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Independence that is – Swaadhintaa!

We are celebrating the 74th Independence of our great nation. The country which has great culture and has been considered the ‘Vishva Guru’. Those who have faith in our rich traditions and culture rejoice by heart on this auspicious day.


As a nation we never thought of grabbing the territories of other nations and always taught others also the lesson of peace and togetherness. We wish the best for everybody and believe in ‘Sarve Bhavantu Sukhina, Sarve Santu Niramaya’ May all be happy and healthy, let all be gentle people and may nobody be in grief.

Anyway, on the occasion of Independence day, let us think about what is independence. As an independent nation, we as a big nationwide family have to plan for progress so that everybody gets opportunities to attain the heights in life as per his or her capacities and intelligence. Let there be enough opportunities so that everybody can attain his or her goals in life. We all depend on each other and we must help others in achieving their goals.


What is independence by the way? Be it as a nation or as an individual. Anybody who have just to obey the orders of others, is often oppressed but he or she doesn’t have to think much. Just follow the command and live the way his master allows him to!


As an independent nation or person, we have to make our plans, implement them and be responsible for the consequences. We are free to live the way we want to live, act as we wish but, a nice example is that our freedom to spread our arms is to the extent that our hands do not come in the way of anybody else or not hit somebody in any way!


An independent society is like an orchid, or a garden where all the trees grow as per their capacity and inner strength and make the garden beautiful. There is a communist school of thought, where they say that the trees may be cut at the top to make them equal. However there are weaker sections who need support to come forward.


The democratic philosophy believes in providing everybody opportunities to grow as per their strength and intelligence and contribute towards the well-being of the society. We also believe in the philosophy- ‘From each according to his capacities and to each according to his needs.’


Yes we are an independent nation and we are on the way to liberate our masses from poverty, illiteracy, superstition etc. etc., but we have to continue on this journey. Sometimes we feel that we have moved forward but then some hurdles come in so many forms like- earthquake, floods, pandemic etc. and we are thrown backwards. We have to continue working towards our goals and bring happiness and self-dependence to those who are left behind in the race.


It is a never-ending journey, because we may always have to face new challenges and reconsider our goals. But as a progressive nation we are on the right path and our people are becoming more and more vigilant. I am sure that as a great nation we would find a more and more, respectable place in the world community.


This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Are we really independent? Has India been liberated from poverty, illiteracy, superstition, bigotry…? How long is our journey to Independence yet? #Independence


Thanks for reading.

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भारतीय दर्शन और हिन्दू धर्म

बहुत पहले कहीं पढ़ा था कि विभिन्न धर्मों का अध्ययन कर रहे एक विदेशी विद्वान से जब पूछा गया कि विभिन्न धर्मों के अपने अध्ययन के आधार पर वे क्या कहना चाहेंगे! इस पर उसने कहा था कि आम आदमी के लिए सबसे आसान है मुस्लिम धर्म- पाँच टाइम नमाज पढ़ो और कोई गलती हुई हो तो उसके लिए अल्लाह से माफी मांग लो| इसके बाद उसने कहा कि सबसे से अधिक व्यापक है हिन्दू दर्शन, इसे अंग्रेजी के ‘रिलीजन’ के दायरे में बांधना संभव नहीं है| ये जीवन दर्शन है| कोई हिन्दू धर्म का अध्ययन संपूर्णता से करना चाहता है तो उसके लिए एक जन्म पर्याप्त नहीं है|

 

 

चिंतन की उदारता के मामले में हिन्दू संस्कृति का कोई मुक़ाबला नहीं है| भारतीय दर्शन के संबंध में विश्व धर्म संसद में गए विवेकानंद जी का उदाहरण हमें गर्वित करता है| अब उनका ज़िक्र आया है तो उनके जीवन से जुड़ा एक प्रसंग याद आ रहा है| विदेश जाने के लिए राजस्थान में खेतड़ी के महाराज ने विवेकानंद जी की सहायता की थी| उसी समय की बात है, विवेकानंद जी राजा के महल में गए, तो मालूम हुआ कि वहाँ एक गणिका नृत्य कर रही थी| उसके गीत की ध्वनि सुनकर विवेकानंद जी द्वार पर ही ठिठक गए| उनका संकोच समझकर गणिका ने अपना गीत बदलकर यह भजन गाया-

