कुछ नहीं पूछा -रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहराने का दिन है| प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Gardener Xiii: I asked Nothing ’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

माली- 13: मैंने कुछ नहीं पूछा

मैंने कुछ नहीं पूछा, बस खड़ा रहा
जंगल के किनारे, पेड़ के पीछे।
भोर की आंखों में उनींदापन था,
और हवा में , ओस बकाया थी।
गीली घास की सुस्त गंध
धरती के ऊपर पतली धुंध में टंगी थी।

वटवृक्ष के नीचे तुम अपने हाथों से
गाय को दुह रही थीं,
वे हाथ, जो स्वयं नवनीत की तरह ताजा और मुलायम हैं।
और मैं चुपचाप खड़ा था।
मैंने एक शब्द भी नहीं कहा,
ये तो वह चिड़िया थी, जिसने झाड़ी के पीछे से गीत गाया।


आम के वृक्ष से उसके बौर झर रहे थे,
गांव के पथ पर, और मधुमक्खियां
आईं, एक के बाद एक, गुनगुनाते हुए।
तालाब के एक तरफ, द्वार खुले-
शिव मंदिर के, और एक भक्त वहाँ
मंत्रपाठ करने लगा।

अपनी गोद में दूध का बर्तन लिए
तुम दुहती जा रही थीं, गाय को।
मैं अपना खाली पात्र लिए खड़ा रहा।
मैं तुम्हारे निकट नहीं आया।


मंदिर में घंटा-ध्वनि होने के साथ
आकाश जाग उठा।
मार्ग पर धूल उड़ने लगी
हाँके जा रहे मवेशियों के खुरों से।

अपनी कमर से कजल से भरी गगरियां सटाकर
नदी की ओर से लौटीं महिलाएं।

तुम्हारे कंगन निरंतर खनक रहे थे, और
दूध का झाग तुम्हारी गोद में रखे पात्र के ऊपर तक भर गया था।
सुबह आगे बढ़ती रही, और
मैं तुम्हारे पास नहीं आया।


रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

The Gardener Xiii: I asked Nothing

I asked nothing, only stood at the
edge of the wood behind the tree.
Languor was still upon the eyes
of the dawn, and the dew in the air.

The lazy smell of the damp grass
hung in the thin mist above the earth.
Under the banyan tree you were
milking the cow with your hands,
tender and fresh as butter.


And I was standing still.
I did not say a word. It was the
bird that sang unseen from the thicket.
The mango tree was shedding its
flowers upon the village road, and the
bees came humming one by one.

On the side of the pond the gate of
Shiva’s temple was opened and the
worshipper had begun his chants.
With the vessel on your lap you
were milking the cow.
I stood with my empty can.


I did not come near you.
The sky woke with the sound of
the gong at the temple.
The dust was raised in the road
from the hoofs of the driven cattle.
With the gurgling pitchers at their
hips, women came from the river.

Your bracelets were jingling, and
foam brimming over the jar.
The morning wore on and I did not
come near you.


Rabindranath Tagore

नमस्कार।

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मुझे मिले कुछ पुराने पत्र – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Found A Few Old Letters’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मुझे मिले कुछ पुराने पत्र

मुझे अपने कुछ पुराने पत्र मिले,
जो सावधानीपूर्वक तुम्हारे संदूक में छिपाकर रखे हुए थे—
कुछ छोटे खिलौने, तुम्हारे अपनी यादों से खेलने के लिए।
बहुत कातर हृदय से, तुमने प्रयास किया
चुराकर रखने का, इन नाज़ुक भावों को समय के उन थपेड़ों से-
जो उपग्रहों और सितारों को भी मिटा देते हैं,
और यह भी कहा, ‘ये केवल मेरे हैं, ओह !”
अब ऐसा कोई नहीं है, जो इन पर अपना दावा कर सके—
जो इनकी कीमत अदा कर सके, और ये अब भी यहाँ हैं।
क्या इस दुनिया में कहीं प्रेम नहीं बचा है,
जो तुम्हे इस घोर हानि से बचा सके,
तुम्हारे ऐसे प्रेम के बावज़ूद,
जिसने इन पत्रों को इतने जतन से सुरक्षित रखा?
ओ नारी, तुम मेरे पास एक क्षण के लिए आईं
और तुमने मुझे एक महिला के महान रहस्य से छू लिया,
कि इस सृष्टि में हृदय भी है—
वह नारी, जो ईश्वर को भी वापस लौटाती है,
उसी का अपना मधुरता वाला प्रवाह;
जो स्वयं में है अमर प्रेम और सौंदर्य और यौवन;
जो बुलबुले बनाती धाराओं में नृत्य करता है

