हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन!

तुम गए क्या जग हुआ अंधा कुआं
रेल छूटी रह गया केवल धुआं,
हम भटकते ही फिरे बेहाल,
हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन।

किशन सरोज

चंदन वन डूब गया 4

दाह छुपाने को अब हर पल गाना होगा,
हंसने वालों में रहकर मुस्काना होगा,
घूंघट की ओट किसे होगा संदेह कभी,
रतनारे नयनों में एक सपन डूब गया।

किशन सरोज

किस तरह कुल की बड़ाई काम दे!

आज मैं एक ऐसे कवि की रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिनको खड़ी बोली का प्रारंभिक महाकाव्य रचयिता माना जाता है| आज के रचनाकार हैं, स्वर्गीय अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जी, जिन्होंने, खड़ी बोली में कविता के प्रारंभिक काल में अपना अमूल्य योगदान किया था| हरिऔध जी का जन्म 1865 मेँ हुआ था और भारत के स्वाधीन होने से पहले ही मार्च 1947 मेँ उनका देहांत हो गया था|

लीजिए प्रस्तुत है हरिऔध जी की यह रचना-

हैं जन्म लेते जगह में एक ही,
एक ही पौधा उन्हें है पालता
रात में उन पर चमकता चाँद भी,
एक ही सी चाँदनी है डालता।

मेह उन पर है बरसता एक सा,
एक सी उन पर हवाएँ हैं बही
पर सदा ही यह दिखाता है हमें,
ढंग उनके एक से होते नहीं।


छेदकर काँटा किसी की उंगलियाँ,
फाड़ देता है किसी का वर वसन
प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर,
भँवर का है भेद देता श्याम तन।

फूल लेकर तितलियों को गोद में
भँवर को अपना अनूठा रस पिला,
निज सुगन्धों और निराले ढंग से
है सदा देता कली का जी खिला।


है खटकता एक सबकी आँख में
दूसरा है सोहता सुर शीश पर,
किस तरह कुल की बड़ाई काम दे
जो किसी में हो बड़प्पन की कसर।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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कोशिश करने वालों की हार नहीं होती!

कुछ रचना पंक्तियाँ ऐसी लिखी जाती हैं कि वे मुहावरा बन जाती हैं| जैसे डॉ बशीर बद्र जी का एक शेर था- ‘उजाले अपनी यादों के, हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए|’ ऐसी ही एक पंक्ति आज की कविता की है, जिसको अक्सर लोग कहावत की तरह दोहराते हैं| वैसे इसके रचनाकार ऐसे हैं, जिनकी कविताएं हम बचपन में पढ़ा करते थे, राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत कविताएं- ‘वंदना के इन स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला लो’ आदि|


लीजिए आज प्रस्तुत है हमारे स्वाधीनता संग्राम के समय सक्रिय -स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी की यह प्रेरक कविता, जिसकी एक पंक्ति को आज भी प्रेरणा देने के लिए दोहराया जाता है-



लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है,
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है,
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती|
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जाकर खाली हाथ लौटकर आता है,
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में,
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती|
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो,
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम,
कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती|
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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राजा को खबर तक नहीं!

आज मैं पंडित श्रीकृष्ण तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जो मेरे हमनाम हैं (मैं शर्मा हूँ, वे तिवारी हैं), वाराणसी के निवासी हैं और उन्होंने कुछ बहुत सुंदर नवगीत लिखे हैं| मैंने अपनी संस्था के लिए किए गए आयोजनों में से एक में श्री तिवारी जी को बुलाया था जिसमें उन्होंने अपने श्रेष्ठ काव्य पाठ के अलावा बहुत सुंदर संचालन भी किया था|


लीजिए प्रस्तुत है श्री तिवारी जी का यह गीत जो अव्यवस्था, अराजकता और शासन की असफलताओं की ओर इशारा करता है –



भीलों ने बाँट लिए वन,
राजा को खबर तक नहीं|

पाप ने लिया नया जनम
दूध की नदी हुई जहर,
गाँव, नगर धूप की तरह
फैल गई यह नई ख़बर,
रानी हो गई बदचलन
राजा को खबर तक नहीं|

कच्चा मन राजकुंवर का
बेलगाम इस कदर हुआ,
आवारे छोरे के संग
रोज खेलने लगा जुआ,
हार गया दांव पर बहन
राजा को खबर तक नहीं|

उलटे मुंह हवा हो गई
मरा हुआ सांप जी गया,
सूख गए ताल -पोखरे
बादल को सूर्य पी गया,
पानी बिन मर गए हिरन
राजा को खबर तक नहीं|

एक रात काल देवता
परजा को स्वप्न दे गए,
राजमहल खंडहर हुआ
छत्र -मुकुट चोर ले गए,
सिंहासन का हुआ हरण
राजा को खबर तक नहीं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|



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मैं क्या जिया ?

