संध्या सिंदूर लुटाती है!

एक बार फिर से मैं आज हिन्दी काव्य मंचों पर अपने गीतों के माध्यम से श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर देने वाले स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में बच्चन जी ने शाम के कुछ बहुत सुंदर चित्र प्रस्तुत किए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का यह गीत –



संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

रंगती स्‍वर्णिम रज से सुदंर
निज नीड़-अधीर खगों के पर,
तरुओं की डाली-डाली में कंचन के पात लगाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

करती सरि‍ता का जल पीला,
जो था पल भर पहले नीला,
नावों के पालों को सोने की चादर-सा चमकाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

उपहार हमें भी मिलता है,
श्रृंगार हमें भी मिलता है,
आँसू की बूंद कपोलों पर शोणित की-सी बन जाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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नीड़ का निर्माण फिर फिर!

आज एक बार फिर से हिन्दी गीत काव्य के स्तंभ और कवि सम्मेलनों में श्रोताओं को झूमने के लिए मजबूर कर देने वाले विख्यात कवि और गीतकार स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का एक प्रसिद्ध गीत शेयर कर रहा हूँ|

बच्चन जी के बारे में कुछ बातें मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ, इस गीत के शीर्षक के आधार पर ही बच्चन जी ने अपनी आत्म कथा के एक भाग का शीर्षक भी रखा था| जीवन में अनेक बार ऐसे ठहराव और बाधा का सामना हमें करना पड़ता है कि हमें लगता है कि अब आगे बढ़ना संभव नहीं है, लेकिन इंसान हिम्मत संजोकर फिर आगे बढ़ता है और बढ़ता चला जाता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का यह गीत-


नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!

वह उठी आँधी कि नभ में
छा गया सहसा अँधेरा,
धूलि धूसर बादलों ने
भूमि को इस भाँति घेरा,

रात-सा दिन हो गया, फिर
रात आ‌ई और काली,
लग रहा था अब न होगा
इस निशा का फिर सवेरा,

रात के उत्पात-भय से
भीत जन-जन, भीत कण-कण
किंतु प्राची से उषा की
मोहिनी मुस्कान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!

वह चले झोंके कि काँपे
भीम कायावान भूधर,
जड़ समेत उखड़-पुखड़कर
गिर पड़े, टूटे विटप वर,

हाय, तिनकों से विनिर्मित
घोंसलो पर क्या न बीती,
डगमगा‌ए जबकि कंकड़,
ईंट, पत्थर के महल-घर;

बोल आशा के विहंगम,
किस जगह पर तू छिपा था,
जो गगन पर चढ़ उठाता
गर्व से निज तान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!


क्रुद्ध नभ के वज्र दंतों
में उषा है मुसकराती,
घोर गर्जनमय गगन के
कंठ में खग पंक्ति गाती;

एक चिड़िया चोंच में तिनका
लि‌ए जो जा रही है,
वह सहज में ही पवन
उंचास को नीचा दिखाती!

नाश के दुख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता से
सृष्टि का नव गान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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मैं सांसों के दो तार लिए फिरता हूँ!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी काव्य जगत के अनूठे कवि, किसी समय मंचों की शोभा बढ़ाने वाले और श्रोताओं को झूमने के लिए मजबूर करने वाले, स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसे उन्होंने आत्म-परिचय के रूप में प्रस्तुत किया है|

एक बार फिर से मुझे आकाशवाणी के लिए बच्चन जी का एक इंटरव्यू याद आ रहा है, जिसमें उनके साथ मैं भी मौजूद था| साक्षात्कारकर्ता सुश्री कमला शास्त्री ने कहा कि आपके गीत शायद इसलिए बहुत लोकप्रिय हैं क्योंकि इनकी भाषा बहुत सरल है|


इस पर बच्चन जी ने कहा था कि भाषा का सरल होना इतना आसान नहीं है, इसके लिए इंसान को भीतर से बच्चा बनना पड़ता है| खैर आज प्रस्तुत है बच्चन जी का यह गीत-


मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्‍यार लिए फिरता हूँ;
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
मैं सासों के दो तार लिए फिरता हूँ!



मैं स्‍नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्‍यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा है उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!


मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;
है यह अपूर्ण संसार ने मुझको भाता
मैं स्‍वप्‍नों का संसार लिए फिरता हूँ!


मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,
सुख-दुख दोनों में मग्‍न रहा करता हूँ;
जग भ्‍ाव-सागर तरने को नाव बनाए,
मैं भव मौजों पर मस्‍त बहा करता हूँ!

मैं यौवन का उन्‍माद लिए फिरता हूँ,
उन्‍मादों में अवसाद लए फिरता हूँ,
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,
मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ!


कर यत्‍न मिटे सब, सत्‍य किसी ने जाना?
नादन वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!
फिर मूढ़ न क्‍या जग, जो इस पर भी सीखे?
मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भूलना!

मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;
जग जिस पृथ्‍वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्‍वी को ठुकराता!


मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिसपर भूपों के प्रसाद न्यौछावर,
मैं उस खंडर का भाग लिए फिरता हूँ!

मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;
क्‍यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!

मैं दीवानों का एक वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ;
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्‍ती का संदेश लिए फिरता हूँ!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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