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उधर रास्ता न था!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

हमारे एक प्रसिद्ध फिल्मी अभिनेता, निर्माता, निर्देशक हुए हैं, अभी वे सक्रिय नहीं हैं, ईश्वर उनको लंबी उम्र दे, वे हैं- श्री मनोज कुमार।

फिल्म निर्माता के रूप में उन्होंने एक विशेष विषय पर फिल्में बनाई- देशप्रेम और देशभक्ति। उनकी फिल्म के एक गीत की पंक्ति है-


है प्रीत जहाँ की रीत सदा,
मैं गीत उसी के गाता हूँ,
भारत का रहने वाला हूँ,
भारत की बात सुनाता हूँ।


अचानक यह गीत याद आया तो खयाल आया कि देश, देशप्रेम एक बहुत अच्छा विषय है, लेकिन कवियों / शायरों के लिए मूलभूत विषय तो ज़िंदगी है। असल में उसके बाद ही, उससे जुड़कर ही बाकी सभी विषय आगे आते हैं।

श्रेष्ठ कवि श्री रामावतार त्यागी जी की पंक्तियां हैं-


एक हसरत थी कि आंचल का मुझे प्यार मिले,
मैंने मंज़िल को तलाशा, मुझे बाज़ार मिले,
ज़िंदगी और बता, तेरा इरादा क्या है!


इस गीत में वे ज़िंदगी को चुनौती देते हुए दिखाई देते हैं। बस इस ज़िंदगी के सफर से जुड़ी एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसे श्री हरिहरन, पंकज उधास और शायद और भी कई गायकों ने गाया है। इस खूबसूरत गज़ल के लेखक हैं- श्री मुमताज़ राशिद।

लीजिए इस गज़ल का आनंद लीजिए-


पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था
हम जिस तरफ़ चले थे उधर रास्ता न था।


परछाइयों के शहर की तनहाइयां न पूछ,
अपना शरीक-ए-ग़म कोई अपने सिवा न था।


पत्तों के टूटने की सदा घुट के रह गई,
जंगल में दूर-दूर, हवा का पता न था।


राशिद किसे सुनाते गली में तेरी गज़ल,
उसके मकां का कोई दरीचा खुला न था।


पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था,
हम उस तरफ़ चले थे जिधर रास्ता न था।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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कोरोना संकट- जनता, सरकार और विपक्ष!

आज एक बार फिर से मैं कोरोना संकट और लॉक डाउन के अनुभव के बारे में बात कर रहा हूँ| मैं वैसे पणजी, गोवा में रहता हूँ लेकिन लॉक-डाउन की पूरी अवधि बंगलौर में गुज़री है| लगे हाथ यहाँ के एक विशेष अनुभव का भी ज़िक्र कर दूँ| बंगलौर के हेगड़े नगर में एक विशाल रिहायशी कॉम्प्लेक्स में रह रहा हूँ, 17वीं मंज़िल पर और लॉक-डाउन के दौरान 17वीं मंज़िल से नीचे नहीं उतरा हूँ| हाँ तो एक विशेष अनुभव जिसका मैं ज़िक्र कर रहा था, वो यह कि हमारी सोसायटी में, दिन में सामान्यतः 20-25 बार बिजली जाती है, कुछ ही देर में वापस आ जाती है, शायद ‘बैक अप’ के कारण, परंतु इन्टरनेट जाता है तो उसके आने में अधिक टाइम लग जाता है| होता यह है कि कई बार जब रात में बिजली जाती है तो यह सोचकर संतोष होता है कि बिजली विभाग वाले अभी भी काम कर रहे हैं!

