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वसंत का एक दिन – रवींद्रनाथ ठाकुर

लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘वन डे इन स्प्रिंग’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

वसंत का एक दिन
वसंत के मौसम में एक दिन, एक महिला
मेरे एकाकी वनों में आई,
वह प्रेयसी के अति सुंदर रूप में आई-
मुझे सौंपने के लिए मेरे गीत, मेरी प्यारी धुनें,
मेरे स्वप्नों को, मिठास प्रदान करने के लिए,
अचानक एक तूफानी लहर आई,
उसने मेरे हृदय के किनारों ध्वस्त कर दिया,
और सभी भाषाओं को डुबो दिया।

मेरे होठों पर कोई नाम नहीं आया,
वह पेड़ के नीचे खड़ी थी, वह घूमी,
मेरे चेहरे की तरफ देखा, जो दर्द से उदास दिख रहा था,
वह तेज कदमों से आगे बढ़ी, और मेरे पास बैठ गई।
उसने मेरे हाथों को अपने हाथों में लिया, फिर वह बोली:
‘न तुम मुझे जानते हो और न मैं तुमको-
मुझे आश्चर्य है कि ऐसा कैसे हो सकता है?’
मैंने कहा:
‘हम दोनो मिलकर बना सकते हैं, हमेशा के लिए एक पुल
दो प्राणियों के बीच, जो एक-दूसरे से अनजान हैं,
यह उत्कंठापूर्ण अजूबा, सभी के दिल में शामिल है।’

मेरे दिल का जो क्रंदन है, वही उसके दिल का भी है;
जिस धागे से वह मुझे बांधती है, वही उसे भी बांधता है।
उसको मैंने हर जगह पाना चाहा है,
उसकी मैंने अपने भीतर पूजा की है,
उसी पूजा के भीतर छिपे रहते हुए ही, उसने भी मुझे पाना चाहा है।

विशाल समुद्रों को पार करते हुए, वह आई मेरा दिल चुराने के लिए।
जिसे वह वापस लौटाना भूल गई, क्योंकि उसने अपना खो दिया था।
उसका अपना सौंदर्य ही, उसको धोखा दे गया था,
वह अपना जाल फैलाती है, और यह नहीं जानती
कि वह इसमें किसी को पकड़ेगी, या खुद पकड़ी जाएगी।



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

One Day In Spring.


One day in spring, a woman came
In my lonely woods,
In the lovely form of the Beloved.
Came, to give to my songs, melodies,
To give to my dreams, sweetness.
Suddenly a wild wave
Broke over my heart’s shores
And drowned all language.

To my lips no name came,
She stood beneath the tree, turned,
Glanced at my face, made sad with pain,
And with quick steps, came and sat by me.
Taking my hands in hers, she said:
‘You do not know me, nor I you-
I wonder how this could be?’
I said:
‘We two shall build, a bridge for ever
Between two beings, each to the other unknown,
This eager wonder is at the heart of things.’

The cry that is in my heart is also the cry of her heart;
The thread with which she binds me binds her too.
Her have I sought everywhere,
Her have I worshipped within me,
Hidden in that worship she has sought me too.

Crossing the wide oceans, she came to steal my heart.
She forgot to return, having lost her own.
Her own charms play traitor to her,
She spreads her net, knowing not
Whether she will catch or be caught.

Rabindranath Tagore

नमस्कार।

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सौ वर्ष बाद!

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलनों से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘A Hundred Years Hence’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

सौ वर्ष बाद

कौन है वह
जो इतने चाव के साथ
पढ़ता होगा मेरी कविताएं
आज से सौ वर्ष बाद!


क्या तुम तक पहुंचा पाऊँगा मैं

वसंत की इस ताज़ा सुबह से मिलने वाले आनंद का मामूली सा अंश भी
वह पुष्प जो आज खिलता है
वह गीत जो पक्षी गाते हैं
आज अस्त होते सूर्य की चमक
जिसमें प्रेम की मेरी भावनाएं घुली-मिली हैं?

