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मैंने देखा स्वप्न – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Dreamt’ का भावानुवाद-

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

मैंने देखा स्वप्न

 

मैंने देखा स्वप्न, की वह मेरे सिरहाने बैठी है, कोमलता से मेरे बालों में उँगलियाँ फिराते हुए,
अपने स्पर्श की धुन को बजाते हुए| मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा
और अपने आंसुओं से संघर्ष कराते हुए देखता रहा, जब तक कि मौन भाषा की पीड़ा ने
मेरी नींद को एक बुलबुले की तरह नहीं फोड़ दिया|
मैं उठकर बैठ गया और अपनी खिड़की के ऊपर आकाश-गंगा की चमक को देखा,
जैसे मौन की एक दुनिया जल रही हो, और मैं सोचता रहा कि क्या इस क्षण
उसको भी ऐसा ही स्वप्न आया होगा, जिसकी ताल मेरे स्वप्न से मिलती हो|

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

I Dreamt

 

I dreamt that she sat by my head, tenderly ruffling my hair with
her fingers, playing the melody of her touch. I looked at her face
and struggled with my tears, till the agony of unspoken words burst
my sleep like a bubble.
I sat up and saw the glow of the Milky Way above my window,
like a world of silence on fire, and I wondered if at this moment
she had a dream that rhymed with mine.

 

-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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प्रेम का दीप – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Lamp of Love’ का भावानुवाद-

 

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

प्रेम का दीप

 

प्रकाश, ओह कहाँ है प्रकाश?
अभिलाषा की धधकती ज्वाला से इसको सुलगाओ!

 

वहाँ एक दीप है परंतु कभी भी लौ की टिमटिमाहट नहीं– ऐसा है तुम्हारा भाग्य, मेरे हृदय?
आह, मृत्यु कहीं बेहतर होती तुम्हारे लिए!

 

मुसीबत तुम्हारे द्वार पर दस्तक देती है,
और उसका संदेश है कि तुम्हारा प्रभु जागृत है,
और वह तुम्हे बुलाता है, रात्रि के अंधकार के माध्यम से, प्रेम-मिलन स्थल पर।

 

आकाश पर बादलों से ढका हुआ है और वर्षा थम नहीं रही है।
मुझे नहीं मालूम कि वह क्या है जो मेरे भीतर घुमड़ रहा है—मैं इसका अर्थ नहीं जानता।

 

बिजली कौंधने के एक क्षण से, मेरी आंखों मेरी दृष्टि में और अंधेरा छा जाता है,
और मेरा हृदय उस मार्ग को टटोलता है, जहाँ रात्रि का संगीत मुझे बुला रहा है।

 

प्रकाश, ओह कहाँ है प्रकाश!
अभिलाषा की धधकती ज्वाला से इसको सुलगाओ!
बादल गर्जना करते हैं और वायु चीखते हुए, शून्य में दौड़ती है।
रात्रि काली है, काले पत्थर की तरह।
घंटों को ऐसे ही अंधेरे में न गुजरने दो।
अपने प्राणों से प्रेम का दीप सुलगाओ।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Lamp of Love

 

Light, oh where is the light?
Kindle it with the burning fire of desire!
There is the lamp but never a flicker of a flame–is such thy fate, my heart?
Ah, death were better by far for thee!
Misery knocks at thy door,
and her message is that thy lord is wakeful,
and he calls thee to the love-tryst through the darkness of night.
The sky is overcast with clouds and the rain is ceaseless.
I know not what this is that stirs in me–I know not its meaning.
A moment’s flash of lightning drags down a deeper gloom on my sight,
and my heart gropes for the path to where the music of the night calls me.
Light, oh where is the light!
Kindle it with the burning fire of desire!
It thunders and the wind rushes screaming through the void.
The night is black as a black stone.
Let not the hours pass by in the dark.
Kindle the lamp of love with thy life..

-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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