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प्यार से भीगा प्रकृति का गात साथी!

स्वर्गीय भारत भूषण जी मेरे परम प्रिय कवि रहे हैं, कवि सम्मेलनों में उनका कविता पाठ सुनना, वास्तव में वहाँ जाने की क्रिया को सार्थक कर देता था| बहुत भाव-विभोर होकर वे सस्वर काव्य-पाठ करते थे|



आज का भारत भूषण जी का यह गीत दर्शाता है कि किस प्रकार पूरे संयम और मर्यादा के साथ, सार्थक प्रणय गीत लिखा जा सकता है-

आज पहली बात पहली रात साथी|

चाँदनी ओढ़े धरा सोई हुई है,
श्याम अलकों में किरण खोई हुई है|
प्यार से भीगा प्रकृति का गात साथी,
आज पहली बात पहली रात साथी|

मौन सर में कंज की आँखें मुंदी हैं,
गोद में प्रिय भृंग हैं बाहें बँधी हैं,
दूर है सूरज, सुदूर प्रभात साथी,
आज पहली बात पहली रात साथी|

आज तुम भी लाज के बंधन मिटाओ,
खुद किसी के हो चलो अपना बनाओ,
है यही जीवन, नहीं अपघात साथी|
आज पहली बात पहली रात साथी|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मेरा बदन हो गया पत्थर का!

स्वर्गीय रमेश रंजक जी मेरे प्रिय कवि रहे हैं, उनका स्नेह भी मिला मुझे और एक विशेषता थी उनमें कि यदि अच्छी रचना उनके शत्रु की भी हो तो उसकी तारीफ़ अवश्य करते थे| कम शब्दों में कैसे बड़ी बात कही जाए, यह उनकी रचनाओं में देखा जा सकता है|

आज मैं रंजक जी का यह नवगीत शेयर कर रहा हूँ-



मेरा बदन हो गया पत्थर का|

‘सोनजुही-से’ हाथ तुम्हारे
लकड़ी के हो गये,
हारे दिन फीके हो गये,
नक्शा बदल गया सारे घर का|

भिड़ने लगे जोर से दरवाज़े,
छत, आँगन, दालान
सभी लगते आधे-आधे,
ख़ारीपन भर गया समुन्दर का|

सिमट गयी हैं कछुए-सी बातें,
दिन में दो दिन हुए
रात में चार-चार रातें,
तेवर बदला अक्षर-अक्षर का|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कच्चे रंगों से तसवीर बना डाली!

स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी के हिन्दी कविता के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे हैं| वे बच्चों की पत्रिका पराग के संपादक भी रहे थे और अपने साहित्य सृजन के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किए गए|

आज मैं नंदन जी की यह रचना शेयर कर रहा हूँ-


रेशमी कंगूरों पर
नर्म धूप सोयी।
मौसम ने
नस-नस में
नागफनी बोयी!
दोषों के खाते में कैसे लिख डालें
गर अंगारे
याचक बन पाँखुरियाँ माँग गए

कच्चे रंगों से
तसवीर बना डाली,
हल्की बौछार पड़ी
रंग हुए खाली।
कितनी है दूरी,
पर, जाने क्या मजबूरी
कि
टीस के सफ़र की

कई सीढ़ियाँ,
फलाँग गए।

खंड-खंड अपनापन
टुकड़ों में
जीना।

फटे हुए कुर्ते-सा
रोज़-रोज़ सीना।
संबंधों के सूनेपन की अरगनियों में
जगह-जगह
अपना ही बौनापन
टाँग गए!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मिट्टी को बादल में गूँथें, चाक चलाएँ!

