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खेल का मेरा साथी- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘My Playmate’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

My Playmate!



अब मेरे मुख से , कोई शोर भरे स्वर नहीं निकलेंगे, ऐसी है मेरे स्वामी की इच्छा| अब मैं केवल धीमे स्वर में ही बात करूंगा|
मेरे हृदय की ध्वनि, किसी गीत को गुनगुनाने में ही अभिव्यक्त होगी| लोग तेज़ी से आगे बढ़ते हैं, राजा के बाजार की तरफ, सभी विक्रेता और खरीदार वहाँ हैं| परंतु मुझे असमय ही दूर जाना है, भरी दोपहरी में, कार्य की व्यस्तता के बीच|
चलो फिर पुष्पों को मेरे बगीचे में खिलने दो, यद्यपि ये उनके खिलने का समय नहीं है, और दोपहरी में मधुमक्खियों को अपनी सुस्त धुन में गुनगुनाने दो|
मैंने कितने ही घंटे बिताए हैं, अच्छे और बुरे की पहचान करने में, परंतु अब मेरे पास आनंद है, जब खाली दिनों में मेरे खेल का साथी, मेरे हृदय को अपनी ओर खींचता है, मुझे नहीं मालूम कि अचानक आया यह बुलावा, किस निरर्थक असंगति के लिए है!


-रवींद्रनाथ ठाकुर




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


My Playmate




No more noisy, loud words from me, such is my master’s will. Henceforth I deal in whispers. The speech of my heart will be carried on in murmurings of a song.
Men hasten to the King’s market. All the buyers and sellers are there. But I have my untimely leave in the middle of the day, in the thick of work.
Let then the flowers come out in my garden, though it is not their time, and let the midday bees strike up their lazy hum.
Full many an hour have I spent in the strife of the good and the evil, but now it is the pleasure of my playmate of the empty days to draw my heart on to him, and I know not why is this sudden call to what useless inconsequence!




-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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स्वतन्त्रता- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Freedom’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

स्वतंत्रता!

भय से मुक्ति ही वह स्वतंत्रता है
जिसकी मैं अपनी मातृभूमि के लिए मैं मांग करता हूँ!
युगों-युगों के उस भार से मुक्ति, जो आपके शीश को झुकाता है,
आपकी कमर तोड़ता है, आपकी आँखों को भविष्य की मांग दर्शाते संकेत
देखने में असफल बना देता है;
निद्रा के बंधनों से मुक्ति, जहां आप स्वयं को रात्रि की
निश्‍चलता के बंधनों को सौंप देते हो,
उस सितारे पर अविश्वास करते हुए, जो सत्य के साहसिक पथ और
प्रारब्ध की अराजकता से मुक्ति के बारे मे बताता है,
सभी नौकाएँ कमजोर होकर दिशाहीन अनिश्चित हवाओं के हवाले हो जाती हैं,
और ऐसे हाथ में पड़ जाती हैं जो सदा मृत्यु की तरह कठोर और ठंडे रहते हैं|
कठपुतलियों की दुनिया में रहने के अपमान से मुक्ति,
जहां सभी गतिविधियां मस्तिष्कहीन तारों के माध्यम से प्रारंभ होती हैं,
और फिर जड़बुद्धि आदतों के माध्यम से दोहराई जाती हैं,
जहां आकृतियाँ धैर्य और आज्ञाकारिता के साथ,
प्रदर्शन के स्वामी की प्रतीक्षा करते हैं,
कि वह उनको हिला-डुलाकर जीवन स्वांग प्रस्तुत करे|


-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Freedom

Freedom from fear is the freedom
I claim for you my motherland!
Freedom from the burden of the ages, bending your head,
breaking your back, blinding your eyes to the beckoning
call of the future;
Freedom from the shackles of slumber wherewith
you fasten yourself in night’s stillness,
mistrusting the star that speaks of truth’s adventurous paths;
freedom from the anarchy of destiny
whole sails are weakly yielded to the blind uncertain winds,
and the helm to a hand ever rigid and cold as death.
Freedom from the insult of dwelling in a puppet’s world,
where movements are started through brainless wires,
repeated through mindless habits,
where figures wait with patience and obedience for the
master of show,
to be stirred into a mimicry of life.



