नींद चुराने वाली- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Sleep stealer’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

नींद चुराने वाली!

किसने नींद चुराई, मेरे शिशु की आंखों से? मुझे जानना है।
अपनी कमर से मटका सटाकर मां जाती है पानी भरने
गांव में पास के एक कुएं से।
यह समय था दोपहर का। बच्चों के खेलने का समय जा चुका है;
तालाब में बत्तखें शांत हो गई हैं।
भेड़ चराने वाले बच्चे, वटवृक्ष की छाया में सो गए हैं।
सारस पक्षी अभी भी गंभीर मुद्रा में आम्र-कुंज के निकट दलदल में रुका है।

इस बीच नींद चुराने वाली आई और बच्चे की आंखों से नींद चुराकर उड़ गई।
जब मां वापस आई, उसने बच्चे को पूरे कमरे में इधर से उधर घूमते पाया।
किसने नींद चुराई, मेरे शिशु की आंखों से? मुझे जानना है। मैं उस शैतान महिला को खोजूंगी और जंजीर से बांध दूंगी।

मुझे उस अंधियारी गुफा के भीतर देखना है, जहाँ विशाल चट्टानों और लुढ़कते पत्थरों के बीच से, जल की एक पतली सी धारा निकलती है।
मुझे बकुला कुंज की ऊंघती छाया में खोजना होगा,
जहाँ कपोत अपने निश्चित कोनों में बैठे गुटर-गूं करते हैं,
और जहाँ तारों भरी रात की शांति में परियों की पायल चमकती हैं।

संध्या वेला में, मैं बांस के जंगल की फुसफुसाती शांति में झांकूंगी,
जहाँ जुगनू अपना प्रकाश लुटाते रहते हैं, और पूछूंगी, हर प्राणी से
जो भी मुझे मिलेगा, ”क्या कोई मुझे बता सकता है, नींद चुराने वाली कहाँ रहती है?”

किसने चुराई है मेरे शिशु की आंखों से नींद? मुझे अवश्य जानना है।
अगर मैं उसे पकड़ पाऊं, तो क्या मैं उसे अच्छा सबक नहीं सिखाऊंगी! मैं उसके घौंसले में धावा बोलूंगी, जहाँ वह चुराई हुई नींदों का संग्रह करती है!
मैं यह पूरा भंडार लूट लूंगी, और अपने घर ले जाऊंगी।

मैं उसके दोनों पंख कसकर बांध दूंगी, और उसे नदी के किनारे बिठा दूंगी,
और फिर उसके हाथ में बंसी देकर, जल प्रपात और नीलकमल वाले क्षेत्र में, उसे मछलियों के साथ खेलने का मौका दूंगी,
जब शाम के समय बाजार बंद हो जाएगा,
और गांव के बच्चे, अपनी माताओं की गोद में बैठे होंगे,
तब रात के पक्षी, उपहास करते हुए उसके कानों में फुसफुसाएंगे:
“अब तुम किसकी नींद चुराती हो?”

-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Sleep Stealer

Who stole sleep from baby’s eyes? I must know.
Clasping her pitcher to her waist mother went to fetch water
from the village near by.
It was noon. The children’s playtime was over; the ducks in
the pond were silent.
The shepherd boy lay asleep under the shadow of the banyan
tree.
The crane stood grave and still in the swamp near the mango
grove.
In the meanwhile the Sleep-stealer came and, snatching sleep
from baby’s eyes, flew away.
When mother came back she found baby travelling the room over
on all fours.
Who stole sleep from our baby’s eyes? I must know. I must find
her and chain her up.
I must look into that dark cave, where, through boulders and
scowling stones, trickles a tiny stream.
I must search in the drowsy shade of the bakula grove, where
pigeons coo in their corner, and fairies’ anklets tinkle in the
stillness of starry nights.
In the evening I will peep into the whispering silence of the
bamboo forest, where fireflies squander their light, and will ask
every creature I meet, “Can anybody tell me where the Sleep-stealer
lives?”
Who stole sleep from baby’s eyes? I must know.
Shouldn’t I give her a good lesson if I could only catch her!
I would raid her nest and see where she hoards all her stolen
sleep.
I would plunder it all, and carry it home.
I would bind her two wings securely, set her on the bank of
the river, and then let her play at fishing with a reed among the
rushes and water-lilies.
When the marketing is over in the evening, and the village
children sit in their mothers’ laps, then the night birds will
mockingly din her ears with:
“Whose sleep will you steal now?”

