लोग कुछ डूबते नजर आए!

जब भी आंखों में अश्क भर आए लोग कुछ डूबते नजर आए
चांद जितने भी गुम हुए शब के सब के इल्ज़ाम मेरे सर आए|

गुलज़ार

जैसे हम को पुकारता है कोई!

देर से गूँजते हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई ।

गुलज़ार

आ के फूँक दो उड़ता नहीं धुआँ!

चिंगारी इक अटक सी गई मेरे सीने में,
थोड़ा सा आ के फूँक दो उड़ता नहीं धुआँ|

गुलज़ार

चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ!

आँखों के पोछने से लगा आग का पता,
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ|

गुलज़ार

लकीरें खींच रहा है फ़ज़ाओं में!

काली लकीरें खींच रहा है फ़ज़ाओं में,
बौरा गया है मुँह से क्यूँ खुलता नहीं धुआँ|

गुलज़ा

अब उठता नहीं धुआँ!

चूल्हे नहीं जलाए कि बस्ती ही जल गई,
कुछ रोज़ हो गए हैं अब उठता नहीं धुआँ|

गुलज़ा

आँसुओं के मरासिम पुराने हैं!

आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं,
मेहमाँ ये घर में आएँ तो चुभता नहीं धुआँ|

गुलज़ार

ढाँपने से भी रुकता नहीं धुआँ!

पलकों के ढाँपने से भी रुकता नहीं धुआँ,
कितनी उँडेलीं आँखें प बुझता नहीं धुआँ|

गुलज़ार

जल रहा है प बुझता नहीं धुआँ!

आँखों में जल रहा है प बुझता नहीं धुआँ,
उठता तो है घटा सा बरसता नहीं धुआँ|

गुलज़ार

सर पे अब चढ़ता जा रहा है चाँद!

सीधा-सादा उफ़ुक़ से निकला था,
सर पे अब चढ़ता जा रहा है चाँद|

गुलज़ार