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मुझे शक्ति दो – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Give Me Strength’का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मुझे शक्ति दो


मेरी आपसे प्रार्थना है, मेरे प्रभु—आघात करो,
आघात करो मेरे हृदय के भीतर दरिद्रता के आधार पर|

मुझे शक्ति दो कि मैं, सहजता से अपनी खुशियों और दुखों को सह सकूँ|

मुझे शक्ति दो कि मैं, अपने प्रेम को सेवा के लिए कारगर बना सकूँ|

मुझे शक्ति दो कि मैं न तो किसी निर्धन को अकेला छोड़ दूँ, और न किसी शक्तिशाली अभद्र के सामने घुटने टेकूं|


मुझे शक्ति दो कि मैं अपने मन को प्रतिदिन आने वाले छोटे विचारों से, बहुत ऊपर उठा सकूँ|

और मुझे यह साहस भी दो कि मैं अपनी शक्ति को प्रेम के साथ, आपके समक्ष समर्पित कर सकूँ|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Give Me Strength

This is my prayer to thee, my lord—strike,
strike at the root of penury in my heart.

Give me the strength lightly to bear my joys and sorrows.

Give me the strength to make my love fruitful in service.


Give me the strength never to disown the poor or bend my knees before insolent might.

Give me the strength to raise my mind high above daily trifles.

And give me the strength to surrender my strength to thy will with love.


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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मानहानि – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Defamation’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


मानहानि


तुम्हारी आँखों में ये अश्रु क्यों हैं, मेरे बच्चे?
यह उनका कितना भीषण कृत्य है, बिना कारण तुमको हमेशा डांटना!
तुमने लिखते समय स्याही से अपना चेहरा और उँगलियाँ रंग लीं –
क्या इस कारण ही वे तुमको गंदा बोलते हैं?


अरे, धत्त! क्या वे पूर्ण चंद्रमा को भी गंदा कहेंगे क्योंकि
उसने भी अपने चेहरे पर स्याही से धब्बा लगा लिया है?
हर मामूली गलती के लिए वे तुम्हें दोष देते हैं, मेरे बच्चे| वे बिना कारण
गलतियाँ ढूँढने के लिए तैयार रहते हैं|


खेलते समय तुम्हारे कपड़े फट गए, तो वे तुम्हें गंदा कहते हैं?
अरे, धत्त! वे शरद ऋतु की ऐसी सुबह को क्या कहेंगे, जो अपने
चिथड़े हुए बादलों के बीच से मुस्कुराती है?

उनकी बातों पर कोई ध्यान मत दो, मेरे बच्चे|
वे तुम्हारे गलत कामों की लंबी सूची बनाते हैं|


सबको मालूम है कि तुम्हें मीठी वस्तुएँ पसंद हैं- क्या इसीलिए वे तुम्हें
लालची कहते हैं?
अरे, भाई! तब वे हम जैसे लोगों को क्या कहेंगे, जो तुमसे प्यार करते हैं?

-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Defamation


Whey are those tears in your eyes, my child?
How horrid of them to be always scolding you for nothing!
You have stained your fingers and face with ink while writing-
is that why they call you dirty?
O, fie! Would they dare to call the full moon dirty because
it has smudged its face with ink?
For every little trifle they blame you, my child. They are
ready to find fault for nothing.
You tore your clothes while playing-is that why they call you
untidy?

O, fie! What would they call an autumn morning that smiles
through its ragged clouds?
Take no heed of what they say to you, my child.
They make a long list of your misdeeds.
Everybody knows how you love sweet things-is that why they
call you greedy?
O, fie! What then would they call us who love you?


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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शाश्वतता की कगार – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Brink Of Eternity’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


शाश्वतता की कगार


हताशा से भरा मैं बेचैन होकर उसको खोजता हूँ
अपने घर के हर कोने में;
लेकिन उसको नहीं खोज पाता|


मेरा घर छोटा सा है
और जो कुछ एक बार यहाँ से चला जाए, उसे फिर से नहीं पाया जा सकता|

परंतु तुम्हारी हवेली तो अनंत है मेरे प्रभु,
और उसको खोजता हुआ, मैं आया हूँ तुम्हारे द्वार पर|


मैं तुम्हारे सांध्य-आकाश की सुनहरी छतरी के नीचे खड़ा हूँ
और अपनी जिज्ञासु निगाहें तुम्हारे चेहरे की तरफ उठाता हूँ|

मैं शाश्वतता की कगार पर आ गया हूँ, जहां से कुछ भी नष्ट नहीं होता
—न कोई आशा, न खुशी, और न ही किसी चेहरे की झलक, आंसुओं के बीच से देखी गई|


ओह, मेरे रिक्त जीवन को उस समुद्र में डुबो दो,
इसको गहनतम पूर्णता में डूब जाने दो|
मुझको एक बार फिर, वह खो चुका मधुर स्पर्श महसूस करने दो,
ब्रह्माण्ड की समग्रता में|


-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-




Brink Of Eternity



In desperate hope I go and search for her
in all the corners of my room;
I find her not.