-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जहां मन में नहीं है कोई भय- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Where The Mind Is Without Fear’ का भावानुवाद-
गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


जहां मन में नहीं है कोई भय!


जहां मन भयमुक्त है, और मस्तक ऊंचा है गर्व से,
जहां ज्ञान मुक्त है,
जहां दुनिया छोटे-छोटे टुकड़ों में नहीं बंट गई है,
दुनियादारी की संकीर्ण दीवारों से,
जहां शब्द उभरकर आते हैं, सच्चाई की गहराई से,
जहां अथक परिश्रम फैलाता है अपनी बाँहें, परिपूर्णता की ओर,
जहां तर्क की निर्मल धारा, ने नहीं खो दिया है अपना रास्ता
मृत आदतों के सुनसान रेगिस्तान में,
जहां मस्तिष्क को सदा आप मार्ग दिखाते हो मेरे प्रभु,
निरंतर विस्तारित होते, चिंतन और क्रियाशीलता में,
स्वतंत्रता के उस स्वर्ग में, मेरे प्रभु, मेरे राष्ट्र को जागृत होने दो|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



Where The Mind Is Without Fear

Where the mind is without fear and the head is held high
Where knowledge is free
Where the world has not been broken up into fragments
By narrow domestic walls
Where words come out from the depth of truth
Where tireless striving stretches its arms towards perfection
Where the clear stream of reason has not lost its way
Into the dreary desert sand of dead habit
Where the mind is led forward by thee
Into ever-widening thought and action
Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.




-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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गीतांजलि-1 रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है।

आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Gitanjali-1’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

गीतांजलि-1




तुमने मुझे अनंत बना दिया है, मेरे प्रभु, ऐसी है तुम्हारी प्रसन्नता| यह कमजोर सा पात्र, मेरा शरीर, आप इसे बार-बार भरते हो, बार-बार खाली करते हो, और फिर-फिर भर देते हो, ताज़ा जीवन से|

यह छोटी सी बांस की बांसुरी, तुम इसे साथ लेकर घूमे हो, पहाड़ों पर और घाटियों में, और इसके भीतर फूंकी हैं, ऐसी धुनें जो सदा नूतन और शाश्वत हैं|


तुम्हारे हाथों का अमर स्पर्श पाकर, मेरा छोटा सा हृदय आनंद की सारी सीमाएं भूल जाता है, और अनेक अनकही बातें कह डालता है|

तुम्हारे अनंत उपहार मेरे पास, मेरे इन छोटे-छोटे हाथों में ही आते हैं| युग बीत गए हैं, और अब भी उंडेलते जा रहे हो तुम अपनी करुणा, और अभी भी यहाँ जगह है, और भरने के लिए
|

-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Gitanjali – 1


Thou hast made me endless, such is thy pleasure. This frail vessel thou emptiest again and again, and fillest it ever with fresh life.

This little flute of a reed thou hast carried over hills and dales, and hast breathed through it melodies eternally new.

At the immortal touch of thy hands my little heart loses its limits in joy and gives birth to utterance ineffable.

Thy infinite gifts come to me only on these very small hands of mine. Ages pass, and still thou pourest, and still there is room to fill.




-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मेरे मित्र- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता ‘Entertainment Times’ by TOI द्वारा ऑनलाइन शेयर की गई कुछ कविताओं से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Friend’का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


मेरे मित्र


क्या तुम परदेस में हो, इस तूफानी रात में
प्रेम मार्ग पर अपनी यात्रा में मेरे दोस्त?
आकाश कराह रहा है, मानो निराश हो|


मेरी आँखों में आज रात नींद नहीं है|
बार-बार द्वार खोलकर बाहर देखती हूँ
घनघोर अंधेरे को, मेरे दोस्त!


मुझे अपने सामने कुछ दिखाई नहीं देता|
कहाँ गया वह तुम्हारा मार्ग!


पता नहीं स्याह काली नदी के किस धुंधले किनारे तुम चल रहे हो,
डरावने जंगलों के किस सुदूर छोर पर,
उदासी के किसी उलझे हुए जाल से होकर तुम तय कर रहे हो,
मेरे पास आने के लिए अपना रास्ता, मेरे मित्र?


-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Friend



Art thou abroad on this stormy night
on thy journey of love, my friend?
The sky groans like one in despair.