-Rabindranath Tagore

नमस्कार।
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प्रतीक्षा- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर करने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक पुरानी पोस्ट|
आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ।

लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Waiting’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

प्रतीक्षा

जो गीत गाने के लिए मैं यहाँ आया था
वह आज तक नहीं गाया गया है।
मैंने अपने सभी दिन बिता दिए हैं
अपने वाद्य यंत्र पर तार चढ़ाने और उतारने में।
सही समय नहीं आया है,
और न शब्द ठीक से सजाए गए हैं;
केवल मेरे हृदय में व्यथा बनी रही है
कामनाएं करने की…
मैंने उसका चेहरा नहीं देखा है,
न उसकी आवाज को सुना है;
केवल मैंने उसकी सधी हुई पदचाप सुनी है
मेरे घर के सामने वाले मार्ग से
परंतु अभी दीप भी नहीं जलाया गया है
और मैं उसे अपने घर के भीतर नहीं बुला सकता;
उससे मिलने की आस में जीवित हूँ मैं;
परंतु यह मिलन अभी नहीं हुआ है।
-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Waiting

The song I came to sing
remains unsung to this day.
I have spent my days in stringing
and in unstringing my instrument.
The time has not come true,
the words have not been rightly set.
only there is the agony
of wishing in my heart
I have not seen his face,
nor have I listened to his voice.
only I have heard his gentle footsteps
from the road before my house
But the lamp has not been lit
and I cannot ask him into my house.
I live in the hope of meeting with him.
but this meeting is not yet.

-Rabindranath Tagore


नमस्कार
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मैंने समुद्र में अपना जाल फेंका!

आज पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Cast My Net Into The Sea’ का भावानुवाद-



गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मैंने समुद्र में अपना जाल फेंका

प्रातःकाल मैंने समुद्र में अपना जाल फेंका।
मैंने उस अंधेरे समुद्रतल से ऐसी अनोखे स्वरूप और दिव्य सौंदर्य वाली वस्तुएं घसीटकर निकालीं- जिनमें से कुछ चमकती थीं, मुस्कान की तरह, कुछ झिलमिला रही थीं – अश्रुओं की तरह, और कुछ दमक रही थीं, नववधू के कपोलों की तरह।

दिन भर में एकत्रित बोझ के साथ, जब मैं अपने घर गया, मेरी प्रेयसी बगीचे में अकेली बैठी, फूल की पंखुड़ियां नोच रही थी।
मैं संकोचवश एक क्षण के लिए ठिठक गया, और फिर मैंने वह संग्रह, जो घसीटकर लाया था, वह उसके कदमों में डाल दिया, और शांत खड़ा हो गया।
उसने उन पर एक निगाह डाली और बोली, ‘ये क्या अजीब चीजें हैं? मुझे नहीं मालूम कि ये किस काम आती हैं!’

मैंने शर्म से सिर झुका लिया और सोचा, ‘ मैंने इनके लिए संघर्ष नहीं किया है, बाजार से खरीदा भी नहीं इनको, ये सब उसको देने के लिए उचित उपहार नहीं हैं।’
और फिर पूरी रात, मैं उनको एक-एक करके मार्ग पर फेंकता रहा।
सुबह हुई, बहुत से यात्री उधर से निकले, उन्होंने उनको उठाया और अपने साथ दूर-दराज के देशों में ले गए।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

I Cast My Net Into The Sea


In the morning I cast my net into the sea.
I dragged up from the dark abyss things of strange aspect and strange beauty — some shone like a smile, some glistened like tears, and some were flushed like the cheeks of a bride.
When with the day’s burden I went home, my love was sitting in the garden idly tearing the leaves of a flower.
I hesitated for a moment, and then placed at her feet all that I had dragged up, and stood silent.
She glanced at them and said, ‘What strange things are these? I know not of what use they are!’
I bowed my head in shame and thought, ‘I have not fought for these, I did not buy them in the market; they are not fit gifts for her.’
Then the whole night through I flung them one by one into the street.
In the morning travellers came; they picked them up and carried them into far countries.

