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मैं छः सेवक रखता हूँ – रुड्यार्ड किप्लिंग

आज, मैं विख्यात ब्रिटिश कवि रुड्यार्ड किप्लिंग की एक कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। श्री किप्लिंग एक ब्रिटिश कवि थे लेकिन उनका जन्म ब्रिटिश शासन के दौरान, मुम्बई में ही हुआ था। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Keep Six Honest’ का भावानुवाद-

 

 

मैं छः सेवक रखता हूँ

 

मैं अपने पास छः ईमानदार सेवक रखता हूँ
(मैं जो कुछ भी जानता हूँ, उन्होने ही मुझे सिखाया है);
उनके नाम हैं-‘क्या’ और ‘क्यों’ और ‘कब’,
तथा ‘कैसे’ और ‘कहाँ’ और ‘कौन’।
मैं उनको भेजता हूँ भूतल पर और समुद्र में,
में उनको भेजता हूँ पूर्व और पश्चिम में;
लेकिन मेरे लिए काम करने के बाद,
मैं उनको आराम करने देता हूँ।

 

मैं उनको नौ बजे से पांच बजे तक आराम करने देता हूँ,
क्योंकि तब मैं व्यस्त होता हूँ,
मैं उनको नाश्ता, भोजन और चाय भी दिलाता हूँ,
क्योंकि वे भूखे प्राणी हैं।
लेकिन इस बारे में अलग-अलग लोगों के, अलग विचार हैं;
मैं एक छोटी बच्ची को जानता हूँ-
उसके पास एक करोड़ सेवक हैं,
जिनको वह बिल्कुल आराम से नहीं बैठने देती!

 

वो उनको रवाना कर देती है अपने कामों के लिए विदेशों में,
जैसे ही उसकी आंखें खुलती हैं-
दस लाख ‘कैसे’, बीस लाख ‘कहाँ’,
और सत्तर लाख ‘क्यों’!

 

 

-Rudyard Kipling

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ

I Keep Six Honest

 

I keep six honest serving-men
(They taught me all I knew);
Their names are What and Why and When
And How and Where and Who.
I send them over land and sea,
I send them east and west;
But after they have worked for me,
I give them all a rest.
I let them rest from nine till five,
For I am busy then,
As well as breakfast, lunch, and tea,
For they are hungry men.
But different folk have different views;
I know a person small-
She keeps ten million serving-men,
Who get no rest at all!
She sends’em abroad on her own affairs,
From the second she opens her eyes-
One million Hows, two million Wheres,
And seven million Whys!

– Rudyard Kipling

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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