प्रभुजी मेरे अवगुण चित न धरो,
एक लोहा पूजा में राखत, एक घर वधिक परो,
यह दुविधा पारस नहीं मानत, कंचन करत खरौ|

यह सुनकर विवेकानन्द जी को अपनी भूल का एहसास हुआ, वे भीतर गए और उस गणिका के चरणों में गिरकर बोले- ‘माँ मुझे क्षमा कर दो, मुझे यह भेद नहीं करना चाहिए था’| यह प्रसंग खेतड़ी के राजा के महल में लिखा हुआ है| हाँ जी,यह है भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म की विशेषता| यहाँ मन की पवित्रता सबसे बड़ी आवश्यकता है और कोई भी किसी से भी सीख ले सकता है|

मुझे बहुत पहले की एक घटना याद आ रही है, दिल्ली में किसी प्रकाशक ने एक पाठ्य पुस्तक में पैगंबर मुहम्मद साहब की तस्वीर छाप दी थी, तब उसकी प्रेस पर हमला हुआ था, आग लगा दी गई थी| उन लोगों का कहना था कि इंसानी हाथों से पैगंबर की तस्वीर कैसे बनाई जा सकती है! हिन्दू धर्म में कलाकार अपनी कल्पना और प्रतिभा द्वारा जो सुंदर से सुंदर चित्र अथवा मूर्ति बना देता है, उसे लोग ईश्वर का चित्र अथवा मूर्ति मान लेते हैं|

हिन्दू धर्म जिसे कहते हैं, वह कोई उपासना पद्यति मात्र नहीं है जिसका प्रचार किया जाए, लोगों को इसमें आने के लिए प्रेरित या मजबूर किया जाए| देश में बहुत जगहों पर तो गरीबों, आदिवासियों को अनाज आदि देकर कहा जाता है कि देखो तुम्हारा भगवान तुम्हें खाना नहीं देता, हमारा ईश्वर देता है, इसलिए हमारे धर्म में शामिल हो जाओ| इसलिए ज़्यादातर इसमें आस्था और लालच का अंतर है|

बहुत से ऐसे साधु और प्रवचन करने वाले हैं, जो अगर गलत आचरण करते पाए गए हैं तो उनको जेल जाना पड़ा है, भले उनके कितने भी शिष्य बने हों| जबकि अन्य धर्मों के मामले में ‘नन’ आदि पर अन्याय होने पर, उनकी ही ज़ुबान बंद कर दी जाती है|
हिन्दू धर्म में, प्रारंभ से ही चर्चा और शास्त्रार्थ को बढ़ावा दिया जाता रहा है| यहाँ लोग आँख मूंदकर किसी के पीछे नहीं जाते, अगर ऐसा हुआ और बाद में मालूम हुआ कि यह गलत मार्ग है तो लोग उसको छोड़ देते हैं|

हमारी पौराणिक कथाओं में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं कि त्रिदेव से आशीर्वाद पाकर आसुरी प्रवृत्ति के लोग अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हैं| ऐसे में हमारे त्रिदेव जो आवश्यक होता है वह कदम उठाते हैं| यह स्पष्ट है कि जो गलत आचरण कर रहा है, जो धर्म विरुद्ध है, उसको हराने के लिए जो भी आवश्यक हो किया जा सकता है|