My house is small
and what once has gone from it can never be regained.


But infinite is thy mansion, my lord,
and seeking her I have to come to thy door.

I stand under the golden canopy of thine evening sky
and I lift my eager eyes to thy face.


I have come to the brink of eternity from which nothing can vanish
—no hope, no happiness, no vision of a face seen through tears.

Oh, dip my emptied life into that ocean,
plunge it into the deepest fullness.
Let me for once feel that lost sweet touch
in the allness of the universe.

-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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भिक्षुक हृदय – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Beggarly Heart’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


भिक्षुक हृदय


जब मेरा हृदय कठोर और शुष्क हो गया हो,
तब मेरे ऊपर दया की वृष्टि करते हुए आना|

जब जीवन से कृपा लुप्त हो गई हो,
तब एक गीत की गूंज के साथ आना|

जब काम की आपाधापी मुझे पूरी तरह, बाहरी जगत से काट दे,
तब मेरे पास आना, मौन के देवता, अपनी शांति और चैन के साथ|


जब मेरा भिक्षुक हृदय सिर झुकाकर बैठा हो, बंद कमरे के एक कोने में,
तब मेरे सम्राट, द्वार तोड़कर अंदर, एक सम्राट की आनबान के साथ आना|

जब कामनाएँ मुझे अंधा कर दें, मायाजाल और धूल फैलाकर, ओ मेरे पवित्र प्रभु,
सबको जागृत करने वाले, अपने प्रकाश और गर्जना के साथ आना|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-




Beggarly Heart


When the heart is hard and parched up,
come upon me with a shower of mercy.

When grace is lost from life,
come with a burst of song.

When tumultuous work raises its din on all sides shutting me out from
beyond, come to me, my lord of silence, with thy peace and rest.


When my beggarly heart sits crouched, shut up in a corner,
break open the door, my king, and come with the ceremony of a king.

When desire blinds the mind with delusion and dust, O thou holy one,
thou wakeful, come with thy light and thy thunder


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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कौन है यह – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Who Is This’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


कौन है यह

मैं अकेला ही निकला था, इस गुप्त भेंट के अपने मार्ग पर,
परंतु कौन है यह, जो इस शांत अंधेरे में मेरे पीछे-पीछे चला है?

मैं एक तरफ खिसक जाता हूं उसकी उपस्थिति से बचने के लिए, परंतु उससे बचने में सफल नहीं होता|

वह अपनी अकड़ भरी चाल के कारण धूल उड़ाता चलता है;
मैं जो भी शब्द बोलता हूँ, उसमें वह अपना भारी स्वर जोड़ देता है|


वह मेरा ही अपना लघु अहं है, मेरे प्रभु, उसे बिलकुल शर्म नहीं आती;
परंतु मैं शर्मिंदा हूँ, कि मैं आपके द्वार पर, उसको साथ लेकर आया|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Who Is This



I came out alone on my way to my tryst.
But who is this that follows me in the silent dark?

I move aside to avoid his presence but I escape him not.

He makes the dust rise from the earth with his swagger;
he adds his loud voice to every word that I utter.

He is my own little self, my lord, he knows no shame;
but I am ashamed to come to thy door in his company.



-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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पुष्प – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Flower’ का भावानुवाद-




गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


पुष्प


इस नन्हे पुष्प को शाख से चुन लो, देर न करो! कहीं ऐसा न हो
कि यह मुरझाकर धूल में गिर जाए|

संभव है कि आपके पुष्पहार में इसे स्थान न मिल पाए, परंतु अपने हाथों की पीड़ा के स्पर्श द्वारा
इसका सम्मान करो और इसे चुन लो| मुझे डर है कि मुझे जानकारी होने से पहले ही, ऐसा न हो कि दिन ढल जाए,
और पूजा में भेंट चढ़ाने का समय निकल जाए|.


