इंसान का जीना मुश्किल है!

जो ‘धर्म’ पै बीती देख चुके ‘ईमां’ पै जो गुज़री देख चुके,
इस ‘रामो-रहीम’ की दुनिया में इंसान का जीना मुश्किल है|

अर्श मलसियानी

ये नये मिज़ाज का शहर है!

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो|

बशीर बद्र

लेकिन मेरा लावारिस दिल!

आज मैं स्वर्गीय राही मासूम रज़ा साहब की एक नज़्म शेयर कर रहा हूँ| राही मासूम रज़ा साहब एक प्रतिष्ठित साहित्यकार थे तथा उनको अनेक साहित्यिक सम्मानों के अलावा पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे अलंकरणों से भी सम्मानित किया गया था| उनके उपन्यास ‘दिल एक सादा कागज’, ‘आधा गांव’ आदि को पढ़ते हुए भी कभी कभी लगता था कि जैसे कविता पढ़ रहे हों| बहुत डूबकर रचनाएं लिखते थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राही मासूम रज़ा साहब की यह नज़्म –

मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी

मंदिर राम का निकला

लेकिन मेरा लावारिस दिल

अब जिस की जंबील में कोई ख़्वाब

कोई ताबीर नहीं है

मुस्तकबिल की रोशन रोशन

एक भी तस्वीर नहीं है

बोल ए इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल

ये लावारिस, ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल

आख़िर किसके नाम का निकला

मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी

मंदिर राम का निकला|

बन्दा किसके काम का निकला

ये मेरा दिल है

या मेरे ख़्वाबों का मकतल

चारों तरफ बस ख़ून और आँसू, चीख़ें, शोले

घायल गुड़िया

खुली हुई मुर्दा आँखों से कुछ दरवाज़े

ख़ून में लिथड़े कमसिन कुरते

एक पाँव की ज़ख़्मी चप्पल

जगह-जगह से मसकी साड़ी

शर्मिन्दा नंगी शलवारें

दीवारों से चिपकी बिंदी

सहमी चूड़ी

दरवाज़ों की ओट में आवेजों की कबरें

ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत

ए श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम

ये आपकी दौलत आप सम्हालें

मैं बेबस हूँ

आग और ख़ून के इस दलदल में

मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इन्सान कहाँ तक पहुंचे!

चांद को छूके चले आए हैं विज्ञान के पंख,
देखना ये है कि इन्सान कहाँ तक पहुंचे।

गोपालदास “नीरज”

जंग टलती है तो बेहतर है !

इसलिए ऐ शरीफ इंसानों ,
जंग टलती है तो बेहतर है !
आप और हम सभी के आंगन में ,
शमा जलती रहे तो बेहतर है !

साहिर लुधियानवी

युद्ध-1

खून अपना हो या पराया हो
नस्ल-ए-आदम का खून है आख़िर,
जंग मशरिक में हो या मगरिब में ,
अमन-ऐ-आलम का खून है आख़िर !

साहिर लुधियानवी

इंसान!

एक बार फिर से आज मैं, अपने समय के प्रमुख गीत कवियों में शामिल और कवि सम्मेलनों में अपने गीतों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाले स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में कुछ उदाहरण देकर यह बताया गया है इंसान को कैसा होना चाहिए, वास्तव में हम सीखना चाहें तो जीवन में किसी से भी सीख सकते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत-


मैंने तोड़ा फूल, किसी ने कहा-
फूल की तरह जियो औ मरो
सदा इंसान ।

भूलकर वसुधा का शृंगार,
सेज पर सोया जब संसार,
दीप कुछ कहे बिना ही जला-
रातभर तम पी-पीकर पला-
दीप को देख, भर गए नयन
उसी क्षण-
बुझा दिया जब दीप, किसी ने कहा
दीप की तरह जलो, तम हरो
सदा इंसान ।

रात से कहने मन की बात,
चँद्रमा जागा सारी रात,
भूमि की सूनी डगर निहार,
डाल आँसू चुपके दो-चार

डूबने लगे नखत बेहाल
उसी क्षण-
छिपा गगन में चाँद, किसी ने कहा-
चाँद की तरह, जलन तुम हरो
सदा इंसान।

साँस-सी दुर्बल लहरें देख,
पवन ने लिखा जलद को लेख,
पपीहा की प्यासी आवाज़,
हिलाने लगी इंद्र का राज,

धरा का कण्ठ सींचने हेतु
उसी क्षण –
बरसे झुक-झुक मेघ, किसी ने कहा-
मेघ की तरह प्यास तुम हरो
सदा इंसान ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इतने अभी बच गए आदमी!

हाय इतने अभी बच गए आदमी,
गिनते-गिनते जिन्हें दोपहर हो गई|

रामावतार त्यागी

ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा!

कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उस के बारे में
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा।

दुष्यंत कुमार

प्रेम दीप

एक बार फिर दीपावली के बहाने से बात करते हैं|

आप सभी जानते हैं दीपावली हिंदुओं का पवित्र पर्व है| हमारी प्राचीन संस्कृति जिसे हम सामान्यतः भारतीय अथवा व्यापक रूप से हिन्दू संस्कृति के नाम से जानते है, यह संस्कृति दुनिया में निराली है| कितने ही महान संत, महात्मा और धर्म गुरू हुए हैं हमारे यहाँ|

हम कभी विश्व गुरू कहलाते रहे हैं, हमने पूरी दुनिया को प्रेम का संदेश दिया है| हमारे एक प्रतिनिधि जब विदेश में जाकर, विभिन्न देशों के विद्वानों और सामान्य जनों को ‘भाइयों और बहनों’ कहकर संबोधित करते हैं, तब सब चकित रह जाते हैं| वे ऐसा सोच ही नहीं पाते थे कि हम सब दुनिया वाले भाई बहन हैं| हम सदा से सबके सुख और कल्याण की कामना करते रहे हैं|

जिस बात का उल्लेख मैं यहाँ करना चाह रहा हूँ वह यही है कि आज कुछ लोग हिन्दू धर्म के रक्षक बनकर, हमारी संस्कृति और सभ्यता का विकृत और वीभत्स रूप प्रस्तुत कर रहे हैं| ऐसे लोगों से आज वास्तव में हिन्दू धर्म को खतरा है!

कुछ लोग कह सकते हैं कि दूसरे धर्मों में भी ऐसे लोग हैं, होंगे मैं इनकार नहीं करता, उनसे कानून द्वारा निपटा जा सकता है, लेकिन जो लोग आज विभिन्न हिन्दू सेना, बजरंग दल आदि के नाम से, धर्म रक्षा के नाम पर गुंडागर्दी करते हैं, उनके साथ सख्ती से निपटा जाना जरूरी है|

गाय की हत्या होने पर मुझे दुख होता है, लेकिन उससे कहीं अधिक दुख मुझे तब होता है, जब ऐसे किसी आरोप में किसी इंसान की हत्या कर दी जाती है|

बातें बहुत सी है कहने के लिए, लेकिन अंत में रमानाथ अवस्थी जी के शब्दों में यही कहूँगा



जो तुझमें है वो सब में है,
जो सब में है वो तुझ में है,
इसलिए प्यार को धर्म बना,
इसलिए धर्म को प्यार बना|



पुनः दीपावली की मंगल कामनाएं|

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