फिर भी एक क्षण के लिए
तुम अपना दक्षिणी द्वार खोलो
और खिड़की के पास बैठकर,
दूर क्षितिज की ओर देखो
और अपनी अन्तर्दृष्टि में इस परिदृष्य को निर्मित करो-


आज से सौ वर्ष पूर्व
आनंद की एक बेचैन तरंग आसमानों से नीचे उतरी थी
और उसने इस जगत के हृदय को छुआ था
आनंद से सराबोर प्रारंभिक वसंत
जो किसी सीमा में नहीं बंध रहा था
और अपने फड़फड़ाते पंख पसार रहा था |


दक्षिणी पवन चली
पुष्पों और पराग की गंध से लदी हुई
तभी अचानक
उन्होंने समूचे विश्व को यौवन से परिपूर्ण चमक से भर दिया
सौ वर्ष पूर्व|

उस दिन एक युवा कवि जागता रहा
गीतों से भरे अधीर हृदय के साथ
उमंग से भरकर
जिसके मन में बहुत से भावों को व्यक्त करने का उत्साह था
जैसे कि पुष्प खिलने के लिए अंगड़ाई ले रहे हों
आज से सौ वर्ष पहले!

सौ वर्ष बाद
तुम्हारे घरों में कोई
युवा कवि क्या गाता है!


उसके लिए
अपनी तरफ से वसंत के अनुभव की ये अभिव्यक्तियाँ भेज रहा हूँ|
एक क्षण के लिए इन्हें गूंजने दो,
अपने वसंत में, अपने दिल की धड़कनों में|
मधुमक्खियों की गुंजार में,
पत्तियों की सरसराहट में
आज से सौ वर्ष बाद|

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



A Hundred Years Hence

A hundred years hence
Who it is
With such curiosity
Reads my poems
A hundred years hence!
Shall I be able to send you
An iota of joy of this fresh spring morning
The flower that blooms today
The songs that the birds sing
The glow of today’s setting sun
Filled with my feelings of love?
Yet for a moment
Open up your southern gate
And take your seat at the window
Look at the far horizon
And visualize in your mind’s eye –
One day a hundred years ago
A restless ecstasy drifted from the skies
And touched the heart of this world
The early spring mad with joy
Knew no bounds
Spreading its restless wings
The southern breeze blew
Carrying the scent of flowers’ pollen
All on a sudden soon
They coloured the world with a youthful glow
A hundred years ago.
That day a young poet kept awake
With an excited heart filled with songs
With so much ardour
Anxious to express so many things
Like buds of flowers straining to bloom
One day a hundred years ago.
A hundred years hence
What young poet
Sings songs in your homes!
For him
I send my tidings of joy of this spring.
Let it echo for a moment
In your spring, in your heartbeats,
In the humming of the bees
In the rustling of the leaves
A hundred years hence.

Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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तुम हो जाओ अविचल!

आज मैं पुनः अपनी एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहरा रहा हूँ|

आज मैं विख्यात कवि, नोबेल पुरस्कार विजेता- श्री पाब्लो नेरुदा की मूल रूप से ‘स्पेनिश’ भाषा में लिखी गई एक कविता के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर उसका भावानुवाद और उसके बाद अंग्रेजी में अनूदित कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-


पाब्लो नेरुदा


मैं चाहता हूँ कि तुम हो जाओ अविचल



मैं चाहता हूँ कि तुम रहो अविचल- स्थिर, शांत
जैसे कि तुम यहाँ हो ही नहीं
और तुम सुनो मेरी आवाज, बहुत दूर से
और मेरी आवाज तुम्हे छू नहीं पाए,
ऐसा लगे कि जैसे तुम्हारे नेत्र कहीं उड़ गए हों,
और ऐसा लगता है कि किसी चुंबन ने तुम्हारे मुंह को बंद कर दिया है,
जैसे सभी पदार्थ, मेरी आत्मा से भरे हैं
और तुम उन पदार्थों से बाहर निकलती हो,
मेरी आत्मा से भरी हुई,
तुम मेरी आत्मा की तरह हो,
स्वप्न की एक तितली,
और तुम इस एक शब्द की तरह हो: अवसाद,


मैं चाहता हूँ कि तुम रहो अविचल- स्थिर, शांत
और तुम बहुत दूर लगती हो,
ऐसा लगता है जैसे तुम विलाप कर रही हो,
एक तितली, कपोत की तरह गुटर-गूं कर रही है,
और तुम मुझे बहुत दूर से सुनती हो,
और मेरी आवाज तुम तक नहीं पहुंचती है,
मुझे आने दो, जिससे मैं तुम्हारे मौन में स्थिर हो जाऊं,
और मुझे बात करने दो तुमसे, तुम्हारे मौन के माध्यम से,
यह एक दमकता दीप है,
सरल, जैसे एक अंगूठी
तुम एक रात की तरह हो,
अपनी स्थिरता और चमकते नक्षत्रों के साथ,

