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जाने कौन आस-पास होता है!

गुलज़ार साहब अपनी शायरी में और फिल्मी गीतों में भी एक्सपेरीमेंट करने के लिए जाने जाते हैं| एक अलग तरह का चमत्कार अक्सर उनकी शायरी और गीतों में देखा जाता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है गुलज़ार साहब का यह गीत –

जब भी यह दिल उदास होता है,
जाने कौन आस-पास होता है|

होंठ चुपचाप बोलते हों जब,
सांस कुछ तेज़-तेज़ चलती हो|
आंखें जब दे रही हों आवाज़ें,
ठंडी आहों में सांस जलती हो|

आँख में तैरती हैं तसवीरें,
तेरा चेहरा तेरा ख़याल लिए|
आईना देखता है जब मुझको
एक मासूम सा सवाल लिए|


कोई वादा नहीं किया लेकिन,
क्यों तेरा इंतजार रहता है|
बेवजह जब क़रार मिल जाए,
दिल बड़ा बेकरार रहता है|

जब भी यह दिल उदास होता है,
जाने कौन आस-पास होता है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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जाने क्या हो गया सवेरों को!

आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|

जीवन में बहुत तरह की परिस्थितियों, बहुत सी परीक्षाओं से गुज़रना पड़ता है, आज तो पूरी मानव-जाति को कोरोना की परीक्षा देनी पड़ी है और हमारे देश पर यह संकट इस समय कुछ अधिक ही गहरा है|

इस परिवेश में, आज मुझे आज यह गीत याद आ रहा है, लीजिए प्रस्तुत है-  

अब की यह बरस
बड़ा तरस-तरस बीता
दीवारें नहीं पुतीं, रंग नहीं आए
एक-एक माह बाँध, खींच-खींच लाए
अब की यह बरस

जाने क्या हो गया सवेरों को
रोगी की तरह उठे खाट से
रूखे-सूखे दिन पर दिन गए
किसी नदी के सूने घाट-से

हमजोली शाखों के हाथ-पाँव
पानी में तैर नहीं पाए

शामें सब सरकारी हो गईं
अपनापन पेट में दबोच कर
छाती पर से शहर गुज़र गया
जाने कितना निरीह सोच कर

बिस्तर तक माथे की मेज़ पर
काग़ज़ दो-चार फड़फड़ाए

वेतन की पूर्णिमा नहीं लगी
दशमी के चाँद से अधिक हमें
शीशों को तोड़ गई कालिमा
समझे फिर कौन आस्तिक हमें

खिड़की से एक धार ओज कर
हम आधी देह भर नहाए

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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कच्चे रंगों से तसवीर बना डाली!

स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी के हिन्दी कविता के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे हैं| वे बच्चों की पत्रिका पराग के संपादक भी रहे थे और अपने साहित्य सृजन के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किए गए|

आज मैं नंदन जी की यह रचना शेयर कर रहा हूँ-


रेशमी कंगूरों पर
नर्म धूप सोयी।
मौसम ने
नस-नस में
नागफनी बोयी!
दोषों के खाते में कैसे लिख डालें
गर अंगारे
याचक बन पाँखुरियाँ माँग गए

कच्चे रंगों से
तसवीर बना डाली,
हल्की बौछार पड़ी
रंग हुए खाली।
कितनी है दूरी,
पर, जाने क्या मजबूरी
कि
टीस के सफ़र की

कई सीढ़ियाँ,
फलाँग गए।

खंड-खंड अपनापन
टुकड़ों में
जीना।

फटे हुए कुर्ते-सा
रोज़-रोज़ सीना।
संबंधों के सूनेपन की अरगनियों में
जगह-जगह
अपना ही बौनापन
टाँग गए!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ओ प्रवासी जल!

डॉ कुँवर बेचैन मेरे गुरुजनों में रहे हैं| मैं उस कालेज में विज्ञान के विद्यार्थी के रूप में कुछ समय गया जिसमें वे हिन्दी साहित्य पढ़ाते थे| खैर उनसे परिचय तो बाद में कवि गोष्ठियों के माध्यम से हुआ और बाद में कुछ बार मैंने एक आयोजक की भूमिका निभाते हुए भी उनको कवि के रूप में बुलाया था| जब आते थे, बड़े प्रेम से गले मिलते थे| अब तो मुझे रिटायर हुए भी 10 साल हो गए हैं, अतः अब मिलना नहीं हो पाता|


आज डॉ कुँवर बेचैन जी का एक बेहद खूबसूरत गीत शेयर कर रहा हूँ| हमारे जीवन में जो तरलता, चंचलता के कारण हैं, जब वह रोजगार की तलाश में विदेशों में बस जाते हैं, तब यहाँ उनकी कमी बहुत महसूस की जाती है| लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-


लौट आ रे !
ओ प्रवासी जल !
फिर से लौट आ !

रह गया है प्रण मन में
रेत, केवल रेत जलता
खो गई है हर लहर की
मौन लहराती तरलता
कह रहा है चीख कर मरुथल
फिर से लौट आ रे!