एक उदाहरण याद आ रहा है| असुर राज जलंधर, जो शिवांश था, वह अपनी आसुरी शक्ति से त्रिलोक विजयी हो जाता है, उसकी पतिव्रता पत्नी – वृंदा पूजा करती है, जिसमें उसके शामिल हो जाने के बाद उसका अंत संभव नहीं होता, ऐसे में उसकी पूजा को असफल करना मानवता की रक्षा के लिए आवश्यक था| भगवान नारायण (विष्णु) ऐसे में जलंधर का रूप धरकर इस पूजा को असफल कराते हैं, इसके लिए उनको वृंदा का श्राप भी झेलना पड़ता है| लेकिन मानवता की रक्षा के लिए वे यह काम करते हैं| वृंदा को आज भी हरि मंदिर में ‘तुलसी’ के रूप में पूजा जाता है|

इसी प्रकार मानवता की रक्षा के लिए विषपान करने वाले महादेव का उदाहरण और कहाँ मिलेगा|

बस इतना ही कहना चाहूँगा कि हिन्दू धर्म की व्यापकता किनारे पर बैठकर नहीं समझी जा सकती, हाँ कुछ सतही बुद्धिजीवी जैसे आतंकवादियों के मानवाधिकारों की वकालत करते हैं, वैसे ही धर्म विरुद्ध आचरण करने वालों के पक्ष में दलील देते रहते हैं| यह स्पष्ट है कि दशानन रावण की विद्वत्ता अथवा किसी का वृहद ज्ञान उस समय किसी काम का नहीं रहता, जब उसका आचरण धर्म विरुद्ध होता है|

बातें बहुत सारी हैं, एक और प्रसंग याद आ रहा है, अपने भाई सुग्रीव को अनेक प्रकार से सताने वाले बाली को राम मारते हैं, तब वह पूछता है कि ऐसा क्या है कि मैं आपका वैरी हो गया और सुग्रीव आपका मित्र है| इस पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम कहते हैं-

अनुज वधु भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।
इन्हहिं कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।।

बातें बहुत हैं कहने के लिए, हिन्दू धर्म के बारे में लोग अक्सर बिना ज्ञान के टिप्पणी करना अपना धर्म समझते हैं, बल्कि शायद ऐसा करना ही सैक्युलर होने की पहचान माना जाता है| इसलिए मन हुआ कि कुछ बात इस विषय में कर ली जाए|

एक दो बातें और याद आ रही हैं, वो भी कह दूँ, पता नहीं फिर कब ऐसे विषय पर बात करने का मन होगा| हिन्दू धर्म के साथ रचनात्मकता भी कैसी दिव्य जुड़ी है| मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ की तुलसीदास और सूरदास जी जैसा प्रतिभाशाली कवि, पूरी दुनिया में नहीं हुआ है| खास तौर से धार्मिक आख्यान पर आधारित महाकाव्य रचने के लिए, जो रचनाएँ श्रद्धालु पाठकों के लिए अमृत के समान हैं| विशेष रूप से मेरे जैसे लोगों के लिए, जिनके लिए वेद-पुराण आदि का अध्ययन करना संभव नहीं है| आपको गाँव-देहात में ऐसे अनपढ़ लोग मिल जाएंगे जिनको तुलसीदास जी के रामचरितमानस की चौपाइयाँ कंठस्थ हैं| मुझे मालूम है कि कई धर्मों के प्रचार के लिए लोगों को अत्यधिक आकर्षक राशियों का प्रस्ताव किया गया कि वे ‘मानस’ जैसा ग्रंथ लिख दें, परंतु ऐसी रचना केवल गहन आस्था और अटूट श्रद्धा द्वारा ही संभव है|

जहां मानस के प्रसंग, जनसाधारण को सामान्य भाषा में हमारे ग्रन्थों के सार से परिचित कराते हैं, हनुमान चालीसा भी लोगों को कंठस्थ है, जो प्रभु के अनन्य भक्त हनुमान जी का गुणगान करती है, वहीं श्रीकृष्ण जी द्वारा अर्जुन के माध्यम से दुनिया को दिया गया गीता का संदेश ऐसा है जिसके एक-एक श्लोक पर विद्वान लोग, कई दिन तक व्याख्यान देते हैं, अनेक प्रसिद्ध विद्वानों ने इनकी व्याख्याएँ लिखी हैं| पूरी दुनिया आज गीता, रामायण के संदेश से लाभान्वित हो रही है|

