कभी कभी !

हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत कुशल गीतकार स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी के कुछ गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं, हिन्दी गीत साहित्य में उनका अमूल्य योगदान रहा है|
आज मैं स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूं-

कभी कभी जब मेरी तबियत
यों ही घबराने लगती है,
तभी ज़िन्दगी मुझे न जाने
क्या-क्या समझाने लगती है|

रात, रात भर को ही मिलती
दिन भी मिलता दिन भर को,
कोई पूरी तरह न मिलता
रमानाथ लौटो घर को|

घर भी बिन दीवारों वाला
जिसकी कोई राह नहीं,
पहुँच सका तो पहुँचूँगा मैं
वैसे कुछ परवाह नहीं|


मंज़िल के दीवाने मन पर
जब दुविधा छाने लगती है,
तभी ज़िन्दगी मुझे न जाने
क्या-क्या समझाने लगती है|

पूरी होने की उम्मीद में
रही सदा हर नींद अधूरी,
तन चाहे जितना सुंदर हो
मरना तो उसकी मज़बूरी|

मज़बूरी की मार सभी को
मज़बूरन सहनी पड़ती है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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देखेगा कौन?

हिन्दी नवगीत आंदोलन के प्रणेता स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी, हिन्दी गीत साहित्य में अपने योगदान के लिए हमेशा याद किए जाएंगे|

आज मैं स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूं-


बगिया में नाचेगा मोर,
देखेगा कौन?
तुम बिन ओ मेरे चितचोर,
देखेगा कौन?

नदिया का यह नीला जल, रेतीला घाट,
झाऊ की झुरमुट के बीच, यह सूनी बाट,
रह-रह कर उठती हिलकोर,
देखेगा कौन?

आँखड़ियों से झरते लोर,
देखेगा कौन?

बौने ढाकों का यह वन, लपटों के फूल,
पगडंडी के उठते पाँव, रोकते बबूल,
बौराये आमों की ओर,
देखेगा कौन?
पाथर-सा ले हिया कठोर,
देखेगा कौन?

नाचती हुई फुल-सुंघनी, बनतीतर शोख,
घास पर सोन-चिरैया, डाल पर महोख,
मैना की यह पतली ठोर,
देखेगा कौन?
कलंगी वाले ये कठफोर,
देखेगा कौन?

आसमान की ऐंठन-सी धुएँ की लकीर,
ओर-छोर नापती हुई, जलती शहतीर,
छू-छूकर सांझ और भोर,
देखेगा कौन?
दुखती यह देह पोर-पोर,
देखेगा कौन?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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वह झंकार है कविता!

नीलम सिंह जी एक सृजनशील कवियित्री हैं, उनके एक गीत की पंक्तियां मुझे अक्सर याद आती हैं-

धूप, धुआँ, पानी में,
ऋतु की मनमानी में,
सूख गए पौधे तो
मन को मत कोसना,
और काम सोचना|

आज प्रस्तुत है नीलम सिंह जी की एक और प्रभावशाली कविता, जो वास्तव में ‘कविता’ की क्षमता और प्रभाविता के बारे में ही है –

शब्दों के जोड़-तोड़ से
गणित की तरह
हल की जा रही है जो
वह कविता नहीं है|

अपनी सामर्थ्य से दूना
बोझ उठाते-उठाते
चटख गई हैं जिनकी हड्डियाँ
उन मज़दूरों के
ज़िस्म का दर्द है कविता
भूख से लड़ने के लिये
तवे पर पक रही है जो
उस रोटी की गंध है कविता|


उतार सकता है जो
ख़ुदा के चेहरे से भी नकाब
वो मज़बूत हाथ है कविता
जीती जा सकती है जिससे
बड़ी से बड़ी जंग
वह हथियार है कविता|

जिसके आँचल की छाया में
पलते हैं हमारी आँखों के
बेहिसाब सपने
उस माँ का प्यार है कविता
जिसके तुतलाते स्वर
कहना चाहते हैं बहुत कुछ
उस बच्चे की नई वर्णमाला का
अक्षर है कविता|


कविता एकलव्य का अँगूठा नहीं है
कि गुरु-दक्षिणा के बहाने
कटवा दिया जाय
वह अर्जुन का गाण्डीव है, कृष्ण का सुदर्शन चक्र ।

कविता नदी की क्षीण रेखा नहीं
समुद्र का विस्तार है
जो गुंजित कर सकती है
पूरे ब्रह्माण्ड को
वह झंकार है कविता ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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दृश्य ही अदृश्य हो जाएगा!