तुम्हारा मौन एक सितारे का मौन है,
उतना ही सुदूर और खरा।


मैं चाहता हूँ कि तुम रहो अविचल- स्थिर, शांत
ऐसे कि जैसे तुम यहाँ हो ही नहीं,
बहुत दूर हो और उदासी से भरी,
मानो तुम मर गई होती,
और फिर एक शब्द, एक मुस्कान काफी है,
मैं खुश हूँ;
क्योंकि यह सच नहीं है।


और अब वह अंग्रेजी अनुवाद, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



Pablo Neruda


I Like For You To Be Still


I like for you to be still
It is as though you are absent
And you hear me from far away
And my voice does not touch you
It seems as though your eyes had flown away
And it seems that a kiss had sealed your mouth
As all things are filled with my soul
You emerge from the things
Filled with my soul
You are like my soul
A butterfly of dream

And you are like the word: Melancholy

I like for you to be still
And you seem far away
It sounds as though you are lamenting
A butterfly cooing like a dove
And you hear me from far away
And my voice does not reach you
Let me come to be still in your silence
And let me talk to you with your silence
That is bright as a lamp
Simple, as a ring
You are like the night
With its stillness and constellations
Your silence is that of a star

As remote and candid

I like for you to be still
It is as though you are absent
Distant and full of sorrow
So you would’ve died
One word then, One smile is enough
And I’m happy;
Happy that it’s not true


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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प्रेम गीतिका

आज फिर से मैं एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

आज भी मैं विख्यात कवि नोबेल पुरस्कार विजेता- श्री पाब्लो नेरुदा की मूल रूप से ‘स्पेनिश’ भाषा में लिखी गई एक कविता के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर उसका भावानुवाद और उसके बाद अंग्रेजी में अनूदित कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-


पाब्लो नेरुदा

प्रेम गीतिका

मैं लालायित हूँ, तुम्हारे मुंह, तुम्हारी आवाज़, तुम्हारे केशों के लिए,
शांत और अनबुझी प्यास के कारण बेचैन,
मैं गलियों में तुम्हें तलाशता फिरता हूँ,
रोटी से मुझे तृप्ति नहीं मिलती,
सवेरा मुझे अव्यवस्थित करता है, पूरा दिन
मैं तुम्हारे कदमों के द्रवमान तलाशता हूँ!


मैं भूखा हूँ तुम्हारी तरल हंसी के लिए,
तुम्हारे हाथ एक आदिम फसल का रंग लिए हुए,
तुम्हारे हाथों की उंगलियों में नाखूनों के पीले पत्थरों के लिए,
मैं तुम्हारी त्वचा को पूरे बादाम की तरह चबा जाना चाहता हूँ।

मैं तुम्हारे कमनीय शरीर में दमकती सूर्य की किरण पचा जाना चाहता हूँ,
तुम्हारे अभिमानी चेहरे पर स्थापित प्रभुतापूर्ण नासिका,
मैं तुम्हारी चितवन के इन प्रहारों की तैरती छायाओं से
अपनी क्षुधा मिटाना चाहता हूँ,


और मैं इधर-उधर भटकता हूँ, धुंधलके में सूंघते हुए,
तुम्हारी तलाश में, तुम्हारे हृदय को खोजने के लिए,
जैसे जंगली बिल्ला (प्यूमा) घूमता है, क्विट्रेटू के रेगिस्तानों में!



और अब वह अंग्रेजी अनुवाद, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Pablo Neruda

Love Sonnet

I crave your mouth, your voice, your hair.
Silent and starving, I prowl through the streets.
Bread does not nourish me, dawn disrupts me, all day
I hunt for the liquid measure of your steps.

I hunger for your sleek laugh,
your hands the color of a savage harvest,
hunger for the pale stones of your fingernails,
I want to eat your skin like a whole almond.


I want to eat the sunbeam flaring in your lovely body,
the sovereign nose of your arrogant face,
I want to eat the fleeting shade of your lashes,

and I pace around hungry, sniffing the twilight,
hunting for you, for your hot heart,
like a puma in the barrens of Quitratue.


