वर्ना घर खो जाएँगे!

तुम जो सोचो वो तुम जानो हम तो अपनी कहते हैं,
देर न करना घर आने में वर्ना घर खो जाएँगे|

निदा फ़ाज़ली

घर-बार होना चाहिए!

ज़िंदगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें,
टूटा-फूटा ही सही घर-बार होना चाहिए|

मुनव्वर राना

मेरे हिस्से में माँ आई!

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई,
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई |

मुनव्वर राना

खिड़की से मुस्कराई हो!

कभी तो हो मेरे कमरे में ऐसा मंज़र भी,
बहार देख के खिड़की से मुस्कराई हो|

परवीन शाकिर

घर के अन्दर किसने आग लगाई है!

बाहर सहन में पेड़ों पर कुछ जलते-बुझते जुगनू थे,
हैरत है फिर घर के अन्दर किसने आग लगाई है|

क़तील शिफ़ाई

दुनिया कभी घर बोलते हैं!

सराये है जिसे नादां मुसाफ़िर,
कभी दुनिया कभी घर बोलते हैं|

राजेश रेड्डी

ये ज़मीं कुछ कम है!

घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है,
अपने नक्शे के मुताबिक़ ये ज़मीं कुछ कम है|

शहरयार

अब मेरे सर पर नहीं रहा!

इस घर में जो कशिश थी, गई उन दिनों के साथ,
इस घर का साया अब मेरे सर पर नहीं रहा|

मुनीर नियाज़ी

मेरा घर सजा लगे!

मेहमान बन के आये किसी रोज़ अगर वो शख़्स,
उस रोज़ बिन सजाये मेरा घर सजा लगे|

क़तील शिफ़ाई

नहीं कोई मकाँ मेरा!

मैं जब लौटा तो कोई और ही आबाद था “बेकल”,
मैं इक रमता हुआ जोगी, नहीं कोई मकाँ मेरा|

बेकल उत्साही