I have no sleep tonight.
Ever and again I open my door and look out on
the darkness, my friend!


I can see nothing before me.
I wonder where lies thy path!


By what dim shore of the ink-black river,
by what far edge of the frowning forest,
through what mazy depth of gloom art thou threading
thy course to come to me, my friend?


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मुझे शक्ति दो – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Give Me Strength’का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मुझे शक्ति दो


मेरी आपसे प्रार्थना है, मेरे प्रभु—आघात करो,
आघात करो मेरे हृदय के भीतर दरिद्रता के आधार पर|

मुझे शक्ति दो कि मैं, सहजता से अपनी खुशियों और दुखों को सह सकूँ|

मुझे शक्ति दो कि मैं, अपने प्रेम को सेवा के लिए कारगर बना सकूँ|

मुझे शक्ति दो कि मैं न तो किसी निर्धन को अकेला छोड़ दूँ, और न किसी शक्तिशाली अभद्र के सामने घुटने टेकूं|


मुझे शक्ति दो कि मैं अपने मन को प्रतिदिन आने वाले छोटे विचारों से, बहुत ऊपर उठा सकूँ|

और मुझे यह साहस भी दो कि मैं अपनी शक्ति को प्रेम के साथ, आपके समक्ष समर्पित कर सकूँ|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Give Me Strength

This is my prayer to thee, my lord—strike,
strike at the root of penury in my heart.

Give me the strength lightly to bear my joys and sorrows.

Give me the strength to make my love fruitful in service.


Give me the strength never to disown the poor or bend my knees before insolent might.

Give me the strength to raise my mind high above daily trifles.

And give me the strength to surrender my strength to thy will with love.


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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मानहानि – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Defamation’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


मानहानि


तुम्हारी आँखों में ये अश्रु क्यों हैं, मेरे बच्चे?
यह उनका कितना भीषण कृत्य है, बिना कारण तुमको हमेशा डांटना!
तुमने लिखते समय स्याही से अपना चेहरा और उँगलियाँ रंग लीं –
क्या इस कारण ही वे तुमको गंदा बोलते हैं?


अरे, धत्त! क्या वे पूर्ण चंद्रमा को भी गंदा कहेंगे क्योंकि
उसने भी अपने चेहरे पर स्याही से धब्बा लगा लिया है?
हर मामूली गलती के लिए वे तुम्हें दोष देते हैं, मेरे बच्चे| वे बिना कारण
गलतियाँ ढूँढने के लिए तैयार रहते हैं|


खेलते समय तुम्हारे कपड़े फट गए, तो वे तुम्हें गंदा कहते हैं?
अरे, धत्त! वे शरद ऋतु की ऐसी सुबह को क्या कहेंगे, जो अपने
चिथड़े हुए बादलों के बीच से मुस्कुराती है?

उनकी बातों पर कोई ध्यान मत दो, मेरे बच्चे|
वे तुम्हारे गलत कामों की लंबी सूची बनाते हैं|


सबको मालूम है कि तुम्हें मीठी वस्तुएँ पसंद हैं- क्या इसीलिए वे तुम्हें
लालची कहते हैं?
अरे, भाई! तब वे हम जैसे लोगों को क्या कहेंगे, जो तुमसे प्यार करते हैं?

-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Defamation


Whey are those tears in your eyes, my child?
How horrid of them to be always scolding you for nothing!
You have stained your fingers and face with ink while writing-
is that why they call you dirty?
O, fie! Would they dare to call the full moon dirty because
it has smudged its face with ink?
For every little trifle they blame you, my child. They are
ready to find fault for nothing.
You tore your clothes while playing-is that why they call you
untidy?

O, fie! What would they call an autumn morning that smiles
through its ragged clouds?
Take no heed of what they say to you, my child.
They make a long list of your misdeeds.
Everybody knows how you love sweet things-is that why they
call you greedy?
O, fie! What then would they call us who love you?


