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मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह!

आज स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी ने फिल्मों में बहुत से गीत लिखे, वे काव्य मंचों पर किसी समय बहुत लोकप्रिय थे और उनको ‘गीतों का राजकुमार’ कहा जाता था|


लीजिए आज प्रस्तुत है उनकी एक हिन्दी ग़ज़ल, जिसे वे गीतिका कहते थे-

जब चले जाएंगे लौट के सावन की तरह,
याद आएंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह।

ज़िक्र जिस दम भी छिड़ा उनकी गली में मेरा,
जाने शरमाए वो क्यों गांव की दुल्हन की तरह।

कोई कंघी न मिली जिससे सुलझ पाती वो,
ज़िन्दगी उलझी रही ब्रह्म के दर्शन की तरह।


दाग़ मुझमें है कि तुझमें यह पता तब होगा,
मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह।

हर किसी शख़्स की किस्मत का यही है किस्सा,
आए राजा की तरह ,जाए वो निर्धन की तरह।

जिसमें इन्सान के दिल की न हो धड़कन ‘नीरज’,
शायरी तो है वह अख़बार की कतरन की तरह।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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एक नहीं मिलता जो प्यार से पुकारे!

हिन्दी काव्य मंचों के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक साहित्यिक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी का यह गीत बहुत लोकप्रिय रहा है और जीवन, उसके एकाकीपन के बारे में कुछ बहुत सुंदर अभिव्यक्तियाँ इस गीत में हैं|


लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारा सा गीत-

भीड़ में भी रहता हूँ वीरान के सहारे
जैसे कोई मंदिर किसी गाँव के किनारे।


जाना-अनजाना शोर आता बिन बुलाए,
जीवन की आग को आवाज में छुपाए|
दूर-दूर काली रात साँय-साँय करती,
मन में न जाने कैसे कैसे रंग भरती|
अनजाना, अनचाहा अंधकार बार-बार,
करता है तारों से न जाने क्या इशारे।


चारों ओर बिखरे हैं धूल भरे रास्ते,
पता नहीं कौन इनमें है मेरे वास्ते|
जाने कहाँ जाने के लिए हूँ यहाँ आया,
किसी देवी-देवता ने नहीं ये बताया|
मिलने को मिलता है सारा ही ज़माना,
एक नहीं मिलता जो प्यार से पुकारे।


तन चाहे कहीं भी हो मन है सफ़र में,
हुआ मैं पराया जैसे अपने ही घर में|
सूरज की आग मेरे साथ-साथ चलती,
चाँदनी से मिली-जुली रात मुझे छलती|
तन की थकन तो उतार दी है पथ ने,
जाने कौन मन की थकन को उतारे।


कोई नहीं लगा मुझे अपना पराया,
दिल से मिला जो उसे दिल से लगाया|
भेदभाव नहीं किया शूल या सुमन से,
पाप-पुण्य जो भी किया, किया पूरे मन से|
जैसा भी हूँ, वैसा ही हूँ समय के सामने,
चाहे मुझे प्यार करे, चाहे मुझे मारे।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मनवा तो सावन -सावन रहा!

आज श्रेष्ठ कवि श्री सोम ठाकुर जी का एक साहित्यिक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में महीनों के माध्यम से मौसम और मौसम के बहाने जीवन के विभिन्न पड़ावों का वर्णन बड़ी खूबसूरती से किया गया है|


लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारा सा गीत-

देह हुई फागुन तो क्या हुआ
रे मितवा
मनवा तो सावन -सावन रहा|

इतना विश्वास किया अपनों पर
चंद्रमा रखा हम ने सपनों पर,
हमको जग की चित्तरसारी में
हर चेहरा दर्पण -दर्पण रहा|
रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


बस इतना ही धरम –करम भाया
अपनाया जो जीभर अपनाया,
हमको तो सदा प्रेम -मंदिर का
हर रजकण चंदन -चंदन रहा|

रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


कौन रखे याद इस कहानी को
कहाँ मिले शरण आग पानी को,
गुँथी हुई बाँहों में मुक्ति मिली
बाकी सुख बंधन -बंधन रहा|

रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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बूंद बन-बन टूट जाऊँगा वहां