लेकिन अपने देश में तो यही है कि जो हिन्दू धर्म की बुराई करे वह सेक्युलर और जो आतंकवादियों के मानवाधिकारों की वकालत करे, वही प्रगतिशील|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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मायानगरी का स्वर्ण मृग !

आज मुंबई की मायानगरी की बात कर लेते हैं, जिसे लोग हॉलीवुड की तर्ज पर बॉलीवुड भी कहते हैं| एक से एक प्रतिभाएँ रही हैं इस मुंबई में, और यह क्षेत्र भारत का फिल्मी देवलोक जैसा लगता है|

 

 

मुंबई मायानगरी का हिस्सा रहे महान कलाकारों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि कोई नाम गिनाने लगे तो जितने नाम वह बताएगा उससे दो गुने छूट जाएंगे| मेरे उस्ताद और सपनों के सौदागर- महान शोमैन राजकपूर भी इसी नगरी में थे, जिनके सपनों का महल आर के स्टूडिओ भी आज बिक चुका है| मेरे परम प्रिय गायक – मुकेश जी भी इसी नगरी का हिस्सा थे, जिनकी निश्छल आवाज आज भी हमारे मन में गूँजती है- ‘सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है’| जैसा मैंने पहले कहा इतने महान लोग, नाम लेना शुरू करें तो ये सिलसिला समाप्त ही नहीं होगा- निर्माता, निर्देशक, अभिनेता, गीतकार, संगीतकार, गायक, टैकनीशियन आदि-आदि| हजारों लोगों ने इस मायानगरी से अपनी पहचान बनाई है|

मुंबई की यह मायानगरी हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाली प्रतिभाओं से भरी पड़ी है, लोग यहाँ अपनी किस्मत आज़माने के लिए आते ही रहते हैं और एक बार जो जनता के दिल पर अपनी छाप छोड़ देता है, लोग उसको अपने सिर-आँखों पर बिठाते हैं|

ये दुनिया है यहाँ पर आना-जाना तो लगा ही रहता है, पिछले दिनों हमने ऋषि कपूर और इरफान खान जैसे महान कलाकारों को असमय खो दिया| यह सिलसिला तो चलता ही रहता है, जब ऊपर वाला बीमारी के बहाने या किसी दुर्घटना के कारण किसी को अपने पास बुला लेता है|

लेकिन हाल ही में सुशांत सिंह राजपूत जिस प्रकार गए, वह अत्यंत हृदय विदारक है और इस फिल्मी नगरी की मानवीयता पर बहुत से गंभीर प्रश्न खड़े करता है|

ये ऐसी दुनिया है, जहां एक बार जब कोई कलाकार जनता का दिल जीत ले तो लोग उसे कंधों पर उठा लेते हैं, ऐसी ऊंचाई प्रदान करते हैं, जिसकी कहीं और कल्पना नहीं की जा सकती है| यही कारण है कि यहाँ कंपिटीशन भी बहुत तगड़ा है| लोग घर से सीधे भागकर कर या बाकायदा फिल्मों से जुड़े कोर्स करके, थिएटर के माध्यम से, अनेक प्रकार से यहाँ आते हैं|