आज डॉ धर्मवीर भारती जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| भारती जी ने कविता, कहानी, उपन्यास आदि सभी विधाओं में अपना बहुमूल्य योगदान किया था| उनकी कुछ रचनाएँ- सूरज का सातवाँ घोडा, अंधा युग, ठंडा लोहा, ठेले पर हिमालय, सात गीत वर्ष आदि काफी प्रसिद्ध रहीं| वे साप्ताहिक पत्रिका- धर्मयुग के यशस्वी संपादक भी रहे|

 

लीजिए प्रस्तुत है भारती जी की यह रचना-

 

 

 

मैं क्या जिया ?
मुझको जीवन ने जिया –
बूँद-बूँद कर पिया, मुझको
पीकर पथ पर ख़ाली प्याले-सा छोड़ दिया|

 

मैं क्या जला?
मुझको अग्नि ने छला –
मैं कब पूरा गला, मुझको
थोड़ी-सी आँच दिखा दुर्बल मोमबत्ती-सा मोड़ दिया|

 

देखो मुझे
हाय मैं हूँ वह सूर्य
जिसे भरी दोपहर में
अँधियारे ने तोड़ दिया !

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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समय की नंगी सलीबों पर, गले में अटकी हुईं फाँसें!

आज मैं हिन्दी कविता और नवगीत के यशस्वी हस्ताक्षर श्री ओम प्रभाकर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| वैसे तो मनुष्य को जीवन में आशावादी होना चाहिए, लेकिन एक कवि अपने समय की सभी स्थितियों को अभिव्यक्त करता है, विसंगतियों को उजागर करता है| इन अभिव्यक्तियों का मूल उद्देश्य इंसानियत को जगाना ही होता है|

ओम प्रभाकर जी की इस रचना में भी आज के समय की विसंगतियों को बड़ी कुशलता से उजागर किया गया है| प्रस्तुत है यह रचना-

 

 

बीत गए दिन
फूल खिलने के।

 

होती हैं केवल वनस्पतियाँ
हरी-हरी-सी
हर गली
हर मोड़ पर बैठी
मौत अपनी बाँह फैलाकर।

 

बर्फ़-सा
जमता हुआ हर शख़्स
चुप्पियों में क़ैद हैं साँसें,
समय की नंगी सलीबों पर
गले में अटकी हुईं फाँसें,
लिख रहे हैं
लोग कविताएँ
नींद की ज्यों गोलियाँ खाकर।

 

बीत गए दिन
अब हवाओं में गन्धकेतु हिलने के
फूल खिलने के।

 

ढोती है काले पहाड़ दृष्टियाँ
सूर्य झर गए,
दृश्य घाटी में गहरे उतर गए,
बीत गए दिन
उठी बाँहों से बाँहों के मिलने के
फूल खिलने के।

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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हरी कलगी बाजरे की – अज्ञेय

आज हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद के प्रणेता और नई कविता के सूत्रधार स्व. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इस कविता में भी उन्होंने इस बात पर बल दिया है कि अब कविता में नए प्रतीकों की खोज की जानी चाहिए क्योंकि पुराने प्रतीकों का उपयोग होते-होते वे घिस गए हैं।

अज्ञेय जी एक महान कवि, कहानीकार और उपन्यासकार थे और प्रयोगवाद के प्रणेता थे, उन्होंने भाषा में अनेक प्रयोग किए और कविता को एक नया स्वरूप प्रदान किया। समय की आवश्यकताओं को देखते हुए उन्होंने भाषा के छायावादी मायाजाल को तोड़ते हुए कविता की नई भाषा गढ़ने की पहल की। वैसे ये वास्तविकता है कि साहित्य के ये सभी आंदोलन यूरोप में पहले ही आ चुके थे और भारत में बाद में आए।

