भारत महिमा – जयशंकर प्रसाद

आज छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ तथा कामायनी, आँसू आदि अनेक गौरवामयी श्रेष्ठ रचनाओं के रचयिता स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की भारत के गौरव का वर्णन करने वाली एक प्रसिद्ध रचना शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए प्रस्तुत है यह रचना-


हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार
उषा ने हँस अभिनंदन किया और पहनाया हीरक-हार

जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक
व्योम-तम पुँज हुआ तब नष्ट, अखिल संसृति हो उठी अशोक

विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत
सप्तस्वर सप्तसिंधु में उठे, छिड़ा तब मधुर साम-संगीत

बचाकर बीज रूप से सृष्टि, नाव पर झेल प्रलय का शीत
अरुण-केतन लेकर निज हाथ, वरुण-पथ पर हम बढ़े अभीत


सुना है वह दधीचि का त्याग, हमारी जातीयता विकास
पुरंदर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास

सिंधु-सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह
दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह

धर्म का ले लेकर जो नाम, हुआ करती बलि कर दी बंद

हमीं ने दिया शांति-संदेश, सुखी होते देकर आनंद

विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम
भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम

यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि
मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि

किसी का हमने छीना नहीं, प्रकृति का रहा पालना यहीं
हमारी जन्मभूमि थी यहीं, कहीं से हम आए थे नहीं

जातियों का उत्थान-पतन, आँधियाँ, झड़ी, प्रचंड समीर
खड़े देखा, झेला हँसते, प्रलय में पले हुए हम वीर

चरित थे पूत, भुजा में शक्ति, नम्रता रही सदा संपन्न
हृदय के गौरव में था गर्व, किसी को देख न सके विपन्न

हमारे संचय में था दान, अतिथि थे सदा हमारे देव
वचन में सत्य, हृदय में तेज, प्रतिज्ञा मे रहती थी टेव

वही है रक्त, वही है देश, वही साहस है, वैसा ज्ञान
वही है शांति, वही है शक्ति, वही हम दिव्य आर्य-संतान

जियें तो सदा इसी के लिए, यही अभिमान रहे यह हर्ष
निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मरण-मिलन (मृत्यु-विवाह)- रवींद्र नाथ ठाकुर

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर जी की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Maran-Milan (Death-Wedding)’ का भावानुवाद-




गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मरण-मिलन (मृत्यु-विवाह)

तुम इतनी मधुरता से क्यों बोलती हो, मृत्यु; हे मृत्यु,
रेंगकर मेरे पास आ जाती हो, मुझे इतना छिपकर देखती हो?
यह ऐसा व्यवहार नहीं है, जो किसी प्रेमी को करना चाहिए।
जब संध्या कुसुम अपने थके हुए तनों से झूल जाते हैं,
जब मवेशी खेतों से वापस लाए जाते हैं,
पूरा दिन चरने के बाद, तब तुम, हे मृत्यु,
मृत्यु, तुम बहुत सधे हुए कदमों से आती हो मेरे पास,
पूरी तरह स्थिर होकर मेरी बगल में बैठ जाती हो।
मैं समझ नहीं पाता हूँ, तुम जो कुछ कहती हो।

ओह, क्या इसी तरह तुम मुझे ले जाओगी, हे मृत्यु,
मृत्यु? एक चोर की तरह, गहरी नींद की स्थिति में,
जब तुम मेरी आंखों के रास्ते मेरे हृदय तक पहुंचोगी?
इस प्रकार क्या तुम अपनी चाल को मंद बनाए रखोगी,
मेरी नींद में- सुन्न पड़े रक्त में, तुम्हारी झनझनाती पायल की ध्वनि,
मेरे कानों में सुस्ती भरी कुलबुलाहट पैदा करती? क्या तुम मृत्यु ,
मृत्यु, मुझे अंततः लपेट लोगी तुम,
अपने ठंडे हाथों में, और ले जाओगी, जब मैं स्वप्न देख रहा होऊंगा?
मुझे नहीं मालूम क्यों तुम इस तरह आती हो और जाती हो।

