मुझसे इक नज़्म का वादा है!



आज मैं गुलज़ार साहब की एक नज़्म शेयर कर रहा हूँ| एक अलग ही अंदाज़ में बात काही है इसमें गुलज़ार साहब ने, कुछ एहसास, कुछ अनुभव वे कहते हैं कि शायद तभी होंगे जब जीवन की अंतिम घड़ियां सामने हों, कवि की एक अलग तरह की अभिव्यक्ति है यह भी, आखिर कवि तो हमेशा ही कुछ नया तलाशता रहता है|

लीजिए प्रस्तुत है गुलज़ार साहब की यह छोटी सी नज़्म –


मुझसे इक नज़्म का वादा है,
मिलेगी मुझको
डूबती नब्ज़ों में,
जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिए चाँद,
उफ़क़ पर पहुंचे
दिन अभी पानी में हो,
रात किनारे के क़रीब
न अँधेरा, न उजाला हो,
यह न रात, न दिन

ज़िस्म जब ख़त्म हो
और रूह को जब सांस आए

मुझसे इक नज़्म का वादा है मिलेगी मुझको



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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