स्वर्गीय निदा फ़ाजली साहब मेरे प्रिय शायर रहे हैं, उनकी अनेक रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज एक रचना उनकी शेयर कर रहा हूँ, जो बताती है कि जाति-धर्म के भेदभाव कितने बेमानी हैं| इस कविता में वह कहते हैं कि बच्चे बनकर आइए वही काम करें जो ऊपर वाला करता है, विभिन्न रूप और वेशभूषा के लोग बनाना और फिर उनको नए सांचे में ढाल देना|


लीजिए प्रस्तुत है, निदा फ़ाज़ली साहब की यह सुंदर रचना-

आओ
कहीं से थोड़ी सी मिट्टी भर लाएँ,
मिट्टी को बादल में गूँथें
चाक चलाएँ,
नए-नए आकार बनाएँ|

किसी के सर पे चुटिया रख दें
माथे ऊपर तिलक सजाएँ,
किसी के छोटे से चेहरे पर
मोटी सी दाढ़ी फैलाएँ|

कुछ दिन इनसे जी बहलाएँ,
और यह जब मैले हो जाएँ,


दाढ़ी चोटी तिलक सभी को,
तोड़-फोड़ के गड़-मड़ कर दें|
मिली हुई यह मिट्टी फिर से
अलग-अलग साँचों में भर दें,

– चाक चलाएँ
नए-नए आकार बनाएँ|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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चाँद निकला तो सो गईं आँखें!

नक़्श लायलपुरी साहब एक प्रमुख साहित्यकार और फिल्मी गीतकार रहे हैं, उनके अनेक गीत हम आज भी गुनगुनाते हैं, जैसे ‘मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा’, ‘कई सदियों से कई जन्मों से’ आदि-आदि|

आज उनकी एक सुंदर सी ग़ज़ल मैं शेयर कर रहा हूँ, जिसमें विभिन्न परिस्थितियों और मनः स्थितियों में आँखों की स्थिति को व्यक्त किया गया है-

तुझको सोचा तो खो गईं आँखें,
दिल का आईना हो गईं आँखें|

ख़त का पढ़ना भी हो गया मुश्किल,
सारा काग़ज़ भिगो गईं आँखें|

कितना गहरा है इश्क़ का दरिया,
उसकी तह में डुबो गईं आँखें|

कोई जुगनू नहीं तसव्वुर का,
कितनी वीरान हो गईं आँखें|

दो दिलों को नज़र के धागे से,
इक लड़ी में पिरो गईं आँखें|


रात कितनी उदास बैठी है,
चाँद निकला तो सो गईं आँखें|

‘नक़्श’ आबाद क्या हुए सपने,
और बरबाद हो गईं आँखें|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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यह कवि का घर है !

डॉ रामदरश मिश्र जी, जिनकी रचना मैं आज शेयर कर रहा हूँ, वे हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं और कविता, कहानी तथा उपन्यास लेखन, सभी क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय एवं सम्मानित हैं|

आज की उनकी इस रचना में भी उन्होंने कवि की अलग प्रकार की दृष्टि और दर्शन का परिचय दिया है-



गेंदे के बड़े-बड़े जीवंत फूल
बेरहमी से तोड़ लिए गए
और बाज़ार में आकर बिकने लगे|

बाज़ार से ख़रीदे जाकर वे
पत्थर के चरणों पर चढ़ा दिए गए,
फिर फेंक दिए गए कूड़े की तरह|

मैं दर्द से भर आया
और उनकी पंखुड़ियाँ रोप दीं
अपनी आँगन-वाटिका की मिट्टी में,
अब वे लाल-लाल, पीले-पीले, बड़े-बड़े फूल बनकर
दहक रहे हैं|


मैं उनके बीच बैठकर उनसे संवाद करता हूँ,
वे अपनी सुगंध और रंगों की भाषा में
मुझे वसंत का गीत सुनाते हैं|


और मैं उनसे कहता हूँ —
जीओ मित्रो !
पूरा जीवन जीओ उल्लास के साथ,
अब न यहाँ बाज़ार आएगा
और न पत्थर के देवता पर तुम्हें चढ़ाने के लिए धर्म,
यह कवि का घर है !



