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आज रात मैं लिख सकता हूँ!


आज भी मैं विख्यात कवि नोबेल पुरस्कार विजेता- श्री पाब्लो नेरुदा की जो मूलतः चिले से थे, की मूल रूप से ‘स्पेनिश’ भाषा में लिखी गई कविता, के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर उसका भावानुवाद और उसके बाद अंग्रेजी में अनूदित मूल कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

आज रात मैं लिख सकता हूँ

आज रात मैं लिख सकता हूँ, सर्वाधिक उदास पंक्तियां।
जैसे मैं लिख सकता हूँ, कि तारों से सजी है रात,
तारे नीले हैं और दूर-दूर कांप रहे हैं।’

आसमान में रात की हवा घूमती है और गाती है।

आज रात मैं लिख सकता हूँ, सर्वाधिक उदास पंक्तियां।
मैंने उसे प्रेम किया, और कभी-कभी उसने भी मुझे प्रेम किया।

आज जैसी रातों में, मैंने उसे अपनी बांहों में लिए रखा।
अनंत आकाश के तले मैं उसे बारबार चूमता रहा।

उसने मुझे प्यार किया, कभी-कभी मैंने भी उसे प्यार किया।
कोई कैसे उसकी अति सुंदर स्थिर आंखों को प्यार न करता।

आज रात मैं लिख सकता हूँ, सर्वाधिक उदास पंक्तियां।
मुझे लगता है कि मैं उसे प्यार नहीं करता, यह महसूस करने के लिए मैंने उसे खो दिया।

घनघोर रात की ध्वनियां सुनने को, जो और भी घनघोर है, उसके बिना,
और ये काव्य पंक्तियां पड़ती हैं आत्मा पर, जैसे ओस गिरती है घास पर।

इससे क्या फर्क पड़ता है कि मेरा प्रेम उसे अपने पास नहीं रख पाया।
रात तारों से भरी है और वह मेरे पास नहीं है।

यही सब है, दूर कहीं कोई गीत गा रहा है दूर कहीं।
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं है कि इसने उसे खो दिया।

मेरी दृष्टि प्रयास करती है उसे खोजने का, जैसे उसे पास लाने का।
मेरी आत्मा उसे खोजती है, और वह मेरे पास नहीं है।

वही रात, वही उन्हीं पेड़ों का सफेद हो जाना,
लेकिन उस समय के हम, हम अब वही नहीं हैं।

मैं अब उसे प्यार नहीं करता, यह तो निश्चित है, लेकिन मैं कैसे उसे प्यार करता था।
मेरी आवाज़ ने प्रयास किया कि हवा को खोज ले, जो उसके सुनते हुए, उसे स्पर्श करे।

किसी और की, वह होगी किसी और की, जैसे कि वह मेरे चुंबनों से पहले थी।
उसकी आवाज़, उसका दमकता बदन। उसकी असीम आंखें।

मैं अब उसे प्रेम नहीं करता, यह निश्चित है, लेकिन शायद मैं उसे प्यार करता हूँ।
प्रेम की उम्र इतनी कम है और भूलना होता है इतनी देर तक!

क्योंकि आज जैसी रातों में मैं उसे, अपनी बांहों में भरे रहता था,
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं है कि मैंने उसे खो दिया है।

यद्यपि यह शायद अंतिम दर्द हो, जो उसने मुझे दिया है,
और यह अंतिम कविता जो मैं उसके लिए लिख रहा हूँ।

पाब्लो नेरूदा

अंग्रेजी अनुवाद- डब्लू. एस. मेर्विन

और अब वह अंग्रेजी अनुवाद, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Tonight I Can Write

Tonight I can write the saddest lines.

Write, for example, ‘The night is starry
and the stars are blue and shiver in the distance.’

The night wind revolves in the sky and sings.

Tonight I can write the saddest lines.
I loved her, and sometimes she loved me too.

Through nights like this one I held her in my arms.
I kissed her again and again under the endless sky.