 

 

खैर मैं बात कर रहा था भारतवर्ष में लॉक डाउन के अनुभव के बारे में| हमारे देश ने एक सच्चे जन नायक के नेतृत्व में लॉक डाउन का प्रारंभ किया तथा क्रमशः इसके विभिन्न चरणों में हम इस महा संकट का मुक़ाबला कर रहे हैं| मोदी जी परिस्थितियों के संबंध में मुख्य मंत्रियों और विशेषज्ञों की सलाह लेने के बाद आगामी कदमों का निर्णय लेते हैं तथा समय-समय पर जनता के साथ एक सच्चे जन-नायक, एक अभिभावक की तरह संवाद करते हैं| परंतु उनके राजनैतिक विरोधी तो स्वाभाविक रूप से उनमें एक तानाशाह को ही देखते हैं, क्योंकि मोदी जी के कारण ही जनता ने उन्हें कचरे के डिब्बे में फेंक दिया है|

लॉक डाउन लागू होने के समय यह आवश्यक था कि जो जहां है, वहीं रहे और हम इस बीच चिकित्सा व्यवस्था और अन्य आवश्यक ढांचे का निर्माण कर सकें, तब तक संक्रमण अधिक न फैल पाए और हम इसमें व्यापक रूप से सफल हुए हैं, इसका प्रमाण अनेक बड़े देशों के मुक़ाबले हमारी स्थिति देखकर समझा जा सकता है|

कुछ लोग शायद ये कह सकते हैं कि हमारा वर्तमान नेतृत्व कोरोना के खतरे के बारे में पहले से नहीं जानता था, इसलिए वह परिस्थितियों का अध्ययन करने के बाद ही उनका उपाय खोजता है| शायद कोई राहुल गांधी जैसा महाज्ञानी और त्रिकालदर्शी नेता होता तो वह कोरोना को यहाँ बिलकुल पनपने ही नहीं देता| खैर मैं इस विषय में अधिक चर्चा नहीं करना चाहूँगा!

आज हम कोरोना संकट से निपटने की दृष्टि से बेहतर स्थिति में हैं और हमें धीरे-धीरे सावधानी के साथ सामान्य स्थितियाँ बहाल करने की ओर आगे बढ़ना है| इस बीच प्रवासी मजदूरों की घर वापसी का एक बड़ा संकट आया| इस संकट में कुछ स्थानों पर विपक्षी सरकारों द्वारा न केवल प्रवासी मजदूरों पर ध्यान न दिया जाना अपितु उनको वापस जाने के लिए उकसाना भी शामिल था|

इस संदर्भ में यह प्रश्न भी उठाया जाता है कि क्यों उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूर इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर के रूप में कार्य करते हैं| इस संदर्भ में हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि इन दो प्रदेशों में लंबे समय तक ऐसी क्षेत्रीय पार्टियों ने शासन किया है, जिनके पास केवल जातिवादी राजनीति थी, यह हिसाब था कि किनको ‘चार जूते’ मारने हैं| विकास तो उनका एजेंडा था ही नहीं, बस कुछ जाति और संप्रदायों को साथ लेकर उनको सत्ता में बने रहना था| वे चाहे यू पी में मुलायम सिंह, मायावती और अखिलेश यादव हों या बिहार में चारा घोटाले के महानायक- लालू प्रसाद यादव हों|

मैं आशा करता हूँ कि यूपी और बिहार की वर्तमान सरकारें ऐसी व्यवस्था करेंगी कि इन प्रदेशों से मजदूरों का पलायन भविष्य में कम से कम हो| क्योंकि वैसे तो एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में रोजगार के लिए जाना कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी संख्या में लोग विदेशों में भी जाते हैं|

अंत में एक प्रसंग याद आ रहा है, लालू प्रसाद जी के जमाने के बिहार का| मैं उन दिनों जमशेदपुर के पास, हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की मुसाबनी माइंस में काम करता था, जो अब झारखंड में हैं, उस समय बिहार में ही था, क्योंकि झारखंड राज्य बाद में बना था| हाँ तो हिंदुस्तान कॉपर की माइंस और कारखाने के बीच 8 किलोमीटर लंबी सार्वजनिक सड़क थी, जो जर्जर हालत में थी| उस कंपनी की तरफ से बिहार सरकार को पत्र लिखकर इस बात की अनुमति मांगी गई कि वे अपने खर्च पर उस सड़क की मरम्मत कर दें| इसके उत्तर में तब की बिहार सरकार से अनेक शर्तें लगाई गईं, जैसे कि सड़क पर पूरा अधिकार सरकार का रहेगा, सरकार कुछ खर्च नहीं करेगी और एक शर्त यह भी कि सरकार का एक इंजीनियर कंपनी का मेहमान बनकर काम को सुपरवाइज़ करेगा| हिंदुस्तान कॉपर प्रबंधन द्वारा यह शर्त स्वीकार नहीं की गई कि घोटालेबाज सरकार का प्रतिनिधि उनके काम को सुपरवाइज़ करे, उसमें अनावश्यक अड़ंगे लगाए और इस प्रकार वह काम नहीं हुआ|

फिर से, कोरोना संकट के बारे में बात करते हुए इतना ही कहूँगा कि हम इस अभूतपूर्व संकट का पूरी हिम्मत और विश्वास के साथ मुकाबला कर रहे हैं, और हमे विश्वास है कि हम अवश्य सफल होंगे|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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कोरोना के खतरे के बीच!