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

हिंदी के एक अत्यंत श्रेष्ठ गीतकार थे श्री भारत भूषण जी, मेरठ के रहने वाले थे और काव्य मंचों पर मधुरता बिखेरते थे। मैं यह नहीं कह सकता कि वे सबसे लोकप्रिय थे, परंतु जो लोग कवि-सम्मेलनों में कविता, गीतों के आस्वादन के लिए जाते थे, उनको भारत भूषण जी के गीतों से बहुत सुकून मिलता था।


वैसे भारत भूषण जी ने बहुत से अमर गीत लिखे हैं- ‘चक्की पर गेहूं लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा- उखड़ा, क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई’; ‘मैं बनफूल भला मेरा, कैसा खिलना, क्या मुर्झाना’, ‘आधी उमर करके धुआं, ये तो कहो किसके हुए’ आदि-आदि।

आज जो गीत मुझे बरबस याद आ रहा है वह एक ऐसा गीत है, जिसमें वे लोग जो जीवन में मनचाही उपलब्धियां नहीं कर पाते, असफल रहते हैं, वे अपने आप को किस तरह समझाते हैं, बहुत सुंदर उपमाएं दी हैं इस गीत में भारत भूषण जी ने, प्रस्तुत यह गीत-

तू मन अनमना न कर अपना, इसमें कुछ दोष नहीं तेरा,
धरती के कागज़ पर मेरी, तस्वीर अधूरी रहनी थी।

रेती पर लिखे नाम जैसा, मुझको दो घड़ी उभरना था,
मलयानिल के बहकाने पर, बस एक प्रभात निखरना था,
गूंगे के मनोभाव जैसे, वाणी स्वीकार न कर पाए,
ऐसे ही मेरा हृदय कुसुम, असमर्पित सूख बिखरना था।

जैसे कोई प्यासा मरता, जल के अभाव में विष पी ले,
मेरे जीवन में भी ऐसी, कोई मजबूरी रहनी थी।
धरती के कागज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी॥

इच्छाओं के उगते बिरुवे, सब के सब सफल नहीं होते,
हर एक लहर के जूड़े में, अरुणारे कमल नहीं होते,
माटी का अंतर नहीं मगर, अंतर रेखाओं का तो है,
हर एक दीप के हंसने को, शीशे के महल नहीं होते।


दर्पण में परछाई जैसे, दीखे तो पर अनछुई रहे,
सारे सुख वैभव से यूं ही, मेरी भी दूरी रहनी थी।
धरती के कागज़ पर मेरी, तस्वीर अधूरी रहनी थी॥

मैंने शायद गत जन्मों में, अधबने नीड़ तोड़े होंगे,
चातक का स्वर सुनने वाले, बादल वापस मोड़े होंगे,
ऐसा अपराध किया होगा, जिसकी कुछ क्षमा नहीं होती,
तितली के पर नोचे होंगे, हिरणों के दृग फोड़े होंगे।

मुझको आजन्म भटकना था, मन में कस्तूरी रहनी थी।
धरती के कागज़ पर मेरी, तस्वीर अधूरी रहनी थी।।


इस गीत के साथ मैं उस महान गीतकार का विनम्र स्मरण करता हूँ।

नमस्कार

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कोई पार नदी के गाता!

हिन्दी कवि सम्मेलनों के मंचों पर किसी समय हरिवंशराय बच्चन जी का ऐसा नाम था, जिसके लोग दीवाने हुआ करते थे| वह उनकी मधुशाला हो या लोकगीत शैली में लिखा गया उनका गीत- ‘ए री महुआ के नीचे मोती झरें’, ‘अग्निपथ,अग्निपथ,अग्निपथ’ आदि-आदि|


एक बात माननी पड़ेगी मुझे उनको कवि-सम्मेलन में साक्षात सुनने का सौभाग्य नहीं मिला, हाँ एक बार आकाशवाणी में उनका साक्षात्कार हुआ था, जिसके लिए मैं अपने प्रोफेसर एवं कवि-मित्र स्वर्गीय डॉ सुखबीर सिंह जी के साथ उनको, नई दिल्ली में उनके घर से लेकर आया था, और इंटरव्यू के दौरान स्टूडिओ में उनके साथ था|


लीजिए प्रस्तुत है बच्चन जी का यह खूबसूरत गीत-


कोई पार नदी के गाता!

