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मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह!

आज स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी ने फिल्मों में बहुत से गीत लिखे, वे काव्य मंचों पर किसी समय बहुत लोकप्रिय थे और उनको ‘गीतों का राजकुमार’ कहा जाता था|


लीजिए आज प्रस्तुत है उनकी एक हिन्दी ग़ज़ल, जिसे वे गीतिका कहते थे-

जब चले जाएंगे लौट के सावन की तरह,
याद आएंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह।

ज़िक्र जिस दम भी छिड़ा उनकी गली में मेरा,
जाने शरमाए वो क्यों गांव की दुल्हन की तरह।

कोई कंघी न मिली जिससे सुलझ पाती वो,
ज़िन्दगी उलझी रही ब्रह्म के दर्शन की तरह।


दाग़ मुझमें है कि तुझमें यह पता तब होगा,
मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह।

हर किसी शख़्स की किस्मत का यही है किस्सा,
आए राजा की तरह ,जाए वो निर्धन की तरह।

जिसमें इन्सान के दिल की न हो धड़कन ‘नीरज’,
शायरी तो है वह अख़बार की कतरन की तरह।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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आश्वासन का जर्दा, भाषण की सुपाड़ियाँ!

हिन्दी काव्य मंचों के प्रसिद्ध हास्य कवि स्वर्गीय ओमप्रकाश आदित्य जी एक अत्यंत सृजनशील रचनाकार थे, छंद पर उनका पूर्ण अधिकार था और उनकी हास्य कविताओं को बहुत आनंद और आदर के साथ सुना जाता था| मेरा सौभाग्य है कि अनेक बार कवि सम्मेलनों के आयोजन के कारण उनसे भेंट का अवसर मिला था|


आज प्रस्तुत है नेताजी का नख-शिख वर्णन करने वाली उनकी कविता, यह कविता काफी लंबी है, अतः इसको दो भागों में शेयर करूंगा, पहले भाग के रूप में, नेताजी के कुछ अंगों का वर्णन आज प्रस्तुत है-

सिर

बेपैंदी के लोटे-सा सिर शोभित
शीश-क्षितिज पर लघु-लघु कुंतल
सूखाग्रस्त क्षेत्र में जैसे
उजड़ी हुई फसल दिखती हो
धवल हिमालय-सा गर्वित सिर
अति उन्नत सिर
वोट मांगते समय स्वयं यों झुक जाता है
सिया-हरण से पूर्व झुका था जैसे रावण
या डसने से पूर्व सर्प जैसे झुकता है
स्वर्ण पट्टिका-सा ललाट है
कनपटियों तक
चंदन-चित्रित चौड़ा माथा
कनपटियों पर रेख उभरती कूटनीति की
माथे पर दुर्भाग्य देश का लिखा हुआ है

कान

सीपी जैसे कान शब्द जय-जय के मोती
कान नहीं ये षडयंत्रों के कुटिल भँवर हैं
एक कान ज्यों विरोधियों के लिए चक्रव्यूह
एक कान ज्यों चुगलखोर चमचे का कमरा!

नयन

रिश्वत के अंजन से अंजित
पर मद-रंजित
दूर किसी ऊँची कुर्सी पर
वर्षों से टकटकी लगाए
गिध्द नयन दो
भौहें हैं ज्यों मंत्री-मंडल की बैठक हो
पलकें ज्यों उद्धाटन मदिरा की दुकान का
अंतरंग कमरे-सी भीतर काली पुतली
पुतली में छोटा-सा गोलक जैसे कुर्सी
क्रोध-कुटिलता कपट कोरकों में बैठे हैं
शर्म न जाने इन ऑंखों में कहाँ छुप गई!

नाक

शहनाई-सी नाक, नफीरी जैसे नथुने
नाक नुकीली में ऊपर से है नकेल
पर नथ करती है
है नेता की नाक, नहीं है ऐरी-गैरी
कई बार कट चुकी किंतु फिर भी अकाट्य है!

मुख

होंठ कत्थई इन दोनों होठों का मिलना
कत्थे में डूबा हो जैसे चांद ईद का
चूने जैसे दाँत, जीभ ताम्बूल पत्र-सी
आश्वासन का जर्दा भाषण की सुपाड़ियाँ
नेताजी का मुख है अथवा पानदान है
अधरों पर मुस्कान सितारे जैसे टूटें
बत्तीसी दिखती बत्तीस मोमबत्ती-सी
बड़ा कठिन लोहे के चने चबाना लेकिन
कितने लोहे के पुल चबा लिए
इन दृढ़ दाँतों ने
निगल गई यह जीभ
न जाने कितनी सड़कें
लोल-कपोल गोल मुख-मंडल
मुख पर काला तिल कलंक-सा
चांद उतर आया धरती पर
नेता की सूरत में!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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बूंद बन-बन टूट जाऊँगा वहां

