
बोधिवृक्ष की शीतल छाया,
सिरजा सुधा, तृषित वसुधा को संजीवन-घन दो।
मन-मन मिलते जहाँ देवता! वह विशाल मन दो।

 

तप कर शील मनुज का साधें,
जग का हृदय हृदय से बाँध,
सत्य हेतु निष्ठा अशोक की, गौतम का प्रण दो।
मन-मन मिलते जहाँ देवता! वह विशाल मन दो।

 

देख सकें सब में अपने को,
महामनुजता के सपने को,
हे प्राचीन! नवीन मनुज को वह सुविलोचन दो।
मन-मन मिलते जहाँ देवता! वह विशाल मन दो।

 

खँडहर की अस्तमित विभाओ,
जगो, सुधामयि! दरश दिखाओ,
पीड़ित जग के लिए ज्ञान का शीतल अंजन दो।
मन-मन मिलते जहाँ देवता! वह विशाल मन दो।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

*****