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खगोलशास्त्री- रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Astronomer’  का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

 खगोलशास्त्री

 

मैंने केवल इतना कहा, “शाम के समय जब  पूर्ण चंद्रमा फंस जाता है
दाड़म वृक्ष की शाखाओं के बीच, तब क्या कोई जाकर  
उसको पकड़ नहीं सकता?

 

परंतु दादा केवल हंसे और बोले,” जितने बच्चे मैंने देखे हैं, तुम उन सबसे
ज्यादा मूर्ख हो। चांद हमसे बहुत दूर है, कोई कैसे
उसको पकड़ सकता है?”

 

मैंने कहा, “दादा, आप कैसी मूर्खता की बात करते हो!  जब मां खिड़की से बाहर झांकती हैं  
और हमें नीचे खेलते देखकर मुस्कुराती हैं, तब क्या आप  कहोगे कि वह
बहुत दूर हैं?”

 

दादा ने फिर से कहा, “तुम एक मूर्ख बालक हो, तुमको ऐसा जाल कहाँ मिलेगा
जो इतना बड़ा हो कि उसमें चांद को पकड़ा जा सके?”
मैंने कहा, “बिल्कुल, आप उसे अपने हाथों से पकड़ सकते हो।’’

 

परंतु दादा हंसे और बोले, “जितने भी बच्चे मैंने देखे हैं, तुम उन सबसे मूर्ख हो,  
अगर यह पास आ जाए तब तुम देख पाओगे कि चांद कितना बड़ा है।”

 

मैंने कहा, “दादा, आपके स्कूल में वे लोग क्या मूर्खतापूर्ण बातें सिखाते हैं! जब मां
हम लोगों को चूमने के लिए नीचे झुकती है, तब क्या उनका चेहरा बड़ा
दिखता है?”

 

परंतु तब भी दादा कहते हैं, “तुम एक मूर्ख बालक हो।”

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ- 

 

Astronomer!

 

I only said, “When in the evening the round full moon gets
entangled among the beaches of that Dadam tree, couldn’t somebody
catch it?”
But dada laughed at me and said, “Baby, you are the silliest
child I have ever known. The moon is ever so far from us, how could
anybody catch it?”
I said, “Dada, how foolish you are! When mother looks out of
her window and smiles down at us playing, would you call her far
away?”
Still dada said, “You are a stupid child! But, baby where
could you find a net big enough to catch the moon with?”
I said, “Surely you could catch it with your hands.”
But dada laughed and said, “You are the silliest child I have
known. If it came nearer, you would see how big the moon is.”
I said, “Dada, what nonsense they teach at your school! When
mother bends her face down to kiss us, does her face look very
big?”
But still dada says, “You are a stupid child.”.

                                              Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

                                 ************

 

                                 

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स्रोत- गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Source’ का भावानुवाद-

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

स्रोत!

 

वह निद्रा जो आकर चुपचाप, नन्हे शिशु की आंखों में बैठ जाती है-

क्या किसी को मालूम है, वह कहाँ से आती है?

हाँ, लोग ऐसा कहते हैं कि इसका अपना बसेरा है वहाँ,

परियों के देश में,  वन की छाया में,

जो जुगनुओं के कारण बहुत हल्के प्रकाश में डूबा है,

मोहकता की दो शर्मीली कलियां लटकी हुई हैं, वहाँ से यह नींद आती है,

शिशु की आंखों को चूमने के लिए।

 

वह मुस्कान जो सोते हुए शिशु की आंखों में टिमटिमाती है-

क्या कोई जानता है कि वह कहाँ पैदा हुई थी?

हाँ, ऐसा बताते हैं लोग बढ़ते हुए चांद से निकली एक नाज़ुक सी किरण ने

पतझड़ के एक मिटते हुए बादल के किनारे को छुआ,

और वहीं यह मुस्कान सबसे पहले पैदा हुई थी,

ओस से धुली एक सुबह के स्वप्न में-

वह मुस्कान जो सोते हुए शिशु के होठों पर खेलती है।

 

वह मधुर, मृदुल ताज़गी जो शिशु के अंगों में खिलती है-

क्या कोई जानता है कि वह इतने लंबे समय से कहाँ छिपी थी?

हाँ, जब उसकी मां, एक नवयुवती थी,

यह उसके हृदय में व्याप्त थी, प्रेम के सुकोमल और शांत रहस्य के रूप में,

वह मधुर, सुकोमल ताज़गी, जो शिशु के

अंगों में खिल रही है। 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

The Source!

The sleep that flits on baby’s eyes- does anybody know from where it comes? Yes, there is a rumour that it has its dwelling where,
in the fairy village among shadows of the forest dimly lit with glow-worms,
there hang two shy buds of enchantment. From there it
comes to kiss baby’s eyes.
The smile that flickers on baby’s lips when he sleeps- does anybody know where it was born? Yes, there is a rumour that a young pale beam
of a crescent moon touched the edge of a vanishing autumn cloud,
and there the smile was first born
in the dream of a dew washed morning- the smile that flickers on baby’s lips when he sleeps.
The sweet, soft freshness hat blooms on baby’s limbs-
does anybody know where it was hidden so long?
Yes, when the mother was a young girl,
it lay pervading her heart in tender and silent mystery
of love-the sweet, soft freshness that has
bloomed on baby’s limbs.top

Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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