आज के लिए इतना ही, नमस्कार।

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रंगीन खिलौने – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Coloured Toys’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

रंगीन खिलौने

जब मैं तुम्हारे लिए रंगीन खिलौने लाता हूँ, मेरे बच्चे
मैं समझ जाता हूँ कि रंगों का इतना प्रदर्शन क्यों है- बादलों में, पानी पर,
और पुष्पों को इतनी आभा से क्यों रंगा गया है,
—जब मैं तुम्हें रंगीन खिलौने देता हूँ मेरे बच्चे|

जब मैं गीत गाता हूँ , तुम्हें नचाने के लिए
मैं सचमुच जान जाता हूँ कि पत्तियों में संगीत क्यों है,
और क्यों लहरें अपनी ध्वनियों का समूह-गान, ध्यान से सुनती भूमि को भेजती हैं

— जब मैं गीत गाता हूँ, तुम्हें नचाने के लिए|


जब मैं उपहार लाता हूँ, तुम्हारे ललचाते हाथों के लिए
मैं जान जाता हूँ कि पुष्पों के प्यालों में मधु क्यों भरा होता है
और क्यों फलों के भीतर गुप्त रूप से मधुर रस भर जाता है
— जब मैं उपहार लाता हूँ, तुम्हारे ललचाते हाथों के लिए|


जब मैं तुम्हारा चेहरा चूमता हूँ, जिससे तुम मुस्कुराओ, मेरे प्रिय,
मैं निस्संदेह यह समझ जाता हूँ कि आकाश से सुबह के प्रकाश के साथ, कौन सा आनंद प्रवाहित होकर आता है,
और वह कौन सा उल्लास है, जो ग्रीष्म की हवा मेरे शरीर में भर देती है
— जब मैं तुम्हारा चेहरा चूमता हूँ, जिससे तुम मुस्कुराओ|



-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Coloured Toys


When I bring to you coloured toys, my child,
I understand why there is such a play of colors on clouds, on water,
and why flowers are painted in tints
—when I give coloured toys to you, my child.

When I sing to make you dance
I truly now why there is music in leaves,
and why waves send their chorus of voices to the heart of the listening earth
—when I sing to make you dance.

When I bring sweet things to your greedy hands
I know why there is honey in the cup of the flowers
and why fruits are secretly filled with sweet juice
—when I bring sweet things to your greedy hands.

When I kiss your face to make you smile, my darling,
I surely understand what pleasure streams from the sky in morning light,
and what delight that is that is which the summer breeze brings to my body

—when I kiss you to make you smile.


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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सर्दी की रात में सैर !

आज फिर से बारी है पुरानी ब्लॉग पोस्ट की|

आज मैं विख्यात अंग्रेजी कवि श्री रॉबर्ट फ्रॉस्ट की एक कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

सर्दियों में शाम की सैर के लिए-
कोई नहीं था मेरे साथ, जिससे कर सकूं कुछ बात,
परंतु एक लंबी कतार थी, झोपड़ियों की,
गिरती बर्फ के बीच, जिनमें से रोशनी की आंखें चमक रही थीं।

और मैंने महसूस किया कि मेरे भीतर जनता है:
मेरे भीतर वायलिन के सुर हैं,
मुझे पर्दे के भीतर से झलक दिखाई दे रही थी
यौवन भरे आकारों और युवा चेहरों की।

मेरे पास बाहर से ऐसा साथ था,
मैं वहाँ तक चलता चला गया, जब आगे और झोंपड़ियां नहीं थीं।
मैं फिर वापस मुड़ा और पछताया, वापस लौटते समय,
मुझे कोई खिड़की दिखाई नहीं दी, पूर्ण अंधकार था।

बर्फ के ऊपर चरचराहट की आवाज करते मेरे पांव,
गांव की ऊंघती गली की तंद्रा को बाधित कर रहे थे,
जैसे उस परिवेश को अपवित्र कर रहे हों,
सर्दी की रात में दस बजे बाहर निकलकर।

                                     – रॉबर्ट फ्रॉस्ट

और अब मूल अंग्रेजी कविता-

I had for my winter evening walk-
No one at all with whom to talk,
But I had the cottages in a row
Up to their shining eyes in snow.