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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शाश्वतता की कगार – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Brink Of Eternity’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


शाश्वतता की कगार


हताशा से भरा मैं बेचैन होकर उसको खोजता हूँ
अपने घर के हर कोने में;
लेकिन उसको नहीं खोज पाता|


मेरा घर छोटा सा है
और जो कुछ एक बार यहाँ से चला जाए, उसे फिर से नहीं पाया जा सकता|

परंतु तुम्हारी हवेली तो अनंत है मेरे प्रभु,
और उसको खोजता हुआ, मैं आया हूँ तुम्हारे द्वार पर|


मैं तुम्हारे सांध्य-आकाश की सुनहरी छतरी के नीचे खड़ा हूँ
और अपनी जिज्ञासु निगाहें तुम्हारे चेहरे की तरफ उठाता हूँ|

मैं शाश्वतता की कगार पर आ गया हूँ, जहां से कुछ भी नष्ट नहीं होता
—न कोई आशा, न खुशी, और न ही किसी चेहरे की झलक, आंसुओं के बीच से देखी गई|


ओह, मेरे रिक्त जीवन को उस समुद्र में डुबो दो,
इसको गहनतम पूर्णता में डूब जाने दो|
मुझको एक बार फिर, वह खो चुका मधुर स्पर्श महसूस करने दो,
ब्रह्माण्ड की समग्रता में|


-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-




Brink Of Eternity



In desperate hope I go and search for her
in all the corners of my room;
I find her not.

My house is small
and what once has gone from it can never be regained.


But infinite is thy mansion, my lord,
and seeking her I have to come to thy door.

I stand under the golden canopy of thine evening sky
and I lift my eager eyes to thy face.


I have come to the brink of eternity from which nothing can vanish
—no hope, no happiness, no vision of a face seen through tears.

Oh, dip my emptied life into that ocean,
plunge it into the deepest fullness.
Let me for once feel that lost sweet touch
in the allness of the universe.

-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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भिक्षुक हृदय – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Beggarly Heart’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


भिक्षुक हृदय


जब मेरा हृदय कठोर और शुष्क हो गया हो,
तब मेरे ऊपर दया की वृष्टि करते हुए आना|

जब जीवन से कृपा लुप्त हो गई हो,
तब एक गीत की गूंज के साथ आना|

जब काम की आपाधापी मुझे पूरी तरह, बाहरी जगत से काट दे,
तब मेरे पास आना, मौन के देवता, अपनी शांति और चैन के साथ|


जब मेरा भिक्षुक हृदय सिर झुकाकर बैठा हो, बंद कमरे के एक कोने में,
तब मेरे सम्राट, द्वार तोड़कर अंदर, एक सम्राट की आनबान के साथ आना|

जब कामनाएँ मुझे अंधा कर दें, मायाजाल और धूल फैलाकर, ओ मेरे पवित्र प्रभु,
सबको जागृत करने वाले, अपने प्रकाश और गर्जना के साथ आना|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-




Beggarly Heart


When the heart is hard and parched up,
come upon me with a shower of mercy.

When grace is lost from life,
come with a burst of song.

When tumultuous work raises its din on all sides shutting me out from
beyond, come to me, my lord of silence, with thy peace and rest.


When my beggarly heart sits crouched, shut up in a corner,
break open the door, my king, and come with the ceremony of a king.

When desire blinds the mind with delusion and dust, O thou holy one,
thou wakeful, come with thy light and thy thunder


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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कौन है यह – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Who Is This’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


कौन है यह

मैं अकेला ही निकला था, इस गुप्त भेंट के अपने मार्ग पर,
परंतु कौन है यह, जो इस शांत अंधेरे में मेरे पीछे-पीछे चला है?

मैं एक तरफ खिसक जाता हूं उसकी उपस्थिति से बचने के लिए, परंतु उससे बचने में सफल नहीं होता|

वह अपनी अकड़ भरी चाल के कारण धूल उड़ाता चलता है;
मैं जो भी शब्द बोलता हूँ, उसमें वह अपना भारी स्वर जोड़ देता है|


वह मेरा ही अपना लघु अहं है, मेरे प्रभु, उसे बिलकुल शर्म नहीं आती;
परंतु मैं शर्मिंदा हूँ, कि मैं आपके द्वार पर, उसको साथ लेकर आया|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Who Is This



I came out alone on my way to my tryst.
But who is this that follows me in the silent dark?

I move aside to avoid his presence but I escape him not.

He makes the dust rise from the earth with his swagger;
he adds his loud voice to every word that I utter.

He is my own little self, my lord, he knows no shame;
but I am ashamed to come to thy door in his company.



-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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