लौट आ रे !
ओ प्रवासी जल !
फिर से लौट आ !


सिंधु सूखे, नदी सूखी
झील सूखी, ताल सूखे
नाव, ये पतवार सूखे
पाल सूखे, जाल सूखे
सूखने अब लग गए उत्पल,
फिर से लौट आ रे !

लौट आ रे !
ओ प्रवासी जल !
फिर से लौट आ !


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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भरकर आग अंक में मुझको सारी रात जागना होगा!

स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी एक ऐसे गीतकार थे जो हमेशा कुछ अलग किस्म के गीत लिखते थे| उनकी कुछ गीत पंक्तियाँ जो अक्सर याद आती हैं, उनमें हैं- ‘ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है’, ‘एक भी आँसू न कर बेकार, जाने कब समंदर मांगने आ जाए’, ‘इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूँ, जब मिलेगी रोशनी मुझसे मिलेगी’ आदि-आदि| बड़े करीने से त्यागी जी हर किस्म के भावों को अपने गीतों में पिरोते थे|


लीजिए आज रामावतार त्यागी जी के इस गीत का आनंद लीजिए-

चाँदी की उर्वशी न कर दे युग के तप संयम को खंडित
भरकर आग अंक में मुझको सारी रात जागना होगा ।

मैं मर जाता अगर रात भी मिलती नहीं सुबह को खोकर
जीवन का जीना भी क्या है, गीतों का शरणागत होकर,
मन है राजरोग का रोगी, आशा है शव की परिणीता
डूब न जाये वंश प्यास का पनघट मुझे त्यागना होगा ॥


सपनों का अपराध नहीं है, मन को ही भा गयी उदासी
ज्यादा देर किसी नगरी में रुकते नहीं संत सन्यासी
जो कुछ भी माँगोगे दूँगा ये सपने तो परमहंस हैं
मुझको नंगे पाँव धार पर आँखें मूँद भागना होगा ॥

गागर क्या है – कंठ लगाकर जल को रोक लिया माटी ने
जीवन क्या है – जैसे स्वर को वापिस भेज दिया घाटी ने,
गीतों का दर्पण छोटा है जीवन का आकार बड़ा है
जीवन की खातिर गीतों को अब विस्तार माँगना होगा ॥


चुनना है बस दर्द सुदामा लड़ना है अन्याय कंस से
जीवन मरणासन्न पड़ा है, लालच के विष भरे दंश से
गीता में जो सत्य लिखा है, वह भी पूरा सत्य नहीं है
चिन्तन की लछ्मन रेखा को थोड़ा आज लाँघना होगा ॥


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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तब पता यह चला, मूलधन खो गया!

आज एक बार फिर से आज मैं हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रसिद्ध हस्ताक्षर, स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय त्यागी जी जुझारूपन की कविता के लिए जाने जाते थे और एक अलग तरह की छाप उनकी कविताओं की पड़ती थी|

लीजिए प्रस्तुत है यह सुंदर गीत कविता –

तन बचाने चले थे कि मन खो गया,
एक मिट्टी के पीछे रतन खो गया|

घर वही, तुम वही, मैं वही, सब वही,
और सब कुछ है वातावरण खो गया|

यह शहर पा लिया, वह शहर पा लिया,
गाँव को जो दिया था वचन खो गया|

जो हज़ारों चमन से महकदार था,
क्या किसी से कहें वह सुमन खो गया|


दोस्ती का सभी ब्याज़ जब खा चुके,
तब पता यह चला, मूलधन खो गया|

यह जमीं तो कभी भी हमारी न थी,
यह हमारा तुम्हारा गगन खो गया|

हमने पढ़कर जिसे प्यार सीखा कभी,
एक गलती से वह व्याकरण खो गया|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह!

आज स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी ने फिल्मों में बहुत से गीत लिखे, वे काव्य मंचों पर किसी समय बहुत लोकप्रिय थे और उनको ‘गीतों का राजकुमार’ कहा जाता था|


लीजिए आज प्रस्तुत है उनकी एक हिन्दी ग़ज़ल, जिसे वे गीतिका कहते थे-

जब चले जाएंगे लौट के सावन की तरह,
याद आएंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह।

ज़िक्र जिस दम भी छिड़ा उनकी गली में मेरा,
जाने शरमाए वो क्यों गांव की दुल्हन की तरह।

कोई कंघी न मिली जिससे सुलझ पाती वो,
ज़िन्दगी उलझी रही ब्रह्म के दर्शन की तरह।


दाग़ मुझमें है कि तुझमें यह पता तब होगा,
मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह।

हर किसी शख़्स की किस्मत का यही है किस्सा,
आए राजा की तरह ,जाए वो निर्धन की तरह।

जिसमें इन्सान के दिल की न हो धड़कन ‘नीरज’,
शायरी तो है वह अख़बार की कतरन की तरह।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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एक नहीं मिलता जो प्यार से पुकारे!