हिन्दी के गीत- कविता संसार के एक और अनमोल रत्न स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी को आज याद कर रहा हूँ| पहले भी इनके कुछ गीत मैंने शेयर किए है| भावुकता का अजीब संसार होता है इन लोगों के पास, जिसमें ये जीते हैं और अपनी अनूठी अनुभूतियों से हमें परिचित कराते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत-  
              

प्यार से मुझको बुलाओगे जहां,                                                                 एक क्या सौ बार आऊँगा वहां|

पूछने की है नहीं फ़ुर्सत मुझे,
कौन हो तुम क्या तुम्हारा नाम है|
किसलिए मुझको बुलाते हो कहां,
कौन सा मुझसे तुम्हारा काम है|


फूल से तुम मुस्कुराओगे जहाँ,
मैं भ्रमर सा गुनगुनाऊँगा वहां|

कौन मुझको क्या समझता है यहां,
आज तक इस पर कभी सोचा नहीं|
आदमी मेरे लिए सबसे बड़ा,
स्वर्ग में या नरक में वह हो कहीं|


आदमी को तुम झुकाओगे जहां,
प्राण की बाजी लगाऊँगा वहां|

जानता हूँ एक दिन मैं फूल-सा,
टूट जाऊँगा बिखरने के लिए|
फिर न आऊंगा तुम्हारे रूप की,
रौशनी में स्नान करने के लिए|


किन्तु तुम मुझको भुलाओगे जहां,
याद अपनी मैं दिलाऊँगा वहां|

मैं नहीं कहता कि तुम मुझको मिलो,
और मिलकर दूर फिर जाओ चले|
चाहता हूँ मैं तुम्हें देखा करूं,
बादलों से दूर जा नभ के तले|


सर उठाकर तुम झुकाओगे जहां,
बूंद बन-बन टूट जाऊँगा वहां|


आज के लिए इतना ही, नमस्कार|

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आँखों से आँसू की बिछुड़न, होंठों से बाँसुरियों की!

मेरे लिए गुरु तुल्य – डॉक्टर कुंवर बेचैन जी का एक गीत और आज शेयर कर रहा हूँ| कविता, गीत, ग़ज़ल आदि की यात्रा तो निरंतर चलती रहती है। डॉक्टर बेचैन एक सृजनशील रचनाकार हैं और कवि सम्मेलनों में खूब डूबकर अपने गीत पढ़ते हैं|

कुछ गीत जो बहुत शुरू में उनका सुने थे, आज भी स्मृतियों में टंके रहते हैं- ‘जितनी दूर नयन से सपना, जितनी दूर अधर से हँसना, बिछुए जितनी दूर कुँवारे पाँव से, उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से’, ऐसे अनेक गीत हैं, जैसे ‘आँखों में सिर्फ बादल, सुनसान बिजलियाँ हैं, अंगार हैं अधर पर, सब सांस आंधियाँ हैं, रग-रग दौड़ती सी एक आग की नदी है, ये बीसवीं सदी है’ आदि-आदि ।


आइए आज डॉक्टर बेचैन जी के इस गीत का आनंद लेते हैं-

मिलना और बिछुड़ना दोनों
जीवन की मजबूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।


शाखों से फूलों की बिछुड़न
फूलों से पंखुड़ियों की,
आँखों से आँसू की बिछुड़न
होंठों से बाँसुरियों की,
तट से नव लहरों की बिछुड़न
पनघट से गागरियों की,
सागर से बादल की बिछुड़न
बादल से बीजुरियों की|


जंगल जंगल भटकेगा ही
जिस मृग पर कस्तूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।


सुबह हुए तो मिले रात-दिन
माना रोज बिछुड़ते हैं,
धरती पर आते हैं पंछी
चाहे ऊँचा उड़ते हैं,
सीधे सादे रस्ते भी तो
कहीं कहीं पर मुड़ते हैं,
अगर हृदय में प्यार रहे तो
टूट टूटकर जुड़ते हैं|


हमने देखा है बिछुड़ों को
मिलना बहुत जरूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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एक करो अपराध सुर्खियों में छा जाओगे!