दूसरी तरफ वे लोग हैं जो पहले से इस परिवार का हिस्सा हैं| वे किसी फिल्मी घराने से हैं, अथवा पहले कुछ फिल्में कर चुके हैं और अब जनता को उतना प्रभावित नहीं कर पा रहे हैं| ऐसे में कुछ लोग घेरेबंदी करते, चक्रव्यूह रचते हैं| दूर किसी छोटे से इलाके से आया संवेदनशील कलाकार जब अचानक ऊंचाई प्राप्त कर लेता है, तब वह प्रसिद्ध तो होता है लेकिन साथ ही अकेला भी हो जाता है| अपनी मुसीबतों को वह किसी से शेयर भी नहीं कर पाता| सुशांत सिंह राजपूत, जैसा उनको देखने से ही लगता था, अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति थे, ऐसा सुना गया है कि पिछले 6 महीनों में उनसे एक-एक करके 7 फिल्में छीन ली गईं| लॉबी वाले ये खलनायक न जाने कितनी प्रतिभाओं को मुंबई से और कभी जीवन से भी पलायन करने पर मजबूर कर देते हैं|

इस घटना के बाद मुझे लगता है कि और जागरूकता आएगी और ऐसे दुष्ट लोगों को कानूनी कार्रवाई का भी सामना करना पड़ेगा|

एक विचार मेरे मन में आ रहा है, मुंबई में जहां फिल्म नगरी में इस प्रकार की घृणित लॉबी काम करती है, वहीं ठाकरे बंधु और उनकी नफरत की राजनीति करने वाली पार्टियों के छुटभैये भी आए दिन अन्य प्रदेशों से आने वालों को धमकाते रहते हैं| मैं समझता हूँ कि जिस प्रकार नोएडा में छोटी सी फिल्म-नगरी बनाई गई है, उसी प्रकार अन्य स्थानों पर भी राज्य सरकारों द्वारा फिल्म निर्माण के लिए स्थान, इन्फ्रा स्ट्रक्चर और प्रोत्साहन प्रदान किया जाए| क्या ही अच्छा हो कि कई फिल्म नगरी विकसित हो जाएँ, उनके बीच प्रतियोगिता हो, जिससे अन्य राज्य भी विकसित हों और इन छुटभैये लोगों की दादागिरी भी समाप्त हो|
ऐसे ही यह विचार आया कि फिल्मी दुनिया किसी प्रकार और अधिक मानवीय और नई प्रतिभाओं का खुले दिल से स्वागत करने वाली बन सके|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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One Change That I would like to make in the Human World!

Today I would like to mention in the beginning that I am making my submission based on the following #IndiSpire prompt-

Suppose you’re given the boon by god to change one thing in this human world. What will you change? #UltimateChange

 

 

I am selfish to some extent, and yes I think this is justified. But this selfishness is not limited to myself, my family and not even to my city etc. but I think of my country first, then I think for the complete human family.

Now a days the whole world is fighting the demon like Pandemic- Corona Virus. If I could make a change, it could also be that there may not be any disease which could place such a nasty challenge before the human society.

There are so many divisions among the human society- caste, creed, religion, colour etc. I wish there may not be any such division, all may be one and everybody get equal opportunity to achieve whatever he or she can, based on the efforts made by that individual.

But when I think about which one change I would like to make to this human world, if I got the power to do so, I feel that I would make a geographical change. Yes, I wish everybody well, but there are some countries and human beings, who are not born to love. They are always making efforts to destabilize the world, always preparing for wars, spreading hate, terrorism etc.

For my peace-loving country, our two neighbouring countries China and Pakistan are always creating troubles. While we wish to make efforts for the well being of our people, to make steady progress, living in an atmosphere of peace, these two neighbouring countries have joined together to disturb the atmosphere of love and peace.

I would like to make a geographical change and put these two countries, may be next to North Korea. While South Korea is on one side of North Korea, these two war loving countries I might put on another side of North Korea and put some peace-loving countries as our neighbours in their place. So that these two may become the well deserving neighbours of the big-headed premiere of North Korea there and enjoy his company while my country may focus on the well-being of its citizens.

There could be many things which can be done for the well being of my country and the world at large, but this is what came to my mind instantly.

Thanks for reading.

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The Fittest Survive!