स्वर्गीय भारत यायावर जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| मैं उनसे कभी मिला नहीं, फ़ेसबुक पर मेरे मित्र थे, अपनी रचनाओं के बारे में सूचना देते रहते थे, जिनको पढ़कर मैं काफी प्रभावित होता था, विशेष रूप से फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ जी पर उन्होंने अत्यंत सराहनीय कार्य किया है| विभिन्न विषयों पर, अनेक रचनाकारों के संबंध में उनके अत्यंत सारगर्भित आलेख मैंने फ़ेसबुक पर ही पढे और कुछ चर्चाओं में भाग भी लिया|

फिर एक-दो बार उन्होंने लिखा कि वे अस्वस्थ हैं और फिर 21 अक्टूबर,2021 को उनके देहांत का दुःखद समाचार भी मिला| स्वर्गीय यायावर जी का स्मरण करते हुए आज उनकी यह कविता शेयर कर रहा हूँ –



एक दृश्य है जो अदृश्य हो गया है
उसका बिम्ब मन में उतर गया है
मैं चुप हूँ
चुपचाप चला जाऊँगा
कहाँ
किस ओर
किस जगह
अदृश्य !

किसी के मन में यह बात प्रकट होगी
कि एक दृश्य था
अदृश्य हो चला गया है !

अब उसके शब्द जो हवा में सनसनाते थे
किसी के साथ कुछ दूर घूम आते थे
उसके विचार कहीं मानो किसी गुफ़ा से निकलते थे
पहले गुर्राते थे
फिर गले लगाते थे
फिर कुछ चौंक – चौंक जाते थे
फिर बहुत चौंकाते थे

अब उसकी कहीँ छाया तक नहीं है
अब कोई पहचान भी नहीं है
दृश्य में अदृश्य हो जाएगा
कहीं नज़र नहीं आएगा !

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आँधियों ने गोद में हमको खिलाया है !

आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार और कादंबिनी पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय रामानंद दोषी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| दोषी जी का गीत ‘मन होता है पारा, ऐसे देखा नहीं करो’ बहुत प्रसिद्ध हुआ था|

इस रचना में दोषी जी ने हमारे महान राष्ट्र की गौरव वंदना बड़े श्रेष्ठ तरीके से प्रस्तुत की है| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रामानंद दोषी जी की यह कविता –

आँधियों ने गोद में हमको खिलाया है न भूलो,
कंटकों ने सिर हमें सादर झुकाया है न भूलो,
सिन्धु का मथकर कलेजा हम सुधा भी शोध लाए,
औ’ हमारे तेज से सूरज लजाया है न भूलो।

वे हमीं तो हैं कि इक हुंकार से यह भूमि कांपी,
वे हमीं तो हैं जिन्होंने तीन डग में सृष्टि नापी,
और वे भी हम कि जिनकी सभ्यता के विजय रथ की
धूल उड़ कर छोड़ आई छाप अपनी विश्वव्यापी।

वक्र हो आई भृकुटि तो ये अचल नगराज डोले,
दश दिशाओं के सकल दिक्पाल ये गजराज डोले,
डोल उट्ठी है धरा, अम्बर, भुवन, नक्षत्र-मंडल,
ढीठ अत्याचारियों के अहंकारी ताज डोले।


सुयश की प्रस्तर-शिला पर चिह्न गहरे हैं हमारे,
ज्ञान-शिखरों पर धवल ध्वज-चिन्ह हैं लहरे हमारे,
वेग जिनका यों कि जैसे काल की अंगड़ाइयाँ हों,
उन तरंगों में निडर जलयान ठहरे हैं हमारे।

मस्त योगी हैं कि हम सुख देखकर सबका सुखी हैं,
कुछ अजब मन है कि हम दुख देखकर सबका दुखी हैं,
तुम हमारी चोटियों की बर्फ़ को यों मत कुरेदो,
दहकता लावा हृदय में है कि हम ज्वालामुखी हैं।

लास्य भी हमने किए हैं और तांडव भी किए हैं,
वंश मीरा और शिव के, विष पिया है औ’ जिए हैं,
दूध माँ का, या कि चन्दन, या कि केसर जो समझ लो,
यह हमारे देश की रज है कि हम इसके लिए हैं।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कौन थकान हरे जीवन की?