प्रस्तुत है अज्ञेय जी की यह कविता-

 

 

 

हरी कलगी बाजरे की

 

हरी बिछली घास।
दोलती कलगी छरहरे बाजरे की।

 

अगर मैं तुम को ललाती सांझ के नभ की अकेली तारिका
अब नहीं कहता,
या शरद के भोर की नीहार – न्हायी कुंई,
टटकी कली चम्पे की, वगैरह, तो
नहीं कारण कि मेरा हृदय उथला या कि सूना है
या कि मेरा प्यार मैला है।

 

बल्कि केवल यही : ये उपमान मैले हो गये हैं।
देवता इन प्रतीकों के कर गये हैं कूच।

 

कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।
मगर क्या तुम नहीं पहचान पाओगी :
तुम्हारे रूप के-तुम हो, निकट हो, इसी जादू के-
निजी किसी सहज, गहरे बोध से, किस प्यार से मैं कह रहा हूं-
अगर मैं यह कहूं-

 

बिछली घास हो तुम लहलहाती हवा मे कलगी छरहरे बाजरे की ?

 

आज हम शहरातियों को
पालतु मालंच पर संवरी जुहि के फ़ूल से
सृष्टि के विस्तार का- ऐश्वर्य का- औदार्य का-
कहीं सच्चा, कहीं प्यारा एक प्रतीक
बिछली घास है,
या शरद की सांझ के सूने गगन की पीठिका पर दोलती कलगी
अकेली
बाजरे की।

 

और सचमुच, इन्हें जब-जब देखता हूं
यह खुला वीरान संसृति का घना हो सिमट आता है-
और मैं एकान्त होता हूं समर्पित

 

शब्द जादू हैं-
मगर क्या समर्पण कुछ नहीं है ?

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

***

श्रीराम की जलसमाधि – भारत भूषण

आज फिर से मैं अपने प्रिय कवि/गीतकारों में से एक स्व. भारत भूषण जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इस रचना में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जलसमाधि का प्रसंग प्रस्तुत किया गया है। श्रीराम जो शिखर पर हैं, लोगों के प्रभु हैं, अयोध्या के नरेश हैं, जब प्रसंग के अनुसार वे जल-समाधि लेते हैं, वे किसी से कोई शिकायत नहीं कर सकते, शिखर पर व्यक्ति कितना अकेला होता है, वह ईश्वर का अवतार ही क्यों न हो!

श्रीराम की जल समाधि के प्रसंग में, वे जब जल में क्रमशः डूबते जाते हैं, तब उनके मन में क्या-क्या आता है, इसका बहुत सुंदर वर्णन स्व. भारत भूषण जी ने अपनी रचना में किया है। लीजिए प्रस्तुत है यह अति सुंदर रचना-

 

 

पश्चिम में ढलका सूर्य उठा वंशज सरयू की रेती से,
हारा-हारा, रीता-रीता, निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम,
निःशब्द अधर पर रोम-रोम था टेर रहा सीता-सीता।

 

किसलिए रहे अब ये शरीर, ये अनाथ मन किसलिए रहे,
धरती को मैं किसलिए सहूँ, धरती मुझको किसलिए सहे।
तू कहाँ खो गई वैदेही, वैदेही तू खो गई कहाँ,
मुरझे राजीव नयन बोले, काँपी सरयू, सरयू काँपी,
देवत्व हुआ लो पूर्णकाम, नीली माटी निष्काम हुई,
इस स्नेहहीन देह के लिए, अब सांस-सांस संग्राम हुई।

 

ये राजमुकुट, ये सिंहासन, ये दिग्विजयी वैभव अपार,
ये प्रियाहीन जीवन मेरा, सामने नदी की अगम धार,
माँग रे भिखारी, लोक माँग, कुछ और माँग अंतिम बेला,
इन अंचलहीन आँसुओं में नहला बूढ़ी मर्यादाएँ,
आदर्शों के जलमहल बना, फिर राम मिलें न मिलें तुझको,
फिर ऐसी शाम ढले न ढले।

 