भले ही इसका रंग अधिक गहरा न हो और गंध भी हल्की सी हो, परंतु अपनी सेवा में उपयोग करो इस पुष्प का
और समय निकल जाने से पहले ही, इसको शाख से चुन लो |



-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-





Flower



Pluck this little flower and take it, delay not! I fear lest it
droop and drop into the dust.

I may not find a place in thy garland, but honour it with a touch of
pain from thy hand and pluck it. I fear lest the day end before I am
aware, and the time of offering go by.


Though its colour be not deep and its smell be faint, use this flower
in thy service and pluck it while there is time.




-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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सुदूर काल – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Distant Time’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



सुदूर काल


मुझे नहीं मालूम कि किस सुदूर काल से
तुम आ रहे हो पास, मुझसे मिलने के लिए|
तुम्हारा सूरज और सितारे, कभी तुमको हमेशा के लिए मेरी दृष्टि से छिपा नहीं पाएंगे|

बहुत सी सुबहों को और शामों को, तुम्हारे कदमों की आहट सुनी गई है
तुम्हारा संदेशवाहक मेरे हृदय में पहुंचा है तथा मुझसे गुप्त मंत्रणा की है|


पता नहीं क्यों आज मेरा जीवन अतिरिक्त रूप से गतिशील है,
और मेरा हृदय आनंद से कंपायमान हो रहा है|

क्या मेरे लिए यहाँ अपना काम समेटने का समय आ गया है,
और मैं वायुमंडल में तुम्हारी मधुर उपस्थिति की सुगंध महसूस कर रहा हूँ|



-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-





Distant Time




I know not from what distant time
thou art ever coming nearer to meet me.
Thy sun and stars can never keep thee hidden from me for aye.

In many a morning and eve thy footsteps have been heard
and thy messenger has come within my heart and called me in secret.

I know not only why today my life is all astir,
and a feeling of tremulous joy is passing through my heart.


It is as if the time were come to wind up my work,
and I feel in the air a faint smell of thy sweet presence.




-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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Poetry

शुभाशीष- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Benediction’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



शुभाशीष



इस लघु प्राणी को आशीष दो, इस शुभ्र आत्मा को। जिसने जीता है स्वर्ग का चुंबन,
हमारी धरती के लिए|
उसे सूर्य के प्रकाश से प्रेम है, उसे अपनी माता की सूरत प्यारी
लगती है|
उसने न तो धूल को धिक्कारना सीखा है, और न स्वर्ण के पीछे
भागना|


उसे अपने हृदय से लगा लो और आशीष दो|
वह सैंकड़ों चौराहों वाले इस क्षेत्र में आया है|
मुझे नहीं मालूम कि भीड़ में उसने तुम्हें कैसे चुना, तुम्हारे द्वार पर आया,
और तुम्हारा हाथ थामा, अपना मार्ग जानने के लिए|


वो तुम्हारे पीछे चलेगा, हँसता और बतियाता, और उसके हृदय में कोई
संदेह नहीं होगा|
उसका विश्वास कायम रखो, उसको सीधा मार्ग बताओ और आशीष दो|


उसके सिर पर अपना हाथ रखो, और यह प्रार्थना करो कि यद्यपि नीचे
लहरें कठिन चुनौती दे रही हैं, परंतु ऊपर से हवा आ जाए, उसकी नौका की पाल को भर दे,
और उसको दिशा देते हुए, शांति के स्वर्ग में ले जाए|


जल्दबाजी में उसे भूल न जाना, उसे अपने हृदय से लगाना और
उसे आशीष देना|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-




Benediction



Bless this little heart, this white soul that has won the kiss of
heaven for our earth.
He loves the light of the sun, he loves the sight of his
mother’s face.
He has not learned to despise the dust, and to hanker after
gold.
Clasp him to your heart and bless him.
He has come into this land of an hundred cross-roads.
I know not how he chose you from the crowd, came to your door,
and grasped you hand to ask his way.
He will follow you, laughing the talking, and not a doubt in
his heart.
Keep his trust, lead him straight and bless him.
Lay your hand on his head, and pray that though the waves
underneath grow threatening, yet the breath from above may come and
fill his sails and waft him to the heaven of peace.
Forget him not in your hurry, let him come to your heart and
bless him.



-Rabindranath Tagore



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कागज़ की नावें- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Paper Boats’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



कागज़ की नावें!