अज्ञेय जी द्वारा संपादित तारसप्तक के माध्याम से हिन्दी में नई कविता का युग प्रारंभ हुआ था, इसमें संकलित कवियों के संबंध मे अज्ञेय जी ने लिखा था कि वे एक दूसरे से और एक दूसरे के कुत्तों से भी नफरत करते हैं, परंतु वे सभी कविता के नए युग के प्रतिनिधि हैं| तारसप्तक के बाद अज्ञेय जी ने ‘दूसरा सप्तक’ और ‘तीसरा सप्तक’ के माध्यम से भी उस समय के अनेक प्रतिनिधि कवियों को प्रस्तुत किया था| आज मैं ‘तारसप्तक’ में शामिल रहे स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूं| गिरिजा कुमार जी का गीत ‘छाया मत छूना मन’ बहुत नाज़ुक मनोभावों को प्रस्तुत करता है|

गिरिजा कुमार माथुर जी के लिखे प्रेरणा गीत ‘हम होंगे कामयाब‘ जो कि अंग्रेजी गीत ‘वी शेल ओवरकम’ का अनुवाद है, उससे तो सभी लोग परिचित हैं|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी की यह कविता –

कौन थकान हरे जीवन की?
बीत गया संगीत प्यार का,
रूठ गयी कविता भी मन की ।

वंशी में अब नींद भरी है,
स्वर पर पीत सांझ उतरी है
बुझती जाती गूंज आखिरी
इस उदास बन पथ के ऊपर
पतझर की छाया गहरी है,
अब सपनों में शेष रह गई
सुधियां उस चंदन के बन की ।

रात हुई पंछी घर आए,
पथ के सारे स्वर सकुचाए,
म्लान दिया बत्ती की बेला
थके प्रवासी की आंखों में
आंसू आ आ कर कुम्हलाए,
कहीं बहुत ही दूर उनींदी
झांझ बज रही है पूजन की ।

कौन थकान हरे जीवन की?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इक पीर पली मीलों तक!

आज एक बार फिर मैं, मेरे लिए गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर कुँवर बेचैन जी अत्यंत सरल हृदय व्यक्ति और श्रेष्ठ रचनाकार थे| उनसे मिलने और उनका कविता पाठ सुनने का अनुभव स्मरणीय होता था|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की यह ग़ज़ल –

ज़िंदगी यूँ भी जली, यूँ भी जली मीलों तक,
चाँदनी चार क‍़दम, धूप चली मीलों तक|

प्यार का गाँव अजब गाँव है जिसमें अक्सर,
ख़त्म होती ही नहीं दुख की गली मीलों तक|

प्यार में कैसी थकन कहके ये घर से निकली,
कृष्ण की खोज में वृषभानु-लली मीलों तक|

घर से निकला तो चली साथ में बिटिया की हँसी,
ख़ुशबुएँ देती रही नन्हीं कली मीलों तक|

माँ के आँचल से जो लिपटी तो घुमड़कर बरसी,
मेरी पलकों में जो इक पीर पली मीलों तक|

मैं हुआ चुप तो कोई और उधर बोल उठा,
बात यह है कि तेरी बात चली मीलों तक|

हम तुम्हारे हैं ‘कुँअर’ उसने कहा था इक दिन,
मन में घुलती रही मिसरी की डली मीलों तक|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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हँसाते-हँसाते रूलाया गया हूँ !

स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी हिन्दी साहित्य मंच के एक अनूठे कवि थे, उनकी अभिव्यक्ति शैली अलग तरह की थी, अक्सर एक कवि के रूप में वे अपनी बात करते थे, आज भी मैं ‘आत्माभिव्यक्ति शैली में मैं लिखी गई उनकी एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी की यह कविता –


न छेड़ो मुझे मैं सताया गया हूँ ।
हँसाते-हँसाते रूलाया गया हूँ ।

सताए हुए को सताना बुरा है,
तृषित की तृषा को बढ़ाना बुरा है,
विफल याचना की अकर्मण्यता पर-
अभय-दान का मुस्कुराना बुरा है ।
करूँ बात क्या दान या भीख की मैं,
संजोया नहीं हूँ, लुटाया गया हूँ ।
न छेड़ो मुझे…।

न स्वीकार मुझको नियंत्रण किसी का,
अस्वीकार कब है निमंत्रण किसी का,
मुखर प्यार के मौन वातावरण में-
अखरता अनोखा समर्पण किसी का ।
प्रकृति के पटल पर नियति तूलिका से,
अधूरा बना कर, मिटाया गया हूँ !