She loved me, sometimes I loved her too.
How could one not have loved her great still eyes.

Tonight I can write the saddest lines.
To think that I do not have her. To feel that I have lost her.

To hear the immense night, still more immense without her.
And the verse falls to the soul like dew to the pasture.

What does it matter that my love could not keep her.
The night is starry and she is not with me.

This is all. In the distance someone is singing. In the distance.
My soul is not satisfied that it has lost her.

My sight tries to find her as though to bring her closer.
My heart looks for her, and she is not with me.

The same night whitening the same trees.
We, of that time, are no longer the same.

I no longer love her, that’s certain, but how I loved her.
My voice tried to find the wind to touch her hearing.

Another’s. She will be another’s. As she was before my kisses.
Her voice, her bright body. Her infinite eyes.

I no longer love her, that’s certain, but maybe I love her.
Love is so short, forgetting is so long.

Because through nights like this one I held her in my arms
my soul is not satisfied that it has lost her.

Though this be the last pain that she makes me suffer
and these the last verses that I write for her.
Pablo Neruda
Translated in English by W.S. Merwin

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|
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वह चलती है, सुंदरता बिखेरते हुए!

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

पिछले कुछ दिनों में मैंने लॉर्ड बॉयरन की कुछ कविताओं का भावानुवाद प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। कविता में एक खूबसूरती यह भी होती है कि हर कोई उसे अपनी तरह से समझ सकता है। आज फिर से एक बार, अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि लॉर्ड बॉयरन की एक प्रसिद्ध कविता –‘शी वॉक्स इन ब्यूटी’ का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

वह चलती है, सुंदरता बिखेरते हुए!

वह चलती है सुंदरता बिखेरते, जैसे रात-
बिना बादलों के परिवेश में, और फिर तारों से भरा आकाश,
और उसकी निगाहों के पहलू में अंधकार और प्रकाश-
दोनों के सर्वश्रेष्ठ स्वरूप घुलते-मिलते:
निर्मल प्रकाश के नाज़ुक स्वरूप के साथ,
जो ऊपर वाला, किसी गर्वीले दिन को भी नहीं देता है।


रंग की एक कूची अधिक, एक किरण कम,
जिन्होंने उस अनाम मोहकता को मात दे दी,
जो प्रत्येक कलमुहे पेड़ में लहराती है,
अथवा कोमलता से उसके चेहरे पर पड़कर फीकी हो जाती है;
जहाँ विचार शांतिपूर्वक मधुर अभिव्यक्ति देते हैं,
कि उनका वह ठिकाना- कितना पवित्र, कितना प्यारा है।


और वह कपोल, आंख की भौंह,
कितने कोमल, कितने शांत, फिर भी कितना बतियाते,
वे मुस्कान जो जीत लेती हैं, वह आभा जो चमचमाती है,
परंतु वे बताते हैं उन दिनों के बारे में, जो अच्छाई से बिताए गए,
एक मस्तिष्क जिसका शरीर के साथ सामंजस्य है,
एक हृदय जो एकदम भोला है!


– लॉर्ड बॉयरन


और अब मूल अंग्रेजी कविता-

She Walks In Beauty

She walks in beauty, like the night
Of cloudless climes and starry skies;
And all that’s best of dark and bright
Meet in her aspect and her eyes:
Thus mellowed to that tender light
Which heaven to gaudy day denies.


One shade the more, one ray the less,
Had half impaired the nameless grace
Which waves in every raven tress,
Or softly lightens o’er her face;
Where thoughts serenely sweet express
How pure, how dear their dwelling place.


And on that cheek, and o’er that brow,
So soft, so calm, yet eloquent,
The smiles that win, the tints that glow,
But tell of days in goodness spent,
A mind at peace with all below,
A heart whose love is innocent!

