तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है!

हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है,
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है|

राहत इन्दौरी

उजालों को क्या करूँ!

मेरे ख़ुदा मैं अपने ख़यालों को क्या करूँ,
अंधों के इस नगर में उजालों को क्या करूँ|

राजेश रेड्डी

आवारा ख्यालों की तरह!

जुस्तजू ने किसी मंजिल पे ठहरने न दिया,
हम भटकते रहें आवारा ख्यालों की तरह|

जां निसार अख़्तर