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दिल को वही काम आ गया!

आज फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| खास बात ये है आज का ये गीत मुकेश जी ने शम्मी कपूर जी के लिए गाया था, शायद मुकेश जी ने बहुत कम गीत गाये होंगे शम्मी कपूर जी के लिए, मुझे तो कोई और याद नहीं है| फिल्म- ‘ब्लफ़ मास्टर’ के लिए यह गीत- राजेन्द्र कृष्ण जी ने लिखा था और इसका संगीत दिया था – आनंद वीर जी शाह ने|


लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी का गाया, कुछ अलग किस्म का यह गीत, जिसमें प्यार करने न करने के बारे में कुछ तर्क-वितर्क किया गया है-

सोचा था प्यार हम न करेंगे,
सूरत पे यार हम न मरेंगे,
लेकिन किसी पे दिल आ गया|
सोचा था प्यार हम न करेंगे||

बहुत ख़ाक दुनिया की छानी थी हमने,
अब तक किसी की न मानी थी हमने,
धोखे में दिल कैसे आ गया|
सोचा था प्यार हम न करेंगे|


अगर दिल न देते बड़ा नाम करते,
मगर प्यार से बड़ा काम करते,
दिल को यही काम आ गया|


सोचा था प्यार हम न करेंगे
सूरत पे यार हम न मरेंगे
फिर भी किसी पे दिल आ गया|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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चाँद रोया साथ मेरे, रात रोयी बार -बार!

काफी दिन से मैंने अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया कोई गीत शेयर नहीं किया है| लीजिए आज मैं ये शानदार गीत शेयर कर रहा हूँ| फिल्म- ‘एक रात’ के लिए यह गीत ‘अंजान’ जी ने लिखा है और उषा खन्ना जी के संगीत निर्देशन में इसे मुकेश जी ने अपने लाजवाब अंदाज़ में गाया है|

कविता में उद्दीपन का भी महत्व होता है, बहुत से गीतों में हम सुनते हैं कि नायक अथवा नायिका के मनोभावों को प्रकट करने में प्रकृति, हवा, बादल आदि-आदि भी साथ देते हैं| कुछ ऐसा ही इस गीत में भी है|


लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-

आज तुमसे दूर हो कर, ऐसे रोया मेरा प्यार,
चाँद रोया साथ मेरे, रात रोयी बार बार|

कुछ तुम्हारे बंदिशें हैं, कुछ हैं मेरे दायरे,
जब मुक़द्दर ही बने दुश्मन तो कोई क्या करे,
हाय कोई क्या करे,
इस मुकद्दर पर किसी का, क्या है आखिर इख्तियार|
चाँद रोया साथ मेरे, रात रोयी बार बार …


हर तमन्ना से ज़ुदा मैं, हर खुशी से दूर हूँ,
जी रहा हूँ, क्योंकि जीने के लिये मजबूर हूँ,
हाय मैं मजबूर हूँ|
मुझको मरने भी न देगा, ये तुम्हारा इन्तज़ार|
चाँद रोया साथ मेरे, रात रोयी बार बार ..



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बहुत जी लिए हम तेरा नाम लेकर!

कल मैंने अपने प्रिय गायक मुकेश जी का एक गीत शेयर किया था, तो आज भी मन हो रहा है| वैसे मुकेश जी के गीत ही ऐसे हैं कि यादों में लिपटे रहते हैं| आज का ये गीत है 1965 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘पूर्णिमा’ का, गीत लिखा है- गुलज़ार जी ने और इसका संगीत दिया है- कल्याणजी आनंद जी ने| इस फिल्म के नायक थे सदाबहार अभिनेता धर्मेन्द्र जी|


मुकेश जी ऐसे महान गायक थे कि उनके लिए नौशाद जी कहते थे- ‘तुम गा दो, मेरा गीत अमर हो जाए’| मुकेश जी ने रफी साहब, किशोर कुमार जी और लता जी से कम गीत गाए हैं, लेकिन लोकप्रियता के मामले में वे किसी से कम नहीं हैं| अपने जीवित रहते उन्हें किसी भी पुरूष गायक से अधिक फिल्मफेयर पुरस्कार मिले थे और आज भी लोगों को उनके गीत याद आते हैं|

यह भी बात है कि लाजवाब गीत-संगीत का जो समय पहले था, वो तो अब आना संभव ही नहीं है, किसी को इतनी फुर्सत नहीं है कि वह गीत-संगीत पर इतनी मेहनत करे|


लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-

तुम्हें ज़िन्दगी के उजाले मुबारक,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|
तुम्हें पा के हम खुद से दूर हो गए थे,
तुम्हें छोड़कर अपने पास आ गए हैं|



तुम्हारी वफ़ा से शिकायत नहीं है,
निभाना तो कोई रवायत नहीं है|
जहाँ तक कदम आ सके आ गए हैं,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|


चमन से चले हैं ये इल्ज़ाम लेकर,
बहुत जी लिए हम तेरा नाम लेकर|
मुरादों की मंज़िल से दूर आ गए थे,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|


तुम्हें ज़िन्दगी के उजाले मुबारक,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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