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जो पुल बनाएँगे – अज्ञेय

आज एक छोटी सी कविता शेयर कर रहा हूँ, अज्ञेय जी की यह कविता छोटी सी है परंतु बड़ी बात कहती है| अज्ञेय जी हिन्दी साहित्य का ऐसा युगांतरकारी व्यक्तित्व थे, वे भारत में प्रयोगवाद और नई कविता के प्रणेता रहे| हाँ वे विशेष रूप से कम्युनिस्टों के निशाने पर रहते थे| कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृतांत, निबंध आदि हर क्षेत्र में अज्ञेय जी ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है|

लीजिए प्रस्तुत है अज्ञेय जी की यह कविता-

 

 

जो पुल बनाएँगे
वे अनिवार्यतः
पीछे रह जाएँगे।

 

सेनाएँ हो जाएँगी पार
मारे जाएँगे रावण
जयी होंगे राम;
जो निर्माता रहे
इतिहास में बंदर कहलाएँगे।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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ये क्या हो रहा है ये क्यों हो रहा है- अकबर इलाहाबादी

आज अकबर इलाहाबादी साहब की एक छोटी सी रचना शेयर कर रहा हूँ| अकबर इलाहाबाद साहब ने हल्की-फुलकी और गंभीर, दोनों प्रकार की रचनाएँ लिखी हैं, नेताओं के बारे में भी और मशहूर गजल, ‘हंगामा है क्यों बरपा’ भी अकबर इलाहाबादी साहब ने ही लिखी थी| लीजिए आज इस कविता का आनंद लीजिए-

 

 

कोई हँस रहा है कोई रो रहा है,
कोई पा रहा है कोई खो रहा है|

 

कोई ताक में है किसी को है गफ़लत,
कोई जागता है कोई सो रहा है|

 

कहीँ नाउम्मीदी ने बिजली गिराई,
कोई बीज उम्मीद के बो रहा है|

 

इसी सोच में मैं तो रहता हूँ ‘अकबर’,
ये क्या हो रहा है ये क्यों हो रहा है|

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है!

आज एक बार फिर से स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक गजल प्रस्तुत कर रहा हूँ| दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि थे और आपात्काल मेन लिखे गए उनके गजल संग्रह – ‘साये में धूप’ के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हुए थे| आपात्काल के उस दमनकारी माहौल में इस प्रकार की गज़लें लिखना में वास्तव में बहुत बड़ा साहस का का था|

लीजिए प्रस्तुत है दुष्यंत जी की ये गजल-

 

 

 

 

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है|

 

एक चिनगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है|

 

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है|

 

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है|

 

निर्वसन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है|

 

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है|

 

 

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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भाभी माँगे खट्टी अमिया, भैया रस की खीर!

आज एक बार फिर से देश के लोकप्रिय कवि और गीतकार माननीय श्री सोम ठाकुर जी का एक बेहद लोकप्रिय गीत शेयर कर रहा हूँ, मेरा सौभाग्य है कि आयोजनों के सिलसिले में मुझे उनसे कई बार मिलने का और अनेक बार उनका काव्य-पाठ सुनने का अवसर प्राप्त हुआ है।

 

 

इस गीत की विशेषता यह है कि एक समय था जब आकाशवाणी से प्रातः काल प्रसारित होने वाले ‘ब्रज माधुरी’ कार्यक्रम में नियमित रूप से यह गीत प्रसारित होता है। लीजिए प्रस्तुत है हमारे महान भारतवर्ष का गौरव गान करने वाला यह गीत-

 

सागर चरण पखारे, गंगा शीश चढ़ावे नीर,
मेरे भारत की माटी है चन्दन और अबीर,
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ-सौ नमन करूँ।

 

मंगल भवन अमंगलहारी के गुण तुलसी गावे,
सूरदास का श्याम रंगा मन अनत कहाँ सुख पावे।
जहर का प्याला हँस कर पी गई प्रेम दीवानी मीरा,
ज्यों की त्यों रख दीनी चुनरिया, कह गए दास कबीर।
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ- सौ नमन करूँ।

 

फूटे फरे मटर की भुटिया, भुने झरे झर बेरी,
मिले कलेऊ में बजरा की रोटी मठा मठेरी।
बेटा माँगे गुड की डलिया, बिटिया चना चबेना,
भाभी माँगे खट्टी अमिया, भैया रस की खीर।
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ-सौ नमन करूँ।

