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क़ीमत नहीं चुकाई गइ इक ग़रीब से!

आज फिल्म- ‘एक महल हो सपनों का’ से किशोर कुमार साहब का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| 1975 में रिलीज़ हुई इस फिल्म का यह गीत लिखा है- साहिर लुधियानवी जी ने और इसके लिए संगीत दिया था- रवि जी ने|

वास्तव में कविता और गीत ज़िंदगी के खट्टे-मीठे अनुभवों के आधार पर ही लिखे जाते हैं और कड़ुवे अनुभवों पर आधारित गीत शायद ज्यादा प्रभाव डालते हैं| दुनिया में वैसे तो शायद सभी लोग ये मानते हैं की वे प्रेम करने के लिए आए हैं, लेकिन बहुत से लोगों के लिए यह दुर्लभ ही रह जाता है| क्योंकि जहां हिसाब-किताब है वहाँ प्रेम नहीं है और जहां प्रेम है, वहाँ हिसाब-किताब नहीं है| प्रेम तो सिर्फ देना जानता है, लेकिन ऐसा सबके साथ कहाँ हो पाता है|

 

 

लीजिए आप किशोर दा के गाये  इस गीत का आनंद लीजिए-

 

देखा है ज़िंदगी को, कुछ इतना करीब से,
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से|

 

कहने को दिल की बात जिन्हें ढूँढते थे हम,
महफ़िल में आ गये हैं वो अपने नसीब से|
देखा है ज़िंदगी को, कुछ इतना करीब से||

 

नीलाम हो रहा था किसी नाज़नीं का प्यार,
क़ीमत नहीं चुकाई गइ इक ग़रीब से|
देखा है ज़िंदगी को, कुछ इतना करीब से||

 

तेरी वफ़ा की लाश पे, ला मैं ही डाल दूँ,
रेशम का ये कफ़न जो मिला है रक़ीब से|
देखा है ज़िंदगी को, कुछ इतना करीब से||

 

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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धूल हूँ मैं तू पवन बसंती!

आज काफी लंबे अंतराल के बाद मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी के गाए एक गीत के बोल शेयर कर रहा हूँ। इस गीत को जीतेंद्र जी पर फिल्माया गया है। जीतेंद्र जी के लिए भी मुकेश जी ने बहुत से हिट गीत गाये हैं। 1969 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘धरती कहे पुकार के’ के लिए यह गीत ज़नाब मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने लिखा था और मुकेश जी ने, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी के संगीत में, अपने मधुर स्वर देकर इसे अमर कर दिया था।

एक बात और, मुकेश जी को दर्द भरे गीतों का बेताज बादशाह कहा जाता है, यह गीत भी कुछ ऐसा ही, अपनी बर्बादी का जश्न मनाने का गीत!

 

 

लीजिए प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल-

खुशी की वो रात आ गई
कोई गीत जगने दो
गाओ रे झूम झूम,
कहीं कोई काँटा लगे
जो पग में तो लगने दो,
नाचो रे झूम झूम!

 

आज हँसूं मैं इतना कि
मेरी आँख लगे रोने
आज मैं इतना गाऊं कि
दिल में दर्द लगे होने,
मजे में सवेरे तलक
यही धुन मचलने दो,
नाचो रे झूम झूम।
गाओ रे झूम झूम॥

 

धूल हूँ मैं तू पवन बसंती
क्यों मेरा संग धरे,
मेरी नहीं तो और किसी की
बइयां में रंग भरे।
दो नैनो में आँसू लिए
दुल्हनिया को सजने दो,
नाचो रे झूम झूम।
गाओ रे झूम झूम॥

 

कहीं कोई काँटा लगे
जो पग में तो लगने दो,
नाचो रे झूम झूम।
गाओ रे झूम झूम।।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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