There was a time when our forefathers lived in jungles, as we are told. In jungles there is the law of the land, which tells that the powerful species survive. We hear about species which existed in the world earlier and do not exist now. Surprisingly some species of earlier time we hear about were so big and powerful, it is surprising to know that they couldn’t survive. Further it is also worth consideration that in the long run either they could survive,  or the small human beings could, let’s take the example of Dianosaurs.

 

 

Yes there is a rule in the forest lands, or even the under-water world, that it is the fittest, the strongest who survives. In the jungles the lion and the bigger animals kill the smaller ones. Under water also it is said that the bigger fishes swallow the smaller ones.

The same principle could also apply on human beings, to great extent it might be seen in uncivilized societies. But in case of human society, it is not just the physical power that counts, but more than that it is mental power.

It is mental power only, through which humans initially made weapons for their survival, to kill the wild animals, they also killed them for eating, like the wild animals also do. But humans cooked their food. They invented so many things, houses to live safely, colonies to live as a society. Humans are thinking animals, so they could soon understand that if we live as a co-operative society, we can help each-other in growth and also be safe from external dangers. I think first it was small groups, which later grew larger and larger, and became villages, cities and countries.

Yes if not connected with each other, it would be the principle of survival of the fittest getting applied on us. But we know that in that way the humans would get destroyed and the world would become a big jungle.
Further the fitness or the might of human beings does not mean the physical fitness only. It is the mind and money power, which counts more in today’s world. We also see gangsters, who represent the uncivilized world, totally dependent on their physical might, the weapons and the nasty designs. We also find the rich and powerful moving with their body guards carrying guns, for safeguarding them. We also find artists and popular leaders going among huge crowds giving their message of love.

Today the world has became a global village, we are inter-connected and a person living in a country does also care about the well being of people in other country, if there is any natural calamity, spread of some deadly disease or any kind of trouble. We know today that if we don’t care, the same problem we also might have to face.

So we need to acquire the power of knowledge, necessary gadgets for safeguarding ourselves and our society, because in the human world today, there is nobody who can survive and rule barely on his own fitness or say power, be it of any kind. We have to be a strong and sensible society, that thinks about well-being of ourselves and the whole world.

So in today’s world one should be in good health, be well informed and well connected and be an active and vigilant member of the society. I think that is the requirement to remain a contributing member of society, which is not a jungle in anyway. Yes for those living in jungle, other principles might apply.

These are my humble views on the #IndiSpire prompt- “survival of the fittest,” the Law of the Jungle what do these phrases tell you? I often wonder if we got Charles Darwin’s theory wrong. #Survivalofthefittest

Thanks for reading.

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Being Contributing Members of Society!

It is our life and we choose a role for ourselves and that determines what success means to us and it may be quite different from others. There are so many things which frame our personality, it starts with the ‘Samskaaras’ the values which we imbibe from our family and the atmosphere of initial neighborhood, relatives and schooling. Still there are so many other things which are instrumental in forming the unique personality of any person.

 

 

If we consider at the level of some failed country like Pakistan, there we find that young boys speak a language full of hatred towards India and Indians. Whether they can harm India or not is not an issue, my worry is how much they are harming themselves. Would such a young boy would become a good and successful human being, I have every doubt on that.

Today there are such organizations working at international level which train and send terrorists to various parts of the world to kill people for no reason. I feel worried about the future of the mankind after seeing these trends.

What is our role in this world, other than studying and being able to earn sufficient money to raise and maintain our families. We live in a human society, we are part of some country governed in a democratic or may be some other type of administration. Wherever we are, we need to play a positive role, make our humble contribution as a citizen, as a vigilant member of society.

So the basic requirement for every individual is to become a good human being and a contributing member of society. If people try to achieve their selfish goals at the cost of others, then there would be complete anarchy and people would keep fighting and everybody would be a loser. So to remain a vibrant and futuristic society and state, some basic values are to be adopted by everybody, every citizen or say every member of society.