 

फूटे रंग मौर के बन में, खोले बंद किवड़िया,
हरी झील में छप छप तैरें मछरी सी किन्नरिया।
लहर लहर में झेलम झूमे, गावे मीठी लोरी,
पर्वत के पीछे नित सोहे, चंदा सा कश्मीर।
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ- सौ नमन करूँ।

 

चैत चाँदनी हँसे , पूस में पछुवा तन मन परसे,
जेठ तपे धरती गिरजा सी, सावन अमृत बरसे।
फागुन मारे रस की भर भर केसरिया पिचकारी
भीजे आंचल , तन मन भीजे, भीजे पचरंग चीर,
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ-सौ नमन करूँ।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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अपनी भाषा की रोशनी में चलता रहूँ – रमेश रंजक

आज मैं अपने प्रिय कवियों में से एक रहे स्व. रमेश रंजक जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। यह जानकर अच्छा लगता है कि रमेश रन्जक जी से कुछ बार बात करने का, उनके नवगीत सुनने का अवसर मिला और एक बार उन्होंने मेरा गीत सुनकर उसे नवगीत संकलन अंतराल-4 में प्रकाशित करने के लिए भेजा था।

रंजक जी ने कविता और नवगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई थी, उनकी यह रचना भी एक अच्छी बानगी है, उनकी रचना प्रतिभा और उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाने वाले। लीजिए प्रस्तुत है ये रचना-

 

 

 

जब मैं छोटा था
पिताजी कहते थे —
‘अंधेरे  में
रोशनी लेकर चला करो !’

 

जब मैं बड़ा हुआ
रीतिकालीन नायिकाओं को
आँचल की ओट में
दीप लिए चलते पढ़ा ।

 

जब कुछ और बड़ा हुआ
तो मैंने अपने भीतर
स्वयं एक
रोशनी को गढ़ा ।

 

अब, जब मैं
पचास का हो रहा हूँ
चाहता हूँ कि —
अपनी भाषा की रोशनी में
चलता रहूँ
और उस अन्धेरे को
दलता रहूँ
जो हमारे भीतर की रोशनी को
लगातार खाए जा रहा है ।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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वह विशाल मन दो- रामधारी सिंह ‘दिनकर’ !

आज मैं भारतवर्ष में हिंदी के एक महान कवि, जिन्हें ओज और शृंगार दोनो प्रकार की कविताओं में महारत हासिल थी, वे सांसद भी रहे लेकिन उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। ऐसे महान रचनाकार स्व. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ, आइए देखें कि वे इस कविता में ईश्वर से क्या मांगते हैं-

 

 

जो त्रिकाल-कूजित संगम है, वह जीवन-क्षण दो,
मन-मन मिलते जहाँ देवता! वह विशाल मन दो।

 

माँग रहा जनगण कुम्हलाया
बोधिवृक्ष की शीतल छाया,
सिरजा सुधा, तृषित वसुधा को संजीवन-घन दो।
मन-मन मिलते जहाँ देवता! वह विशाल मन दो।

 

तप कर शील मनुज का साधें,
जग का हृदय हृदय से बाँध,
सत्य हेतु निष्ठा अशोक की, गौतम का प्रण दो।
मन-मन मिलते जहाँ देवता! वह विशाल मन दो।

 

देख सकें सब में अपने को,
महामनुजता के सपने को,
हे प्राचीन! नवीन मनुज को वह सुविलोचन दो।
मन-मन मिलते जहाँ देवता! वह विशाल मन दो।

 

खँडहर की अस्तमित विभाओ,
जगो, सुधामयि! दरश दिखाओ,
पीड़ित जग के लिए ज्ञान का शीतल अंजन दो।
मन-मन मिलते जहाँ देवता! वह विशाल मन दो।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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अपनी छोटी-सी ज़मीन पर , अपनी उगा फसल!

