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सपने, सुरीले सपने!

आज एक बार फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर करना चाहूँगा| ये गीत राजेश खन्ना जी और अमिताभ जी के कुशल अभिनय से युक्त फिल्म- आनंद से है, जो 1971 में रिलीज़ हुई थी| इस फिल्म में मुकेश जी का गाया एक और गीत- ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ भी अमर गीतों की श्रेणी में शामिल है|


इस गीत को लिखा है गुलज़ार जी ने लिखा है और संगीत दिया है सलिल चौधरी जी ने|


लीजिए प्रस्तुत है यह लाजवाब गीत-


मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने
सपने, सुरीले सपने,
कुछ हँसते, कुछ गम के
तेरी आँखों के साये चुराए रसीली यादों ने|

छोटी बातें, छोटी-छोटी बातों की हैं यादें बड़ी
भूले नहीं, बीती हुई एक छोटी घड़ी,
जनम-जनम से आँखे बिछाईं
तेरे लिए इन राहों में,
मैंने तेरे लिए ही सात..
.

भोले-भाले, भोले-भाले दिल को बहलाते रहे
तन्हाई में, तेरे ख्यालों को सजाते रहे,
कभी-कभी तो आवाज देकर
मुझको जगाया ख़्वाबों से,
मैंने तेरे लिए ही सात…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला!

आज गुलाम अली साहब का गाया हुआ एक गीत याद आ रहा है, जिसे 1990 में रिलीज़ हुई फिल्म- आवारगी में फिल्माया गया था, गीत को लिखा है- आनंद बक्षी जी ने और संगीत अनु मलिक जी का है। कुल मिलाकर यह गीत गुलाम अली जी ने बड़े सुंदर ढंग से गाया है और बहुत सुंदर बन पड़ा है।

गीत में जो कहा गया है वह तो स्पष्ट है ही कि किसी मनुष्य का पूरा जीवन, उसके सभी गुण कभी-कभी उसकी आवारगी की भेंट चढ़ जाते हैं। लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारा सा गीत-

 

चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला,
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला।

 

बड़ा दिलकश, बड़ा रँगीन, है ये शहर कहते हैं,
यहाँ पर हैं हज़ारों घर, घरों में लोग रहते हैं,
मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ,
न मुझसे बन सका छोटा सा घर, दिन रात रोता हूँ,
खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

मेरे मालिक, मेरा दिल क्यूँ तड़पता है, सुलगता है,
तेरी मर्ज़ी, तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है,
किसी को गुल, किसी को तूने अंगारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था,
मुझे बरबाद होना था, मुझे नाकाम होना था,
मुझे तक़दीर ने, तक़दीर का मारा बना डाला।
चमकते चाँद को टूटा…

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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आजकल वो इस तरफ देखता है कम!

आज मुकेश जी का गाया एक बहुत सुंदर गीत याद आ रहा है, राज कपूर साहब द्वारा अभिनीत इस फिल्म- ‘फिर सुबह होगी’ का यह गीत साहिर लुधियानवी जी ने लिखा है और इसे मुकेश जी ने खय्याम साहब के संगीत में गाया है।

असल में यह गीत आज के हालात पर बहुत सुंदर व्यंग्य है, गीत में कुछ ऐसा कहा गया है कि भगवान आजकल इस दुनिया की तरफ देख ही नहीं रहा है और फिर यह भी कि इतना फैल चुकी इस दुनिया को सुधारने के लिए भगवान के पास पर्याप्त मानव-बल नहीं है, इसलिए लोग स्वयं ही अपने तरीके से अपनी समस्याओं को हल कर रहे हैं।

 

लीजिए इस गीत का आनंद लेते हैं-

 

आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम,
आज कल वो इस तरफ देखता है कम,
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम।

 

आजकल किसी को वो टोकता नहीं,
चाहे कुछ भी कीजिये रोकता नहीं,
हो रही है लूटमार फट रहें हैं बम।
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम,
आज कल इस तरफ देखता है कम।

 

किसको भेजे वो यहाँ खाक छानने,
इस तमाम भीड़ का हाल जानने,
आदमी हैं अनगिनत देवता हैं कम।
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम,
आज कल इस तरफ देखता है कम।

 

जो भी है वो ठीक है फिक़्र क्यों करे,
हम ही सब जहान की फ़िक्र क्यों करें,
जब तुम्हे ही गम नहीं तो क्यों हमें हो गम।
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम,
आज कल इस तरफ देखता है कम।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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