जंग टलती है तो बेहतर है !

इसलिए ऐ शरीफ इंसानों ,
जंग टलती है तो बेहतर है !
आप और हम सभी के आंगन में ,
शमा जलती रहे तो बेहतर है !

साहिर लुधियानवी

युद्ध-1

खून अपना हो या पराया हो
नस्ल-ए-आदम का खून है आख़िर,
जंग मशरिक में हो या मगरिब में ,
अमन-ऐ-आलम का खून है आख़िर !

साहिर लुधियानवी

इंसान!

एक बार फिर से आज मैं, अपने समय के प्रमुख गीत कवियों में शामिल और कवि सम्मेलनों में अपने गीतों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाले स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में कुछ उदाहरण देकर यह बताया गया है इंसान को कैसा होना चाहिए, वास्तव में हम सीखना चाहें तो जीवन में किसी से भी सीख सकते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत-


मैंने तोड़ा फूल, किसी ने कहा-
फूल की तरह जियो औ मरो
सदा इंसान ।

भूलकर वसुधा का शृंगार,
सेज पर सोया जब संसार,
दीप कुछ कहे बिना ही जला-
रातभर तम पी-पीकर पला-
दीप को देख, भर गए नयन
उसी क्षण-
बुझा दिया जब दीप, किसी ने कहा
दीप की तरह जलो, तम हरो
सदा इंसान ।

रात से कहने मन की बात,
चँद्रमा जागा सारी रात,
भूमि की सूनी डगर निहार,
डाल आँसू चुपके दो-चार

डूबने लगे नखत बेहाल
उसी क्षण-
छिपा गगन में चाँद, किसी ने कहा-
चाँद की तरह, जलन तुम हरो
सदा इंसान।

साँस-सी दुर्बल लहरें देख,
पवन ने लिखा जलद को लेख,
पपीहा की प्यासी आवाज़,
हिलाने लगी इंद्र का राज,

धरा का कण्ठ सींचने हेतु
उसी क्षण –
बरसे झुक-झुक मेघ, किसी ने कहा-
मेघ की तरह प्यास तुम हरो
सदा इंसान ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

इतने अभी बच गए आदमी!

हाय इतने अभी बच गए आदमी,
गिनते-गिनते जिन्हें दोपहर हो गई|

रामावतार त्यागी

ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा!

कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उस के बारे में
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा।

दुष्यंत कुमार

प्रेम दीप

एक बार फिर दीपावली के बहाने से बात करते हैं|

आप सभी जानते हैं दीपावली हिंदुओं का पवित्र पर्व है| हमारी प्राचीन संस्कृति जिसे हम सामान्यतः भारतीय अथवा व्यापक रूप से हिन्दू संस्कृति के नाम से जानते है, यह संस्कृति दुनिया में निराली है| कितने ही महान संत, महात्मा और धर्म गुरू हुए हैं हमारे यहाँ|

हम कभी विश्व गुरू कहलाते रहे हैं, हमने पूरी दुनिया को प्रेम का संदेश दिया है| हमारे एक प्रतिनिधि जब विदेश में जाकर, विभिन्न देशों के विद्वानों और सामान्य जनों को ‘भाइयों और बहनों’ कहकर संबोधित करते हैं, तब सब चकित रह जाते हैं| वे ऐसा सोच ही नहीं पाते थे कि हम सब दुनिया वाले भाई बहन हैं| हम सदा से सबके सुख और कल्याण की कामना करते रहे हैं|

जिस बात का उल्लेख मैं यहाँ करना चाह रहा हूँ वह यही है कि आज कुछ लोग हिन्दू धर्म के रक्षक बनकर, हमारी संस्कृति और सभ्यता का विकृत और वीभत्स रूप प्रस्तुत कर रहे हैं| ऐसे लोगों से आज वास्तव में हिन्दू धर्म को खतरा है!

कुछ लोग कह सकते हैं कि दूसरे धर्मों में भी ऐसे लोग हैं, होंगे मैं इनकार नहीं करता, उनसे कानून द्वारा निपटा जा सकता है, लेकिन जो लोग आज विभिन्न हिन्दू सेना, बजरंग दल आदि के नाम से, धर्म रक्षा के नाम पर गुंडागर्दी करते हैं, उनके साथ सख्ती से निपटा जाना जरूरी है|

गाय की हत्या होने पर मुझे दुख होता है, लेकिन उससे कहीं अधिक दुख मुझे तब होता है, जब ऐसे किसी आरोप में किसी इंसान की हत्या कर दी जाती है|

बातें बहुत सी है कहने के लिए, लेकिन अंत में रमानाथ अवस्थी जी के शब्दों में यही कहूँगा



जो तुझमें है वो सब में है,
जो सब में है वो तुझ में है,
इसलिए प्यार को धर्म बना,
इसलिए धर्म को प्यार बना|



पुनः दीपावली की मंगल कामनाएं|

*********

ऐ शरीफ़ इंसानों!