And I thought I had the folk within:
I had the sound of a violin;
I had a glimpse through curtain laces
Of youthful forms and youthful faces.

I had such company outward bound.
I went till there were no cottages found.
I turned and repented, but coming back
I saw no window but that was black.

Over the snow my creaking feet
Disturbed the slumbering village street
Like profanation, by your leave,
At ten o’clock of a winter eve.

                                     Robert Frost

नमस्कार।


आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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दीवार की मरम्मत!

एक बार फिर से आज एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

आज भी मैं विख्यात अंग्रेजी कवि श्री रॉबर्ट फ्रॉस्ट की एक कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

दीवार की मरम्मत

ऐसा कुछ है, जो दीवार को पसंद नहीं करता,
वह, उसके नीचे जमी हुई जमीन को नीचे से फुला देता है,
और ऊपर लगे पत्थरों को धूप में फैला देता है;
और बीच में इतनी जगह बना देता है कि दो लोग भी सटकर पार हो सकते हैं।


शिकारियों द्वारा किए गए ऐसे कामों की बात अलग हैं:
मैंने उनको देखा है और उसकी मरम्मत की है
जहाँ वे एक भी पत्थर को अपनी जगह नहीं लगा रहने देंगे,
लेकिन किसी छिपे हुए खरगोश को अवश्य बाहर निकाल लेंगे,
अपने भौंकते कुत्ते को खुश करने के लिए।


मैं दीवारों में बने ऐसे संकरे रास्तों की बात कर रहा हूँ,
जिनको किसी ने बनते नहीं देखा, इसकी आवाज़ भी नहीं सुनी।
लेकिन वसंत में मरम्मत का समय आने पर, हम उन्हें वहाँ पाते हैं।

मैं अपने पड़ौसी को पहाड़ी के पार;
और जब किसी दिन हम उस लाइन पर एक साथ चलने-
और अपने बीच की दीवार को फिर से दुरुस्त करने के लिए मिलते हैं,
तब यह जानने का अवसर देता हूँ।
जब हम चलते हैं, तो वह दीवार अपने बीच रखते हैं।


और प्रत्येक बड़ा पत्थर जो किसी भी तरफ गिर गया है,
और कुछ छोटे सपाट टुकड़े और कुछ गेंद जैसे गोल,
उनको सही स्थान पर स्थिर करने के लिए, हमें कुछ समय तक प्रयास करना होता है:
“जहाँ हो वहीं बने रहो, जब तक हम पीठ नहीं फेर लेते!”
उन पत्थरों पर काम करते समय हम अपनी उंगलियों को भी खुरदुरा बना लेते हैं।


अरे, यह भी एक प्रकार का मैदानी खेल है,
एक-एक खिलाड़ी, दोनो तरफ, यह इससे थोड़ा अधिक है:
जहाँ पर यह है, वहाँ हमें दीवार की जरूरत नहीं है;

उसके देवदार (सनोबर) के पेड़ हैं और मेरा सेब का बगीचा,
मेरे सेब के पेड़ उस पार कभी नहीं जाएंगे,
और उसके सनोबर के नीचे जाकर चिल्गोजे नहीं खाएंगे, मैं उससे कहता हूँ।
वह इतना ही कहता है, “अच्छी बाड़ लगाने से अच्छे पड़ौसी बनते हैं।”


वसंत मेरे मस्तिष्क में शरारत की तरह आता है, मुझे लगता है
अगर मैं उसके दिमाग में एक बात डाल सकूं:
“वे लोग अच्छे पड़ौसी क्यों बनते हैं? क्या ये
वहाँ नहीं होता जहाँ गाय होती हैं? लेकिन यहाँ तो कोई गाय नहीं है।


दीवार बनाने से पहले मैं पूछना चाहता हूँ,
क्या है जिसे मैं दीवार के अंदर या किसे उससे बाहर कर रहा हूँ,
और किसको मेरे कारण खतरा हो सकता था।

कुछ है, जिसे दीवार पसंद नहीं है,
“वह इसको गिरा हुआ देखना चाहता है।” मैं उसको “पारलौकिक बौना” कह सकता हूँ,
परंतु वह वास्तव में बौना नहीं है, और शायद मैं हूँ।