हिन्दी के गीत- कविता संसार के एक और अनमोल रत्न स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी को आज याद कर रहा हूँ| पहले भी इनके कुछ गीत मैंने शेयर किए है| भावुकता का अजीब संसार होता है इन लोगों के पास, जिसमें ये जीते हैं और अपनी अनूठी अनुभूतियों से हमें परिचित कराते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत-  
              

प्यार से मुझको बुलाओगे जहां,                                                                 एक क्या सौ बार आऊँगा वहां|

पूछने की है नहीं फ़ुर्सत मुझे,
कौन हो तुम क्या तुम्हारा नाम है|
किसलिए मुझको बुलाते हो कहां,
कौन सा मुझसे तुम्हारा काम है|


फूल से तुम मुस्कुराओगे जहाँ,
मैं भ्रमर सा गुनगुनाऊँगा वहां|

कौन मुझको क्या समझता है यहां,
आज तक इस पर कभी सोचा नहीं|
आदमी मेरे लिए सबसे बड़ा,
स्वर्ग में या नरक में वह हो कहीं|


आदमी को तुम झुकाओगे जहां,
प्राण की बाजी लगाऊँगा वहां|

जानता हूँ एक दिन मैं फूल-सा,
टूट जाऊँगा बिखरने के लिए|
फिर न आऊंगा तुम्हारे रूप की,
रौशनी में स्नान करने के लिए|


किन्तु तुम मुझको भुलाओगे जहां,
याद अपनी मैं दिलाऊँगा वहां|

मैं नहीं कहता कि तुम मुझको मिलो,
और मिलकर दूर फिर जाओ चले|
चाहता हूँ मैं तुम्हें देखा करूं,
बादलों से दूर जा नभ के तले|


सर उठाकर तुम झुकाओगे जहां,
बूंद बन-बन टूट जाऊँगा वहां|


आज के लिए इतना ही, नमस्कार|

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मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा !

एक बार फिर से मैं, हिन्दी काव्य मंचों और फिल्मी दुनिया, दोनों क्षेत्रों में अपनी रचनाधर्मिता की अमिट छाप छोड़ने वाले स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी की एक हिन्दी गजल, जिसे वे ‘गीतिका’ कहते थे प्रस्तुत कर रहा हूँ| नीरज जी जहां कवि सम्मेलनों में बहुत लोकप्रिय थे, वहीं उन्होंने हमारी फिल्मों में भी अनेक साहित्यिक गरिमा से युक्त गीत लिखे|


आज की यह गजल भी उनकी एक अलग पहचान प्रस्तुत करती है –

तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा ।
सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा ।

वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में,
हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा ।

तू ढूँढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में,
वो श्याम तो किसी मीरा की चश्म-ए-तर में रहा ।


वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की,
मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा ।

हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में,
उसे न कुछ भी मिला, जो अगर-मगर में रहा ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अश्रु बहाने से न कभी पाषाण पिघलता है !

हिन्दी काव्य मंचों के प्रमुख एवं लोकप्रिय कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय शिशुपाल सिंह जी ‘निर्धन’ की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|


एक संकल्प इस कविता में है कि आज हमारे जीवन में कितना ही अंधकार क्यों न हो, हम अपने लक्ष्य अवश्य प्राप्त करेंगे| बड़ा ही ओजपूर्ण संकल्प इस कविता में व्यक्त किया गया है –


रात-रात भर जब आशा का दीप मचलता है,
तम से क्या घबराना सूरज रोज़ निकलता है ।

कोई बादल कब तक
रवि-रथ को भरमाएगा?
ज्योति-कलश तो निश्चित ही
आँगन में आएगा।


द्वार बंद मत करो भोर रसवंती आएगी,
कभी न सतवंती किरणों का चलन बदलता है ।

भले हमें सम्मानजनक
संबोधन नहीं मिले,
हम ऐसे हैं सुमन
कहीं गमलों में नहीं खिले।


अपनी वाणी है उद्बोधन गीतों का उद्गम,
एक गीत से पीड़ाओं का पर्वत गलता है ।

ठीक नहीं है यहाँ
वेदना को देना वाणी,
किसी अधर पर नहीं-
कामना, कोई कल्याणी ।


चढ़ता है पूजा का जल भी ऐसे चरणों पर
जो तुलसी बनकर अपने आँगन में पलता है ।

मत दो तुम आवाज़
भीड़ के कान नहीं होते,
क्योंकि भीड़ में-
सबके सब इंसान नहीं होते ।


मोती पाने के लालच में नीचे मत उतरो,
प्रणपालक तृण तूफ़ानों के सर पर चलता है ।

रात कटेगी कहो कहानी
राजा-रानी की,
करो न चिन्ता
जीवन-पथ में, गहरे पानी की।


हँसकर तपते रहो छाँव का अर्थ समझने को,
अश्रु बहाने से न कभी पाषाण पिघलता है ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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संबंध कुछ उनका नहीं है, सूर्य के परिवार से!