All the scriptures, our religious books, reformers and even the text books our children read, all teach some basic values for becoming a good human being and a contributing member of society.

We need to develop a positive personality, adopt positive attitude to play a ‘win all’ game. So what could be the basic ingredients of a positive personality, positive attitude. We can mention say- we should always remain happy, for that we need to keep our hopes alive, which means one must be optimistic, one also must be kind and helpful to others, that also is a virtue which makes us help others and earn respect from other members of society. If all people help those, who need help, our society would grow very fast and all miseries would come to an end.

Helping or giving others, what they need, it could be material thing, it could also be attention, in whatever way we can contribute for other members of our society. Further it is not just that we do something for others, help them as a duty, basically we need to respect others, mutual respect is also a very strong binding force and makes any society a winning and progressive society.

I mentioned some kind of things which need to become a part of our attitude and it would project our personality as an individual. One could think which one of these values one should make a part of his personality. I would like to mention that these values need not be chosen to become a part of our attitude, but it is a complete package. If an individual carries high values, is optimistic, respects the institutions of society and state, that person would automatically make all these virtues  parts of his attitude and would make progress in life while making a positive contribution for the society also. Yes we also need to review our actions at regular intervals to see whether we have been positively contributing members of the society and not tried to achieve success at the cost of others.

These are my humble views on the #IndiSpire prompt- “Attitude is a choice. Happiness is a choice. Optimism is a choice. Kindness is a choice. Giving is a choice. Respect is a choice. Whatever choice you make makes you. Choose wisely.” Your reflection on those words of Roy T Bennett #WiseChoices

Thanks for reading.

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राष्ट्रीयता और राष्ट्रद्रोह

मैं इन दिनों लंदन प्रवास में हूँ और यहाँ की वर्तमान और पिछले वर्ष की यात्राओं के अनुभव इन दिनों शेयर कर रहा हूँ। ये अनुभव मैं आगे भी शेयर करता रहूंगा।

इस बीच एक और विषय पर बात करने का मन है, अभी ‘राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रद्रोह’ विषय पर चर्चा चल रही थी, इस विषय में मैंने भी अपने विचार रखे, आज अलग से इससे जुड़े विषय पर अपनी सम्मति देने का मन है।

 

 

हमने पिछले कुछ वर्षों में ऐसी गतिविधियां देखी हैं, जिनको राष्ट्रद्रोही कहने में कम से कम मुझे तो कोई संदेह नहीं है। मैं  जेएनयू में हुई गतिविधियों का उल्लेख कर रहा हूँ, जिनमें हमारे सैनिकों के शहीद होने पर खुशी मनाना, बुरहान बानी को फांसी का विरोध और इस प्रकार के नारे लगाया जाना शामिल है- ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह’। अभी कश्मीर के संबंध में सरकार द्वारा लिए गए ऐतिहासिक कदम के बाद ‘जेएनयू’ फैक्ट्री से ही निकली एक कश्मीरी युवती ‘शेहला रशीद’  द्वारा ट्वीट करके, झूठी अफवाह फैलाया जाना भी इसका उदाहरण है कि यह प्रतिष्ठित संस्थान आज राष्ट्रद्रोह का अड्डा बन गया है।

इस सबके पीछे देखा जाए तो लॉर्ड मैकाले द्वारा भारत को मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखने के लिए चलाई गई शिक्षा पद्यति का बहुत बड़ा हाथ है। हमारी बहुत समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर रही है और लॉर्ड मैकाले का यही सिद्धांत था कि भारतीयों को अपने सांस्कृतिक मूल्यों से काट दो, उनके मन से राष्ट्र-गौरव निकाल दो, तब उनको गुलाम बनाए रखना आसान होगा और वे भौतिक रूप से आज़ाद हो जाएं तब भी वे मानसिक रूप से गुलाम बने रहेंगे, और इसके लिए अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से भारतीय लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे।

