क्या करेंगे हम भजन होकर!

आज फिर से प्रस्तुत है मेरे अत्यंत प्रिय कवि और गीतकार आदरणीय सोम ठाकुर जी का एक गीत| सोम जी ने गीतों में अनेक प्रयोग किए हैं और अनेक प्रेम से सराबोर गीत तो लिखे ही हैं, वहीं राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभाषा प्रेम के भी कुछ बहुत सुंदर गीत उन्होंने लिखे हैं| उनके अनेक गीत समय-समय पर याद आते रहते हैं|

लीजिए आज आदरणीय सोम ठाकुर जी का यह बहुत प्यारा सा प्रस्तुत है–


दूरियाँ हम से बहुत लिपटी
एक अलबेला नमन होकर
खुशबुओं से हम सदा भटके
दो गुलाबों की छुअन होकर|

एक आँचल हाथ को छूकर
गुम गया इन बंद गलियों में
मंत्र जैसा पढ़ गया कोई
चितवनी गीतांजलियों में
पर्वतों के पाँव उग आए
दीन -दुनिया का चलन होकर|

याद कर लेगा अकेलापन
उम्र से कुछ भूल हो जाना
कसमसाहट की नदी बहना
बिजलियों का फूल हो जाना
रात अगली रात से बोली
सेज की सूनी शिकन होकर
|

रख रही है जो मुझे जिंदा
आप ये कमज़ोरियाँ सहिये
नाम चाहे जो मुझे दे दें
देवता हर बार मत कहिये
गीत है इंसान की पूजा
क्या करेंगे हम भजन होकर|

यह बड़ी नमकीन मिट्टी है
व्यर्थ है मीठी किरण बोना
सीख लेना सोम से अपने
शहर में ही अजनबी होना
वह समय की प्यास तक पहुँचा
बस अमृत का आचमन होकर|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मैं हूँ बनफूल भला मेरा कैसा खिलना, क्या मुरझाना!

Close-Up Photography of Pink Flowers



स्वर्गीय भारत भूषण जी एक असाधारण प्रतिभा वाले कवि और गीतकार थे| भारत भूषण जी के गीतों को सुनना ही एक दिव्य अनुभव होता था| भारत भूषण जी के अनेक गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं, आज जो गीत शेयर कर रहा हूँ ‘बनफूल’ यह भी भारत भूषण जी का एक प्रसिद्ध गीत है|

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें जीवन में कुछ भी मनचाहा नहीं मिलता, इसका उदाहरण भारत भूषण जी ने ‘बनफूल’ के माध्यम से दिया है| इस गीत में बनफूल अपनी व्यथा सुनाते हुए यह भी कहता है कि मालिन, जो किसी भी दृष्टि से सुंदर नहीं है, लेकिन वह भी चुनने के लिए बनफूल की तरफ निगाह नहीं डालती, और वह जीवन भर उपेक्षित ही रहता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण जी का यह लाजवाब गीत ‘बनफूल’-


मैं हूँ बनफूल भला मेरा कैसा खिलना, क्या मुरझाना,
मैं भी उनमें जिनका जग में, जैसा आना वैसा जाना|

सिर पर अंबर की छत नीली, जिसकी सीमा का अंत नहीं
मैं जहाँ उगा हूँ वहाँ कभी भूले से खिला वसंत नहीं,
ऐसा लगता है जैसे मैं ही बस एक अकेला आया हूँ
मेरी कोई कामिनी नहीं, मेरा कोई भी कंत नहीं,
बस आसपास की गर्म धूल उड़ मुझे गोद में लेती है
है घेर रहा मुझको केवल सुनसान भयावह वीराना|

सूरज आया कुछ जला गया, चंदा आया कुछ रुला गया
आंधी का झोंका मरने की सीमा तक झूला झुला गया,
छह ऋतुओं में कोई भी तो मेरी न कभी होकर आई
जब रात हुई सो गया यहीं, जब भोर हुई कुलमुला गया,
मोती लेने वाले सब हैं, ऑंसू का गाहक नहीं मिला
जिनका कोई भी नहीं उन्हें सीखा न किसी ने अपनाना|


सुनता हूँ दूर कहीं मन्दिर, हैं पत्थर के भगवान जहाँ
सब फूल गर्व अनुभव करते, बन एक रात मेहमान वहाँ,
मेरा भी मन अकुलाता है, उस मन्दिर का आंगन देखूँ
बिन मांगे जिसकी धूल परस मिल जाते हैं वरदान जहाँ,
लेकिन जाऊँ भी तो कैसे, कितनी मेरी मजबूरी है
उड़ने को पंख नहीं मेरे, सारा पथ दुर्गम अनजाना|

