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मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा !

एक बार फिर से मैं, हिन्दी काव्य मंचों और फिल्मी दुनिया, दोनों क्षेत्रों में अपनी रचनाधर्मिता की अमिट छाप छोड़ने वाले स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी की एक हिन्दी गजल, जिसे वे ‘गीतिका’ कहते थे प्रस्तुत कर रहा हूँ| नीरज जी जहां कवि सम्मेलनों में बहुत लोकप्रिय थे, वहीं उन्होंने हमारी फिल्मों में भी अनेक साहित्यिक गरिमा से युक्त गीत लिखे|


आज की यह गजल भी उनकी एक अलग पहचान प्रस्तुत करती है –

तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा ।
सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा ।

वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में,
हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा ।

तू ढूँढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में,
वो श्याम तो किसी मीरा की चश्म-ए-तर में रहा ।


वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की,
मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा ।

हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में,
उसे न कुछ भी मिला, जो अगर-मगर में रहा ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अश्रु बहाने से न कभी पाषाण पिघलता है !

हिन्दी काव्य मंचों के प्रमुख एवं लोकप्रिय कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय शिशुपाल सिंह जी ‘निर्धन’ की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|


एक संकल्प इस कविता में है कि आज हमारे जीवन में कितना ही अंधकार क्यों न हो, हम अपने लक्ष्य अवश्य प्राप्त करेंगे| बड़ा ही ओजपूर्ण संकल्प इस कविता में व्यक्त किया गया है –


रात-रात भर जब आशा का दीप मचलता है,
तम से क्या घबराना सूरज रोज़ निकलता है ।

कोई बादल कब तक
रवि-रथ को भरमाएगा?
ज्योति-कलश तो निश्चित ही
आँगन में आएगा।


द्वार बंद मत करो भोर रसवंती आएगी,
कभी न सतवंती किरणों का चलन बदलता है ।

भले हमें सम्मानजनक
संबोधन नहीं मिले,
हम ऐसे हैं सुमन
कहीं गमलों में नहीं खिले।


अपनी वाणी है उद्बोधन गीतों का उद्गम,
एक गीत से पीड़ाओं का पर्वत गलता है ।

ठीक नहीं है यहाँ
वेदना को देना वाणी,
किसी अधर पर नहीं-
कामना, कोई कल्याणी ।


चढ़ता है पूजा का जल भी ऐसे चरणों पर
जो तुलसी बनकर अपने आँगन में पलता है ।

मत दो तुम आवाज़
भीड़ के कान नहीं होते,
क्योंकि भीड़ में-
सबके सब इंसान नहीं होते ।


मोती पाने के लालच में नीचे मत उतरो,
प्रणपालक तृण तूफ़ानों के सर पर चलता है ।

रात कटेगी कहो कहानी
राजा-रानी की,
करो न चिन्ता
जीवन-पथ में, गहरे पानी की।


हँसकर तपते रहो छाँव का अर्थ समझने को,
अश्रु बहाने से न कभी पाषाण पिघलता है ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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संबंध कुछ उनका नहीं है, सूर्य के परिवार से!

हिन्दी काव्य मंचों के प्रमुख एवं लोकप्रिय कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत करने के क्रम में आज मैं श्री बालकवि बैरागी जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| बैरागी जी स्वाभिमान से भरी, एवं ओजपूर्ण कविताएं लिखने के लिए विख्यात हैं|

बैरागी जी मध्यप्रदेश के अति सामान्य समुदाय से उभरकर आए हैं और अपनी कविताओं की लोकप्रियता के बल पर वे सांसद के पद तक पहुंचे| उनका फिल्म के लिए लिखा एक गीत भी याद आता है-‘तू चंदा मैं चाँदनी, तू तरुवर मैं शाख रे’, कवि सम्मेलनों में जब बैरागी जी कविता पाठ करते हैं तब वे दिव्य वातावरण तैयार करते हैं| मुझे आज भी लाल किले के कवि सम्मेलनों में उनका कविता पाठ याद आता है| ऐसे कवि सम्मेलन जो कई बार दिन निकलने तक भी चलते थे|
आज की इस कविता में भी उन्होंने, प्रतीक रूप में सूर्य के अहंकार के सामने, दीप के समर्पण को महत्व दिया है, जो घर के दीवट में रात भर जलता है| लीजिए प्रस्तुत है श्री बालकवि वैरागी जी की यह कविता –



हैं करोडों सूर्य लेकिन सूर्य हैं बस नाम के,
जो न दें हमको उजाला, वे भला किस काम के?
जो रात भर जलता रहे उस दीप को दीजै दु‍आ,
सूर्य से वह श्रेष्ठ है, क्षुद्र है तो क्या हुआ!
वक्त आने पर मिला लें हाथ जो अँधियार से,
संबंध कुछ उनका नहीं है, सूर्य के परिवार से!


