और का होने दे न अपना रक्खे!

दिल भी पागल है कि उस शख़्स से वाबस्ता है,
जो किसी और का होने दे न अपना रक्खे|

अहमद फ़राज़

ये मुसीबत कहाँ कहाँ!

राह-ए-तलब में छोड़ दिया दिल का साथ भी,
फिरते लिए हुए ये मुसीबत कहाँ कहाँ|

फ़िराक़ गोरखपुरी

अकेला होने लगता है!

ये दिल बचकर ज़माने भर से चलना चाहे है लेकिन,
जब अपनी राह चलता है अकेला होने लगता है|

वसीम बरेलवी

रूह को भी मज़ा मोहब्बत का!

रूह को भी मज़ा मोहब्बत का,
दिल की हम-साएगी से मिलता है|

जिगर मुरादाबादी

जल्वा गह ए नाज़ से उठता भी नहीं!

दिल की गिनती न यगानों में न बेगानों में,
लेकिन उस जल्वा-गह-ए-नाज़ से उठता भी नहीं|

फ़िराक़ गोरखपुरी

ला के छुपा देनी चाहिए!

दिल भी किसी फ़क़ीर के हुजरे से कम नहीं,
दुनिया यहीं पे ला के छुपा देनी चाहिए|

राहत इंदौरी

फिर से जुड़ा नहीं करते!

ये आइनों की तरह देख-भाल चाहते हैं,
कि दिल भी टूटें तो फिर से जुड़ा नहीं करते|

अमजद इस्लाम अमजद

खुल जाओ किसी दिन!

राज़ों की तरह उतरो मिरे दिल में किसी शब,
दस्तक पे मिरे हाथ की खुल जाओ किसी दिन|

अमजद इस्लाम अमजद

मन!

आज फिर से एक बार मैं स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, अवस्थी जी बहुत सरल भाषा में सहजता से अपनी बात कहते थे, जैसे मन से मन का संवाद हो|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत –

मन को वश में करो
फिर चाहे जो करो ।

कर्ता तो और है
रहता हर ठौर है
वह सबके साथ है
दूर नहीं पास है
तुम उसका ध्यान धरो ।
फिर चाहे जो करो ।

सोच मत बीते को
हार मत जीते को
गगन कब झुकता है
समय कब रुकता है
समय से मत लड़ो ।
फिर चाहे जो करो ।


रात वाला सपना
सवेरे कब अपना
रोज़ यह होता है
व्यर्थ क्यों रोता है
डर के मत मरो ।
फिर चाहे जो करो ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कौन जवाँ कौन हसीं रहता है!

दिल फ़सुर्दा तो हुआ देख के उस को लेकिन,
उम्र भर कौन जवाँ कौन हसीं रहता है|

अहमद मुश्ताक़