काली रूखी गदबदा बदन, कांसे की पायल झमकाती
सिर पर फूलों की डलिया ले, हर रोज़ सुबह मालिन आती,
ले गई हज़ारों हार निठुर, पर मुझको अब तक नहीं छुआ
मेरी दो पंखुरियों से ही, क्या डलिया भारी हो जाती,
मैं मन को समझाता कहकर, कल को ज़रूर ले जाएगी
कोई पूरबला पाप उगा, शायद यूँ ही हो कुम्हलाना|


उस रोज़ इधर दुल्हा-दुल्हन को लिए पालकी आई थी
अनगिनती कलियों-फूलों से, ज्यों अच्छी तरह सजाई थी,
मैं रहा सोचता गुमसुम ही, ये भी हैं फूल और मैं भी
सच कहता हूँ उस रात, सिसकियों में ही भोर जगाई थी,
तन कहता मैं दुनिया में हूँ, मन को होता विश्वास नहीं
इसमें मेरा अपराध नहीं, यदि मैं भी चाहूँ मुसकाना|

पूजा में चढ़ना होता तो, उगता माली की क्यारी में
सुख सेज भाग्य में होती तो, खिलता तेरी फुलवारी में,
ऐसे कुछ पुण्य नहीं मेरे, जो हाथ बढ़ा दे ख़ुद कोई
ऐसे भी हैं जिनको जीना ही पड़ता है लाचारी में,
कुछ घड़ियाँ और बितानी हैं, इस कठिन उपेक्षा में मुझको
मैं खिला पता किसको होगा, झर जाऊंगा बे-पहचाना|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए!

दीपावली के सुअवसर पर आज मैं बिना किसी भूमिका के हिन्दी गीतों के राजकुंवर कहलाने वाले स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|

ईश्वर करें कि यह दीपावली हम सभी के जीवन में नई रोशनी लेकर ये और एक जागरूक व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के रूप में हम सभी सफलता की नई ऊँचाइयाँ प्राप्त करें|

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय नीरज जी का यह गीत-


जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना,
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए|

नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग,
उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए।

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यों ही,
भले ही दिवाली यहां रोज आए।

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए


मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अंधेरा,
उतर क्यों न आएं नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे हृदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अंधेरे घिरे जब
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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ये असंगति जिन्दगी के द्वार सौ-सौ बार रोई!



स्वर्गीय भारत भूषण जी हिन्दी काव्य मंचों के ऐसे दिव्य हस्ताक्षर थे कि जिनकी उपस्थिति काव्य मंच को गरिमा प्रदान करती थी| उनके अनेक गीत मैंने पहले शेयर की हैं

मैं बनफूल भला मेरा कैसा खिलना क्या मुरझाना’,

‘चक्की पर गेहूं लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा उखड़ा, क्यों दो पाटों वाली चाकी बाबा कबीर को रुला गई’,

आधी उम्र करके धुआँ ये तो कहो किसके हुए‘|

भारत भूषण जी का जो गीत मैं आज शेयर कर रहा हूँ वह अपने आप में अलग तरह का गीत है|
लीजिए आज प्रस्तुत है, भारत भूषण जी का यह गीत –

ये असंगति जिन्दगी के द्वार सौ-सौ बार रोई
बांह में है और कोई चाह में है और कोई|

साँप के आलिंगनों में
मौन चन्दन तन पड़े हैं
सेज के सपनो भरे कुछ
फूल मुर्दों पर चढ़े हैं,

ये विषमता भावना ने सिसकियाँ भरते समोई
देह में है और कोई, नेह में है और कोई|

स्वप्न के शव पर खड़े हो
मांग भरती हैं प्रथाएं
कंगनों से तोड़ हीरा
खा रहीं कितनी व्यथाएं,

ये कथाएं उग रही हैं नागफन जैसी अबोई
सृष्टि में है और कोई, दृष्टि में है और कोई|


जो समर्पण ही नहीं हैं
वे समर्पण भी हुए हैं
देह सब जूठी पड़ी है
प्राण फिर भी अनछुए हैं,

ये विकलता हर अधर ने कंठ के नीचे सँजोई
हास में है और कोई, प्यास में है और कोई|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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पी जा हर अपमान!