देखता हूँ दीप को और खुद में झाँकता हूँ मैं,
फूट पड़ता है पसीना और बेहद काँपता हूँ मैं|
एक तो जलते रहो और फिर अविचल रहो,
क्या विकट संग्राम है,युद्धरत प्रतिपल रहो|
हाय! मैं भी दीप होता, जूझता अँधियार से,
धन्य कर देता धरा को ज्योति के उपहार से!!


यह घडी बिल्कुल नहीं है शांति और संतोष की,
सूर्यनिष्ठा संपदा होगी गगन के कोष की|
यह धरा का मामला है, घोर काली रात है,
कौन जिम्मेवार है यह सभी को ज्ञात है|
रोशनी की खोज में किस सूर्य के घर जाओगे,
दीपनिष्ठा को जगाओ, अन्यथा मर जाओगे!!


आप मुझको स्नेह देकर चैन से सो जाइए,
स्वप्न के संसार में आराम से खो जाइए|
रात भर लड़ता रहूंगा मैं घने अँधियार से,
रंच भर विचलित न हूंगा मौसमों की मार से|
मैं जानता हूं तुम सवेरे मांग उषा की भरोगे,
जान मेरी जायेगी पर ऋण अदा उसका करोगे!!


आज मैंने सूर्य से बस जरा-सा यों कहा-
आपके साम्राज्य में इतना अँधेरा क्यों रहा?
तमतमाकर वह दहाड़ा–मैं अकेला क्या करूँ?
तुम निकम्मों के लिये मैं ही भला कब तक मरूँ?
आकाश की आराधना के चक्करों में मत पड़ो,
संग्राम यह घनघोर है, कुछ मैं लड़ूँ, कुछ तुम लड़ो !!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मेरी थकन उतर जाती है!

हिन्दी काव्य मंचों के प्रमुख एवं लोकप्रिय कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| रामावतार त्यागी जी स्वाभिमान से भरी, एवं ओजपूर्ण कविताएं लिखने के लिए विख्यात थे|


लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का यह गीत- –

हारे थके मुसाफिर के चरणों को धोकर पी लेने से,
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी थकन उतर जाती है।

कोई ठोकर लगी अचानक, जब-जब चला सावधानी से,
पर बेहोशी में मंजिल तक, जा पहुँचा हूँ आसानी से,
रोने वाले के अधरों पर, अपनी मुरली धर देने से,
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी तृष्णा मर जाती है॥


प्यासे अधरों के बिन परसे, पुण्य नहीं मिलता पानी को,
याचक का आशीष लिये बिन, स्वर्ग नहीं मिलता दानी को,
खाली पात्र किसी का अपनी, प्यास बुझा कर भर देने से,
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी गागर भर जाती है॥

लालच दिया मुक्ति का जिसने, वह ईश्वर पूजना नहीं है,
बन कर वेदमंत्र-सा मुझको, मंदिर में गूँजना नहीं है,
संकटग्रस्त किसी नाविक को, निज पतवार थमा देने से,
मैंने अक्सर यह देखा है ,मेरी नौका तर जाती है॥


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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यह तुम्हारे नैन में तिरता हुआ जल!

एक बार फिर मैं आज बहुत ही प्यारे और भावुक गीतकार, स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मुझे यह स्मरण करके अच्छा लगता है कि मुझे कई बार उनसे गले मिलने का अवसर मिला था| बहुत ही सरल हृदय व्यक्ति, सृजनशील रचनाकार थे| आज के इस गीत में भी उन्होंने प्रेयसी की आँखों में आए आंसुओं के बहाने क्या-क्या बातें कह दीं, भावुकता की उड़ान में कहाँ-कहाँ पहुँच गए|


लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी का यह प्यारा सा गीत- –



नींद सुख की
फिर हमें सोने न देगा-
यह तुम्हारे नैन में तिरता हुआ जल ।

छू लिए भीगे कमल-
भीगी ॠचाएँ
मन हुए गीले-
बहीं गीली हवाएँ|


बहुत सम्भव है डुबो दे
सृष्टि सारी,
दृष्टि के आकाश में घिरता हुआ जल ।

हिमशिखर, सागर, नदी-
झीलें, सरोवर,
ओस, आँसू, मेघ, मधु-
श्रम-बिंदु, निर्झर|

रूप धर अनगिन कथा
कहता दुखों की,
जोगियों-सा घूमता-फिरता हुआ जल ।

लाख बाँहों में कसें
अब ये शिलाएँ,
लाख आमंत्रित करें
गिरि-कंदराएँ|


अब समंदर तक
पहुँचकर ही रुकेगा,
पर्वतों से टूटकर गिरता हुआ जल ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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रथ का टूटा हुआ पहिया!