ओ खंडित प्रणयबंध मेरे, किस ठौर कहां तुझको जोडूँ,
कब तक पहनूँ ये मौन धैर्य, बोलूँ भी तो किससे बोलूँ,
सिमटे अब ये लीला सिमटे, भीतर-भीतर गूँजा भर था,
छप से पानी में पाँव पड़ा, कमलों से लिपट गई सरयू,
फिर लहरों पर वाटिका खिली, रतिमुख सखियाँ, नतमुख सीता,
सम्मोहित मेघबरन तड़पे, पानी घुटनों-घुटनों आया,
आया घुटनों-घुटनों पानी। फिर धुआँ-धुआँ फिर अँधियारा,
लहरों-लहरों, धारा-धारा, व्याकुलता फिर पारा-पारा।

 

फिर एक हिरन-सी किरन देह, दौड़ती चली आगे-आगे,
आँखों में जैसे बान सधा, दो पाँव उड़े जल में आगे,
पानी लो नाभि-नाभि आया, आया लो नाभि-नाभि पानी,
जल में तम, तम में जल बहता, ठहरो बस और नहीं कहता,
जल में कोई जीवित दहता, फिर एक तपस्विनी शांत सौम्य,
धक धक लपटों में निर्विकार, सशरीर सत्य-सी सम्मुख थी,
उन्माद नीर चीरने लगा, पानी छाती-छाती आया,
आया छाती-छाती पानी।

 

आगे लहरें बाहर लहरें, आगे जल था, पीछे जल था,
केवल जल था, वक्षस्थल था, वक्षस्थल तक केवल जल था।
जल पर तिरता था नीलकमल, बिखरा-बिखरा सा नीलकमल,
कुछ और-और सा नीलकमल, फिर फूटा जैसे ज्योति प्रहर,
धरती से नभ तक जगर-मगर, दो टुकड़े धनुष पड़ा नीचे,
जैसे सूरज के हस्ताक्षर, बांहों के चंदन घेरे से,
दीपित जयमाल उठी ऊपर,

 

सर्वस्व सौंपता शीश झुका, लो शून्य राम लो राम लहर,
फिर लहर-लहर, सरयू-सरयू, लहरें-लहरें, लहरें- लहरें,
केवल तम ही तम, तम ही तम, जल, जल ही जल केवल,
हे राम-राम, हे राम-राम
हे राम-राम, हे राम-राम ।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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यह बात किसी से मत कहना!

आज फिर हिंदी कवि सम्मेलनों में काफी लोकप्रिय कवि रहे- स्व. देवराज दिनेश जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। स्व. देवराज दिनेश जी वैसे व्यंग्य कविताओं के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन उन्होंने बहुत से गीत भी लिखे थे और यह उनके प्रिय गीतों में से एक है। यह एक प्रेमगीत है या कहें ऐसे प्रेम से जुड़ा गीत है, जिसे समाज स्वीकार नहीं करता, वह जातिभेद के कारण हो, या जो भी कारण हो।

ऐसा प्रेम जो गुपचुप किया तो जा सकता है परंतु उसे समाज के सामने स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसका परिणाम कुछ भी हो सकता है, हत्या भी!
लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

 

 

मैं तेरे पिंजरे का तोता,
तू मेरे पिंजरे की मैना,
यह बात किसी से मत कहना।

 

मैं तेरी आंखों में बंदी,
तू मेरी आंखों में प्रतिक्षण,
मैं चलता तेरी सांस–सांस,
तू मेरे मानस की धड़कन,
मैं तेरे तन का रत्नहार,
तू मेरे जीवन का गहना!
यह बात किसी से मत कहना!!

 

हम युगल पखेरू हंस लेंगे,
कुछ रो लेंगे कुछ गा लेंगे,
हम बिना बात रूठेंगे भी,
फिर हंस कर तभी मना लेंगे,
अंतर में उगते भावों के,
जलजात किसी से मत कहना!
यह बात किसी से मत कहना!!

 

क्या कहा! कि मैं तो कह दूंगी!
कह देगी तो पछताएगी,
पगली इस सारी दुनियां में,
बिन बात सताई जाएगी।
पीकर प्रिये अपने नयनों की बरसात,
विहंसती ही रहना!
यह बात किसी से मत कहना!!

 

हम युगों युगों के दो साथी,
अब अलग अलग होने आए,
कहना होगा तुम हो पत्थर,
पर मेरे लोचन भर आए,
पगली इस जग के अतल–सिंधु में,
अलग अलग हमको बहना!
यह बात किसी से मत कहना!!

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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