मुझे बताओ, क्या तुम इसी तरह वरण करती हो, मृत्यु,
हे मृत्यु? अकस्मात, जब नहीं होता,
किसी उत्सव, अथवा आशीष या प्रार्थना का भार?
क्या तुम आओगी, अपने घने पीत केशों के साथ,
बिखरे हुए, फैले हुए, जिन पर कोई उजला मुकुट नहीं बांधा गया हो?
क्या, कोई तुम्हारी विजय पताका लेकर नहीं आएगा, तुम्हारे आने से पहले
अथवा जाने के बाद, कोई बत्तियां नहीं चमकेंगी,
जैसे लाल आंखें, नदी के साथ-साथ, मृत्यु, हे मृत्यु?
क्या तुम्हारे कदमों की आहट के आतंक से कोई भूकंप नहीं आएगा?

जब प्रखर नेत्रों वाले शिव आए थे, अपनी वधू को लेने के लिए,
तब जो धूमधाम और तामझाम हुए थे, उन्हें याद करो मृत्यु,
हे मृत्यु: उन्होंने जो शानदार बाघ की खाल पहनी थी;
उनका दहाड़ता बैल-नंदी; उनके बालों में,
फुफकारते नाग; बम-बम की आवाज जो वे अपने मुख से निकालते थे;
उनके गले में झूलती नरमुंडों की माला;
अचानक गूंजने वाला कर्कश संगीत, जब वह अपनी तुरही बजाते हैं,
अपने आगमन की सूचना देने के लिए- क्या यह नहीं था
एक बेहतर तरीका वरण करने का मृत्यु, हे मृत्यु?

और जैसे ही उस मृत्युनुमा विवाहोत्सव का कोलाहल
निकट आया, मृत्यु, हे मृत्यु, आनंद के अश्रु
गौरी की आंखों में भर गए, और उनके वक्ष पर लटकते गहने,
कांपने लगे; उनकी बाईं आंख फड़कने लगी और उनका हृदय
धड़कने लगा; उनका शरीर अतिरिक्त उल्लास से कंपायमान हो गया,
और उनका मन स्वयं के साथ दौड़ने लगा, मृत्यु, हे मृत्यु;
ऐसे दूल्हे के बारे में सोचकर उनकी मां ने चीत्कार किया और अपना सिर पीट लिया,
और उनके पिता ने यह मान लिया कि
कोई भयंकर आपदा आई है।

तुम क्यों हमेशा आती हो, एक चोर की तरह, मृत्यु, ओ मृत्यु,
हमेशा चुपचाप, रात के अंतिम छोर पर,
केवल आंसू शेष छोड़ते हुए ? मेरे पास आओ उत्सव के साथ,
समूची रात्रि को अपनी विजय गाथा गुनगुनाने दो,
अपनी विजय का शंख बजाओ, मुझे रक्तवर्णी चोगा पहनाओ,
मुझे अपनी बाहों में पकड़ो और दूर ले जाओ!
दूसरे क्या सोचेंगे इस पर ध्यान मत दो, मृत्यु,
हे मृत्यु, क्योंकि मैं अपनी मुक्त इच्छा से
तुम्हारे साथ रहूंगा, लेकिन मुझे गौरव के साथ ले जाओ।

अगर तुम आने पर देखो कि मैं अपने कमरे में,
काम में डूबा हूँ , मृत्यु, हे मृत्यु तब तुम,
मेरे व्यस्त होने की पूरी तरह अनदेखी कर देना,
अगर मैं सोया हुआ हूँ, अपने बिस्तर पर
अपनी अभिलाशाओं का, सपने के रूप में आनंद लेते हुए, या झूठ बोलता हूँ,
और मेरे हृदय और आंखों में उदासीनता झलकती है,
अगर मैं नींद और जागृति के बीच झूला झूल रहा हूँ,
तब अपने शंख में अपनी विध्वंसक श्वांस भरो और उसे बजाओ,
मृत्यु, हे मृत्यु, और मैं दौड़कर तुम्हारे पास आ जाऊंगा।