और सुबह के प्रकाश में गाता है;
जो उत्तान तरंगों से धरती का पोषण करता है,
और जिसकी करुणा वर्षा के रूप में पिघलती है;
और जिसमें अविनाशी, उल्लास में दो भागों में बंट जाता है,
और इसके बाद, वे अपने आपको सीमित नहीं रख पाते
और प्रेम की पीड़ा में बह निकलते हैं।


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

I Found A Few Old Letters

I found a few old letters of mine carefully hidden in thy box—
a few small toys for thy memory to play with.
With a timorous heart thou didst try to steal
these trifles from the turbulent stream of time
which washes away planets and stars,
and didst say, “These are only mine!” Alas,
there is no one now who can claim them—
who is able to pay their price; yet they are still here.
Is there no love in this world to rescue thee from utter loss,
even like this love of thine that saved these letters with such fond care?
O woman, thou camest for a moment to my side
and touched me with the great mystery of the woman
that there is in the heart of creation—
she who ever gives back to God
his own outflow of sweetness;
who is the eternal love and beauty and youth;
who dances in bubbling streams and sings in the morning light;
who with heaving waves suckles the thirsty earth
and whose mercy melts in rain;
in whom the eternal one breaks in two in joy
that can contain itself no more and overflows in the pain of love.

Rabindranath Tagore


नमस्कार।
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मैं छः सेवक रखता हूँ – रुड्यार्ड किप्लिंग

फिर से मैं आज अपनी एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

आज, मैं विख्यात ब्रिटिश कवि रुड्यार्ड किप्लिंग की एक कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। श्री किप्लिंग एक ब्रिटिश कवि थे लेकिन उनका जन्म ब्रिटिश शासन के दौरान, मुम्बई में ही हुआ था। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Keep Six Honest’ का भावानुवाद-

मैं छः सेवक रखता हूँ

मैं अपने पास छः ईमानदार सेवक रखता हूँ
(मैं जो कुछ भी जानता हूँ, उन्होने ही मुझे सिखाया है);
उनके नाम हैं-‘क्या’ और ‘क्यों’ और ‘कब’,
तथा ‘कैसे’ और ‘कहाँ’ और ‘कौन’।
मैं उनको भेजता हूँ भूतल पर और समुद्र में,
में उनको भेजता हूँ पूर्व और पश्चिम में;
लेकिन मेरे लिए काम करने के बाद,
मैं उनको आराम करने देता हूँ।

मैं उनको नौ बजे से पांच बजे तक आराम करने देता हूँ,
क्योंकि तब मैं व्यस्त होता हूँ,
मैं उनको नाश्ता, भोजन और चाय भी दिलाता हूँ,
क्योंकि वे भूखे प्राणी हैं।
लेकिन इस बारे में अलग-अलग लोगों के, अलग विचार हैं;
मैं एक छोटी बच्ची को जानता हूँ-
उसके पास एक करोड़ सेवक हैं,
जिनको वह बिल्कुल आराम से नहीं बैठने देती!

वो उनको रवाना कर देती है अपने कामों के लिए विदेशों में,
जैसे ही उसकी आंखें खुलती हैं-
दस लाख ‘कैसे’, बीस लाख ‘कहाँ’,
और सत्तर लाख ‘क्यों’!

-Rudyard Kipling




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ

I Keep Six Honest

I keep six honest serving-men
(They taught me all I knew);
Their names are What and Why and When
And How and Where and Who.
I send them over land and sea,
I send them east and west;
But after they have worked for me,
I give them all a rest.
I let them rest from nine till five,
For I am busy then,
As well as breakfast, lunch, and tea,

For they are hungry men.
But different folk have different views;
I know a person small-
She keeps ten million serving-men,
Who get no rest at all!
She sends’em abroad on her own affairs,
From the second she opens her eyes-
One million Hows, two million Wheres,
And seven million Whys!
– Rudyard Kipling


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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मरण-मिलन (मृत्यु-विवाह)- रवींद्र नाथ ठाकुर

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर जी की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Maran-Milan (Death-Wedding)’ का भावानुवाद-




गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मरण-मिलन (मृत्यु-विवाह)

तुम इतनी मधुरता से क्यों बोलती हो, मृत्यु; हे मृत्यु,
रेंगकर मेरे पास आ जाती हो, मुझे इतना छिपकर देखती हो?
यह ऐसा व्यवहार नहीं है, जो किसी प्रेमी को करना चाहिए।
जब संध्या कुसुम अपने थके हुए तनों से झूल जाते हैं,
जब मवेशी खेतों से वापस लाए जाते हैं,
पूरा दिन चरने के बाद, तब तुम, हे मृत्यु,
मृत्यु, तुम बहुत सधे हुए कदमों से आती हो मेरे पास,
पूरी तरह स्थिर होकर मेरी बगल में बैठ जाती हो।
मैं समझ नहीं पाता हूँ, तुम जो कुछ कहती हो।