श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी एक सुरीले और सृजनशील गीतकार हैं| संयोग से वे भी किसी समय उसी संस्थान के कोलकता स्थित निगमीय कार्यालय में कार्यरत रहे, जिसकी एक परियोजना में मैं कार्यरत था|


श्री बुद्धिनाथ जी का एक गीत बहुत प्रसिद्ध है- ‘एक बार और जाल फेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में बंधन की चाह हो’| आशावाद के इस गीत में कुछ बहुत जानदार अभिव्यक्तियाँ हैं|


आज मैं उनका जो गीत शेयर कर रहा हूँ, वह पत्रकारिता के छिछोरे चरित्र को उजागर करता है| लीजिए प्रस्तुत है यह प्रभावी गीत-



अपराधों के ज़िला बुलेटिन
हुए सभी अख़बार,
सत्यकथाएँ पढ़ते-सुनते
देश हुआ बीमार ।

पत्रकार की क़लमें अब
फ़ौलादी कहाँ रहीं,
अलख जगानेवाली आज
मुनादी कहाँ रही ?

मात कर रहे टी० वी० चैनल
अब मछली बाज़ार ।

फ़िल्मों से, किरकिट से,
नेताओं से हैं आबाद,
ताँगेवाले लिख लेते हैं
अब इनके संवाद|

सच से क्या ये अंधे
कर पाएंगे आँखें चार ?

मिशन नहीं गंदा पेशा यह
करता मालामाल,
झटके से गुज़री लड़की को
फिर-फिर करें हलाल,

सौ-सौ अपराधों पर भारी
इनका अत्याचार ।

त्याग-तपस्या करने पर
गुमनामी पाओगे,
एक करो अपराध
सुर्खियों में छा जाओगे,

सूनापन कट जाएगा
बंगला होगा गुलजार ।

पैसे की, सत्ता की
जो दीवानी पीढ़ी है
उसे पता है, कहां लगी
संसद की सीढ़ी है

और अपाहिज जनता
उसको मान रही अवतार ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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ख़ून गिरा पी गई कचहरी!

आज एक श्रेष्ठ गीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| दिल्ली में रहते हुए उनसे मिलने के, उनका ओजस्वी काव्य-पाठ सुनने और उनके समक्ष अपनी कुछ रचनाएँ प्रस्तुत करने के भी अवसर प्राप्त हुए थे|
जैसे कोई योद्धा युद्ध में वीर-गति को प्राप्त होता है, रंजक जी के साथ ऐसा हुआ था कि दूरदर्शन के लिए कवि गोष्ठी की रिकॉर्डिंग के दौरान ही उनको दिल का दौरा पड़ा था, जो उनके प्राण लेकर ही गया|


आजकल अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत जी की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु के संदर्भ में ही नेताओं और अपराधियों के तंत्रजाल के संबंध में काफी चर्चा हो रही है|
ऐसे ही सदियों से चले आ रहे दुष्चक्र को उद्घाटित करता है रंजक जी का यह गीत–



परदे के पीछे मत जाना मेरे भाई !
टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे, बैठे हुए कसाई ।

बड़े-बड़े अफ़सर बैठे हैं,
माल धरे तस्कर बैठे हैं,
बैठे हैं कुबेर के बेटे,
ऐश लूटते लेटे-लेटे,
नंगी कॉकटेल में नंगी, नाच रही गोराई ।


इधर बोरियों की कतार,
पतलूनों में रोज़गार है,
बड़े-बड़े गोदाम पड़े हैं,
जिन पर नमक हराम खड़े हैं,
परदे के बाहर पहरे पर, आदमक़द महँगाई ।

जिसने उधर झाँककर देखा,
उसकी खिंची पीठ पर रेखा,
काया लगने लगी गिलहरी,
ख़ून गिरा पी गई कचहरी,
ऐसा क़त्ल हुआ चौरे में, लाश न पड़ी दिखाई ।


तेरी क्या औक़ात बावले,
जो परदे की ओर झाँक ले,
ये परदा इस-उसका चंदा,
समझौतों का गोल पुलंदा,
ऐसा गोरखधंधा, जिसकी नस-नस में चतुराई ।

जो इक्के-दुक्के जाएँगे,
वापस नहीं लौट पाएँगे,
जाना है तो गोल बना ले,
हथियारों पर हाथ जमा ले,
ऐसा हल्ला बोल कि जागे, जन-जन की तरुणाई ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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धूप-भरे सूने दालान!