आजकल दुनिया भर में फैली कोरोना की महामारी, हजारों लोग इस भयावह रोग की भेंट चढ़ चुके हैं, ऐसे में  आज के वातावरण के बारे में कुछ बात करने का मन है। यह एक ऐसा वातावरण है, जिसका अनुभव मुझे तो अपने जीवन-काल में कभी नहीं हुआ है। ऐसी महामारी जो पूरी दुनिया में बुरी तरह फैली है और जिसका प्रसार भी इतनी तेजी से होता है कि ऐसा उदाहरण कोई दूसरा ध्यान में नहीं है।

 

 

चीन से प्रारंभ हुई इस महामारी के दुनिया पर पड़े प्रभाव को देखते हुए, भारतवर्ष में इसके लिए ऐसे उपाय किए गए जिन्हें काफी प्रभावी कहा जा सकता है, परंतु ये देश इतना बड़ा है, इतनी जटिलताएं हैं यहाँ कि कोई भी उपाय प्रभावी रूप से लागू करना संभव नहीं है।

आज हमने अपने देश को पूरी दुनिया से काट लिया है, जैसा कि अनेक देशों ने किया हुआ है, विदेशों से भारतीय लोगों को भी यहाँ लाया गया, सभी जगह लॉकडाउन को प्रभावी रूप से लागू करने का प्रयास किया गया है। सभी स्कूल, कॉलेज, दफ्तर आदि बंद हैं, लोग ‘वर्क फ्रॉम होम’ कर रहे हैं, जहाँ संभव है। ये सब संभावना है कि व्यापार को, हमारी और पूरी दुनिया की इकॉनोमी को गंभीर नुकसान होगा, वो सब देखा जाएगा बाद में, लेकिन पहले लोगों को इस महामारी से बचाना है। सबसे बड़ी समस्या है उन दैनिक मजदूरों की जो रोज कुंआ खोदते है और रोज पानी पीते हैं। उनके जो नियोजक हैं, उनसे अनुरोध किया गया है कि वे उनको वेतन आदि दें, लेकिन असंगठित क्षेत्र में यह सुनिश्चित करना लगभग असंभव है।

दिल्ली में मैंने देखा है, गुड़गांव बॉर्डर के पास और अन्य स्थानों पर भी, दैनिक मजदूर इस प्रकार रहते हैं जैसे पिंजरे में, एक कमरे में 2-3 से लेकर 7-8 लोग तक, वे लोग आज के समय में ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ का पालन तो अपने कमरों में रहते हुए भी नहीं कर सकते। उन लोगों पर इस लॉक आउट का सबसे ज्यादा असर पड़ा, क्योंकि उनके नियोजक उनको इस हालत में कुछ नहीं देने वाले। सरकार द्वारा जो व्यापक पहल की गई है उसका भी उनको शायद ठीक से संदेश नहीं पहुंच पाया और अचानक भारी भीड़ दिल्ली से और अन्य महानगरों से पैदल ही निकल पड़ी; उनके लिए बीमारी से ज्यादा बड़ा सवाल भूख का था। देखिए अब कितनों को प्रशासन के लोग रोक पाते हैं, जहाँ भी शेल्टर होम में उनको रखा जा सके।

वैसे लॉक डाउन को इस भगदड़ ने भारी नुकसान पहुंचाया है और इससे हमारे प्रयासों पर काफी बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