जहाँ तुमने नाव का लंगर डाला हुआ है,
मृत्यु, हे मृत्यु, उस समुद्र तक, जहाँ हवा लुढ़का रही है,
अंधकार को अनंत से लेकर, मेरी तरफ,
मुझे सुदूर आकाश में काले बादल जमा होते दिखाई दे सकते हैं
आकाश के उत्तर-पूर्वी किनारे पर; तड़ित के
आग उगलते सर्प, अपने फन उठाकर लहरा सकते हैं,
परंतु मैं किसी आधार हीन भय के कारण बच-निकलने का प्रयास नहीं करूंगा-
मैं आगे बढूंगा शांति के साथ, अडिग भाव से,
लाल तूफान वाले समुद्र पर, मृत्यु, हे मृत्यु।

रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Maran-Milan (Death-Wedding)

Why do you speak so softly, Death, Death,
Creep upon me, watch me so stealthily?
This is not how a lover should behave.
When evening flowers droop upon their tired
Stems, when cattle are brought in from the fields
After a whole day’s grazing, you, Death,
Death, approach me with such gentle steps,
Settle yourself immovably by my side.
I cannot understand the things you say.

Alas, will this be how you will take me, Death,
Death? Like a thief, laying heavy sleep
On my eyes as you descend to my heart?
Will you thus let your tread be a slow beat
In my sleep-numbed blood, your jingling ankle-bells
A drowsy rumble in my ear? Will you, Death,
Death, wrap me, finally, in your cold
Arms and carry me away while I dream?
I do not know why you thus come and go.

Tell me, is this the way you wed, Death,
Death? Unceremonially, with no
Weight of sacrament or blessing or prayer?
Will you come with your massy tawny hair
Unkempt, unbound into a bright coil-crown?
Will no one bear your victory-flag before
Or after, will no torches glow like red
Eyes along the river, Death, Death?
Will earth not quake in terror at your step?

When fierce-eyed Siva came to take his bride,
Remember all the pomp and trappings, Death,
Death: the flapping tiger-skins he wore;
His roaring bull; the serpents hissing round
His hair; the bom-bom sound as he slapped his cheeks;
The necklace of skulls swinging round his neck;
The sudden raucous music as he blew
His horn to announce his coming – was this not
A better way of wedding, Death, Death?

And as that deathly wedding-party’s din
Grew nearer, Death, Death, tears of joy
Filled Gauri’s eyes and the garments at her breast
Quivered; her left eye fluttered and her heart
Pounded; her body quailed with thrilled delight
And her mind ran away with itself, Death, Death;
Her mother wailed and smote her head at the thought
Of receiving so wild a groom; and in his mind
Her father agreed calamity had struck.

Why must you always come like a thief, Death,
Death, always silently, at night’s end,
Leaving only tears? Come to me festively,
Make the whole night ring with your triumph, blow
Your victory-conch, dress me in blood-red robes,
Grasp me by the hand and sweep me away!
Pay no heed to what others may think, Death,
Death, for I shall of my own free will
Resort to you if you but take me gloriously.

If I am immersed in work in my room
When you arrive, Death, Death, then break
My work, thrust my unreadiness aside.
If I am sleeping, sinking all desires
In the dreamy pleasure of my bed, or I lie
With apathy gripping my heart and my eyes
Flickering between sleep and waking, fill
Your conch with your destructive breath and blow,
Death, Death, and I shall run to you.

I shall go to where your boat is moored,
Death, Death, to the sea where the wind rolls
Darkness towards me from infinity.
I may see black clouds massing in the far
North-east corner of the sky; fiery snakes
Of lightning may rear up with their hoods raised,
But I shall not flinch in unfounded fear –
I shall pass silently, unswervingly
Across that red storm-sea, Death, Death.