एक सुरीले गीतकार और भारतीय काव्य मंचों की शान श्री सोम ठाकुर जी का एक प्यारा सा गीत आज शेयर कर रहा हूँ| गीत का सौंदर्य और अभिव्यक्ति की दिव्यता स्वयं ही पाठक/श्रोता को सम्मोहित कर लेती है|


लीजिए प्रस्तुत है प्रतीक्षा का यह प्यारा सा गीत–


खिड़की पर आंख लगी,
देहरी पर कान।

धूप-भरे सूने दालान,
हल्दी के रूप भरे सूने दालान।


परदों के साथ-साथ उड़ता है-
चिड़ियों का खण्डित-सा छाया क्रम
झरे हुए पत्तों की खड़-खड़ में
उगता है कोई मनचाहा भ्रम
मंदिर के कलशों पर-
ठहर गई सूरज की कांपती थकान
धूप-भरे सूने दालान।


रोशनी चढ़ी सीढ़ी-सीढ़ी
डूबा मन
जीने के
मोड़ों को
घेरता अकेलापन|

ओ मेरे नंदन!
आंगन तक बढ़ आया
एक बियाबान।
धूप भरे सूने दालान।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ!

हिन्दी काव्य मंचों के एक अत्यंत लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक प्रसिद्ध गीत आज शेयर कर रहा हूँ, जिसमें कवि ऐसे भाव व्यक्त करता है कि अपने महान राष्ट्र के लिए सब कुछ समर्पित करने के बाद भी हम उसका ऋण नहीं उतार सकते|


लीजिए प्रस्तुत है राष्ट्रप्रेम की भावना से भरपूर यह गीत –



मन समर्पित, तन समर्पित,
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँ तुम्‍हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन,
किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन-
थाल में लाऊँ सजाकर भाल मैं जब भी,
कर दया स्‍वीकार लेना यह समर्पण।


गान अर्पित, प्राण अर्पित,
रक्‍त का कण-कण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँज दो तलवार को, लाओ न देरी,
बाँध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी,
भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी,
शीश पर आशीष की छाया धनेरी।


स्‍वप्‍न अर्पित, प्रश्‍न अर्पित,
आयु का क्षण-क्षण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

तोड़ता हूँ मोह का बंधन, क्षमा दो,
गाँव मेरे, द्वार-घर मेरी, ऑंगन, क्षमा दो,
आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो,
और बाऍं हाथ में ध्‍वज को थमा दो।


सुमन अर्पित, चमन अर्पित,
नीड़ का तृण-तृण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

आज मैं स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, आज की पीढ़ी उनको अमिताभ बच्चन के पिता के रूप में अधिक जानती है, परंतु किसी ज़माने वे हिन्दी कवि सम्मेलनों के अत्यंत लोकप्रिय कवि हुआ करते थे| उनकी ‘मधुशाला’ ने तो लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे, लोग इसको सुनकर झूम उठते थे| उन्होंने प्रेम के, विरह के और विद्रोह के भी गीत लिखे हैं, उनकी एक कविता तो फिल्म- अग्निपथ में काफी गूंजी थी| अनेक लोकगीत शैली के गीत भी उन्होंने लिखे थे- जैसे ‘ए री महुआ के नीचे मोती झरें’|


मुझे याद है आकाशवाणी में उनके एक साक्षात्कार में किसी ने उनसे पूछ लिया था कि क्या उनकी ‘कविताओं की लोकप्रियता का कारण यह है कि उनकी भाषा बहुत सरल है’, इस पर वो बोले थे कि ‘भाषा सरल होना इतना आसान नहीं है, यदि आपका मन निर्मल नहीं होगा, तो आपकी भाषा सरल हो ही नहीं पाएगी’|


आज का उनका यह गीत, एक रूमानी गीत है, आइए इसका आनंद लेते हैं-



क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
पलक संपुटों में मदिरा भर
तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?


यह अधिकार कहाँ से लाया?’
और न कुछ मैं कहने पाया –
मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में –
यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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