हिंदुस्तान के एक नामवर शायर, जिनका भारतीय फिल्मों के गीत-ग़ज़ल लेखन में भी बहुत बड़ा योगदान है और जो कवि-लेखकों के स्वाभिमान की रक्षा के लिए सदा संघर्ष करते रहे, ऐसे महान शायर और गीतकार स्वर्गीय साहिर लुधियानवी जी की एक नज़्म आज शेयर कर रहा हूँ|

इस रचना में साहिर साहब ने युद्ध की विभीषिका से परिचित कराया है और बताया है कि अगर दुनिया में जंग न हो और पूरी मानव-जाति शांति से रहे तो उससे बेहतर कुछ नहीं है क्योंकि युद्ध से किसी का भला नहीं होता| लीजिए प्रस्तुत है साहिर जी की यह नज़्म-


खून अपना हो या पराया हो
नस्ल-ऐ-आदम का खून है आख़िर,
जंग मशरिक में हो या मगरिब में ,
अमन-ऐ-आलम का खून है आख़िर !

बम घरों पर गिरे कि सरहद पर ,
रूह-ऐ-तामीर जख्म खाती है !
खेत अपने जले कि औरों के ,
जीस्त फ़ाकों से तिलमिलाती है !

टैंक आगे बढे कि पीछे हटें,
कोख धरती की बांझ होती है !
फतह का जश्न हो कि हार का सोग,
जिंदगी मय्यतों पे रोती है !


जंग तो खुद ही एक मसअला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी ?
आग और खून आज बख्शेगी
भूख और एहतयाज कल देगी !

इसलिए ऐ शरीफ इंसानों ,
जंग टलती है तो बेहतर है !
आप और हम सभी के आंगन में ,
शमा जलती रहे तो बेहतर है !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
******

सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला!

आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय शायर रहे स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| निदा साहब ने गीत, ग़ज़ल, दोहे- हर विधा में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है और उनमें जो कबीर साहब जैसी साफ़गोई और फक्कड़पन दिखाई देता है, वह आज के समय में दुर्लभ है|


इस ग़ज़ल में भी उन्होंने सादगी के साथ कितनी गहरी बात कही है, वह महसूस करने लायक है| लीजिए आज प्रस्तुत है निदा फ़ाज़ली साहब की यह रचना, जिसे जगजीत सिंह जी ने अनूठे अंदाज़ में गाया है-

गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला,
चिड़ियों को दाने, बच्चों को गुड़धानी दे मौला|

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है,
सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला|

फिर रोशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें,
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला|

फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा,
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला|


तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यों हो,
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला |


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
*******

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़!

स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी बातचीत के लहजे में कविता लिखने के लिए प्रसिद्ध थे| उनके एक संकलन का नाम था ‘बुनी हुई रस्सी’, जिसका आशय है की वे कविता में रस्सी जैसी बुनावट की अपेक्षा रकहते थे| अपने मुंबई जाने के अनुभव को लेकर उन्होंने एक रचना लिखी थी- ‘जी हाँ हुज़ूर, मैं गीत बेचता हूँ’ और संकलन का नाम भी ‘गीत फ़रोश’ रखा था|


आज की रचना में भवानी दादा ने बहुत सहज अंदाज़ में भाईचारे का संदेश दिया है-

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,
हाट से लौटे, ठाठ से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे ।

बात बात में बात ठन गई,
बांह उठी और मूछ तन गई,
इसने उसकी गर्दन भींची
उसने इसकी दाढ़ी खींची ।

अब वह जीता, अब यह जीता
दोनों का बन चला फजीता;
लोग तमाशाई जो ठहरे —
सबके खिले हुए थे चेहरे !


मगर एक कोई था फक्कड़,
मन का राजम कर्रा-कक्कड़;
बढ़ा भीड़ को चीर-चार कर
बोला ‘ठहरो’ गला फाड़ कर ।

अक्कड़ मक्कड़ धूल में धक्कड़
दोनों मूरख दोनों अक्कड़,
गर्जन गूंजी, रुकना पड़ा,
सही बात पर झुकना पड़ा !

उसने कहा, सही वाणी में
डूबो चुल्लू-भर पानी में;
ताकत लड़ने में मत खोओ
चलो भाई-चारे को बोओ !

खाली सब मैदान पड़ा है
आफत का शैतान खड़ा है
ताकत ऐसे ही मत खोओ;
चलो भाई-चारे को बोओ !


सुनी मूर्खों ने जब बानी,
दोनों जैसे पानी-पानी;
लड़ना छोड़ा अलग हट गए,
लोग शर्म से गले, छंट गए ।

सबको नाहक लड़ना अखरा,
ताकत भूल गई सब नखरा;
गले मिले तब अक्कड़ मक्कड़
ख़त्म हो गया धूल में धक्कड़ !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
*********