Rabindranath Tagore

नमस्कार।

मेरी पराश्रितता – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘माई डिपेंडेंस’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मेरी पराश्रितता

मुझे पसंद है पराश्रित रहना, और हमेशा रहना
जिसमें मेरी मां का दुलार और देखभाल शामिल हो,
मेरे पिता हों , प्रेम करने, चूमने और गले लगाने के लिए,
और मैं जीवन को खुशी तथा संपूर्ण मोहकता के साथ जिऊं।

मुझे पसंद है पराश्रित रहना, और ऐसा रहना
अपने संबंधियों पर, जिससे वे मुझ पर बरसाते रहें
अपने कठोर और मृदुल परामर्श, शिकायतें,
पूर्ण चकित भाव, सत्य और सूचनाओं के भंडार।

मुझे पसंद है पराश्रित रहना, और हमेशा रहना
अपने मित्रों पर, गपशप और मेरे पास रहने की इच्छा के लिए,
घरेलू, पारिवारिक और रोमांटिक युक्तियां सुझाने के लिए,
सहकर्मी भी मेरा मार्गदर्शन करें, जोखिमों का सामना करने के लिए।

मुझे पसंद है पराश्रित रहना, और हमेशा रहना
अपने पड़ौसियों पर भी, जो कभी-कभी मुझसे ईर्ष्या करें,
जब मेरा भाग्य मुझे ऊंचाइयों पर ले जाए, और वे सुनें
प्रतिदिन मेरे उठते कदमों की आहट, सरल और कठिन स्थितियों में भी।



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

My Dependence

I like to be dependent, and so for ever
with warmth and care of my mother
my father , to love, kiss and embrace
wear life happily in all their grace.

I like to be dependent, and so for ever
on my kith and kin, for they all shower
harsh and warm advices, complaints
full wondering ,true and info giants.

I like to be dependent, and so for ever
for my friends, chat and want me near
with domestic,family and romantic tips
colleagues as well , guide me work at risks.

I like to be dependent, and so for ever
for my neighbours too, envy at times
when at my rise of fortune like to hear
my daily steps , easy and odd things too.

Rabindranath Tagore


नमस्कार।

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कलम आज उनकी जय बोल!

आज मैं राष्ट्रप्रेम और ओज के कवि, स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की एक प्रसिद्ध कविता शेयर कर रहा हूँ, जिसमें उन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले शहीदों को नमन किया है| दिनकर जी ने जहां ‘मेरे नगपति, मेरे विशाल’ जैसी पंक्तियाँ लिखीं वहीं उन्होंने ‘उर्वशी’ जैसी महान रचना भी लिखी, जो बिल्कुल अलग तरह की थी| पौराणिक चरित्रों को लेकर उन्होंने अद्वितीय काव्य सुमन मां भारती को अर्पित किए हैं, वहीं राष्ट्रभाषा हिन्दी को लेकर भी उनकी अनेक बहुमूल्य रचनाएं हैं| एक बार संसद में हिन्दी विरोधियों को ललकारते हुए उन्होंने अपनी एक प्रसिद्ध रचना का पाठ किया था- ‘तान तान फण व्याल कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की यह प्रसिद्ध कविता –

जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलकर बुझ गए किसी दिन
माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

पीकर जिनकी लाल शिखाएँ
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल
कलम, आज उनकी जय बोल।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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प्रेम

छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| कविता के हर काल का अपना मुहावरा होता है, अभिव्यक्ति का अपना अलग अन्दाज़ होता है| आज की कविता में पंत जी ने अपने तरीके से प्रेम को अभिव्यक्ति दी है|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता –

मैंने
गुलाब की
मौन शोभा को देखा !

उससे विनती की
तुम अपनी
अनिमेष सुषमा को
शुभ्र गहराइयों का रहस्य
मेरे मन की आँखों में
खोलो !

मैं अवाक् रह गया !
वह सजीव प्रेम था !