-Rabindranath Tagore

नमस्कार।
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अडिग- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Unyielding’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

अडिग

जब मैंने तुम्हें, तुम्हारे बगीचे में बुलाया,
बौर आ चुके आमों में लुभावने वाली गंध आ रही थी-
तब भी तुम क्यों इतनी दूर रहीं,
अपने द्वार तुमने इतना कसकर बंद रखे?
बौर आने के बाद वे फलों के गुच्छों में बदल गए-
तुमने मेरे हाथों में भरे फलों को अस्वीकार कर दिया,
और अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं।.

बैसाख माह के भयंकर, प्रबल तूफानों के बीच,
सुनहरे पके फल शाखाओं से टूटकर नीचे गिर पड़े,
मैंने कहा, ऐसे प्रसाद को धूल अशुद्ध कर देती है:
अपने हाथों को इनके लिए स्वर्ग बन जाने दो’,
तुमने फिर भी कोई मैत्री भाव नहीं दिखाया।

संध्या के समय तुम्हारे द्वार पर कोई दीप नहीं जला था,
घनघोर अंधेरा था, जब मैंने अपनी वीणा बजाई।
किस प्रकार सितारों की रोशनी ने, मेरे हृदय के तारों को झंकृत किया!
किस प्रकार मैंने अपनी वीणा को नृत्य में लीन कर दिया!
पर तुमने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

उदास पक्षी सोये नहीं, चहकते रहे,
अपने साथियों को पुकारते, पुकारते।
हमारे मिलन का सही समय निकल जाने के बाद-
नीचे पहुंच गया चांद, जबकि तुम अभी भी मान कर रही थीं,
और चांद अपनी एकांत समाधि में डूब गया।

कौन दूसरे को समझ सकता है !
हृदय अपने आवेग पर काबू नहीं कर पाता।
मुझे आशा थी कि कुछ बची हुई
आंसुओं में डूबी यादें, तुम्हे विचलित कर देंगी,
तुम्हारे एहसास को झकझोर कर सहज बना देंगी।

रात्रि के धुंधला रहे कंठहार की पकड़ ढीली होते-होते चांद, ,
धीरे-धीरे सुबह के कदमों पर गिर पड़ा।
जब तुम सो रही थीं, तब क्या मेरी वीणा ने
अपनी हृदय की पीड़ा से, तुम्हें थपकियां दी थीं? कम से कमतुमने
आनंद भरे स्वप्न ही देखे थे क्या?

रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Unyielding

When I called you in your garden
Mango blooms were rich in fragrance –
Why did you remain so distant,
Keep your doors so tightly fastened?
Blossoms grew to ripe fruit-clusters –
Your rejected my cuppded handfuls,
Closed your eyes to perfectness.

In the fierce harsh storms of Baisakh,
Golden ripened fruit fell tumbling.
‘Dust, I said, ‘defiles such offerings:
Let your hands be heaven to them.’
Still you showed no friendliness.

Lampless were your doors at evening,
Pitch-black as I played my vina.
How the starlight twanged my heartstrings!
How I set my vina dancing!
You showed no responsiveness.

Sad birds twittered sleeplessly,
Calling, calling lost companions.
Gone the right time for our union –
Low the moon while still you brooded,
Sunk in lonely pensiveness.

Who can understand another!
Heart cannot restrain its passion.
I had hoped that some remaining
Tear-soaked memories would sway you,
Stir your feet to lightsomeness.

Moon fell at the feet of morning,
Loosened from the night’s fading necklace.
While you slept, O did my Vina
Lull you with its heartache? Did you
Dream at least of happiness?

-Rabindranath Tagore

नमस्कार।


चंपा का फूल- रवींद्र नाथ ठाकुर


आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|
आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Champa Flower’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

चंपा का फूल

कल्पना करो कि मैं, बस ऐसे ही आनंद लेने के लिए-
चंपा का फूल बन जाता, और किसी वृक्ष की ऊंची शाखा पर खिलता,
और हवा के साथ, मुक्त हंसी के साथ हिलता, और
नई-नई निकली कोंपलों के ऊपर नृत्य करता,
तब क्या तुम मुझे पहचान पातीं मां?