आज स्व. रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। इस गीत में रंजक जी ने नए कवियों को संबोधित करते हुए यह संदेश दिया है कि वे मौलिकता पर पूरा ध्यान दें। अक्सर यह होता है कि लोग तेजी से आगे बढ़ने के लिए दूसरों की नकल करने लगते हैं, बहुत से लोग तो ऐसे भी होते हैं जो दूसरों की काव्य पंक्तियां, अभिव्यक्तियां अपने नाम से प्रकाशित/ प्रसारित कर लेते हैं।

मौलिकता ही वास्तव में रचनाकार की अपनी पहचान बनाती है और सच्चे रचनाकार को ख्याति दिला सकती है। प्रस्तुत है स्व. रमेश रंजक जी की यह रचना-

 

 

वक़्त तलाशी लेगा
वह भी चढ़े बुढ़ापे में
सँभल कर चल ।
कोई भी सामान न रखना
जाना-पहचाना,
किसी शत्रु का, किसी मित्र का
ढंग न अपनाना,
अपनी छोटी-सी ज़मीन पर
अपनी उगा फसल
सँभल कर चल ।
ख्वारी हो सफ़ेद बालों की
ऐसा मत करना,
ज़हर जवानी में पी कर ही
जीती है रचना,
जितना है उतना ही रख
गीतों में गंगाजल,
वे जो आएंगे
छानेंगे कपड़े बदल-बदल,
सँभल कर चल ।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-10, ज़िंदगी एक अंधा कुआं!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज दसवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस दसवीं पोस्ट में तीन और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ|

पहली कविता- हमारी राष्ट्रीय प्रगति, जनकल्याण के लिए हुए प्रयासों की पड़ताल, एक कवि के नजरिये से इस गीत में की गई है, निरंतर एक प्रक्रिया सी चलती है जिसमें सारा आशावाद धुल जाता है-

लेकिन दृश्य नहीं बदला है!

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

मीठे सपनों को कडुवाई आंखों को
दिन रात छला है।
कितने दर्पण तोड़े तुमने
लेकिन दृश्य नहीं बदला है।

 

बचपन की उन्मुक्त कुलांचे
थकी चाल में रहीं बदलती,
दूध धुली सपनीली आंखें
पीत हो गईं- जलती-जलती,
जब भी छूटी आतिशबाजी-
कोई छप्पर और जला है।

 

कितने दर्पण तोड़े तुमने
लेकिन दृश्य नहीं बदला है।।

 

अब अपनी एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जैसी मुझे याद है अभी तक, क्योंकि गीत तो याद रह जाते हैं, स्वच्छंद कविता को याद रखने में दिक्कत होती है, यह कविता वास्तव में अपने देश से दूर रहते हुए उसको याद करने का एक प्रसंग है-

 

काबुलीवाला, खूंखार पठान-
जेब में बच्ची के हाथ का जो छापा लिए घूमता है,
उसमें पैबस्त है उसके वतन की याद।

 

वतन जो कहीं हवाओं की महक,
और कहीं आकाश में उड़ते पंछियों के
सतरंगे हुज़ूम के बहाने याद आता है,
आस्थाओं के न मरने का दस्तावेज है।

 

इसकी मिसाल है कि हम-
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई होने के नाते नहीं
नागरिक होने के नाते बंधु हैं,
सहृदय होने के नाते सखा हैं,

 

वतन हमसे आश्वासन चाहता है-
कि अब किसी ‘होरी’ के घर और खेत-
महाजनी खाते की हेरे-फेर के शिकार नहीं होंगे,

 

कि ‘गोबर’ शहर का होकर भी-
दिल में बसाए रखेगा अपना गांव
और घर से दूर होकर भी
हर इंसान को भरोसा होगा-
कि उसके परिजन सदा सुरक्षित हैं।

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

और अंत में, एक गीत, आज जो ज़िंदगी हम जी रहे हैं, उसको देखने का एक अलग नज़रिया, जहाँ कोई आस्था, कोई विश्वास हमें सहारा देने के लिए नहीं है, लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

 

ज़िंदगी आज की एक अंधा कुआं
जिसमें छाया नहीं, जिसमें पानी नहीं
प्यास के इस सफर के मुसाफिर हैं सब,
कोई राजा नहीं, कोई रानी नहीं।

 

अब न रिश्तों मे पहली सी वो आंच है,
आस्था के नगीने फक़त कांच हैं,
अब लखन भी नहीं राम के साथ हैं,
श्याम की कोई मीरा दिवानी नहीं।

 

हमने बरसों तलाशा घनी छांव को,
हम बहुत दूर तक यूं ही भटका किए,
अब कोई आस की डोर बाकी नहीं
अब किसी की कोई मेहरबानी नहीं।

 

कृष्ण गुलशन में क्या सोचकर आए थे,
न हवा में गमक, न फिजां में महक,
हर तरफ नागफनियों का मेला यहाँ,
कोई सूरजमुखी, रातरानी नहीं।