हिन्दी काव्य मंचों के प्रमुख एवं लोकप्रिय कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत करने के क्रम में आज मैं श्री बालकवि बैरागी जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| बैरागी जी स्वाभिमान से भरी, एवं ओजपूर्ण कविताएं लिखने के लिए विख्यात हैं|

बैरागी जी मध्यप्रदेश के अति सामान्य समुदाय से उभरकर आए हैं और अपनी कविताओं की लोकप्रियता के बल पर वे सांसद के पद तक पहुंचे| उनका फिल्म के लिए लिखा एक गीत भी याद आता है-‘तू चंदा मैं चाँदनी, तू तरुवर मैं शाख रे’, कवि सम्मेलनों में जब बैरागी जी कविता पाठ करते हैं तब वे दिव्य वातावरण तैयार करते हैं| मुझे आज भी लाल किले के कवि सम्मेलनों में उनका कविता पाठ याद आता है| ऐसे कवि सम्मेलन जो कई बार दिन निकलने तक भी चलते थे|
आज की इस कविता में भी उन्होंने, प्रतीक रूप में सूर्य के अहंकार के सामने, दीप के समर्पण को महत्व दिया है, जो घर के दीवट में रात भर जलता है| लीजिए प्रस्तुत है श्री बालकवि वैरागी जी की यह कविता –



हैं करोडों सूर्य लेकिन सूर्य हैं बस नाम के,
जो न दें हमको उजाला, वे भला किस काम के?
जो रात भर जलता रहे उस दीप को दीजै दु‍आ,
सूर्य से वह श्रेष्ठ है, क्षुद्र है तो क्या हुआ!
वक्त आने पर मिला लें हाथ जो अँधियार से,
संबंध कुछ उनका नहीं है, सूर्य के परिवार से!


देखता हूँ दीप को और खुद में झाँकता हूँ मैं,
फूट पड़ता है पसीना और बेहद काँपता हूँ मैं|
एक तो जलते रहो और फिर अविचल रहो,
क्या विकट संग्राम है,युद्धरत प्रतिपल रहो|
हाय! मैं भी दीप होता, जूझता अँधियार से,
धन्य कर देता धरा को ज्योति के उपहार से!!


यह घडी बिल्कुल नहीं है शांति और संतोष की,
सूर्यनिष्ठा संपदा होगी गगन के कोष की|
यह धरा का मामला है, घोर काली रात है,
कौन जिम्मेवार है यह सभी को ज्ञात है|
रोशनी की खोज में किस सूर्य के घर जाओगे,
दीपनिष्ठा को जगाओ, अन्यथा मर जाओगे!!


आप मुझको स्नेह देकर चैन से सो जाइए,
स्वप्न के संसार में आराम से खो जाइए|
रात भर लड़ता रहूंगा मैं घने अँधियार से,
रंच भर विचलित न हूंगा मौसमों की मार से|
मैं जानता हूं तुम सवेरे मांग उषा की भरोगे,
जान मेरी जायेगी पर ऋण अदा उसका करोगे!!


आज मैंने सूर्य से बस जरा-सा यों कहा-
आपके साम्राज्य में इतना अँधेरा क्यों रहा?
तमतमाकर वह दहाड़ा–मैं अकेला क्या करूँ?
तुम निकम्मों के लिये मैं ही भला कब तक मरूँ?
आकाश की आराधना के चक्करों में मत पड़ो,
संग्राम यह घनघोर है, कुछ मैं लड़ूँ, कुछ तुम लड़ो !!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मेरी थकन उतर जाती है!

हिन्दी काव्य मंचों के प्रमुख एवं लोकप्रिय कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| रामावतार त्यागी जी स्वाभिमान से भरी, एवं ओजपूर्ण कविताएं लिखने के लिए विख्यात थे|


लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का यह गीत- –

हारे थके मुसाफिर के चरणों को धोकर पी लेने से,
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी थकन उतर जाती है।

कोई ठोकर लगी अचानक, जब-जब चला सावधानी से,
पर बेहोशी में मंजिल तक, जा पहुँचा हूँ आसानी से,
रोने वाले के अधरों पर, अपनी मुरली धर देने से,
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी तृष्णा मर जाती है॥


प्यासे अधरों के बिन परसे, पुण्य नहीं मिलता पानी को,
याचक का आशीष लिये बिन, स्वर्ग नहीं मिलता दानी को,
खाली पात्र किसी का अपनी, प्यास बुझा कर भर देने से,
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी गागर भर जाती है॥

लालच दिया मुक्ति का जिसने, वह ईश्वर पूजना नहीं है,
बन कर वेदमंत्र-सा मुझको, मंदिर में गूँजना नहीं है,
संकटग्रस्त किसी नाविक को, निज पतवार थमा देने से,
मैंने अक्सर यह देखा है ,मेरी नौका तर जाती है॥


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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यह तुम्हारे नैन में तिरता हुआ जल!