भंग निशा की नीरवता कर,
इस देहाती गाने का स्वर,
ककड़ी के खेतों से उठकर,
आता जमुना पर लहराता!
कोई पार नदी के गाता!

होंगे भाई-बंधु निकट ही,
कभी सोचते होंगे यह भी,
इस तट पर भी बैठा कोई
उसकी तानों से सुख पाता!
कोई पार नदी के गाता!

आज न जाने क्यों होता मन
सुनकर यह एकाकी गायन,
सदा इसे मैं सुनता रहता,
सदा इसे यह गाता जाता!
कोई पार नदी के गाता!


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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कितने दाग लगे चादर में!

एक समय था जब दिल्ली में रहते हुए कवि सम्मेलनों, कवि गोष्ठियों आदि के माध्यम से अनेक श्रेष्ठ कवियों को सुनने का मौका मिलता है| अब वैसा माहौल नहीं रहा, एक तो ‘कोरोना’ ने भी बहुत कुछ बदल दिया है|


हाँ तो पुराने समय के काव्य-मंचों पर उभरने वाले बहुत से कवि, जिनकी कविताएं मैं शेयर करता रहा हूँ, उनमें से जो नाम मुझे आज याद आ रहा है, वे हैं स्वर्गीय शिशुपाल सिंह निर्धन जी, लीजिए आज उनका एक सुंदर गीत शेयर कर रहा हूँ-

अगर चल सको साथ चलो तुम, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितने चलकर आए हो तुम, कितनी मंज़िल शेष रह गई?

हम तुम एक डगर के राही
आगे-पीछे का अन्तर है,
धरती की अर्थी पर सबको
मिला कफ़न यह नीलाम्बर है ।
अगर जल सको साथ जलो तुम, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
अभी चिताओं के मेले में कितनी हलचल शेष रह गई ?


मुझे ओस की बूंद समझकर
प्यासी किरन रोज़ आती है,
फूलों की मुस्कान चमन में
फिर भी मुझे रोज़ लाती है ।
तड़प सको तो साथ तड़प लो, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितनी धरा भिगोई तुमने कितनी मरुथल शेष रह गई ?

अवनी पर चातक प्यासे हैं
अम्बर में चपला प्यासी है,
किसकी प्यास बुझाए बादल
ये याचक हैं, वह दासी है ।
बनो तृप्ति बन सको अगर तुम, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितनी प्यास बुझा लाए हो, कितनी असफल शेष रह गई ?


जीवन एक ग्रंथ है जिसका
सही एक अनुवाद नहीं है,
तुम्हें बताऊँ कैसे साथी
अर्थ मुझे भी याद नहीं है ?
बुझा सको तो साथ बुझाओ, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
मरघट के घट की वह ज्वाला, कितनी चंचल शेष रह गई ?

घाट-घाट पर घूम रहे हैं
भरते अपनी सभी गगरिया,
बदल-बदल कर ओढ़ रहे हैं
अपनी-अपनी सभी चदरिया ।
ओढ़ सको तो साथ ओढ़ लो, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितने दाग़ लगे चादर में, कितनी निर्मल शेष रह गई ?


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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जोगियों का पता नहीं होता!

आज एक आधुनिक कवि श्री शिव ओम अंबर जी की एक हिन्दी गजल शेयर कर रहा हूँ| आशा है आपको इस गजल का कथ्य और इसकी बेबाकी प्रभावित करेगी|


लीजिए प्रस्तुत है यह ग़ज़ल-

जो किसी का बुरा नहीं होता,
शख़्स ऐसा भला नहीं होता।

दोस्त से ही शिकायतें होंगी,
दुश्मनों से गिला नहीं होता।

हर परिन्दा स्वयं बनाता है,
अर्श पे रास्ता नहीं होता।

इश्क के क़ायदे नहीं होते,
दर्द का फलसफा नहीं होता।

ख़त लिखोगे हमें कहाँ आखि़र,
जोगियों का पता नहीं होता।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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