उसने अपने आपसे कहा, मैं उसको वहाँ देख रहा हूँ,
वह अपने हर हाथ में एक पत्थर को मजबूती से ऊपर उठाकर ला रहा है
पाषाण युग के बर्बर हथियार की तरह,
मुझे लगता है कि वह अंधेरे में चल रहा है,
केवल जंगलों का और पेड़ों की छायाओं का अंधेरा नहीं,
वह अपने पिता के कहने के अनुसार नहीं चलेगा,
और वह इसका विचार बहुत अच्छी तरह रखना चाहता है,
वह फिर से कहता है, “अच्छी बाड़ लगाने से अच्छे पड़ौसी बनते हैं।”


– रॉबर्ट फ्रॉस्ट
और अब मूल अंग्रेजी कविता-

Mending Wall

Something there is that doesn’t love a wall,
That sends the frozen-ground-swell under it,
And spills the upper boulders in the sun;
And makes gaps even two can pass abreast.
The work of hunters is another thing:
I have come after them and made repair
Where they have left not one stone on a stone,
But they would have the rabbit out of hiding,
To please the yelping dogs. The gaps I mean,
No one has seen them made or heard them made,

But at spring mending-time we find them there.

I let my neighbour know beyond the hill;
And on a day we meet to walk the line
And set the wall between us once again.
We keep the wall between us as we go.
To each the boulders that have fallen to each.


And some are loaves and some so nearly balls
We have to use a spell to make them balance:
“Stay where you are until our backs are turned!”
We wear our fingers rough with handling them.

Oh, just another kind of out-door game,
One on a side. It comes to little more:
There where it is we do not need the wall:
He is all pine and I am apple orchard.
My apple trees will never get across
And eat the cones under his pines, I tell him.


He only says, “Good fences make good neighbours.”
Spring is the mischief in me, and I wonder
If I could put a notion in his head:
“Why do they make good neighbours? Isn’t it
Where there are cows? But here there are no cows.

Before I built a wall I’d ask to know
What I was walling in or walling out,
And to whom I was like to give offence.


Something there is that doesn’t love a wall,
That wants it down.” I could say “Elves” to him,
But it’s not elves exactly, and I’d rather
He said it for himself. I see him there
Bringing a stone grasped firmly by the top
In each hand, like an old-stone savage armed.

He moves in darkness as it seems to me,
Not of woods only and the shade of trees.
He will not go behind his father’s saying,
And he likes having thought of it so well

He says again, “Good fences make good neighbours.”

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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आज रात मैं लिख सकता हूँ!


आज भी मैं विख्यात कवि नोबेल पुरस्कार विजेता- श्री पाब्लो नेरुदा की जो मूलतः चिले से थे, की मूल रूप से ‘स्पेनिश’ भाषा में लिखी गई कविता, के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर उसका भावानुवाद और उसके बाद अंग्रेजी में अनूदित मूल कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

आज रात मैं लिख सकता हूँ

आज रात मैं लिख सकता हूँ, सर्वाधिक उदास पंक्तियां।
जैसे मैं लिख सकता हूँ, कि तारों से सजी है रात,
तारे नीले हैं और दूर-दूर कांप रहे हैं।’

आसमान में रात की हवा घूमती है और गाती है।

आज रात मैं लिख सकता हूँ, सर्वाधिक उदास पंक्तियां।
मैंने उसे प्रेम किया, और कभी-कभी उसने भी मुझे प्रेम किया।

आज जैसी रातों में, मैंने उसे अपनी बांहों में लिए रखा।
अनंत आकाश के तले मैं उसे बारबार चूमता रहा।

उसने मुझे प्यार किया, कभी-कभी मैंने भी उसे प्यार किया।
कोई कैसे उसकी अति सुंदर स्थिर आंखों को प्यार न करता।

आज रात मैं लिख सकता हूँ, सर्वाधिक उदास पंक्तियां।
मुझे लगता है कि मैं उसे प्यार नहीं करता, यह महसूस करने के लिए मैंने उसे खो दिया।

घनघोर रात की ध्वनियां सुनने को, जो और भी घनघोर है, उसके बिना,
और ये काव्य पंक्तियां पड़ती हैं आत्मा पर, जैसे ओस गिरती है घास पर।

इससे क्या फर्क पड़ता है कि मेरा प्रेम उसे अपने पास नहीं रख पाया।
रात तारों से भरी है और वह मेरे पास नहीं है।

