प्यार की बोली, बोले कौन!

आज एक बार फिर से मैं, अपनी कविताओं, नज़्मों, कहानियों और उपन्यासों में बड़ी सादगी से बड़ी बातें कहने वाले ज़नाब राही मासूम रज़ा साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| उनका एक प्रसिद्ध उपन्यास है ‘दिल एक सादा कागज़’ मुझे याद है उनके उपन्यास पढ़ते हुए भी ऐसा लगता था जैसे कोई कविता पढ़ रहे हों| उनकी इस तरह की एक बहुत सुंदर रचना मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ, ‘लेकिन मेरा लावारिस दिल’ |

लीजिए आज राही मासूम रज़ा साहब की यह रचना शेयर कर रहा हूँ, इस रचना में बहुत सादगी से जो बातें उन्होंने कही हैं वे आज के असहिष्णुता भरे माहौल में बहुत महत्वपूर्ण हैं –

सब डरते हैं, आज हवस के इस सहरा में बोले कौन,
इश्क तराजू तो है, लेकिन, इस पे दिलों को तौले कौन
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सारा नगर तो ख्वाबों की मैयत लेकर श्मशान गया,
दिल की दुकानें बंद पड़ी है, पर ये दुकानें खोले कौन
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काली रात के मुँह से टपके जाने वाली सुबह का जूनून,
सच तो यही है, लेकिन यारों, यह कड़वा सच बोले कौन
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हमने दिल का सागर मथ कर काढ़ा तो कुछ अमृत,
लेकिन आयी, जहर के प्यालों में यह अमृत घोले कौन
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लोग अपनों के खूँ में नहा कर गीता और कुरान पढ़ें,
प्यार की बोली याद है किसको, प्यार की बोली बोले कौन


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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प्यार की फ़स्ल उगाएगी ज़मीं!

इक बिरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है।
आंधी नफ़रत की चलेगी न कहीं अब के बरस
प्यार की फ़स्ल उगाएगी ज़मीं अब के बरस|

साबिर दत्त

चहचहाती बुलबुलों पर—

दो दिलों के दरमियाँ दीवार-सा अंतर न फेंक,
चहचहाती बुलबुलों पर विषबुझे खंजर न फेंक|

कुंवर बेचैन

धमकियों की संस्कृति!

आज भारतीय क्रिकेट के बहाने कुछ बात कर लेते हैं|

क्रिकेट तो वैसे ही अनिश्चितताओं का खेल है, कोई दावे के साथ नहीं कह सकता कि वह जीतेगा| भारतीय टीम का मामला उससे भी कुछ आगे का है| हमारी क्रिकेट टीम का ऐसा रिकॉर्ड है कि वे दुनिया की सबसे मजबूत टीम को भी हरा सकते हैं और सबसे कमजोर टीम से भी हार सकते हैं|

यह भी हो सकता है कि हमें ही ऐसा लगता हो क्योंकि हमने क्रिकेट को एक तरह से अपना राष्ट्रीय खेल मान लिया है| यह खेल भी ऐसा है कि हर देखने वाला इस पर अपने एक्सपर्ट कमेंट्स दे सकता है|

यह लगाव खेल से अच्छी बात है, लेकिन हमें यह ध्यान रखना होगा कि यह एक खेल है और इसमें कोई परिणाम की गारंटी नहीं दे सकता| खास तौर पर जब मुकाबला हमारे और पाकिस्तान के बीच हो रहा हो, तब कुछ वीर पुरूष इसको राष्ट्रीय गौरव से जोड़ लेते हैं और कुछ तो परिणाम प्रतिकूल आने पर, किसी खास धर्म के खिलाड़ी पर अपना द्वेष उगल देते हैं, धमकियाँ देते हैं| ऐसे लोगों पर समुचित कार्रवाई होनी चाहिए|

वैसे कुछ लोग जान बूझकर ऐसा प्रचार भी करते हैं, कि ऐसा हो रहा है,क्योंकि पाकिस्तान भी यह चाहता है कि हमारे यहाँ धार्मिक विद्वेष की खबरें फैलें| उनके यहाँ क्या है, इसकी तो बात ही छोड़ दें, वैसे हमें उनके जैसा बनना भी नहीं है|

एक बार फिर से कहना चाहूँगा कि इस तरह विद्वेष का वातावरण न बनाया जाए| वैसे मुझे लगता है कि जब कोई खिलाड़ी परफ़ॉर्म न कर रहा हो तब उसके विज्ञापन बंद की जा सकते हैं , शायद यह कुछ प्रेरणा दे पाए|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

समय के विष बुझे नाखून!

सोम ठाकुर जी मेरे प्रिय हिन्दी कवियों में से एक हैं, मेरा सौभाग्य है कि एक श्रोता और एक आयोजक के रूप में भी मुझे उनसे अनेक बार मिलने का अवसर प्राप्त हुआ और मैंने उनके बहुत से गीत पहले भी शेयर किए हैं, राष्ट्र प्रेम, भाषा प्रेम, विशुद्ध प्रेम, कौन सा क्षेत्र है जिसमें सोम जी ने लाज़वाब गीत और ग़ज़लों की सौगात नहीं दी है|

लीजिए आज प्रस्तुत है सोम ठाकुर जी का एक गीत जिसमें आज के जीवन में फैलते वैमनस्य के विष को उजागर किया गया है-


हवाए संदली हैं
हम बचें कैसे?
समय के विष बुझे
नाख़ून बढ़ते हैं

देखती आँखें छलक कर
रक्त का आकाश दहका-सा
महमहाते फागुनो में झूलकर भी
रह गया दिन बिना महका सा
पाँव बच्चों के
मदरसे की सहमती सीढ़ियों पर
बड़े डर के साथ चढ़ते हैं

स्वप्नवंशी चितवनों को दी विदा
स्वागत किया टेढ़ी निगाहों का
सहारा छीन लेते हैं पहरूए खुद
उनींदे गाँव की कमज़ोर बाहों का

ज़रा जाने-
भला ये कौन है जो
आदमी की खाल से
हर साज़ मढ़ते हैं?
समय के विष बुझे नाख़ून
बढ़ते है ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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