मैंने सूँघा,
वह उन्मुक्त प्रेम था !
मेरा हृदय
असीम माधुर्य से भर गया !

मैंने
गुलाब को
ओंठों से लगाया !
उसका सौकुमार्य
शुभ्र अशरीरी प्रेम था !

मैं गुलाब की
अक्षय शोभा को
निहारता रह गया !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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फसल काटती लड़की का गीत

एक बार फिर से मैं अपनी एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहरा रहा हूँ, जो मेरे द्वारा किया गया एक प्रसिद्ध कविता का भावानुवाद है|

आज विलियम वर्ड्सवर्थ की एक प्रसिद्ध कविता का सहज अनुवाद, हिंदी में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ। यह अत्यंत प्रसिद्ध रचना है, संभव है इस अनुवाद में कोई कमी रह गई हो, क्योंकि कविता के अर्थ-विस्तार को समझना और फिर उसे पुनः सृजित करना उतना आसान तो नहीं होता, कोई कमी रह गई हो तो उसके लिए क्षमा चाहता हूँ, लेकिन प्रयास करता रहूंगा तो संभव है भविष्य में अधिक अच्छा अनुवाद भी प्रस्तुत कर पाऊंगा।

प्रस्तुत हैं अनुवाद और फिर मूल रचना।

फसल काटती एकाकी लड़की

– विलियम वर्ड्सवर्थ

देखो उसे गौर से, खेत में अकेली,
वह एक पहाड़ी लड़की!
फसल काटती जाती है और गाती जाती है:
यहाँ रुकें और धीरे से आगे बढ़ें!
अकेली काटती है और फिर बांधती है अनाज की फसल,
और गाती है उदासी और तनाव भरा गीत:
अरे सुनो इसे, क्योंकि विस्तृत घाटी
उसकी स्वरलहरी से लबालब भरी है।
किसी कोयल ने ऐसी कूक नहीं सुनाई होगी,
अरब के रेगिस्तान में,
किसी छायादार पथ में थके पथिक समूह के लिए
ऐसा मधुर स्वागत गान:
ऐसे रोमांचक स्वर नहीं सुने गए कभी
वसंत के मौसम में, कोयल के कंठ से भी,
जो सुदूर हैब्रिड द्वीपों में-
समुद्र के शोर को भी शांत कर दे।
क्या मुझे कोई बताएगा-
कि वह क्या गा रही है?-
शायद निराशा से भरे स्वर प्रवाहित हो रहे हैं,
पुरानी, दुख भरी, कहीं दूर घटी घटनाओं के लिए,
और बहुत पहले हुए युद्धों के लिए,
अथवा है यह कोई अधिक सामान्य बात,
आज का ही कोई, जाना-पहचाना मामला?
कोई सहज शोक, हानि अथवा दर्द,
जो हो चुका है और शायद दुबारा हो?

युवती के गीत का विषय जो भी हो,
जैसे यह गीत चलता ही रहेगा,
मैंने सुना उसे अपने काम के साथ गाते हुए,
और मुड़े हुए हंसिए के ऊपर तैरती आवाज-
मैंने सुनी निश्चल और निःस्तब्ध रहकर,
और जब मैं पहाड़ी के ऊपर चढ़ा,
मेरे हृदय में वह संगीत बसा रहा,
बाद में लंबे समय तक,
जबकि मैं और सुन नहीं पा रहा था।

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The Solitary Reaper


BY WILLIAM WORDSWORTH


Behold her, single in the field,
Yon solitary Highland Lass!
Reaping and singing by herself;
Stop here, or gently pass!
Alone she cuts and binds the grain,
And sings a melancholy strain;
O listen! for the Vale profound
Is overflowing with the sound.

No Nightingale did ever chant
More welcome notes to weary bands
Of travelers in some shady haunt,
Among Arabian sands:
A voice so thrilling ne’er was heard
In spring-time from the Cuckoo-bird,
Breaking the silence of the seas
Among the farthest Hebrides.

