अब निशा देती निमंत्रण!

आज मैं हिन्दी के अत्यंत प्रसिद्ध गीत कवि और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के पूज्य पिताश्री स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| बच्चन जी, हां जी किसी जमाने में ‘बच्चन जी’ का मतलब स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी ही होता था| बच्चन जी के गीत श्रोताओं और पाठकों को झूमने पर मज़बूर कर देते थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का यह गीत –

अब निशा देती निमंत्रण!

महल इसका तम-विनिर्मित,
ज्वलित इसमें दीप अगणित!
द्वार निद्रा के सजे हैं स्वप्न से शोभन-अशोभन!
अब निशा देती निमंत्रण!

भूत-भावी इस जगह पर
वर्तमान समाज होकर
सामने है देश-काल-समाज के तज सब नियंत्रण!
अब निशा देती निमंत्रण!

सत्य कर सपने असंभव!–
पर, ठहर, नादान मानव!–
हो रहा है साथ में तेरे बड़ा भारी प्रवंचन!
अब निशा देती निमंत्रण!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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