 

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-2

कल से मैंने अपनी रचनाएं, जितनी उपलब्ध यहाँ शेयर करना शुरू किया है जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं केवल इतना कर रहा हूँ कि मैंने अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

एक बात और, मैं हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

 

 

लीजिए आज इस क्रम की इस दूसरी पोस्ट में दो और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-

 

पिता के नाम

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ 

हे पिता
यदि हो कहीं, तो क्या लिखूं तुमको
बस यही, जो जिस तरह था
उस तरह ही है।

 

पत्र है अभिवादनों की शृंखला केवल
हम अभी जीवित बचे हैं, यह बताने को,
और आश्वासन इसी अनुरूप पाने को,
मैं न मानूं किंतु प्रचलन
इस तरह ही है।

 

हाल अपना क्या सुनाऊं, ठीक सा ही है,
गो कि अदना क्लर्क–
कल का महद आकांक्षी,
ओस मे सतरंगदर्शी बावला पंछी–
हो गया है, मुदित सपना, आपके मन का
जी रहा है, और जीवन
उस तरह ही है।

 

साथ हैं अब कुछ वही एहसास सपनीले-
वह फिसलने फर्श पर मेरा रपट जाना,
और चिंता से तुम्हारा आंख भर लाना,
बीच सड़कों, धुएं, ट्रैफिक के गिरा हूँ मैं
और यह ध्यानस्थ दुनिया-
उस तरह ही है।

 

और यह दूसरी कविता, बेरोजगारी के दिनों के अनुभव पर आधारित-

 

इंद्रधनुष सपनों को, पथरीले अनुभव की
ताक पर धरें,
आओ हम तुम मिलकर, रोज़गार दफ्तर की
फाइलें भरें।

 

गर्मी में सड़कों का ताप बांट लें,
सर्दी में पेड़ों के साथ कांप लें,
बूंद-बूंद रिसकर आकाश से झरें।
रोज़गार दफ्तर की फाइलें भरें॥

 

ढांपती दिशाओं को, हीन ग्रंथियां,
फूटतीं ऋचाओं सी मंद सिसकियां।
खुद सुलगे पिंड हम, आग से डरें।
रोज़गार दफ्तर की
फाइलें भरें।

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ 

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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मिला नहीं कोई भी ऐसा, जिससे अपनी पीर कहूं मैं!

आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय गीत कवि स्व. भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। कविता, गीत आदि स्वयं अपनी बात कहते हैं और जितना ज्यादा प्रभावी रूप से कहते हैं, वही उसकी सफलता की पहचान है। लीजिए आज के लिए स्व. भारत भूषण जी का यह गीत आपको समर्पित है-

 

जिस पल तेरी याद सताए, आधी रात नींद जग जाये,
ओ पाहन! इतना बतला दे, उस पल किसकी बाहँ गहूँ मैं।
अपने अपने चाँद भुजाओं,
में भर भर कर दुनिया सोये।
सारी सारी रात अकेला,
मैं रोऊँ या शबनम रोये।
करवट में दहकें अंगारे, नभ से चंदा ताना मारे,
प्यासे अरमानों को मन में दाबे कैसे मौन रहूँ मैं।

 

गाऊँ कैसा गीत कि जिससे,
तेरा पत्थर मन पिघलाऊँ,
जाऊँ किसके द्वार जहाँ ये,
अपना दुखिया मन बहलाऊँ।
गली गली डोलूँ बौराया, बैरिन हुई स्वयं की छाया,
मिला नहीं कोई भी ऐसा, जिससे अपनी पीर कहूं मैं।

 

टूट गया जिससे मन दर्पण,
किस रूपा की नजर लगी है।
घर घर में खिल रही चाँदनी,
मेरे आँगन धूप जगी है।
सुधियाँ नागन सी लिपटी हैं, आँसू आँसू में सिमटी हैं।
छोटे से जीवन में कितना, दर्द-दाह अब और सहूँ मैं।

 

फटा पड़ रहा है मन मेरा,
पिघली आग बही काया में।
अब न जिया जाता निर्मोही,
गम की जलन भरी छाया में।
बिजली ने ज्यों फूल छुआ है, ऐसा मेरा हृदय हुआ है।
पता नहीं क्या क्या कहता हूँ, अपने बस में आज न हूँ मैं।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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