Will no one tell me what she sings?—
Perhaps the plaintive numbers flow
For old, unhappy, far-off things,
And battles long ago:
Or is it some more humble lay,
Familiar matter of to-day?
Some natural sorrow, loss, or pain,
That has been, and may be again?

Whate’er the theme, the Maiden sang
As if her song could have no ending;
I saw her singing at her work,
And o’er the sickle bending;—
I listened, motionless and still;
And, as I mounted up the hill,
The music in my heart I bore,
Long after it was heard no more.


नमस्कार।

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जगमग जगमग!

राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत कविताएं लिखने वाले, कविता की प्राचीन परंपरा के कवि स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| मुझे याद है कि जब मैं छोटी कक्षाओं का ही विद्यार्थी था तब मैंने द्विवेदी जी की कुछ कविताएं पाठ्यक्रम में पढ़ी थीं | गांधी जी को लेकर लिखी गई उनकी प्रसिद्ध कविता ‘चल पड़े जिधर दो डग मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर‘ भी उनमें शामिल थी|

आज की कविता दीपकों को लेकर है जो गरीबों, अमीरों सभी की ज़िंदगी में उजाला करते हैं और हर स्थान को जगमगा देते हैं| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी की यह कविता-


हर घर, हर दर, बाहर, भीतर,
नीचे ऊपर, हर जगह सुघर,
कैसी उजियाली है पग-पग?
जगमग जगमग जगमग जगमग!

छज्जों में, छत में, आले में,
तुलसी के नन्हें थाले में,
यह कौन रहा है दृग को ठग?
जगमग जगमग जगमग जगमग!

पर्वत में, नदियों, नहरों में,
प्यारी प्यारी सी लहरों में,
तैरते दीप कैसे भग-भग!
जगमग जगमग जगमग जगमग!


राजा के घर, कंगले के घर,
हैं वही दीप सुंदर सुंदर!
दीवाली की श्री है पग-पग,
जगमग जगमग जगमग जगमग!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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जब मुझे भय सताता है!


आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर करने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक पुरानी पोस्ट
आज से भी मैं विख्यात अंग्रेजी कवि जॉन कीट्स की अंग्रेजी भाषा में लिखी गई एक और कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल अंग्रेजी कविता प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-





जॉन कीट्स

जब मुझे भय सताता है!


जब मुझे ऐसे भय सताते हैं, कि शायद मेरा जीवन ही समाप्त हो जाए
इससे पहले कि मेरी कलम, मेरे मन में कुलबुलाती रचनाओं को कागज़ पर उतार पाए,
इससे पहले कि मेरी रचनाओं से भरी पुस्तकें, ऐसे जमा हो जाएं,
जैसे अनाज भंडार में तैयार अनाज भरा होता है;
जब मैं रात के सितारों से भरे चेहरे पर,
अत्यधिक रोमांस के विशाल बादलों से भरे चिह्न देखूं,
और यह सोचूं, कि शायद अवसर के जादुई प्रभाव की बदौलत
इनकी छायाओं तक पहुंचने के लिए मैं जीवित न रहूं;
और जब मुझे ऐसा लगता है कि, घंटे भर के जीवन वाला सुघड़ जीव,
शायद मैं तुम्हे अधिक समय तक नहीं देख पाऊंगा,
परीलोक जैसी शक्तियों में कभी आनंद नहीं आता
तुच्छ किस्म के प्रेम जैसा; – और तब किनारे पर
विशाल विश्व के तट पर मैं अकेला खड़ा हूँ, और सोचता हूँ,
जब तक कि प्रेम और प्रसिद्धि, शून्य में विलीन नहीं हो जाते।



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



John Keats

When I Have Fears



When I have fears that I may cease to be
Before my pen has glean’d my teeming brain,
Before high-piled books, in charactery,
Hold like rich garners the full ripen’d grain;
When I behold, upon the night’s starr’d face,
Huge cloudy symbols of a high romance,
And think that I may never live to trace
Their shadows, with the magic hand of chance;
And when I feel, fair creature of an hour,
That I shall never look upon thee more,
Never have relish in the faery power
Of unreflecting love; – then on the shore
Of the wide world I stand alone, and think
Till love and fame to nothingness do sink.

