लाश चटानों में दबा दी जाए!

दिल का वो हाल हुआ है ग़म-ए-दौराँ के तले,
जैसे इक लाश चटानों में दबा दी जाए|

जाँ निसार अख़्तर

ज़माने में यही होता रहा है!

मोहब्बत में ‘फ़िराक़’ इतना न ग़म कर,
ज़माने में यही होता रहा है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं!

एक ये दिन जब लाखों ग़म और काल पड़ा है आँसू का,
एक वो दिन जब एक ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं|

जावेद अख़्तर

उदासी की मेहनत ठिकाने लगी!

कोई ख़ुद-कुशी की तरफ़ चल दिया,
उदासी की मेहनत ठिकाने लगी|

आदिल मंसूरी

इश्क़ को आज़मा के देख लिया!

‘फ़ैज़’ तकमील-ए-ग़म भी हो न सकी,
इश्क़ को आज़मा के देख लिया|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ये दुख ये हैरानी मुझे दे दो!

ये माना मैं किसी क़ाबिल नहीं हूँ इन निगाहों में,
बुरा क्या है अगर ये दुख ये हैरानी मुझे दे दो|

साहिर लुधियानवी

इश्क़ की है कोई इंतिहा कि ये!

नैरंग-ए-इश्क़ की है कोई इंतिहा कि ये,
ये ग़म कहाँ कहाँ ये मसर्रत कहाँ कहाँ|

फ़िराक़ गोरखपुरी

मैंने कहा था कि मेरे घर में रहो!

है अब ये हाल कि दर दर भटकते फिरते हैं,
ग़मों से मैंने कहा था कि मेरे घर में रहो|

राहत इन्दौरी

अम्बार से लग जाते हैं!

कतरनें ग़म की जो गलियों में उड़ी फिरती हैं,
घर में ले आओ तो अम्बार से लग जाते हैं|

अहमद फ़राज़