– Lord Byron


नमस्कार।


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जब हम दोनो ज़ुदा हुए


आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|


आज फिर से अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि लॉर्ड बॉयरन की एक और कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

हम दोनो जब ज़ुदा हुए
खामोशी और आंसुओं के बीच,
टूटे हुए दिल के साथ,
बरसों तक दूर रहने के लिए,
तुम्हारे गाल पीले और ठंडे हो गए थे,
तुम्हारा चुंबन भी बहुत ठंडा हो गया था,
बेशक वह घड़ी जाहिर कर रही थी
इसके लिए अफसोस।


सुबह की ओस
मेरी भौंह पर जम गई-
मुझे लगा जैसे उस भवितव्य की चेतावनी दे रही हो
जो मुझे अब महसूस हो रहा है।
तुम्हारी कसमें सभी टूट चुकी हैं,
और प्रकाश की तरह तुम्हारी ख्याति है,
मैं सुनता हूँ लोगों को तुम्हारा नाम पुकारते,
और उसकी शर्म में डूब जाता हूँ।


वे मेरे सामने तुम्हारा नाम लेते हैं,
जिसकी गूंज मुझे झकझोर जाती है,
मुझे कंपकंपी सी आ जाती है-
तुम इतनी प्यारी क्यों थीं?
वे नहीं जानते हमारे संबंध के बारे में,
तुमको इतनी अच्छी तरह कौन जानता था-
मैं बहुत लंबे समय तक तुम्हारे लिए पछताता रहूंगा,
इतनी गहराई से कि मैं कह नहीं सकता।


हम गुप्त रूप से मिले-
और खामोशी में हम दुखी होते हैं,
कि तुम्हारा दिल भूल जाए,
तुम्हारी आत्मा धोखा न दे दे,
अगर मैं तुम्हें फिर से मिलूं
बहुत बरसों। के बाद,
तो किस तरह मैं तुम्हारा स्वागत करूंगा?-
खामोशी और आंसुओं के साथ।


– लॉर्ड बॉयरन

और अब मूल अंग्रेजी कविता-

When We Two Parted

When we two parted
In silence and tears,
Half broken-hearted,
To sever for years,
Pale grew thy cheek and cold,
Colder thy kiss;
Truly that hour foretold
Sorrow to this.


The dew of the morning
Sank chill on my brow—
It felt like the warning
Of what I feel now.
Thy vows are all broken,
And light is thy fame:
I hear thy name spoken,
And share in its shame.


They name thee before me,
A knell to mine ear;
A shudder comes o’er me—
Why wert thou so dear?
They know not I knew thee,
Who knew thee too well:—
Long, long shall I rue thee
Too deeply to tell.


In secret we met—
In silence I grieve
That thy heart could forget,
Thy spirit deceive.
If I should meet thee
After long years,
How should I greet thee?—
With silence and tears.


– Lord Byron


नमस्कार।
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शिशु की दुनिया – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Baby’s World’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

शिशु की दुनिया


चाहता हूँ कि मैं, अपने शिशु के हृदय की दुनिया के शांत किनारे पर बैठ जाऊं,
मैं जानता हूँ कि इसमें सितारे हैं, जो उससे बात करते हैं, और आकाश जो उसे प्रसन्न करने के लिए
अपने नादान बादलों और इंद्रधनुषों के साथ, उसके चेहरे पर झुक जाता है|
जो ऐसा विश्वास दिलाते हैं कि वे मूक हैं, और दिखाते हैं, कि वे कभी चल-फिर नहीं सकते|
वे चुपके से खिसक कर उसकी खिड़की तक आ जाते हैं,अपनी कहानियों,
और चमकीले खिलौनों से भरी तश्तरियों के साथ|
मैं चाहता हूँ कि मैं उस मार्ग पर चल सकूँ, जो मेरे शिशु के मन से होकर निकलता है और सभी सीमाओं के पार चलता चला जाता है;
जहां कल्पित राजाओं के दूत, निरंतर इधर-उधर भागते रहते हैं, ऐसे राज्यों के बीच, जिनका इतिहास में कोई उल्लेख नहीं है;
जहां विवेक अपने ही नियमों से पतंगें बनाकर उनको उड़ाता है, सत्य, तथ्यों को उनकी बेड़ियों से मुक्त करता है|


