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एहसास का मारा दिल ही तो है!

लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

कल एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर की थी| एक ही विषय पर लिखी ब्लॉग पोस्ट्स में से वह दूसरी थी| सोचता हूँ कि इस विषय पर साथ की अन्य पोस्ट भी शेयर कर लूँ| आज प्रस्तुत है उससे पहले लिखी गई पोस्ट|



अगर यह पूछा जाए कि रसोई में कौन सी वस्तु, कौन सा पदार्थ सबसे महत्वपूर्ण है तो पाक कला में निपुण कोई व्यक्ति, अब महिला कहने से बच रहा हूँ, क्योंकि बड़े‌-बड़े ‘शेफ’ आज की तारीख में पुरुष हैं, हाँ कोई भी ऐसा व्यक्ति बता देगा कि यह वस्तु सबसे ज्यादा उपयोग में आती है अथवा यह वस्तु सर्वाधिक गुणकारी है।

अब यही सवाल अगर कविता, शायरी, विशेष रूप से फिल्मी गीतों के बारे में पूछा जाए, तो मुझे लगता है कि जो शब्द प्रतियोगिता में सबसे आगे आएंगे, उनमें से एक प्रमुख शब्द है-‘दिल’।

मुकेश जी के एक गीत के बोल याद आ रहे हैं-

दिल से तुझको बेदिली है, मुझको है दिल का गुरूर,
तू ये माने के न माने, लोग मानेंगे ज़ुरूर
!

आगे बढ़ने से पहले, दो शेर याद आ रहे हैं जो गुलाम अली जी ने एक गज़ल के प्रारंभ में गाए हैं-

दिल की चोटों ने कभी, चैन से रहने न दिया,
जब चली सर्द हवा, मैंने तुझे याद किया।
इसका रोना नहीं, क्यों तुमने किया दिल बर्बाद,
इसका गम है कि बहुत देर में बर्बाद किया।


कुछ बार ऐसे लोगों की बात होती है, जो चावल के एक दाने पर काफी बड़ा आलेख, श्लोक, यहाँ तक कि पूरी गीता भी लिख देते हैं। उन चमत्कारों का तो पता नहीं, परंतु ‘दिल’, जिसको शरीर विज्ञानी, आकार-प्रकार के लिहाज़ से पता नहीं कितना छोटा या बड़ा मानते हैं, परंतु उस पर कितना कुछ अंकित हो पाता है, उसकी कोई सीमा नहीं है।

फिल्म ‘दिल ही तो है’ में मुकेश जी ने, साहिर लुधियानवी जी के लिखे दो गीत गाए हैं, जिनका मुखड़ा लगभग एक ही जैसा है, एक उल्लास से भरा है और दूसरा उदासी से, मन हो रहा है दोनों को पूरा ही शेयर करने का-

दिल जो भी कहेगा मानेंगे,
दुनिया में हमारा दिल ही तो है।

हार मानी नहीं ज़िंदगी से,
हंस के मिलते रहे हर किसी से,
क्यों न इस दिल पे क़ुर्बान जाएं,
सह लिए कितने गम किस खुशी से,
सुख में जो न खेले हम ही तो हैं,
दुख से जो न हारा दिल ही तो है।।


कोई साथी न कोई सहारा,

कोई मंज़िल न कोई किनारा,
रुक गए हम जहाँ दिल ने रोका,
चल दिए जिस तरफ दिल पुकारा।
हम प्यार के प्यासे लोगों की,
मंज़िल का इशारा दिल ही तो है॥

अपनी जिंदादिली के सहारे,
हमने दिन ज़िंदगी के गुज़ारे,
वर्ना इस बेमुरव्वत जहाँ में,
और कब्ज़े में क्या था हमारे,
हर चीज है दौलत वालों की,
मुफलिस का बेचारा दिल ही तो है॥