यही सब है, दूर कहीं कोई गीत गा रहा है दूर कहीं।
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं है कि इसने उसे खो दिया।

मेरी दृष्टि प्रयास करती है उसे खोजने का, जैसे उसे पास लाने का।
मेरी आत्मा उसे खोजती है, और वह मेरे पास नहीं है।

वही रात, वही उन्हीं पेड़ों का सफेद हो जाना,
लेकिन उस समय के हम, हम अब वही नहीं हैं।

मैं अब उसे प्यार नहीं करता, यह तो निश्चित है, लेकिन मैं कैसे उसे प्यार करता था।
मेरी आवाज़ ने प्रयास किया कि हवा को खोज ले, जो उसके सुनते हुए, उसे स्पर्श करे।

किसी और की, वह होगी किसी और की, जैसे कि वह मेरे चुंबनों से पहले थी।
उसकी आवाज़, उसका दमकता बदन। उसकी असीम आंखें।

मैं अब उसे प्रेम नहीं करता, यह निश्चित है, लेकिन शायद मैं उसे प्यार करता हूँ।
प्रेम की उम्र इतनी कम है और भूलना होता है इतनी देर तक!

क्योंकि आज जैसी रातों में मैं उसे, अपनी बांहों में भरे रहता था,
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं है कि मैंने उसे खो दिया है।

यद्यपि यह शायद अंतिम दर्द हो, जो उसने मुझे दिया है,
और यह अंतिम कविता जो मैं उसके लिए लिख रहा हूँ।

पाब्लो नेरूदा

अंग्रेजी अनुवाद- डब्लू. एस. मेर्विन

और अब वह अंग्रेजी अनुवाद, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Tonight I Can Write

Tonight I can write the saddest lines.

Write, for example, ‘The night is starry
and the stars are blue and shiver in the distance.’

The night wind revolves in the sky and sings.

Tonight I can write the saddest lines.
I loved her, and sometimes she loved me too.

Through nights like this one I held her in my arms.
I kissed her again and again under the endless sky.

She loved me, sometimes I loved her too.
How could one not have loved her great still eyes.

Tonight I can write the saddest lines.
To think that I do not have her. To feel that I have lost her.

To hear the immense night, still more immense without her.
And the verse falls to the soul like dew to the pasture.

What does it matter that my love could not keep her.
The night is starry and she is not with me.

This is all. In the distance someone is singing. In the distance.
My soul is not satisfied that it has lost her.

My sight tries to find her as though to bring her closer.
My heart looks for her, and she is not with me.

The same night whitening the same trees.
We, of that time, are no longer the same.

I no longer love her, that’s certain, but how I loved her.
My voice tried to find the wind to touch her hearing.

Another’s. She will be another’s. As she was before my kisses.
Her voice, her bright body. Her infinite eyes.

I no longer love her, that’s certain, but maybe I love her.
Love is so short, forgetting is so long.

Because through nights like this one I held her in my arms
my soul is not satisfied that it has lost her.

Though this be the last pain that she makes me suffer
and these the last verses that I write for her.
Pablo Neruda
Translated in English by W.S. Merwin

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|
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वह चलती है, सुंदरता बिखेरते हुए!

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

पिछले कुछ दिनों में मैंने लॉर्ड बॉयरन की कुछ कविताओं का भावानुवाद प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। कविता में एक खूबसूरती यह भी होती है कि हर कोई उसे अपनी तरह से समझ सकता है। आज फिर से एक बार, अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि लॉर्ड बॉयरन की एक प्रसिद्ध कविता –‘शी वॉक्स इन ब्यूटी’ का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

वह चलती है, सुंदरता बिखेरते हुए!

वह चलती है सुंदरता बिखेरते, जैसे रात-
बिना बादलों के परिवेश में, और फिर तारों से भरा आकाश,
और उसकी निगाहों के पहलू में अंधकार और प्रकाश-
दोनों के सर्वश्रेष्ठ स्वरूप घुलते-मिलते:
निर्मल प्रकाश के नाज़ुक स्वरूप के साथ,
जो ऊपर वाला, किसी गर्वीले दिन को भी नहीं देता है।