ओह, क्या इसी तरह तुम मुझे ले जाओगी, हे मृत्यु,
मृत्यु? एक चोर की तरह, गहरी नींद की स्थिति में,
जब तुम मेरी आंखों के रास्ते मेरे हृदय तक पहुंचोगी?
इस प्रकार क्या तुम अपनी चाल को मंद बनाए रखोगी,
मेरी नींद में- सुन्न पड़े रक्त में, तुम्हारी झनझनाती पायल की ध्वनि,
मेरे कानों में सुस्ती भरी कुलबुलाहट पैदा करती? क्या तुम मृत्यु ,
मृत्यु, मुझे अंततः लपेट लोगी तुम,
अपने ठंडे हाथों में, और ले जाओगी, जब मैं स्वप्न देख रहा होऊंगा?
मुझे नहीं मालूम क्यों तुम इस तरह आती हो और जाती हो।

मुझे बताओ, क्या तुम इसी तरह वरण करती हो, मृत्यु,
हे मृत्यु? अकस्मात, जब नहीं होता,
किसी उत्सव, अथवा आशीष या प्रार्थना का भार?
क्या तुम आओगी, अपने घने पीत केशों के साथ,
बिखरे हुए, फैले हुए, जिन पर कोई उजला मुकुट नहीं बांधा गया हो?
क्या, कोई तुम्हारी विजय पताका लेकर नहीं आएगा, तुम्हारे आने से पहले
अथवा जाने के बाद, कोई बत्तियां नहीं चमकेंगी,
जैसे लाल आंखें, नदी के साथ-साथ, मृत्यु, हे मृत्यु?
क्या तुम्हारे कदमों की आहट के आतंक से कोई भूकंप नहीं आएगा?

जब प्रखर नेत्रों वाले शिव आए थे, अपनी वधू को लेने के लिए,
तब जो धूमधाम और तामझाम हुए थे, उन्हें याद करो मृत्यु,
हे मृत्यु: उन्होंने जो शानदार बाघ की खाल पहनी थी;
उनका दहाड़ता बैल-नंदी; उनके बालों में,
फुफकारते नाग; बम-बम की आवाज जो वे अपने मुख से निकालते थे;
उनके गले में झूलती नरमुंडों की माला;
अचानक गूंजने वाला कर्कश संगीत, जब वह अपनी तुरही बजाते हैं,
अपने आगमन की सूचना देने के लिए- क्या यह नहीं था
एक बेहतर तरीका वरण करने का मृत्यु, हे मृत्यु?

और जैसे ही उस मृत्युनुमा विवाहोत्सव का कोलाहल
निकट आया, मृत्यु, हे मृत्यु, आनंद के अश्रु
गौरी की आंखों में भर गए, और उनके वक्ष पर लटकते गहने,
कांपने लगे; उनकी बाईं आंख फड़कने लगी और उनका हृदय
धड़कने लगा; उनका शरीर अतिरिक्त उल्लास से कंपायमान हो गया,
और उनका मन स्वयं के साथ दौड़ने लगा, मृत्यु, हे मृत्यु;
ऐसे दूल्हे के बारे में सोचकर उनकी मां ने चीत्कार किया और अपना सिर पीट लिया,
और उनके पिता ने यह मान लिया कि
कोई भयंकर आपदा आई है।

तुम क्यों हमेशा आती हो, एक चोर की तरह, मृत्यु, ओ मृत्यु,
हमेशा चुपचाप, रात के अंतिम छोर पर,
केवल आंसू शेष छोड़ते हुए ? मेरे पास आओ उत्सव के साथ,
समूची रात्रि को अपनी विजय गाथा गुनगुनाने दो,
अपनी विजय का शंख बजाओ, मुझे रक्तवर्णी चोगा पहनाओ,
मुझे अपनी बाहों में पकड़ो और दूर ले जाओ!
दूसरे क्या सोचेंगे इस पर ध्यान मत दो, मृत्यु,
हे मृत्यु, क्योंकि मैं अपनी मुक्त इच्छा से
तुम्हारे साथ रहूंगा, लेकिन मुझे गौरव के साथ ले जाओ।