आज एक बार फिर गीतों की दुनिया के एक पुराने हस्ताक्षर स्वर्गीय बाल स्वरूप ‘राही’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ | राही जी ने कुछ बहुत अच्छे गीतों और ग़ज़लों का उपहार हमें दिया है| उनको कवि सम्मेलनों में सुनने का भी अवसर मुझे मिला था, उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे मुस्कुराते हुए पूरा काव्य पाठ करते थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय बाल स्वरूप ‘राही’ जी का यह गीत –



पी जा हर अपमान और कुछ चारा भी तो नहीं !

तूने स्वाभिमान से जीना चाहा यही ग़लत था
कहाँ पक्ष में तेरे किसी समझ वाले का मत था
केवल तेरे ही अधरों पर कड़वा स्वाद नहीं है
सबके अहंकार टूटे हैं तू अपवाद नहीं है

तेरा असफल हो जाना तो पहले से ही तय था
तूने कोई समझौता स्वीकारा भी तो नहीं !

ग़लत परिस्थिति ग़लत समय में ग़लत देश में होकर
क्या कर लेगा तू अपने हाथों में कील चुभोकर
तू क्यों टँगे क्रॉस पर तू क्या कोई पैग़म्बर है
क्या तेरे ही पास अबूझे प्रश्नों का उत्तर है?

कैसे तू रहनुमा बनेगा इन पाग़ल भीड़ों का
तेरे पास लुभाने वाला नारा भी तो नहीं ।


यह तो प्रथा पुरातन दुनिया प्रतिभा से डरती है
सत्ता केवल सरल व्यक्ति का ही चुनाव करती है
चाहे लाख बार सिर पटको दर्द नहीं कम होगा
नहीं आज ही, कल भी जीने का यह ही क्रम होगा

माथे से हर शिकन पोंछ दे, आँखों से हर आँसू
पूरी बाज़ी देख अभी तू हारा भी तो नहीं।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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ऐसा कभी होगा नहीं!

स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी अपने समय में हिन्दी काव्य मंच के एक प्रमुख हस्ताक्षर थे, जिन लोगों को गीत पढ़ने और सुनने का शौक है उनको हमेशा अवस्थी जी के नए गीत सुनने की भी लालसा रहती थी| अवस्थी जी के अनेक गीत मुझे प्रिय रहे हैं और मैंने शेयर भी किए हैं, जैसे एक है ‘सो न सका मैं, याद तुम्हारी आई सारी रात, और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात‘, ‘चाहे मकान का हो, चाहे मसान का हो, धुएं का रंग एक है‘ आदि|

लीजिए आज प्रस्तुत है रमानाथ अवस्थी जी का एक और लोकप्रिय गीत, जिसमें उन्होंने अपने अनूठे अंदाज़ में अभिव्यक्ति की है-


ऐसा कहीं होता नहीं
ऐसा कभी होगा नहीं।

धरती जले बरसे न घन,
सुलगे चिता झुलसे न तन।
औ ज़िंदगी में हों न ग़म।

ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं।

हर नींद हो सपनों भरी,
डूबे न यौवन की तरी,
हरदम जिए हर आदमी,
उसमें न हो कोई कमी।

ऐसा कभी होगा नहीं,
ऐसा कभी होता नहीं।


सूरज सुबह आए नहीं,
औ शाम को जाए नहीं।
तट को न दे चुम्बन लहर
औ मृत्यु को मिल जाए स्वर।

ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं।

दुख के बिना जीवन कटे,
सुख से किसी का मन हटे।
पर्वत गिरे टूटे न कन,
औ प्यार बिन जी जाए मन।

ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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जाने कौन आस-पास होता है!

गुलज़ार साहब अपनी शायरी में और फिल्मी गीतों में भी एक्सपेरीमेंट करने के लिए जाने जाते हैं| एक अलग तरह का चमत्कार अक्सर उनकी शायरी और गीतों में देखा जाता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है गुलज़ार साहब का यह गीत –

जब भी यह दिल उदास होता है,
जाने कौन आस-पास होता है|

होंठ चुपचाप बोलते हों जब,
सांस कुछ तेज़-तेज़ चलती हो|
आंखें जब दे रही हों आवाज़ें,
ठंडी आहों में सांस जलती हो|

आँख में तैरती हैं तसवीरें,
तेरा चेहरा तेरा ख़याल लिए|
आईना देखता है जब मुझको
एक मासूम सा सवाल लिए|


कोई वादा नहीं किया लेकिन,
क्यों तेरा इंतजार रहता है|
बेवजह जब क़रार मिल जाए,
दिल बड़ा बेकरार रहता है|

जब भी यह दिल उदास होता है,
जाने कौन आस-पास होता है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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जाने क्या हो गया सवेरों को!

आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|

जीवन में बहुत तरह की परिस्थितियों, बहुत सी परीक्षाओं से गुज़रना पड़ता है, आज तो पूरी मानव-जाति को कोरोना की परीक्षा देनी पड़ी है और हमारे देश पर यह संकट इस समय कुछ अधिक ही गहरा है|

इस परिवेश में, आज मुझे आज यह गीत याद आ रहा है, लीजिए प्रस्तुत है-  

अब की यह बरस
बड़ा तरस-तरस बीता
दीवारें नहीं पुतीं, रंग नहीं आए
एक-एक माह बाँध, खींच-खींच लाए
अब की यह बरस

जाने क्या हो गया सवेरों को
रोगी की तरह उठे खाट से
रूखे-सूखे दिन पर दिन गए
किसी नदी के सूने घाट-से

हमजोली शाखों के हाथ-पाँव
पानी में तैर नहीं पाए

शामें सब सरकारी हो गईं
अपनापन पेट में दबोच कर
छाती पर से शहर गुज़र गया
जाने कितना निरीह सोच कर

बिस्तर तक माथे की मेज़ पर
काग़ज़ दो-चार फड़फड़ाए

वेतन की पूर्णिमा नहीं लगी
दशमी के चाँद से अधिक हमें
शीशों को तोड़ गई कालिमा
समझे फिर कौन आस्तिक हमें

खिड़की से एक धार ओज कर
हम आधी देह भर नहाए

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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कच्चे रंगों से तसवीर बना डाली!

स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी के हिन्दी कविता के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे हैं| वे बच्चों की पत्रिका पराग के संपादक भी रहे थे और अपने साहित्य सृजन के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किए गए|

आज मैं नंदन जी की यह रचना शेयर कर रहा हूँ-


रेशमी कंगूरों पर
नर्म धूप सोयी।
मौसम ने
नस-नस में
नागफनी बोयी!
दोषों के खाते में कैसे लिख डालें
गर अंगारे
याचक बन पाँखुरियाँ माँग गए

कच्चे रंगों से
तसवीर बना डाली,
हल्की बौछार पड़ी
रंग हुए खाली।
कितनी है दूरी,
पर, जाने क्या मजबूरी
कि
टीस के सफ़र की

कई सीढ़ियाँ,
फलाँग गए।

खंड-खंड अपनापन
टुकड़ों में
जीना।

फटे हुए कुर्ते-सा
रोज़-रोज़ सीना।
संबंधों के सूनेपन की अरगनियों में
जगह-जगह
अपना ही बौनापन
टाँग गए!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ओ प्रवासी जल!

डॉ कुँवर बेचैन मेरे गुरुजनों में रहे हैं| मैं उस कालेज में विज्ञान के विद्यार्थी के रूप में कुछ समय गया जिसमें वे हिन्दी साहित्य पढ़ाते थे| खैर उनसे परिचय तो बाद में कवि गोष्ठियों के माध्यम से हुआ और बाद में कुछ बार मैंने एक आयोजक की भूमिका निभाते हुए भी उनको कवि के रूप में बुलाया था| जब आते थे, बड़े प्रेम से गले मिलते थे| अब तो मुझे रिटायर हुए भी 10 साल हो गए हैं, अतः अब मिलना नहीं हो पाता|


आज डॉ कुँवर बेचैन जी का एक बेहद खूबसूरत गीत शेयर कर रहा हूँ| हमारे जीवन में जो तरलता, चंचलता के कारण हैं, जब वह रोजगार की तलाश में विदेशों में बस जाते हैं, तब यहाँ उनकी कमी बहुत महसूस की जाती है| लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-


लौट आ रे !
ओ प्रवासी जल !
फिर से लौट आ !

रह गया है प्रण मन में
रेत, केवल रेत जलता
खो गई है हर लहर की
मौन लहराती तरलता
कह रहा है चीख कर मरुथल
फिर से लौट आ रे!

लौट आ रे !
ओ प्रवासी जल !
फिर से लौट आ !


सिंधु सूखे, नदी सूखी
झील सूखी, ताल सूखे
नाव, ये पतवार सूखे
पाल सूखे, जाल सूखे
सूखने अब लग गए उत्पल,
फिर से लौट आ रे !

लौट आ रे !
ओ प्रवासी जल !
फिर से लौट आ !


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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