तुम आवाज लगातीं, “बच्चे, कहाँ हो तुम?”
और मैं भीतर ही भीतर हंसता और चुप रहता।
मैं चालाकी से अपनी पंखुड़ियां खोलता,
और तुम्हे काम में लगे हुए देखता।

जब तुम स्नान करने के बाद,
गीले केश अपने कंधों पर बिखराए हुए,
चंपा वृक्ष की छाया में चलते हुए, छोटे से आंगन में आतीं,
जहाँ तुम अपनी प्रातः वंदना करती हो,
तुम इस पुष्प की गंध तो महसूस करतीं,
परंतु नहीं जान पातीं, कि यह गंध मुझसे आ रही है।

और जब दोपहर के भोजन के बाद,
तुम खिड़की के पास बैठकर-
रामायण पढ़ोगी, और वृक्ष की छाया तुम्हारे केशों और आंचल पर पड़ेगी,
मैं अपनी छोटी सी छाया उस पृष्ठ पर, ठीक वहाँ डालूंगा, जहाँ तुम पढ़ रही होवोगी,
लेकिन क्या तुम पहचान पाओगी कि यह तुम्हारे बच्चे की नन्ही सी छाया है?
और जब संध्या वेला में, जब तुम अपने हाथ में जलता दीपक लेकर
गाय के अहाते में जाओगी, तब मैं अचानक धरती पर कूद जाऊंगा
और फिर से तुम्हारा बच्चा बन जाऊंगा, और तुमसे कहूंगा
कि मुझे तुम कहानी सुनाओ।
“कहाँ थे तुम अब तक, मेरे शैतान बच्चे?” तुम कहोगी,
“मैं तुमको नहीं बताऊंगा, मां”
यही है जो तुमको और मुझको उस समय करना चाहिए।


रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

The Champa Flower

Supposing I became a chanpa flower,
just for fun, and grew on a
branch high up that tree, and shook
in the wind with laughter and
danced upon the newly budded leaves,
would you know me, mother?
You would call, “Baby, where are you?”
and I should laugh to
myself and keep quite quiet.
I should slyly open my petals
and watch you at your work.
When after your bath, with wet hair
spread on your shoulders,
you walked through the shadow
of the champa tree to the little court
where you say your prayers,
you would notice the scent of the
flower, but not know that it cane from me.
When after the midday meal you sat at the window reading
ramayana, and the tree’s shadow
fell over your hair and your lap,
I should fling my wee little shadow
on to the page of your book,
just where you were reading.
But would you guess that it was
the tiny shadow of your
little child?
When in the evening you went
to the cow shed with the lighted
lamp in your hand I should
suddenly drop on to the earth again and
be your own baby once more,
and beg you to tell me a story.
“Where have you been, you naughty child?”
“I won’t tell you, mother.”
That’s what you and I would say
then.

Rabindranath Tagore

नमस्कार|
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इतना सा मेरापन!

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Little Of Me’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

इतना सा मेरापन!


मुझमें इतना सा मेरापन रह जाने दो,
कि जिसके बाद मैं, अपने समूचे अस्तित्व को तुम्हारा नाम दे सकूं।

मेरी इच्छा को इतना भर रह जाने दो,
जिससे कि मैं हर तरफ तुमको ही महसूस करूं,
और मैं हर मामले में तुम्हारे पास ही पहुंचू,
और हर क्षण तुमको ही अपना प्रेम समर्पित करूं।

मुझमें, मेरा ‘मैं’ इतना कम रह जाने दो,
कि मैं कभी तुमको न छुपाऊं,
मुझसे बंधी अपनी डोर को इतना छोटा कर दो,
कि मैं तुम्हारी इच्छा से बंधा रहूँ,
और मेरा जीवन, तुम्हारे उद्देश्यों की पूर्ति का माध्यम बने-

और यह तुम्हारे प्रेम की ही डोर हो।


रवींद्रनाथ ठाकुर




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



Little Of Me


Let only that little be left of me
whereby I may name thee my all.

Let only that little be left of my will
whereby I may feel thee on every side,
and come to thee in everything,
and offer to thee my love every moment.

Let only that little be left of me
whereby I may never hide thee.
Let only that little of my fetters be left
whereby I am bound with thy will,
and thy purpose is carried out in my life—

and that is the fetter of thy love.