प्रतिदिन मैं अपनी कागज की नावें, बहते जल की धारा में तैराता हूँ|
काले अक्षरों में, मैं उन पर लिखता हूँ, अपना और अपने गाँव का नाम |
मैं आशा करता हूँ कि किसी अजाने स्थान का व्यक्ति इन्हें देखेगा और जानेगा कि मैं कौन हूँ|


मैं इन नावों में अपनी बगिया में उगे शिउली के फूल भी लादता हूँ, और
आशा करता हूँ कि भोर के ये पुष्प सुरक्षित रूप से, रात्रि में किसी किनारे पहुँच जाएंगे|


मैं अपनी नावों को भेजता हूँ, और आकाश में देखता हूँ, कि छोटे-छोटे बादलों की
श्वेत उभरी हुई नौकाएँ यात्रा पर रवाना हो रही हैं|


मैं नहीं जानता कि मेरे खेल का कौन साथी, इनको हवा में तैरा देता है,
मेरी नावों के साथ दौड़ लगाने के लिए!


जब रात होती है, मैं अपना मुख, अपनी बाहों में ढक लेता हूँ, और स्वप्न देखता हूँ
कि कागज की नावें, मध्य रात्रि के सितारों पर और उनके नीचे तैर रही हैं|


उनमें बैठी निद्रा की परियाँ तैर रही हैं, और उनके साथ लदी हैं-
उनकी टोकरियाँ, स्वप्नों से भरी हुई|


-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-




Paper Boats



Day by day I float my paper boats one by one down the running
stream.
In bid black letters I write my name on them and the name of
the village where I live.
I hope that someone in some strange land will find them and
know who I am.
I load my little boats with shiuli flower from our garden, and
hope that these blooms of the dawn will be carried safely to land
in the night.
I launch my paper boats and look up into the sky and see the

little clouds setting thee white bulging sails.
I know not what playmate of mine in the sky sends them down
the air to race with my boats!
When night comes I bury my face in my arms and dream that my
paper boats float on and on under the midnight stars.
The fairies of sleep are sailing in them, and the lading ins
their baskets full of dreams.



-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
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मैं बेचैन हूँ- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Am Restless’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



मैं बेचैन हूँ!



मैं बेचैन हूँ, मुझमें गहन प्यास है, सुदूर स्थित वस्तुओं की|
मेरी आत्मा में तड़प है, अत्यधिक धुंधली दिखाई देती दूरी के घेरे को छूने की| हे विशाल सुदूर, अरी ओ बांसुरी की उत्साहित करने वाली धुन!
मैं भूल जाता हूँ, हमेशा भूल जाता हूँ, कि उड़ान के लिए मेरे पास पंख नहीं हैं, कि मैं हमेशा के लिए इस स्थल में बंद हूँ|

मैं इच्छुक हूँ और जागृत भी, मैं अजनबी हूँ, एक अजाने स्थान पर, तुम्हारा श्वास मुझ तक आता है, मुझे एक असंभव आशा की सूचना देते हुए|
तुम्हारी जिव्हा को मेरा हृदय, अपनी स्वयं की जिव्हा के रूप में जानता है|
अरे पहुँचने हेतु सुदूर, अरे बांसुरी की उत्साहित करने वाली धुन!
मैं भूल जाता हूँ, हमेशा भूल जाता हूँ, कि मुझे मार्ग नहीं मालूम है, कि मेरे पास कोई पंखों वाला घोड़ा नहीं है|

मैं उदासीन हूँ, मेरे हृदय में भटकाव है|
निस्तेज घड़ियों के धूपिया धुंधलके में, नीलाकाश में, आपका कैसा दर्शन आकार लेता है!
अरे सुदूर छोर, अरे बांसुरी की उत्साहित करने वाली धुन!
मैं भूल जाता हूँ, हमेशा भूल जाता हूँ, कि उस घर के दरवाजे- सभी तरफ से बंद हैं, जिसमें मैं अकेला रहता हूँ!



-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-





I Am Restless



I am restless. I am athirst for far-away things.
My soul goes out in a longing to touch the skirt of the dim distance.
O Great Beyond, O the keen call of thy flute!
I forget, I ever forget, that I have no wings to fly, that I am bound in this spot evermore.


I am eager and wakeful, I am a stranger in a strange land.
Thy breath comes to me whispering an impossible hope.
Thy tongue is known to my heart as its very own.
O Far-to-seek, O the keen call of thy flute!
I forget, I ever forget, that I know not the way, that I have not the winged horse.


I am listless, I am a wanderer in my heart.
In the sunny haze of the languid hours, what vast vision of thine takes shape in the blue of the sky!
O Farthest end, O the keen call of thy flute!
I forget, I ever forget, that the gates are shut everywhere in the house where I dwell alone!



-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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