-रवींद्रनाथ ठाकुर




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Baby’s World


I wish I could take a quiet corner in the heart of my baby’s very
own world.
I know it has stars that talk to him, and a sky that stoops
down to his face to amuse him with its silly clouds and rainbows.
Those who make believe to be dumb, and look as if they never
could move, come creeping to his window with their stories and with
trays crowded with bright toys.
I wish I could travel by the road that crosses baby’s mind,
and out beyond all bounds;
Where messengers run errands for no cause between the kingdoms
of kings of no history;
Where Reason makes kites of her laws and flies them, the Truth
sets Fact free from its fetters.


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इतना मधुर कैसे गाते हो तुम – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘How You Sing So Well?’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


तुम इतना मधुर कैसे गाते हो?

अरे प्रबुद्ध मित्र, तुम इतना मधुर कैसे गा लेते हो?

मैं चकित होकर सुनता हूँ,

 पूर्णतः आह्लादित!

तुम्हारे गीत पूरे विश्व को चमत्कृत करते हैं,

 और स्वर्ग लोकों में फैल जाते हैं,

यह पत्थरों को पिघलाते हैं, मार्ग की प्रत्येक वस्तु को चालित करते हैं,

अपने साथ ये स्वार्गिक संगीत ले जाते हैं|  

यद्यपि तुम्हारी धुनों को मेरे स्वर, पकड़ नहीं पाते,

मैं उस महान शैली में गाना चाहता हूँ

परंतु जो मैं कहना चाहता हूँ, वह फंसा रह जाता है,  

 और मेरी आत्मा पराजित होकर चीत्कार करती है!

ये तुमने मेरे भीतर कैसी निश्चिंतता भर दी है?  

तुम्हारे संगीत ने मुझे पूर्णतः मुग्ध कर दिया है!

                                                     रवींद्रनाथ ठाकुर






और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


How You Sing So well

O wise one, how do you sing so well?
I listen in amazement,
completely enthralled!
Your melodies light up the world
And waft across heavens,
Melting stones, driving everything in the way,
Carrying along with them heavenly music.
Though the tunes keep eluding my voice
I feel like singing in that superb vein
What I would like to say get stuck
And my soul cries out, defeated!
What trap have you ensnared me into?
Your music has me fully in its thrall!


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मुझे पूर्णतः प्रसन्न रखिए – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Keep me fully glad’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


मुझे पूर्णतः प्रसन्न रखिए



मुझे पूर्णतः प्रसन्न रखिए, कुछ न होते हुए भी| केवल मेरा हाथ अपने हाथ में ले लीजिए|
गहराती रात्रि के अंधकार में, मेरे हृदय को लीजिए और उसके साथ खेलिए,जैसे चाहो|

मुझे अपने साथ बांध लीजिए, बिना किसी बंधन के|
मैं स्वयं को आपके चरणों में बिछा दूंगा, और वहीं पड़ा रहूँगा| बादलों से ढके आकाश के नीचे, मैं मौन का मौन से मिलन कराऊंगा|

मैं अपने सीने को धरती से सटाकर लेटा हुआ, रात्रि का एक हिस्सा बन जाऊंगा|
मेरे जीवन को प्रसन्न बना दीजिए, बिना कुछ पाए|


वर्षा, आकाश को एक सिरे से दूसरे सिरे तक बुहार देती है| चमेली के पुष्प, भीगी बेकाबू हवा में, अपनी सुगंध के साथ उत्सव मनाते हैं| बादलों के पीछे छिपे हुए सितारे, गोपनीय रूप से आनंद मनाते हैं|

मुझे अपना हृदय भर लेने दो, जिसमें कुछ न हो, बस मेरे आनंद की ही अपनी गहराई हो|

-रवींद्रनाथ ठाकुर




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Keep me fully glad



Keep me fully glad with nothing. Only take my hand in your hand.
In the gloom of the deepening night take up my heart and play with it as you list. Bind me close to you with nothing.
I will spread myself out at your feet and lie still. Under this clouded sky I will meet silence with silence. I will become one with the night clasping the earth in my breast.