Rabindranath Tagore



नमस्कार।

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सुनहरी नाव!

आज बारी है एक पुरानी पोस्ट को दोहराने की, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Golden Boat’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

सुनहरी नाव
आकाश में बादल गरज रहे हैं, जो लबालब भरे हैं वर्षा जल से,
और मैं बैठा हूँ नदी किनारे, उदास और एकाकी।
खेत में ढेरियां बनी हैं, फसल कट चुकी है,
नदी उफन रही है और उसका बहाव बहुत तेज है,
जैसे ही हमने धान की कटाई की, वर्षा प्रारंभ हो गई।

छोटा सा धान का खेत, कोई और नहीं, बस अकेला मैं –
हर तरफ बाढ़ का पानी उमड़ता-घुमड़ता हुआ,
दूर किनारे पर खड़े पेड़, जैसे स्याही के धब्बे हों,
जो गांव की गहरी भूरी सुबह के चित्र पर अंकित हों।
और इस तरफ धान का एक खेत, और कोई नहीं, बस अकेला मैं।

कौन है वह महिला, जो नाव पर किनारे की तरफ आ रही है,
गीत गा रही है? मुझे लगता है कि वह मेरी जानी-पहचानी है।
नौका काफी भरी हुई है, वह आगे गौर से देख रही है,
लहरें लाचार होकर नाव से दोनो तरफ टकराती हैं।
मैं ध्यान से देखता हूँ और महसूस करता हूँ, कि मैंने उसे पहले देखा है।

ओह, कौन सी विदेशी भूमि तक तुम नौकायन करती हो?
किनारे पर आओ, और अपनी नौका में कुछ क्षण के लिए लंगर डाल दो।
वहाँ जाओ, जहाँ तुम जाना चाहती हो, वहीं सामान दो, जहाँ देना चाहो,
परंतु कुछ क्षण के लिए किनारे पर आओ, अपनी मुस्कान बिखेरो-
और जब नौका लेकर जाओ, तब मेरा धान भी साथ ले जाओ।

ले जाओ इसे, जितना भी तुम नौका में लाद सकती हो,
क्या और भी है? नहीं और नहीं है, मैंने पूरा लाद दिया है।
मेरी घनघोर मेहनत, यहाँ नदी के किनारे-
मैंने इसे सबको त्याग दिया है, तह के ऊपर तह बिछाकर,
और अब मुझे भी ले जाओ, इतनी दया करो, मुझे भी अपनी नाव में ले जाओ।.

जगह नहीं है, कोई जगह नहीं, नाव बहुत छोटी है,
मेरे सुनहरे धान से लदी हुई, नाव पूरी तरह भर गई है।
दूर-दूर तक बारिश के बीच –आकाश में बादल, हाँफते हुए इधर-उधर हो रहे हैं,
नदी के निर्जन किनारे पर- मैं अकेला रह जाता हूँ-
जो कुछ था, वह चला गया: सुनहरी नाव सब लेकर चली गई।

रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


The Golden Boat

Clouds rumbling in the sky; teeming rain.
I sit on the river bank, sad and alone.
The sheaves lie gathered, harvest has ended,
The river is swollen and fierce in its flow.
As we cut the paddy it started to rain.

One small paddy-field, no one but me –
Flood-waters twisting and swirling everywhere.
Trees on the far bank; smear shadows like ink
On a village painted on deep morning grey.
On this side a paddy-field, no one but me.


Who is this, steering close to the shore
Singing? I feel that she is someone I know.
The sails are filled wide, she gazes ahead,
Waves break helplessly against the boat each side.
I watch and feel I have seen her face before.

Oh to what foreign land do you sail?
Come to the bank and moor your boat for a while.
Go where you want to, give where you care to,
But come to the bank a moment, show your smile –
Take away my golden paddy when you sail.


Take it, take as much as you can load.
Is there more? No, none, I have put it aboard.
My intense labour here by the river –
I have parted with it all, layer upon layer;
Now take me as well, be kind, take me aboard.


No room, no room, the boat is too small.
Loaded with my gold paddy, the boat is full.
Across the
rain-sky clouds heave to and fro,
On the bare river-bank, I remain alone –
What had has gone: the golden boat took all.

Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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कुछ नहीं पूछा -रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहराने का दिन है| प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Gardener Xiii: I asked Nothing ’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

माली- 13: मैंने कुछ नहीं पूछा

मैंने कुछ नहीं पूछा, बस खड़ा रहा
जंगल के किनारे, पेड़ के पीछे।
भोर की आंखों में उनींदापन था,
और हवा में , ओस बकाया थी।
गीली घास की सुस्त गंध
धरती के ऊपर पतली धुंध में टंगी थी।

वटवृक्ष के नीचे तुम अपने हाथों से
गाय को दुह रही थीं,
वे हाथ, जो स्वयं नवनीत की तरह ताजा और मुलायम हैं।
और मैं चुपचाप खड़ा था।
मैंने एक शब्द भी नहीं कहा,
ये तो वह चिड़िया थी, जिसने झाड़ी के पीछे से गीत गाया।


आम के वृक्ष से उसके बौर झर रहे थे,
गांव के पथ पर, और मधुमक्खियां
आईं, एक के बाद एक, गुनगुनाते हुए।
तालाब के एक तरफ, द्वार खुले-
शिव मंदिर के, और एक भक्त वहाँ
मंत्रपाठ करने लगा।

अपनी गोद में दूध का बर्तन लिए
तुम दुहती जा रही थीं, गाय को।
मैं अपना खाली पात्र लिए खड़ा रहा।
मैं तुम्हारे निकट नहीं आया।


मंदिर में घंटा-ध्वनि होने के साथ
आकाश जाग उठा।
मार्ग पर धूल उड़ने लगी
हाँके जा रहे मवेशियों के खुरों से।

अपनी कमर से कजल से भरी गगरियां सटाकर
नदी की ओर से लौटीं महिलाएं।

तुम्हारे कंगन निरंतर खनक रहे थे, और
दूध का झाग तुम्हारी गोद में रखे पात्र के ऊपर तक भर गया था।
सुबह आगे बढ़ती रही, और
मैं तुम्हारे पास नहीं आया।


रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

The Gardener Xiii: I asked Nothing

I asked nothing, only stood at the
edge of the wood behind the tree.
Languor was still upon the eyes
of the dawn, and the dew in the air.

The lazy smell of the damp grass
hung in the thin mist above the earth.
Under the banyan tree you were
milking the cow with your hands,
tender and fresh as butter.


And I was standing still.
I did not say a word. It was the
bird that sang unseen from the thicket.
The mango tree was shedding its
flowers upon the village road, and the
bees came humming one by one.

On the side of the pond the gate of
Shiva’s temple was opened and the
worshipper had begun his chants.
With the vessel on your lap you
were milking the cow.
I stood with my empty can.


I did not come near you.
The sky woke with the sound of
the gong at the temple.
The dust was raised in the road
from the hoofs of the driven cattle.
With the gurgling pitchers at their
hips, women came from the river.

Your bracelets were jingling, and
foam brimming over the jar.
The morning wore on and I did not
come near you.


Rabindranath Tagore

नमस्कार।

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मुझे मिले कुछ पुराने पत्र – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Found A Few Old Letters’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मुझे मिले कुछ पुराने पत्र

मुझे अपने कुछ पुराने पत्र मिले,
जो सावधानीपूर्वक तुम्हारे संदूक में छिपाकर रखे हुए थे—
कुछ छोटे खिलौने, तुम्हारे अपनी यादों से खेलने के लिए।
बहुत कातर हृदय से, तुमने प्रयास किया
चुराकर रखने का, इन नाज़ुक भावों को समय के उन थपेड़ों से-
जो उपग्रहों और सितारों को भी मिटा देते हैं,
और यह भी कहा, ‘ये केवल मेरे हैं, ओह !”
अब ऐसा कोई नहीं है, जो इन पर अपना दावा कर सके—
जो इनकी कीमत अदा कर सके, और ये अब भी यहाँ हैं।
क्या इस दुनिया में कहीं प्रेम नहीं बचा है,
जो तुम्हे इस घोर हानि से बचा सके,
तुम्हारे ऐसे प्रेम के बावज़ूद,
जिसने इन पत्रों को इतने जतन से सुरक्षित रखा?
ओ नारी, तुम मेरे पास एक क्षण के लिए आईं
और तुमने मुझे एक महिला के महान रहस्य से छू लिया,
कि इस सृष्टि में हृदय भी है—
वह नारी, जो ईश्वर को भी वापस लौटाती है,
उसी का अपना मधुरता वाला प्रवाह;
जो स्वयं में है अमर प्रेम और सौंदर्य और यौवन;
जो बुलबुले बनाती धाराओं में नृत्य करता है