अब दूसरा गीत-

भूले से मुहब्बत कर बैठा,
नादां था बिचारा दिल ही तो है।
हर दिल से खता हो जाती है,
बिगड़ो न खुदारा दिल ही तो है।

इस तरह निगाहें मत फेरो,
ऐसा न हो धड़कन रुक जाए,
सीने में कोई पत्थर तो नहीं,
एहसास का मारा दिल ही तो है।

बेदादगरों की ठोकर से,
सब ख्वाब सुहाने चूर हुए,
अब दिल का सहारा गम ही तो है,
अब गम का सहारा दिल ही तो है।


जब इतना अधिक स्थान ‘दिल’ ने कविता-शायरी में घेरा है, एक ब्लॉग में तो इसका समाना मुश्किल है। ‘मेरा नाम जोकर’ में नायक इस बात पर खुश होता है कि उसके दिल में पूरी दुनिया समा जाएगी और फिर उसका दिल टूटकर बिखर जाता है।

बहुत सारी बातें याद आ रही हैं, दिल को लेकर, कुछ बातें आगे भी तो करेंगे!

नमस्कार
————

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आखिर टूट जाता है!

आज फिर से दिन है पुरानी पोस्ट का, लीजिए प्रस्तुत है एक पुरानी पोस्ट-

आज फिर दिल की बात होनी है, वैसे तो मैं समझता हूँ कि हर दिन इसी विषय पर बात की जा सकती है। एक गीत का मुखड़ा याद आ रहा है, ‘फिर वही दिल लाया हूँ’, जिस अंदाज़ में इसे रफी साहब ने गाया है, उससे यही लगता है कि यह शम्मी कपूर जी पर फिल्माया गया होगा, शायद फिल्म का नाम भी यही था-

बंदापरवर, थाम लो जिगर, बनके प्यार फिर आया हूँ,
खिदमद में आपकी हुज़ूर, फिर वही दिल लाया हूँ!


तो मैं भी आज, फिर से दिल के बारे में ही बात कर रहा हूँ। ये दिल वैसे तो विशेष रूप से फिल्मी गीतों में एक खिलौना ही बनकर रह गया है- ‘खिलौना जानकर तुम तो मेरा दिल तोड़ जाते हो’, ‘न तूफां से खेलो, न साहिल से खेलो, मेरे पास आओ, मेरे दिल से खेलो’, ‘एक दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई इधर गिरा, कोई उधर गिरा’! फिर से मुकेश जी का एक गीत याद आ रहा है-

वो तेरे प्यार का गम, एक बहाना था सनम,
अपनी किस्मत ही कुछ ऐसी थी, कि दिल टूट गया।

वर्ना क्या बात है तुम, कोई सितमगर तो नहीं,
तेरे सीने में भी दिल है, कोई पत्थर तो नहीं,
तूने ढाया है सितम, तो यही समझे हैं हम,
अपनी किस्मत ही कुछ ऐसी थी, कि दिल टूट गया॥


अब हर गीत पूरा नहीं शेयर करूंगा। लेकिन कुल मिलाकर यही लगता है कि दिल जो अपने पास है, वो खिलौना है, शीशा है और दूसरे लोग दिल के नाम पर पत्थर लिए घूम रहे हैं। और फिर ये तो होना ही है-

शीशा हो या दिल हो, आखिर टूट जाता है!

एक और बात, कवि-शायर एक खास तरह की शब्दावली का प्रयोग करते हैं, जो उनकी पहचान बन जाती है। अब जैसे ‘दिल’ तो टूटता ही रहता है, शायद उसकी किस्मत में यही है, लेकिन यह बात सामान्यतः ‘हृदय’ के बारे में सुनने को नहीं मिलती, लेकिन फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ के गीत में ‘इंदीवर’ जी ने सोचा कि हृदय ही क्यों बचा रहे, सो उन्होंने उसको भी तोड़ दिया-

कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे,
तड़पता हुआ जब कोई छोड़ दे,
तब तुम मेरे पास आना प्रिये,
मेरा दर खुला है, खुला ही रहेगा,
तुम्हारे लिए।


अब जैसे इंदीवर जी ने टूटने के लिए ‘दिल’ के स्थान पर ‘हृदय’ जैसे पवित्र शब्द का प्रयोग किया, विषय अलग है लेकिन मुझे भारत भूषण जी की याद आ गई। गीतों में सौंदर्य वर्णन तो बहुत लोग करते हैं, लेकिन उनकी शब्दावली देखिए-

सीपिया बरन, मंगलमय तन,
जीवन-दर्शन बांचते नयन।
साड़ी की सिकुड़न-सिकुड़न में
लिख दी कैसी गंगा लहरी।


आखिर में एक फिल्मी गीत की दो पंक्तियां और याद आ रही हैं-

इस दिल में अभी और भी ज़ख्मों की जगह है,
अबरू की कटारी को दो आब और ज्यादा।


मौका लगेगा तो दिल के बारे में आगे भी बात करेंगे। आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।
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या गम न दिया होता, या दिल न दिया होता!

आज फिर से बारी है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की, लीजिए प्रस्तुत है-

एक बार और दिल की बात कर लेते हैं, ऐसे ही कुछ बातें और आ रही हैं दिमाग में, आप इसे दिल पर मत लेना।

कितनी तरह के दिल लिए घूमते हैं दुनिया में लोग, एक गीत में किसी ने बताया था- ‘कोई सोने के दिल वाला, कोई चांदी के दिल वाला, शीशे का है मतवाले तेरा दिल’।

 

 

वैसे हमारा दिल, हमें चैन से रखने के लिए क्या कुछ कोशिशें नहीं करता-

 

दिल ढूंढता है, फिर वही फुर्सत के रात दिन,
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जाना किए हुए!

जिगर मुरादाबादी साहब का शेर है-

 

आदमी, आदमी से मिलता है,
दिल मगर कम किसी से मिलता है।

एक शेर बशीर बद्र साहब का याद आ रहा है-

 

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आएगा कोई जाएगा,
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो।

एक और शेर किसी का याद आ रहा है-

 

एक इश्क़ का गम आफत, और उस पे ये दिल आफत,
या गम न दिया होता, या दिल न दिया होता।

एक शेर फैज़ अहमद फैज़ साहब का है-

 

कब ठहरेगा दर्द-ए-दिल, कब रात बसर होगी,
सुनते थे वो आएंगे, सुनते थे सहर होगी।

और बहादुर शाह ज़फर साहब का ये शेर तो बहुत प्रसिद्ध है-

 

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दागदार में।

और अब दाग देहलवी साहब का एक शेर याद कर लेते हैं, क्योंकि वैसे तो यह अनंत कथा है-

 

तुम्हारा दिल, मेरे दिल के बराबर हो नहीं सकता,
वो शीशा हो नहीं सकता, ये पत्थर हो नहीं सकता।

चलिए अब एक फिल्मी गीत का मुखड़ा और जोड़ देते हैं-

 

दिल लगाकर हम ये समझे, ज़िंदगी क्या चीज है,
इश्क़ कहते हैं किसे और आशिक़ी क्या चीज है।

ये विषय ऐसा ही कि जब बंद करने की सोचते हैं, तभी कुछ और याद आ जाता है। फिल्मी गीतों के दो मुखड़े और याद आ रहे हैं, उसके बाद बंद कर दूंगा, सच्ची!

 

ये दिल न होता बेचारा, कदम न होते आवारा
जो खूबसूरत कोई अपना हमसफर होता।

और दूसरा-

 

चल मेरे दिल, लहराके चल, मौसम भी है, वादा भी है,
उसकी गली का फासला, थोड़ा भी है, ज्यादा भी है,
चल मेरे दिल।

 

अब चलते रहिए।
नमस्कार।

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