Make my life glad with nothing.
The rains sweep the sky from end to end. Jasmines in the wet untamable wind revel in their own perfume. The cloud-hidden stars thrill in secret. Let me fill to the full my heart with nothing but my own depth of joy.



-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जब तुम मुझसे गाने के लिए कहते हो- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘When You Ask Me To Sing’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


जब तुम मुझसे गाने के लिए कहते हो!



जब तुम मुझसे गाने के लिए कहते हो,
मेरा हृदय गर्व से फूल जाता है|
जब मैं अर्थपूर्ण दृष्टि से तुम्हारी तरफ देखता हूँ,
मेरी आँखें आंसुओं से भीग जाती हैं|
मेरे भीतर जो कुछ भी कठोर और कटु है,
वह पिघलकर स्वार्गिक संगीत में ढल जाता है|
मेरी सभी प्रार्थनाओं और विचारों को
पंख लग जाते हैं, और वे खुशी के गीत गाने वाले पक्षी बन जाते हैं|



तुम मेरे गीतों से संतुष्ट होते हो,
मुझे मालूम है इनसे तुम्हें प्रसन्नता मिलती है|
ये मुझे तुम्हारी संगत में ले जाते हैं,
जहां मैं अपने विचारों के बल पर नहीं पहुँच सकता|
मुझे मेरे गीतों के माध्यम से स्वीकार करो!
मेरे गीतों के माध्यम से, मैं स्वयं को भूल जाता हूँ

और फिर मैं स्वयं को अपने स्वामी का मित्र कह पाता हूँ|


-रवींद्रनाथ ठाकुर




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


When You Ask Me To Sing!


When you ask me to sing
My heart swells with pride
As I look intently at you
My eyes moisten with tears
All that is hard and bitter in me
Melts into heavenly music
All my prayers and thoughts
Take wings like merry birds.



You are content with my songs
I know they please you.
They admit me to your company
The One I can’t reach through thought
Accepts me through my songs!
My songs make me forget myself
And let me call my Lord my friend.


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मुक्त प्रेम- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है।

आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Free Love’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


मुक्त प्रेम


इस दुनिया में जो लोग मुझसे प्रेम करते हैं,वे मुझे मजबूती से पकड़कर सुरक्षित रखना चाहते हैं|
परंतु तुम्हारे प्रेम की स्थिति अलग है, जो उनके प्रेम से कहीं अधिक है,
और तुम मुझे मुक्त रखते हो|

कहीं मैं उनको भूल न जाऊं, इसलिए वे मुझे अकेला नहीं छोड़ते|
परंतु एक-एक करके दिन बीतते जाते हैं, तुम तो दिखाई नहीं देते|

भले ही मैं तुमको अपनी प्रार्थनाओं में याद न करूं, अपने दिल में न रखूं,
मेरे लिए तुम्हारा प्रेम, मेरे प्रेम की प्रतीक्षा करता है|



-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Free Love


By all means they try to hold me secure who love me in this world.
But it is otherwise with thy love which is greater than theirs,
and thou keepest me free.

Lest I forget them they never venture to leave me alone.
But day passes by after day and thou art not seen.

If I call not thee in my prayers, if I keep not thee in my heart,
thy love for me still waits for my love.



-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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खेल का मेरा साथी- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘My Playmate’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

My Playmate!



