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रथ का टूटा हुआ पहिया!

धर्मयुग के यशस्वी संपादक रहे और गद्य और पद्य की सभी विधाओं- कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, यात्रा वृतांत आदि-आदि में अपना बहुमूल्य योगदान करने वाले स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ|

भारती जी ने महाभारत की पृष्ठभूमि पर एक खंडकाव्य- अंधायुग भी लिखा था| आज की इस कविता में भी महाभारत का संदर्भ दिया गया है| वास्तव में जीवन में कभी ऐसे व्यक्तियों अथवा वस्तुओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, जिनको हम अक्सर महत्व नहीं देते|


आइए स्वाभिमान से भारी इस कविता का आनंद लेते हैं-



मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत !

क्या जाने कब
इस दुरूह चक्रव्यूह में
अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ
कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय !


अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी
बड़े-बड़े महारथी
अकेली निहत्थी आवाज़ को
अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें
तब मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया
उसके हाथों में
ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !
मैं रथ का टूटा पहिया हूँ


लेकिन मुझे फेंको मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले !




आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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