अगर तुम आने पर देखो कि मैं अपने कमरे में,
काम में डूबा हूँ , मृत्यु, हे मृत्यु तब तुम,
मेरे व्यस्त होने की पूरी तरह अनदेखी कर देना,
अगर मैं सोया हुआ हूँ, अपने बिस्तर पर
अपनी अभिलाशाओं का, सपने के रूप में आनंद लेते हुए, या झूठ बोलता हूँ,
और मेरे हृदय और आंखों में उदासीनता झलकती है,
अगर मैं नींद और जागृति के बीच झूला झूल रहा हूँ,
तब अपने शंख में अपनी विध्वंसक श्वांस भरो और उसे बजाओ,
मृत्यु, हे मृत्यु, और मैं दौड़कर तुम्हारे पास आ जाऊंगा।

जहाँ तुमने नाव का लंगर डाला हुआ है,
मृत्यु, हे मृत्यु, उस समुद्र तक, जहाँ हवा लुढ़का रही है,
अंधकार को अनंत से लेकर, मेरी तरफ,
मुझे सुदूर आकाश में काले बादल जमा होते दिखाई दे सकते हैं
आकाश के उत्तर-पूर्वी किनारे पर; तड़ित के
आग उगलते सर्प, अपने फन उठाकर लहरा सकते हैं,
परंतु मैं किसी आधार हीन भय के कारण बच-निकलने का प्रयास नहीं करूंगा-
मैं आगे बढूंगा शांति के साथ, अडिग भाव से,
लाल तूफान वाले समुद्र पर, मृत्यु, हे मृत्यु।

रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Maran-Milan (Death-Wedding)

Why do you speak so softly, Death, Death,
Creep upon me, watch me so stealthily?
This is not how a lover should behave.
When evening flowers droop upon their tired
Stems, when cattle are brought in from the fields
After a whole day’s grazing, you, Death,
Death, approach me with such gentle steps,
Settle yourself immovably by my side.
I cannot understand the things you say.

Alas, will this be how you will take me, Death,
Death? Like a thief, laying heavy sleep
On my eyes as you descend to my heart?
Will you thus let your tread be a slow beat
In my sleep-numbed blood, your jingling ankle-bells
A drowsy rumble in my ear? Will you, Death,
Death, wrap me, finally, in your cold
Arms and carry me away while I dream?
I do not know why you thus come and go.

Tell me, is this the way you wed, Death,
Death? Unceremonially, with no
Weight of sacrament or blessing or prayer?
Will you come with your massy tawny hair
Unkempt, unbound into a bright coil-crown?
Will no one bear your victory-flag before
Or after, will no torches glow like red
Eyes along the river, Death, Death?
Will earth not quake in terror at your step?

When fierce-eyed Siva came to take his bride,
Remember all the pomp and trappings, Death,
Death: the flapping tiger-skins he wore;
His roaring bull; the serpents hissing round
His hair; the bom-bom sound as he slapped his cheeks;
The necklace of skulls swinging round his neck;
The sudden raucous music as he blew
His horn to announce his coming – was this not
A better way of wedding, Death, Death?

And as that deathly wedding-party’s din
Grew nearer, Death, Death, tears of joy
Filled Gauri’s eyes and the garments at her breast
Quivered; her left eye fluttered and her heart
Pounded; her body quailed with thrilled delight
And her mind ran away with itself, Death, Death;
Her mother wailed and smote her head at the thought
Of receiving so wild a groom; and in his mind
Her father agreed calamity had struck.

Why must you always come like a thief, Death,
Death, always silently, at night’s end,
Leaving only tears? Come to me festively,
Make the whole night ring with your triumph, blow
Your victory-conch, dress me in blood-red robes,
Grasp me by the hand and sweep me away!
Pay no heed to what others may think, Death,
Death, for I shall of my own free will
Resort to you if you but take me gloriously.

If I am immersed in work in my room
When you arrive, Death, Death, then break
My work, thrust my unreadiness aside.
If I am sleeping, sinking all desires
In the dreamy pleasure of my bed, or I lie
With apathy gripping my heart and my eyes
Flickering between sleep and waking, fill
Your conch with your destructive breath and blow,
Death, Death, and I shall run to you.

I shall go to where your boat is moored,
Death, Death, to the sea where the wind rolls
Darkness towards me from infinity.
I may see black clouds massing in the far
North-east corner of the sky; fiery snakes
Of lightning may rear up with their hoods raised,
But I shall not flinch in unfounded fear –
I shall pass silently, unswervingly
Across that red storm-sea, Death, Death.