यही कामना है कि हमारे सम्मिलित प्रयास इस महामारी पर विजय पाने में सफल होंगे और वे लोग जो ऐसे में सामूहिक रूप से पलायन कर रहे हैं और वे लोग जो कोरोना के मरीजों को कहीं भी छिपाकर इस समस्या को और गंभीर बनाने में योगदान कर रहे हैं, उनसे अनुरोध है कि यह देशद्रोह ही नहीं मानवता के साथ अन्याय है।

इन परिस्थितियों में हमारे चिकित्सक, पुलिस और सेना, अर्धसैनिक बलों के जो लोग जनहित में अपनी ड्यूटी कर रहे हैं और मीडियाकर्मी आदि-आदि, जो भी लोग अपनी जान को जोखिम में डालकर अपना कर्त्तव्य निभा रहे हैं, वे आदर के पात्र हैं। मैंने कहीं पढ़ा था आज दुनिया में जितने कोरोना पीड़ित हैं, उनमें से लगभग 15% स्वास्थ्य कर्मी हैं। वे विशेष रूप से हमारे लिए आदरणीय हैं।

आइए हम सभी मिलकर आज इंसानियत के दुश्मन के रूप में उभरकर आई इस कोरोना महामारी को परास्त करें।

 

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

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बोल मेरी मछली कितना पानी!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है ये पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

 

 

बरसात का मौसम अपने हिस्से की तबाही मचाकर जाने वाला है, अब गरीबों को सर्दी का सामना करना होगा। क्योंकि हर मौसम की मार, गरीबों को ही तो वास्तव में सहनी पड़ती है। अमीर अथवा मध्यम वर्ग तो अपने परिधानों अथवा अनुकूलन की सुविधाओं से अपने को बचा लेते हैं, वो रूम हीटर हों अथवा कूलर, एयर कंडीशनर।

मैं  क्योंकि अब गोआ में हूँ, इसलिए दिल्ली की सर्दी और दिल्ली की गर्मी तो अब याद करने वाली बात हो गई, हाँ यहाँ बारिश दिल्ली से ज्यादा होती है।

जबकि बारिश बीतने चली है, एक खेल याद आ रहा है, जिसे खेलते हुए, हम बचपन में गाया करते ‘हरा समुंदर, गोपी चंदर, बोल मेरी मछली कितना पानी’! ये गीत अब के बच्चे तो शायद कम ही गाते होंगे, हम लोग दिल्ली, यू.पी. के इलाके में इसे गाते थे, जहाँ समुंदर आसपास नहीं था।

एक बार पहले भी मैंने इस विषय में चर्चा की है कि जहाँ, हमारे देश में वर्षा इतनी तबाही मचाती है, वहीं ‘वाटर टेबल’ लगातार नीचे जा रहा है, कुएं सूख रहे हैं, क्योंकि बस्तियां बसाने के लिए तालाबों को समाप्त कर दिया जाता है और जल संरक्षण के कोई प्रभावी उपाय नहीं किए जाते हैं। इस दिशा में सरकारों, नागरिक संगठनों और गंभीरता से काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) द्वारा कदम उठाए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि इसकी उम्मीद आप बिल्डरों से नहीं कर सकते।

पानी पर्याप्त मात्रा में जमीन के नीचे इकट्ठा होता रहे, यह आज की बहुत गंभीर आवश्यकता है, इसके लिए जो भी कदम उठाने हों, ऐसे पेड़ लगाना जो जल संरक्षण, वर्षा में सहायक हों, जो भी आवश्यक है किया जाए जिससे आने वाली पीढ़ियां हमारी लापरवाही को दोष न दें। प्रकृति में पानी की कमी नहीं है, उसके संरक्षण, बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता है, जिससे हमारी खुशियों पर पानी चढ़े, पानी फिर न जाए।

कहीं आने वाले समय में यही गूंज न सुनाई दे- ‘बोल मेरी मछली, कितना पानी’।

अंत में ये पंक्तियां याद आ रही हैं-

 

इस दुनिया में जीने वाले, ऐसे भी हैं जीते
रूखी-सूखी खाते हैं और ठंडा पानी पीते,
भूखे की भूख और प्यास जैसा।
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा।
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वैसे तो हर रंग में तेरा जलवा रंग जमाए
जब तू फिरे उम्मीदों पर तेरा रंग समझ न आए।
कली खिले तो झट आ जाए पतझड़ का पैगाम,
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा।

नमस्कार।

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