धर्मयुग के यशस्वी संपादक रहे और गद्य और पद्य की सभी विधाओं- कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, यात्रा वृतांत आदि-आदि में अपना बहुमूल्य योगदान करने वाले स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ|

भारती जी ने महाभारत की पृष्ठभूमि पर एक खंडकाव्य- अंधायुग भी लिखा था| आज की इस कविता में भी महाभारत का संदर्भ दिया गया है| वास्तव में जीवन में कभी ऐसे व्यक्तियों अथवा वस्तुओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, जिनको हम अक्सर महत्व नहीं देते|


आइए स्वाभिमान से भारी इस कविता का आनंद लेते हैं-



मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत !

क्या जाने कब
इस दुरूह चक्रव्यूह में
अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ
कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय !


अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी
बड़े-बड़े महारथी
अकेली निहत्थी आवाज़ को
अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें
तब मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया
उसके हाथों में
ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !
मैं रथ का टूटा पहिया हूँ


लेकिन मुझे फेंको मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले !




आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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एक जाला-सा समय की आँख में उतरा!

आज हिन्दी नवगीत के एक सशक्त हस्ताक्षर- श्री राजेन्द्र गौतम का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इस नवगीत में सामान्य जन के लिए संघर्ष और आशावाद का संदेश दिया गया है| यह विश्वास व्यक्त किया गया है की परिस्थितियाँ कितनी ही विकट क्यों न हो, हम लोग मिलकर उनका सामना कर सकते हैं| इस अंधेरी सुरंग के पार रोशनी की सौगात अवश्य मिलेगी|


आइए इस नवगीत का आनंद लेते हैं-



यह धुआँ
सच ही बहुत कड़वा —
घना काला
क्षितिज तक दीवार फिर भी
बन न पाएगा ।

सूरज की लाश दबी
चट्टान के नीचे,
सोच यह मन में
ठठा कर रात हँसती है|

सुन अँधेरी कोठरी की वृद्ध खाँसी को,
आत्ममुग्धा-गर्विता यह
व्यंग्य कसती है|

एक जाला-सा
समय की आँख में उतरा,
पर उजाला सहज ही यों
छिन न पाएगा ।


संखिया कोई —
कुओं में डाल जाता है,
हवा व्याकुल
गाँव भर की देह है नीली|
दिशाएँ निःस्पन्द सब
बेहोश सीवाने,
कुटिलता की गुँजलक
होती नहीं ढीली|


पर गरुड़-से
भैरवी के पंख फैलेंगे,
चुप्पियों के नाग का फन
तन न पाएगा ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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हर लड़की की अम्मा मुझको!

आज स्वर्गीय गोपाल प्रसाद व्यास जी की एक हास्य कविता शेयर कर रहा हूँ| व्यास जी किसी समय दिल्ली  में ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के कर्ता-धर्ता हुआ करते थे| लाल-किले पर प्रतिवर्ष स्वाधीनता दिवस और गणतन्त्र दिवस पर आयोजित होने वाले विराट कवि-सम्मेलन के भी वही आयोजक होते थे, जहां मुझे बहुत से प्रमुख कवियों को सुनने का सौभाग्य मिला|

व्यास जी प्रत्येक रविवार को दैनिक हिंदुस्तान में ‘नारद जी खबर लाए हैं’ स्तंभ भी लिखते थे, जो काफी लोकप्रिय था और उसमें सामयिक घटनाओं पर रोचक एवं सटीक टिप्पणियाँ की जाती थीं|

लीजिए प्रस्तुत है गोपाल प्रसाद ‘व्यास’ जी की यह प्रसिद्ध  कविता-

 

 

हिन्दी के कवियों को जैसे
गीत-गवास लगा करती है,
या नेता टाइप लाला को
नाम-छपास लगा करती है।

 

मथुरा के पंडों को लगती
है खवास औरों के घर पर,
उसी तरह श्रोतागण पाकर
मुझे कहास लगा करती है।

 

पढ़ते वक्त मुझे बचपन में
अक्सर प्यास लगा करती थी,
और गणित का घंटा आते
शंका खास लगा करती थी।

 

बड़ा हुआ तो मुझे इश्क के
दौरे पड़ने लगे भंयकर,
हर लड़की की अम्मा मुझको
अपनी सास लगा करती थी।

 

कसम आपकी सच कहता हूं
मुझको सास बहुत प्यारी है,
जिसने मेरी पत्नी जाई
उस माता की बलिहारी है!