Rabindranath Tagore

नमस्कार।

मेरी पराश्रितता – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘माई डिपेंडेंस’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मेरी पराश्रितता

मुझे पसंद है पराश्रित रहना, और हमेशा रहना
जिसमें मेरी मां का दुलार और देखभाल शामिल हो,
मेरे पिता हों , प्रेम करने, चूमने और गले लगाने के लिए,
और मैं जीवन को खुशी तथा संपूर्ण मोहकता के साथ जिऊं।

मुझे पसंद है पराश्रित रहना, और ऐसा रहना
अपने संबंधियों पर, जिससे वे मुझ पर बरसाते रहें
अपने कठोर और मृदुल परामर्श, शिकायतें,
पूर्ण चकित भाव, सत्य और सूचनाओं के भंडार।

मुझे पसंद है पराश्रित रहना, और हमेशा रहना
अपने मित्रों पर, गपशप और मेरे पास रहने की इच्छा के लिए,
घरेलू, पारिवारिक और रोमांटिक युक्तियां सुझाने के लिए,
सहकर्मी भी मेरा मार्गदर्शन करें, जोखिमों का सामना करने के लिए।

मुझे पसंद है पराश्रित रहना, और हमेशा रहना
अपने पड़ौसियों पर भी, जो कभी-कभी मुझसे ईर्ष्या करें,
जब मेरा भाग्य मुझे ऊंचाइयों पर ले जाए, और वे सुनें
प्रतिदिन मेरे उठते कदमों की आहट, सरल और कठिन स्थितियों में भी।



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

My Dependence

I like to be dependent, and so for ever
with warmth and care of my mother
my father , to love, kiss and embrace
wear life happily in all their grace.

I like to be dependent, and so for ever
on my kith and kin, for they all shower
harsh and warm advices, complaints
full wondering ,true and info giants.

I like to be dependent, and so for ever
for my friends, chat and want me near
with domestic,family and romantic tips
colleagues as well , guide me work at risks.

I like to be dependent, and so for ever
for my neighbours too, envy at times
when at my rise of fortune like to hear
my daily steps , easy and odd things too.

Rabindranath Tagore


नमस्कार।

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रवींद्रनाथ ठाकुर- वसंत का एक दिन

आज फिर से मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट प्रस्तुत कर रहा हूँ|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘वन डे इन स्प्रिंग’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

वसंत का एक दिन
वसंत के मौसम में एक दिन, एक महिला
मेरे एकाकी वनों में आई,
वह प्रेयसी के अति सुंदर रूप में आई-
मुझे सौंपने के लिए मेरे गीत, मेरी प्यारी धुनें,
मेरे स्वप्नों को, मिठास प्रदान करने के लिए,
अचानक एक तूफानी लहर आई,
उसने मेरे हृदय के किनारों ध्वस्त कर दिया,
और सभी भाषाओं को डुबो दिया।

मेरे होठों पर कोई नाम नहीं आया,
वह पेड़ के नीचे खड़ी थी, वह घूमी,
मेरे चेहरे की तरफ देखा, जो दर्द से उदास दिख रहा था,
वह तेज कदमों से आगे बढ़ी, और मेरे पास बैठ गई।
उसने मेरे हाथों को अपने हाथों में लिया, फिर वह बोली:
‘न तुम मुझे जानते हो और न मैं तुमको-
मुझे आश्चर्य है कि ऐसा कैसे हो सकता है?’
मैंने कहा:
‘हम दोनो मिलकर बना सकते हैं, हमेशा के लिए एक पुल
दो प्राणियों के बीच, जो एक-दूसरे से अनजान हैं,
यह उत्कंठापूर्ण अजूबा, सभी के दिल में शामिल है।’

मेरे दिल का जो क्रंदन है, वही उसके दिल का भी है;
जिस धागे से वह मुझे बांधती है, वही उसे भी बांधता है।
उसको मैंने हर जगह पाना चाहा है,
उसकी मैंने अपने भीतर पूजा की है,
उसी पूजा के भीतर छिपे रहते हुए ही, उसने भी मुझे पाना चाहा है।

विशाल समुद्रों को पार करते हुए, वह आई मेरा दिल चुराने के लिए।
जिसे वह वापस लौटाना भूल गई, क्योंकि उसने अपना खो दिया था।
उसका अपना सौंदर्य ही, उसको धोखा दे गया था,
वह अपना जाल फैलाती है, और यह नहीं जानती
कि वह इसमें किसी को पकड़ेगी, या खुद पकड़ी जाएगी।



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

One Day In Spring


One day in spring, a woman came
In my lonely woods,
In the lovely form of the Beloved.
Came, to give to my songs, melodies,
To give to my dreams, sweetness.
Suddenly a wild wave
Broke over my heart’s shores
And drowned all language.

To my lips no name came,
She stood beneath the tree, turned,
Glanced at my face, made sad with pain,
And with quick steps, came and sat by me.
Taking my hands in hers, she said:
‘You do not know me, nor I you-
I wonder how this could be?’
I said:
‘We two shall build, a bridge for ever
Between two beings, each to the other unknown,
This eager wonder is at the heart of things.’

The cry that is in my heart is also the cry of her heart;
The thread with which she binds me binds her too.
Her have I sought everywhere,
Her have I worshipped within me,
Hidden in that worship she has sought me too.