और सुबह के प्रकाश में गाता है;
जो उत्तान तरंगों से धरती का पोषण करता है,
और जिसकी करुणा वर्षा के रूप में पिघलती है;
और जिसमें अविनाशी, उल्लास में दो भागों में बंट जाता है,
और इसके बाद, वे अपने आपको सीमित नहीं रख पाते
और प्रेम की पीड़ा में बह निकलते हैं।


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

I Found A Few Old Letters

I found a few old letters of mine carefully hidden in thy box—
a few small toys for thy memory to play with.
With a timorous heart thou didst try to steal
these trifles from the turbulent stream of time
which washes away planets and stars,
and didst say, “These are only mine!” Alas,
there is no one now who can claim them—
who is able to pay their price; yet they are still here.
Is there no love in this world to rescue thee from utter loss,
even like this love of thine that saved these letters with such fond care?
O woman, thou camest for a moment to my side
and touched me with the great mystery of the woman
that there is in the heart of creation—
she who ever gives back to God
his own outflow of sweetness;
who is the eternal love and beauty and youth;
who dances in bubbling streams and sings in the morning light;
who with heaving waves suckles the thirsty earth
and whose mercy melts in rain;
in whom the eternal one breaks in two in joy
that can contain itself no more and overflows in the pain of love.

Rabindranath Tagore


नमस्कार।
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मैं छः सेवक रखता हूँ – रुड्यार्ड किप्लिंग

फिर से मैं आज अपनी एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

आज, मैं विख्यात ब्रिटिश कवि रुड्यार्ड किप्लिंग की एक कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। श्री किप्लिंग एक ब्रिटिश कवि थे लेकिन उनका जन्म ब्रिटिश शासन के दौरान, मुम्बई में ही हुआ था। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Keep Six Honest’ का भावानुवाद-

मैं छः सेवक रखता हूँ

मैं अपने पास छः ईमानदार सेवक रखता हूँ
(मैं जो कुछ भी जानता हूँ, उन्होने ही मुझे सिखाया है);
उनके नाम हैं-‘क्या’ और ‘क्यों’ और ‘कब’,
तथा ‘कैसे’ और ‘कहाँ’ और ‘कौन’।
मैं उनको भेजता हूँ भूतल पर और समुद्र में,
में उनको भेजता हूँ पूर्व और पश्चिम में;
लेकिन मेरे लिए काम करने के बाद,
मैं उनको आराम करने देता हूँ।

मैं उनको नौ बजे से पांच बजे तक आराम करने देता हूँ,
क्योंकि तब मैं व्यस्त होता हूँ,
मैं उनको नाश्ता, भोजन और चाय भी दिलाता हूँ,
क्योंकि वे भूखे प्राणी हैं।
लेकिन इस बारे में अलग-अलग लोगों के, अलग विचार हैं;
मैं एक छोटी बच्ची को जानता हूँ-
उसके पास एक करोड़ सेवक हैं,
जिनको वह बिल्कुल आराम से नहीं बैठने देती!

वो उनको रवाना कर देती है अपने कामों के लिए विदेशों में,
जैसे ही उसकी आंखें खुलती हैं-
दस लाख ‘कैसे’, बीस लाख ‘कहाँ’,
और सत्तर लाख ‘क्यों’!

-Rudyard Kipling




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ

I Keep Six Honest

I keep six honest serving-men
(They taught me all I knew);
Their names are What and Why and When
And How and Where and Who.
I send them over land and sea,
I send them east and west;
But after they have worked for me,
I give them all a rest.
I let them rest from nine till five,
For I am busy then,
As well as breakfast, lunch, and tea,

For they are hungry men.
But different folk have different views;
I know a person small-
She keeps ten million serving-men,
Who get no rest at all!
She sends’em abroad on her own affairs,
From the second she opens her eyes-
One million Hows, two million Wheres,
And seven million Whys!
– Rudyard Kipling


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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