अब मेरे मुख से , कोई शोर भरे स्वर नहीं निकलेंगे, ऐसी है मेरे स्वामी की इच्छा| अब मैं केवल धीमे स्वर में ही बात करूंगा|
मेरे हृदय की ध्वनि, किसी गीत को गुनगुनाने में ही अभिव्यक्त होगी| लोग तेज़ी से आगे बढ़ते हैं, राजा के बाजार की तरफ, सभी विक्रेता और खरीदार वहाँ हैं| परंतु मुझे असमय ही दूर जाना है, भरी दोपहरी में, कार्य की व्यस्तता के बीच|
चलो फिर पुष्पों को मेरे बगीचे में खिलने दो, यद्यपि ये उनके खिलने का समय नहीं है, और दोपहरी में मधुमक्खियों को अपनी सुस्त धुन में गुनगुनाने दो|
मैंने कितने ही घंटे बिताए हैं, अच्छे और बुरे की पहचान करने में, परंतु अब मेरे पास आनंद है, जब खाली दिनों में मेरे खेल का साथी, मेरे हृदय को अपनी ओर खींचता है, मुझे नहीं मालूम कि अचानक आया यह बुलावा, किस निरर्थक असंगति के लिए है!


-रवींद्रनाथ ठाकुर




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


My Playmate




No more noisy, loud words from me, such is my master’s will. Henceforth I deal in whispers. The speech of my heart will be carried on in murmurings of a song.
Men hasten to the King’s market. All the buyers and sellers are there. But I have my untimely leave in the middle of the day, in the thick of work.
Let then the flowers come out in my garden, though it is not their time, and let the midday bees strike up their lazy hum.
Full many an hour have I spent in the strife of the good and the evil, but now it is the pleasure of my playmate of the empty days to draw my heart on to him, and I know not why is this sudden call to what useless inconsequence!




-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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स्वतन्त्रता- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Freedom’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

स्वतंत्रता!

भय से मुक्ति ही वह स्वतंत्रता है
जिसकी मैं अपनी मातृभूमि के लिए मैं मांग करता हूँ!
युगों-युगों के उस भार से मुक्ति, जो आपके शीश को झुकाता है,
आपकी कमर तोड़ता है, आपकी आँखों को भविष्य की मांग दर्शाते संकेत
देखने में असफल बना देता है;
निद्रा के बंधनों से मुक्ति, जहां आप स्वयं को रात्रि की
निश्‍चलता के बंधनों को सौंप देते हो,
उस सितारे पर अविश्वास करते हुए, जो सत्य के साहसिक पथ और
प्रारब्ध की अराजकता से मुक्ति के बारे मे बताता है,
सभी नौकाएँ कमजोर होकर दिशाहीन अनिश्चित हवाओं के हवाले हो जाती हैं,
और ऐसे हाथ में पड़ जाती हैं जो सदा मृत्यु की तरह कठोर और ठंडे रहते हैं|
कठपुतलियों की दुनिया में रहने के अपमान से मुक्ति,
जहां सभी गतिविधियां मस्तिष्कहीन तारों के माध्यम से प्रारंभ होती हैं,
और फिर जड़बुद्धि आदतों के माध्यम से दोहराई जाती हैं,
जहां आकृतियाँ धैर्य और आज्ञाकारिता के साथ,
प्रदर्शन के स्वामी की प्रतीक्षा करते हैं,
कि वह उनको हिला-डुलाकर जीवन स्वांग प्रस्तुत करे|


-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Freedom

Freedom from fear is the freedom
I claim for you my motherland!
Freedom from the burden of the ages, bending your head,
breaking your back, blinding your eyes to the beckoning
call of the future;
Freedom from the shackles of slumber wherewith
you fasten yourself in night’s stillness,
mistrusting the star that speaks of truth’s adventurous paths;
freedom from the anarchy of destiny
whole sails are weakly yielded to the blind uncertain winds,
and the helm to a hand ever rigid and cold as death.
Freedom from the insult of dwelling in a puppet’s world,
where movements are started through brainless wires,
repeated through mindless habits,
where figures wait with patience and obedience for the
master of show,
to be stirred into a mimicry of life.



-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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