Crossing the wide oceans, she came to steal my heart.
She forgot to return, having lost her own.
Her own charms play traitor to her,
She spreads her net, knowing not
Whether she will catch or be caught.

Rabindranath Tagore


नमस्कार।

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बादल और लहरें – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘क्लॉउड्स एंड वेव्स’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

बादल और लहरें

सुनो मां, बादलों में रहने वाले दोस्त मुझे बुलाते हैं-
“सुबह हमारे जागने के समय से दिन के अंत तक, हम साथ खेलते हैं।
हम सुनहरी भोर के साथ खेलते हैं, हम खेलते हैं- चमकीले चांद के साथ।”
मैं उनसे पूछता हूँ, “लेकिन मैं तुम्हारे पास कैसे आ सकता हूँ?”
उनका जवाब होता है, “धरती के किनारे पर आ जाओ, अपने हाथ ऊपर उठाओ-
आकाश की तरफ, और तुम बादलों में पहुंचा दिए जाओगे।“
“मेरी मां घर पर मेरी प्रतीक्षा कर रही है”, मैं कहता हूँ,”मैं उसे छोड़कर
कैसे आ सकता हूँ?”
ये सुनकर वे मुस्कुराते हैं, और तैरकर दूर चले जाते हैं।
परंतु मां, मैं उससे भी अच्छा एक खेल जानता हूँ।
मैं बादल बन जाऊंगा और तुम चांद बनोगी।
मैं तुमको अपने दोनों हाथों से ढक लूंगा, और हमारे घर की छत
नीला आकाश बन जाएगी।
लहरों में रहने वाले दोस्त मुझे बुलाते हैं-
“हम सुबह से रात तक गाते रहते हैं; आगे और आगे हम सैर करते रहते हैं, और हम नहीं जानते
कि हम कहाँ से होकर जा रहे हैं।
मैं पूछता हूँ, “लेकिन मैं तुम्हारे बीच कैसे आ सकता हूँ?”
वे मुझे बताते हैं, “समुद्र के किनारे आओ और अपनी आंखें बंद करके खड़े रहो
और लहरें तुम्हे अपने ऊपर बिठाकर लेकर आ जाएंगी।”
मैं कहता हूँ, “मेरी मां घर पर है, वह चाहती है कि मैं हर समय उसके साथ रहूं-
मैं उसको छोड़कर कैसे जा सकता हूँ?”
वे मुस्कुराते हैं और नाचते हुए आगे बढ़ जाते हैं।
परंतु मुझे इससे ज्यादा अच्छा खेल मालूम है,
मैं लहरें बन जाऊंगा और तुम एक अजाना किनारा बनोगी।
मैं बल खाता हुआ आगे बढ़ता जाऊंगा, तुम्हारी गोदी में आकर ठहाका मारकर हंसूगा,
और दुनिया में कोई नहीं जान पाएगा कि हम दोनों कहाँ हैं।


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Clouds And Waves


Rabindranath Tagore

Mother, the folk who live up in the clouds call out to me-
“We play from the time we wake till the day ends.
We play with the golden dawn, we play with the silver moon.”
I ask, “But how am I to get up to you ?”
They answer, “Come to the edge of the earth, lift up your
hands to the sky, and you will be taken up into the clouds.”
“My mother is waiting for me at home, “I say, “How can I leave
her and come?”
Then they smile and float away.
But I know a nicer game than that, mother.
I shall be the cloud and you the moon.
I shall cover you with both my hands, and our house-top will
be the blue sky.
The folk who live in the waves call out to me-
“We sing from morning till night; on and on we travel and know
not where we pass.”
I ask, “But how am I to join you?”
They tell me, “Come to the edge of the shore and stand with
your eyes tight shut, and you will be carried out upon the waves.”
I say, “My mother always wants me at home in the everything-
how can I leave her and go?”
They smile, dance and pass by.
But I know a better game than that.
I will be the waves and you will be a strange shore.
I shall roll on and on and on, and break upon your lap with laughter.
And no one in the world will know where we both are.