हिन्दी काव्य मंचों के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक साहित्यिक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी का यह गीत बहुत लोकप्रिय रहा है और जीवन, उसके एकाकीपन के बारे में कुछ बहुत सुंदर अभिव्यक्तियाँ इस गीत में हैं|


लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारा सा गीत-

भीड़ में भी रहता हूँ वीरान के सहारे
जैसे कोई मंदिर किसी गाँव के किनारे।


जाना-अनजाना शोर आता बिन बुलाए,
जीवन की आग को आवाज में छुपाए|
दूर-दूर काली रात साँय-साँय करती,
मन में न जाने कैसे कैसे रंग भरती|
अनजाना, अनचाहा अंधकार बार-बार,
करता है तारों से न जाने क्या इशारे।


चारों ओर बिखरे हैं धूल भरे रास्ते,
पता नहीं कौन इनमें है मेरे वास्ते|
जाने कहाँ जाने के लिए हूँ यहाँ आया,
किसी देवी-देवता ने नहीं ये बताया|
मिलने को मिलता है सारा ही ज़माना,
एक नहीं मिलता जो प्यार से पुकारे।


तन चाहे कहीं भी हो मन है सफ़र में,
हुआ मैं पराया जैसे अपने ही घर में|
सूरज की आग मेरे साथ-साथ चलती,
चाँदनी से मिली-जुली रात मुझे छलती|
तन की थकन तो उतार दी है पथ ने,
जाने कौन मन की थकन को उतारे।


कोई नहीं लगा मुझे अपना पराया,
दिल से मिला जो उसे दिल से लगाया|
भेदभाव नहीं किया शूल या सुमन से,
पाप-पुण्य जो भी किया, किया पूरे मन से|
जैसा भी हूँ, वैसा ही हूँ समय के सामने,
चाहे मुझे प्यार करे, चाहे मुझे मारे।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मनवा तो सावन -सावन रहा!

आज श्रेष्ठ कवि श्री सोम ठाकुर जी का एक साहित्यिक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में महीनों के माध्यम से मौसम और मौसम के बहाने जीवन के विभिन्न पड़ावों का वर्णन बड़ी खूबसूरती से किया गया है|


लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारा सा गीत-

देह हुई फागुन तो क्या हुआ
रे मितवा
मनवा तो सावन -सावन रहा|

इतना विश्वास किया अपनों पर
चंद्रमा रखा हम ने सपनों पर,
हमको जग की चित्तरसारी में
हर चेहरा दर्पण -दर्पण रहा|
रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


बस इतना ही धरम –करम भाया
अपनाया जो जीभर अपनाया,
हमको तो सदा प्रेम -मंदिर का
हर रजकण चंदन -चंदन रहा|

रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


कौन रखे याद इस कहानी को
कहाँ मिले शरण आग पानी को,
गुँथी हुई बाँहों में मुक्ति मिली
बाकी सुख बंधन -बंधन रहा|

रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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बूंद बन-बन टूट जाऊँगा वहां

हिन्दी के गीत- कविता संसार के एक और अनमोल रत्न स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी को आज याद कर रहा हूँ| पहले भी इनके कुछ गीत मैंने शेयर किए है| भावुकता का अजीब संसार होता है इन लोगों के पास, जिसमें ये जीते हैं और अपनी अनूठी अनुभूतियों से हमें परिचित कराते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत-  
              

प्यार से मुझको बुलाओगे जहां,                                                                 एक क्या सौ बार आऊँगा वहां|

पूछने की है नहीं फ़ुर्सत मुझे,
कौन हो तुम क्या तुम्हारा नाम है|
किसलिए मुझको बुलाते हो कहां,
कौन सा मुझसे तुम्हारा काम है|


फूल से तुम मुस्कुराओगे जहाँ,
मैं भ्रमर सा गुनगुनाऊँगा वहां|

कौन मुझको क्या समझता है यहां,
आज तक इस पर कभी सोचा नहीं|
आदमी मेरे लिए सबसे बड़ा,
स्वर्ग में या नरक में वह हो कहीं|


आदमी को तुम झुकाओगे जहां,
प्राण की बाजी लगाऊँगा वहां|

जानता हूँ एक दिन मैं फूल-सा,
टूट जाऊँगा बिखरने के लिए|
फिर न आऊंगा तुम्हारे रूप की,
रौशनी में स्नान करने के लिए|


किन्तु तुम मुझको भुलाओगे जहां,
याद अपनी मैं दिलाऊँगा वहां|

मैं नहीं कहता कि तुम मुझको मिलो,
और मिलकर दूर फिर जाओ चले|
चाहता हूँ मैं तुम्हें देखा करूं,
बादलों से दूर जा नभ के तले|


सर उठाकर तुम झुकाओगे जहां,
बूंद बन-बन टूट जाऊँगा वहां|


आज के लिए इतना ही, नमस्कार|

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