एक बार फिर मैं आज बहुत ही प्यारे और भावुक गीतकार, स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मुझे यह स्मरण करके अच्छा लगता है कि मुझे कई बार उनसे गले मिलने का अवसर मिला था| बहुत ही सरल हृदय व्यक्ति, सृजनशील रचनाकार थे| आज के इस गीत में भी उन्होंने प्रेयसी की आँखों में आए आंसुओं के बहाने क्या-क्या बातें कह दीं, भावुकता की उड़ान में कहाँ-कहाँ पहुँच गए|


लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी का यह प्यारा सा गीत- –



नींद सुख की
फिर हमें सोने न देगा-
यह तुम्हारे नैन में तिरता हुआ जल ।

छू लिए भीगे कमल-
भीगी ॠचाएँ
मन हुए गीले-
बहीं गीली हवाएँ|


बहुत सम्भव है डुबो दे
सृष्टि सारी,
दृष्टि के आकाश में घिरता हुआ जल ।

हिमशिखर, सागर, नदी-
झीलें, सरोवर,
ओस, आँसू, मेघ, मधु-
श्रम-बिंदु, निर्झर|

रूप धर अनगिन कथा
कहता दुखों की,
जोगियों-सा घूमता-फिरता हुआ जल ।

लाख बाँहों में कसें
अब ये शिलाएँ,
लाख आमंत्रित करें
गिरि-कंदराएँ|


अब समंदर तक
पहुँचकर ही रुकेगा,
पर्वतों से टूटकर गिरता हुआ जल ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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रथ का टूटा हुआ पहिया!

धर्मयुग के यशस्वी संपादक रहे और गद्य और पद्य की सभी विधाओं- कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, यात्रा वृतांत आदि-आदि में अपना बहुमूल्य योगदान करने वाले स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ|

भारती जी ने महाभारत की पृष्ठभूमि पर एक खंडकाव्य- अंधायुग भी लिखा था| आज की इस कविता में भी महाभारत का संदर्भ दिया गया है| वास्तव में जीवन में कभी ऐसे व्यक्तियों अथवा वस्तुओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, जिनको हम अक्सर महत्व नहीं देते|


आइए स्वाभिमान से भारी इस कविता का आनंद लेते हैं-



मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत !

क्या जाने कब
इस दुरूह चक्रव्यूह में
अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ
कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय !


अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी
बड़े-बड़े महारथी
अकेली निहत्थी आवाज़ को
अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें
तब मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया
उसके हाथों में
ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !
मैं रथ का टूटा पहिया हूँ


लेकिन मुझे फेंको मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले !




आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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एक जाला-सा समय की आँख में उतरा!

आज हिन्दी नवगीत के एक सशक्त हस्ताक्षर- श्री राजेन्द्र गौतम का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इस नवगीत में सामान्य जन के लिए संघर्ष और आशावाद का संदेश दिया गया है| यह विश्वास व्यक्त किया गया है की परिस्थितियाँ कितनी ही विकट क्यों न हो, हम लोग मिलकर उनका सामना कर सकते हैं| इस अंधेरी सुरंग के पार रोशनी की सौगात अवश्य मिलेगी|


आइए इस नवगीत का आनंद लेते हैं-



यह धुआँ
सच ही बहुत कड़वा —
घना काला
क्षितिज तक दीवार फिर भी
बन न पाएगा ।

सूरज की लाश दबी
चट्टान के नीचे,
सोच यह मन में
ठठा कर रात हँसती है|

सुन अँधेरी कोठरी की वृद्ध खाँसी को,
आत्ममुग्धा-गर्विता यह
व्यंग्य कसती है|

एक जाला-सा
समय की आँख में उतरा,
पर उजाला सहज ही यों
छिन न पाएगा ।


संखिया कोई —
कुओं में डाल जाता है,
हवा व्याकुल
गाँव भर की देह है नीली|
दिशाएँ निःस्पन्द सब
बेहोश सीवाने,
कुटिलता की गुँजलक
होती नहीं ढीली|


पर गरुड़-से
भैरवी के पंख फैलेंगे,
चुप्पियों के नाग का फन
तन न पाएगा ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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