नमस्कार।
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रवीन्द्रनाथ ठाकुर – बादल और लहरें

एक बार फिर बारी है पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने की|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘क्लॉउड्स एंड वेव्स’ का भावानुवाद-



गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

बादल और लहरें

सुनो मां, बादलों में रहने वाले दोस्त मुझे बुलाते हैं-
“सुबह हमारे जागने के समय से दिन के अंत तक, हम साथ खेलते हैं।

हम सुनहरी भोर के साथ खेलते हैं, हम खेलते हैं- चमकीले चांद के साथ।”

मैं उनसे पूछता हूँ, “लेकिन मैं तुम्हारे पास कैसे आ सकता हूँ?”
उनका जवाब होता है, “धरती के किनारे पर आ जाओ, अपने हाथ ऊपर उठाओ-
आकाश की तरफ, और तुम बादलों में पहुंचा दिए जाओगे।“

“मेरी मां घर पर मेरी प्रतीक्षा कर रही है”, मैं कहता हूँ,”मैं उसे छोड़कर
कैसे आ सकता हूँ?”
ये सुनकर वे मुस्कुराते हैं, और तैरकर दूर चले जाते हैं।

परंतु मां, मैं उससे भी अच्छा एक खेल जानता हूँ।
मैं बादल बन जाऊंगा और तुम चांद बनोगी।
मैं तुमको अपने दोनों हाथों से ढक लूंगा, और हमारे घर की छत
नीला आकाश बन जाएगी।

लहरों में रहने वाले दोस्त मुझे बुलाते हैं-
“हम सुबह से रात तक गाते रहते हैं; आगे और आगे हम सैर करते रहते हैं, और हम नहीं जानते
कि हम कहाँ से होकर जा रहे हैं।

मैं पूछता हूँ, “लेकिन मैं तुम्हारे बीच कैसे आ सकता हूँ?”
वे मुझे बताते हैं, “समुद्र के किनारे आओ और अपनी आंखें बंद करके खड़े रहो
और लहरें तुम्हे अपने ऊपर बिठाकर लेकर आ जाएंगी।”

मैं कहता हूँ, “मेरी मां घर पर है, वह चाहती है कि मैं हर समय उसके साथ रहूं-
मैं उसको छोड़कर कैसे जा सकता हूँ?”
वे मुस्कुराते हैं और नाचते हुए आगे बढ़ जाते हैं।

परंतु मुझे इससे ज्यादा अच्छा खेल मालूम है,
मैं लहरें बन जाऊंगा और तुम एक अजाना किनारा बनोगी।
मैं बल खाता हुआ आगे बढ़ता जाऊंगा, तुम्हारी गोदी में आकर ठहाका मारकर हंसूगा,
और दुनिया में कोई नहीं जान पाएगा कि हम दोनों कहाँ हैं।

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Clouds And Waves

Rabindranath Tagore

Mother, the folk who live up in the clouds call out to me-
“We play from the time we wake till the day ends.
We play with the golden dawn, we play with the silver moon.”
I ask, “But how am I to get up to you ?”

They answer, “Come to the edge of the earth, lift up your
hands to the sky, and you will be taken up into the clouds.”
“My mother is waiting for me at home, “I say, “How can I leave
her and come?”
Then they smile and float away.

But I know a nicer game than that, mother.
I shall be the cloud and you the moon.
I shall cover you with both my hands, and our house-top will
be the blue sky.

The folk who live in the waves call out to me-
“We sing from morning till night; on and on we travel and know
not where we pass.”
I ask, “But how am I to join you?”

They tell me, “Come to the edge of the shore and stand with
your eyes tight shut, and you will be carried out upon the waves.”
I say, “My mother always wants me at home in the everything-
how can I leave her and go?”
They smile, dance and pass by.

But I know a better game than that.
I will be the waves and you will be a strange shore.
I shall roll on and on and on, and break upon your lap with laughter.
And no one in the world will know where we both are.

नमस्कार।

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गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता- व्यापारी

एक बार फिर मैं आज एक पुरानी पोस्ट शेयर कर रहा हूँ| लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘दा मर्चेंट’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

व्यापारी

कल्पना करो मां, कि तुम घर पर रहती हो और मैं यात्रा करता हूँ,
अजाने प्रदेशों की।

कल्पना करो कि मेरी नाव तैयार है, रवाना होने को, पूरी तरह सामान से लदी हुई।
अब ठीक से सोचो मां, इससे पहले कि तुम मुझसे कहो, कि मैं वापस आते समय
तुम्हारे लिए क्या लेकर आऊं।

मां, क्या तुम चाहती हो सोने की अनेकों ढेरियां?
वहाँ, सुनहरी धाराओं के किनारों पर, खेत
सुनहरी फसलों से भरे पड़े हैं।

और वन-मार्ग के छायादार रास्तों में, सुनहरे चंपा के फूल
भूमि पर गिरते रहते हैं।

मैं उनको सैंकड़ों टोकरियों में भरकर तुम्हारे लिए लाऊंगा।
मां, क्या तुम पतझड़ में गिरने वाली बूंदों जैसे बड़े-बड़े मोती पाना चाहती हो?