क्षितिज पर धरा व्योम से नित्य मिलती,
सदा चांदनी में चकोरी निकलती,
तिमिर यदि न आह्वान करता प्रभा का-
कभी रात भर दीप की लौ न जलती ।
करो व्यंग्य मत व्यर्थ मेरे मिलन पर,
मैं आया नहीं हूँ, बुलाया गया हूँ ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सपना है अभी भी!

हिन्दी साहित्य की प्रत्येक विधा में अद्वितीय लेखन करने वाले, भले ही वह उपन्यास, कहानी और निबंध लेखन हो तथा हिन्दी कविता के गीत, नवगीत और अगीत सभी क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ने वाले और धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज उनकी एक और कविता शेयर कर रहा हूँ|

जीवन में मनुष्य का ध्येय, उसका संकल्प और सपना ही उसे सब कुछ करने को प्रेरित करता है| लीजिए प्रस्तुत है इसी को प्रभावी अभिव्यक्ति देती स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की यह कविता –



क्योंकि सपना है अभी भी
इसलिए तलवार टूटी अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध धूमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
क्योंकि सपना है अभी भी!

तोड़ कर अपने चतुर्दिक का छलावा
जब कि घर छोड़ा, गली छोड़ी, नगर छोड़ा
कुछ नहीं था पास बस इसके अलावा
विदा बेला, यही सपना भाल पर तुमने तिलक की तरह आँका था
(एक युग के बाद अब तुमको कहां याद होगा?)
किन्तु मुझको तो इसी के लिए जीना और लड़ना
है धधकती आग में तपना अभी भी
क्योंकि सपना है अभी भी!

तुम नहीं हो, मैं अकेला हूँ मगर
वह तुम्ही हो जो
टूटती तलवार की झंकार में
या भीड़ की जयकार में
या मौत के सुनसान हाहाकार में
फिर गूंज जाती हो

और मुझको
ढाल छूटे, कवच टूटे हुए मुझको
फिर तड़प कर याद आता है कि
सब कुछ खो गया है – दिशाएं, पहचान, कुंडल,कवच
लेकिन शेष हूँ मैं, युद्धरत् मैं, तुम्हारा मैं
तुम्हारा अपना अभी भी


इसलिए, तलवार टूटी, अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धूंध धुमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
क्योंकि सपना है अभी भी!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कारवाँ गुज़र गया!

आज बिना किसी भूमिका के, श्रेष्ठ कवि और गीतों के राजकुमार कहलाने वाले स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी का एक प्रसिद्ध गीत शेयर कर रहा हूँ| एक ऐसा गीत जो नीरज जी की पहचान बना और उनसे अक्सर कवि सम्मेलनों में यह गीत प्रस्तुत करने का अनुरोध किया जाता था|

इस गीत का कुछ अंश मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ, लीजिए आज प्रस्तुत है नीरज जी का यह पूरा गीत –

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई
चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई,

गीत अश्क बन गए छंद हो दफन गए
साथ के सभी दिऐ धुआँ पहन पहन गए
और हम झुके-झुके, मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा
क्या जमाल था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ़ जमीन और आसमाँ उधर उठा

थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,

एक दिन मगर यहाँ ऐसी कुछ हवा चली
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली
और हम लुटे-लुटे वक्त से पिटे-पिटे
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

हाथ थे उठे कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,

हो सका न कुछ मगर, शाम बन गई सहर
वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखर-बिखर
और हम डरे-डरे, नीर नैन में भरे
ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।


माँग भर चली कि एक जब नई-नई किरन
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरन-चरन
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन चली दुल्हन
गाँव सब उमड़ पड़ा बहक उठे नयन-नयन,

पर तभी ज़हर भरी गाज़ एक वह गिरी
पुँछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी
और हम अजान से दूर के मकान से
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार| 

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