नमस्कार।

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मैं दीन हो जाता हूँ!

आज मैं हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार, तारसप्तक के कवि और बातचीत के लहजे में श्रेष्ठ रचनाएं देने के लिए विख्यात, साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक सम्मानों से विभूषित स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|

इस रचना में भवानी दादा ने कुछ ऐसे मनोभाव व्यक्त किए हैं कि कई बार किसी रईस व्यक्ति से मिलने के बाद ऐसा ऐहसास होता है कि वह रईस होने के अलावा कुछ नहीं है, यहाँ तक कि इंसान भी नहीं और निरंतर उसके सामने लघुता का कृत्रिम बोध होता है| लीजिए प्रस्तुत है भवानी दादा की यह कविता –


सागर से मिलकर जैसे
नदी खारी हो जाती है
तबीयत वैसे ही
भारी हो जाती है मेरी
सम्पन्नों से मिलकर

व्यक्ति से मिलने का
अनुभव नहीं होता
ऐसा नहीं लगता
धारा से धारा जुड़ी है
एक सुगंध
दूसरी सुगंध की ओर मुड़ी है|


तो कहना चाहिए
सम्पन्न व्यक्ति
व्यक्ति नहीं है
वह सच्ची कोई अभिव्यक्ति
नहीं है

कई बातों का जमाव है
सही किसी भी
अस्तित्व का अभाव है
मैं उससे मिलकर
अस्तित्वहीन हो जाता हूँ


दीनता मेरी
बनावट का कोई तत्व नहीं है
फिर भी धनाढ्य से मिलकर
मैं दीन हो जाता हूँ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अपने बस में आज न हूँ मैं!

हिन्दी काव्य मंचों के एक अद्वितीय गीतकार जिनकी उपस्थिति से मंच को गरिमा और ऊंचाई मिलती थी, ऐसे स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ| भारत भूषण जी के अनेक गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं, आज प्रस्तुत है यह गीत|

रचना अपना परिचय स्वयं देती है, लीजिए प्रस्तुत है यह प्रेम में कुछ अलग ही परिस्थितियों का गीत-


जिस पल तेरी याद सताए, आधी रात नींद जग जाये
ओ पाहन! इतना बतला दे उस पल किसकी बाहँ गहूँ मैं|

अपने अपने चाँद भुजाओं
में भर भर कर दुनिया सोये
सारी सारी रात अकेला
मैं रोऊँ या शबनम रोये
करवट में दहकें अंगारे, नभ से चंदा ताना मारे
प्यासे अरमानों को मन में दाबे कैसे मौन रहूँ मैं|


गाऊँ कैसा गीत कि जिससे
तेरा पत्थर मन पिघलाऊँ
जाऊँ किसके द्वार जहाँ ये
अपना दुखिया मन बहलाऊँ
गली गली डोलूँ बौराया, बैरिन हुई स्वयं की छाया
मिला नहीं कोई भी ऐसा जिससे अपनी पीर कहूं मैं|

टूट गया जिससे मन दर्पण
किस रूपा की नजर लगी है
घर घर में खिल रही चाँदनी
मेरे आँगन धूप जगी है
सुधियाँ नागन सी लिपटी हैं, आँसू आँसू में सिमटी हैं
छोटे से जीवन में कितना दर्द-दाह अब और सहूँ मैं|


फटा पड़ रहा है मन मेरा
पिघली आग बही काया में
अब न जिया जाता निर्मोही
गम की जलन भरी छाया में
बिजली ने ज्यों फूल छुआ है, ऐसा मेरा हृदय हुआ है
पता नहीं क्या क्या कहता हूँ, अपने बस में आज न हूँ मैं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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