 

जरा सोचिए, अगर विधाता
जग में सास नहीं उपजाते,
तो हम जैसे पामर प्राणी
बिना विवाह ही रह जाते।

 

कहो कहां से मुन्नी आती?
कहो कहां से मुन्ना आता?
इस भारत की जनसंख्या में
अपना योगदान रह जाता।

 

आधा दर्जन बच्चे कच्चे
अगर न अपना वंश बढ़ाते,
अपना क्या है, नेहरू चाचा
बिना भतीजों के रह जाते

 

एक-एक भारतवासी के
पीछे दस-दस भूत न होते,
तो अपने गुलजारी नंदा
भार योजनाओं का ढोते।

 

क्या फिर बांध बनाए जाते?
क्या फिर अन्न उगाए जाते?
कर्जे-पर-कर्जे ले-लेकर
क्या मेहमान बुलाए जाते?

 

यह सब हुआ सास के कारण
बीज-रूप है वही भवानी,
सेओ इनको नेता लोगो!
अगर सफलता तुमको पानी

 

श्वसुर-प्रिया, सब सुखदाता हैं
भव-भयहारिणि जगदाता हैं,
सुजलां सुफलां विख्याता है
सास नहीं, भारत माता है।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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जैसे कोई हंस अकेला, आंगन में उतरे!

आज हिन्दी नवगीत के अनूठे हस्ताक्षर माहेश्वर तिवारी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| गीत-कविता आदि स्वयं ही अपनी बात कहते हैं, उसके बारे में अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं होती| किसी की याद को लेकर कितनी सुंदर अभिव्यक्ति इस गीत में दी गई है, आइए इस गीत का आनंद लेते हैं-

 

 

याद तुम्हारी जैसे कोई
कंचन-कलश भरे।
जैसे कोई किरन अकेली
पर्वत पार करे।

 

लौट रही गायों के
संग-संग
याद तुम्हारी आती,
और धूल के
संग-संग
मेरे माथे को छू जाती,
दर्पण में अपनी ही छाया-सी
रह-रह उभरे,
जैसे कोई हंस अकेला
आंगन में उतरे।

 

जब इकला कपोत का
जोड़ा
कंगनी पर आ जाए,
दूर चिनारों के
वन से
कोई वंशी स्वर आए,
सो जाता सूखी टहनी पर
अपने अधर धरे|
लगता जैसे रीते घट से
कोई प्यास हरे।

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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प्रेमा नदी – सोम ठाकुर

आज मैं एक बार फिर से अपने प्रिय कवियों में से एक माननीय श्री सोम ठाकुर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यह एक अलग तरह की कविता है जो अपना संपूर्ण प्रभाव पाठक/श्रोता पर छोड़ती है| लीजिए इस कविता का आनंद लीजिए-

 

 

 

मैं कभी गिरता – संभलता हूँ
उछलता -डूब जाता हूँ,
तुम्हारी मधुबनी यादें लिए
प्रेमा नदी|

 

यह बड़ी जादूभरी, टोने चढ़ी है,
फूटती है सब्ज़ धरती से, मगर
नीले गगन के साथ होती है,
रगो में दौड़ती है सनसनी बोती हुई
मन को भिगोती हुई,
उमड़ती है अंधेरी आँधियो के साथ
उजली प्यास का मरुथल पिए, प्रेमा नदी|

 

भोर को सूर्य घड़ी में
खुशबुओं से मैं पिघलता हूँ,
उबालों को हटाते ग्लेशियर लादे हुए
हर वक़्त बहता हूँ,
रुपहली रात की चंद्रा-भंवर में
घूम जाता हूँ,
बहुत खामोश रहता हूँ
मगर वंशी बनाती है मुझे
अपनी छुअन के साथ,
हर अहसास को गुंजन किए
प्रेमा नदी|

 

यह सदानीरा पसारे हाथ
मेरे मुक्त आदिम निर्झरों को माँग लेती है,
कदंबों तक झुलाती है
निचुड़ती बिजलियाँ देकर
भरे बादल उठाती है,
बिछुड़ते दो किनारे को
हरे एकांत का सागर दिए
प्रेमा नदी|

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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