हम विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक हैं, हमें विश्व-गुरू का दर्जा प्राप्त था। मैक्समूलर जैसे अनेक विदेशी विद्वान भारतीय संस्कृति का लंबे समय तक अध्ययन करते रहे, फादर क़ामिल बुल्के जैसे विदेशी मानस मर्मज्ञ रहे।

हमारे राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी ने संस्कृति के चार अध्याय पुस्तक और कितना सुंदर साहित्य लिखा। उनका एक प्रसंग याद आ रहा है। दिनकर जी ने एम.ए. नहीं किया था, सो उनके मन में आया और उन्होंने एम.ए. के लिए फॉर्म भर दिया। उस समय बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति भी विख्यात हिंदी साहित्यकार थे, मुझे उनका नाम अभी याद नहीं आ रहा, उन्होंने दिनकर जी को बुलाया और कहा- ये क्या कर रहे हो दिनकर, लोग आपकी पुस्तकें, कवितायें आदि कोर्स में पढ़ रहे हैं, उन पर शोध कर रहे हैं, तुम्हे क्या जरूरत है एम.ए. करने की!

मैं जिस तरफ संकेत करना चाहता हूँ वो ये हि कि हमारे यहाँ डिग्री वाले नहीं अध्यवसाय वाले विद्वान रहे हैं, भारत एक सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश रहा है। हमारे अनपढ़ कबीर को पूरी दुनिया पढ़कर समझने का प्रयास कर रही है। तुलसीदास जी कहाँ के पढ़े-लिखे थे, जिनकी चौपाइयां आज भी गांवों में अनपढ़ बुज़ुर्ग संदर्भ के लिए जब-तब दोहराते हैं।

एक लंबी संस्कृति रही है, पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान को आगे बढाने की परंपरा रही है। एक भारतीय संत- स्वामी विवेकानंद जब विश्व धर्म संसद में खड़ा होकर बोलता है, तब उसका संबोधन-‘भाइयो और बहनो’ सबको अकस्मात चौंका देता है, जो तब तक ‘देवियो और सज्जनो’ ही सुनते आए थे, विश्व बंधुत्व की अवधारणा को मन से अपनाने वाले इस संत की वाणी को दुनिया मंत्रमुग्ध होकर सुनती है, यह कोई किस्सा-कहानी नहीं है!

लेकिन आज, मैकाले की सफलता इस बात में है कि हमारे डिग्रीधारी विद्वान इस पश्चिमी अवधारणा को स्वीकार करते हैं कि ‘राष्ट्र’ एक काल्पनिक इकाई है, एक कल्पना है, हम बस यह मान लेते हैं कि यह हमारा देश है।

हाँ यह भी सच है कि बहुत सी बातें विश्वास पर ही कायम हैं, वरना कोई किसी को अपना पिता अथवा संतान भी नहीं माने। सुना है कि ओशो रजनीश के व्याख्यान स्थल पर लिखा रहता था, ‘कृपया अपने जूते और दिमाग बाहर छोड़कर आएं।‘

आज के डिग्रीधारी विद्वानों के साथ दिक्कत यह है कि जो बात कोई बाहरी विद्वान कहता है उसे वे तुरंत मान लेते हैं, लेकिन जो उनको भारतीय परंपरा से मिलती है उसको वे मानने को तैयार नहीं होते और इसकी परिणति यहाँ तक होती है जैसा जेएनयू में देखने को मिला।

अंत में एक बात अवश्य जोड़ना चाहूंगा, जो लोग दूसरों को सुधारने का, अपने हिसाब से भारतीय बनाने का और जाति और धर्म के नाम पर अत्याचार का काम करते हैं वे भारतीयता के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

ऐसे ही आज कुछ विचार मन में आए, मैं यहाँ किसी को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं कर रहा हूँ, मैं कोई विदेशी लेखक नहीं हूँ इसलिए कुछ लोगों का तो मेरी बात से सहमत होना संभव ही नहीं है।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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