रंग की एक कूची अधिक, एक किरण कम,
जिन्होंने उस अनाम मोहकता को मात दे दी,
जो प्रत्येक कलमुहे पेड़ में लहराती है,
अथवा कोमलता से उसके चेहरे पर पड़कर फीकी हो जाती है;
जहाँ विचार शांतिपूर्वक मधुर अभिव्यक्ति देते हैं,
कि उनका वह ठिकाना- कितना पवित्र, कितना प्यारा है।


और वह कपोल, आंख की भौंह,
कितने कोमल, कितने शांत, फिर भी कितना बतियाते,
वे मुस्कान जो जीत लेती हैं, वह आभा जो चमचमाती है,
परंतु वे बताते हैं उन दिनों के बारे में, जो अच्छाई से बिताए गए,
एक मस्तिष्क जिसका शरीर के साथ सामंजस्य है,
एक हृदय जो एकदम भोला है!


– लॉर्ड बॉयरन


और अब मूल अंग्रेजी कविता-

She Walks In Beauty

She walks in beauty, like the night
Of cloudless climes and starry skies;
And all that’s best of dark and bright
Meet in her aspect and her eyes:
Thus mellowed to that tender light
Which heaven to gaudy day denies.


One shade the more, one ray the less,
Had half impaired the nameless grace
Which waves in every raven tress,
Or softly lightens o’er her face;
Where thoughts serenely sweet express
How pure, how dear their dwelling place.


And on that cheek, and o’er that brow,
So soft, so calm, yet eloquent,
The smiles that win, the tints that glow,
But tell of days in goodness spent,
A mind at peace with all below,
A heart whose love is innocent!

– Lord Byron


नमस्कार।


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जब हम दोनो ज़ुदा हुए


आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|


आज फिर से अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि लॉर्ड बॉयरन की एक और कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

हम दोनो जब ज़ुदा हुए
खामोशी और आंसुओं के बीच,
टूटे हुए दिल के साथ,
बरसों तक दूर रहने के लिए,
तुम्हारे गाल पीले और ठंडे हो गए थे,
तुम्हारा चुंबन भी बहुत ठंडा हो गया था,
बेशक वह घड़ी जाहिर कर रही थी
इसके लिए अफसोस।


सुबह की ओस
मेरी भौंह पर जम गई-
मुझे लगा जैसे उस भवितव्य की चेतावनी दे रही हो
जो मुझे अब महसूस हो रहा है।
तुम्हारी कसमें सभी टूट चुकी हैं,
और प्रकाश की तरह तुम्हारी ख्याति है,
मैं सुनता हूँ लोगों को तुम्हारा नाम पुकारते,
और उसकी शर्म में डूब जाता हूँ।


वे मेरे सामने तुम्हारा नाम लेते हैं,
जिसकी गूंज मुझे झकझोर जाती है,
मुझे कंपकंपी सी आ जाती है-
तुम इतनी प्यारी क्यों थीं?
वे नहीं जानते हमारे संबंध के बारे में,
तुमको इतनी अच्छी तरह कौन जानता था-
मैं बहुत लंबे समय तक तुम्हारे लिए पछताता रहूंगा,
इतनी गहराई से कि मैं कह नहीं सकता।


हम गुप्त रूप से मिले-
और खामोशी में हम दुखी होते हैं,
कि तुम्हारा दिल भूल जाए,
तुम्हारी आत्मा धोखा न दे दे,
अगर मैं तुम्हें फिर से मिलूं
बहुत बरसों। के बाद,
तो किस तरह मैं तुम्हारा स्वागत करूंगा?-
खामोशी और आंसुओं के साथ।


– लॉर्ड बॉयरन

और अब मूल अंग्रेजी कविता-

When We Two Parted

When we two parted
In silence and tears,
Half broken-hearted,
To sever for years,
Pale grew thy cheek and cold,
Colder thy kiss;
Truly that hour foretold
Sorrow to this.


The dew of the morning
Sank chill on my brow—
It felt like the warning
Of what I feel now.
Thy vows are all broken,
And light is thy fame:
I hear thy name spoken,
And share in its shame.


They name thee before me,
A knell to mine ear;
A shudder comes o’er me—
Why wert thou so dear?
They know not I knew thee,
Who knew thee too well:—
Long, long shall I rue thee
Too deeply to tell.


In secret we met—
In silence I grieve
That thy heart could forget,
Thy spirit deceive.
If I should meet thee
After long years,
How should I greet thee?—
With silence and tears.


– Lord Byron


नमस्कार।
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