मैं मोतियों वाले द्वीप का किनारा पार करूंगा,.
वहाँ प्रभात के समय, घास मैदान में फूलों पर, हल्के से मोती कंपकपाते हैं
ये मोती घास पर गिर जाते हैं, और मोती बिखरे रहते हैं,
समुद्र की बेकाबू लहरों के निकट, रेत में छितराए हुए।
मेरा भाई के पास, एक जोड़ी पंख वाले घोड़े होंगे,
उड़ने के लिए-. बादलों के बीच।

पिताजी के लिए मैं ऐसी जादुई कलम लाऊंगा, जो स्वयं ही लिखेगी।
और तुम्हारे लिए मां, मुझे अवश्य लानी चाहिए, गहनों की ऐसी संदूकची,
जिसकी कीमत, सात राजाओं को अपना राजपाट देकर चुकानी पड़े।




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

The Merchant


Rabindranath Tagore


Imagine, mother, that you are to stay at home and I am to travel into strange lands.
Imagine that my boat is ready at the landing fully laden.
Now think well, mother, before you say what I shall bring for
you when I come back.
Mother, do you want heaps and heaps of gold?
There, by the banks of golden streams, fields are full of
golden harvest.
And in the shade of the forest path the golden champ flower
drop on the ground.

I will gather them all for you in many hundred baskets.
Mother, do you want pearls big as the raindrops of autumn?
I shall cross to the pearl island shore.
There in the early morning light pearls tremble on the meadow
flowers, pearls drop on the grass, and pearls are scattered on the
sand in spray by the wild sea-waves.
My brother shall have a pair of horses with wings to fly among
the clouds.
For father I shall bring a magic pen that, without his
knowing, will write of itself.

For you, mother, I must have the casket and jewel that cost
seven kings their kingdom.



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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भ्रमण पिपासा – गेराल्ड गॉल्ड



आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर करने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक पुरानी पोस्ट|

भ्रमण, यायावरी और यदि धार्मिक उद्देश्य जोड़ दें तो यह पवित्र होकर तीर्थ यात्रा बन जाता है।
जी हाँ, आज गेराल्ड गॉल्ड की अंग्रेजी कविता ‘Wander thirst‘ याद आ रही है, जो मुझे बचपन से ही बहुत प्रिय रही है।

आज मैं यहाँ उसका यथासंभव हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करने का भी प्रयास कर रहा हूँ-

भ्रमण पिपासा


पूरब में जहाँ सूरज उगता है, उसके पार; और पश्चिम में समुद्र के भी पार
और पूरब और पश्चिम में मेरी भ्रमण पिपासा, नहीं रहने देगी मुझे चैन से,
ये मेरे भीतर पागलपन के झोंके की तरह मचलती है, उकसाती है मुझे- अलविदा कहने को,
क्योंकि मुझे बुलाते रहते हैं- समुद्र, गगन के सितारे और हाँ आकाश भी तो पुकारता है!

मुझे नहीं पता कि वह जो श्वेत मार्ग दिखता है, वह कहाँ है, और कहाँ हैं नीली पहाड़ियां,
परंतु सूर्य को मित्र बना सकता है मनुष्य, और सितारे को अपना मार्गदर्शक,
और जब एक बार पुकार सुनाई दे जाती है, तब यायावरी की कोई सीमा नहीं बांधी जा सकती,
क्योंकि नदियां बुलाती हैं, सड़कें बुलाती हैं, और हाँ पक्षी भी तो बुलाता है!

वहाँ, जहाँ लंबा क्षितिज पसरा है, और वहीं रहता है दिन-रात,
बूढ़े जलयान घर की ओर लौटते हैं, जबकि युवा जलयान और दूर बढ़ जाते हैं,
लौट सकता हूँ मैं , लेकिन मैं जाऊंगा अवश्य, और यदि लोग आपसे पूछें कि क्यों,
तो आप पूरा दोष डाल दें सितारों पर और सूरज पर,
और उस सुदूर श्वेत मार्ग पर, आसमान पर।


इस हिंदी अनुवाद के साथ ही मूल अंग्रेजी रचना भी प्रस्तुत है:-


Wander-thirst

Beyond the east the sunrise; Beyond the west the sea
And East and West the Wander-Thirst that will not let me be;
It works in me like madness to bid me say goodbye,
For the seas call, and the stars call, and oh! The call of the sky!
I know not where the white road runs, nor what the blue hills are,
But a man can have the sun for friend, and for his guide, a star;
And there’s no end to voyaging when once the voice is heard,
For the rivers call, and the road calls, and oh! The call of a bird!
Yonder the long horizon lies, and there by night and day
The old ships draw to home again, the young ships sail away
And come I may, but go I must, and if men ask you why,
You may put the blame on the stars and the sun,
And the white road and the sky.

– Gerald Gould

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार

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