भारत का यह रेशमी नगर!

आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की एक लंबी कविता, देश की राजधानी दिल्ली के बारे में, देश की राजनीति और सामाजिक जीवन, समृद्धि, संस्कृति आदि विभिन्न पक्षों के संबंध में दिनकर जी ने विस्तार से इस कविता में अपने भाव व्यक्त किए हैं|

लीजिए प्रस्तुत है यह विशिष्ट कविता–



दिल्ली फूलों में बसी, ओस-कण से भीगी, दिल्ली सुहाग है, सुषमा है, रंगीनी है,
प्रेमिका-कंठ में पड़ी मालती की माला, दिल्ली सपनों की सेज मधुर रस-भीनी है।

बस, जिधर उठाओ दृष्टि, उधर रेशम केवल, रेशम पर से क्षण भर को आंख न हटती है,
सच कहा एक भाई ने, दिल्ली में तन पर रेशम से रुखड़ी चीज न कोई सटती है।

हो भी क्यों नहीं? कि दिल्ली के भीतर जाने, युग से कितनी सिदि्धयां समायी हैं।
औ` सबका पहुंचा काल तभी जब से उन की आंखें रेशम पर बहुत अधिक ललचायी हैं।

रेशम से कोमल तार, क्लांतियों के धागे, हैं बंधे उन्हीं से अंग यहां आजादी के,
दिल्ली वाले गा रहे बैठ निश्चिंत मगन रेशमी महल में गीत खुरदुरी खादी के।

वेतनभोगिनी, विलासमयी यह देवपुरी, ऊंघती कल्पनाओं से जिस का नाता है,
जिसको इसकी चिन्ता का भी अवकाश नहीं, खाते हैं जो वह अन्न कौन उपजाता है।

उद्यानों का यह नगर कहीं भी जा देखो, इसमें कुम्हार का चाक न कोई चलता है,
मजदूर मिलें पर, मिलता कहीं किसान नहीं, फूलते फूल, पर, मक्का कहीं न फलता है।


क्या ताना है मोहक वितान मायापुर का, बस, फूल-फूल, रेशम-रेशम फैलाया है,
लगता है, कोई स्वर्ग खमंडल से उड़कर, मदिरा में माता हुआ भूमि पर आया है।

ये, जो फूलों के चीरों में चमचमा रहीं, मधुमुखी इन्द्रजाया की सहचरियां होंगी,
ये, जो यौवन की धूम मचाये फिरती हैं, भूतल पर भटकी हुई इन्द्रपरियां होंगी।

उभरे गुलाब से घटकर कोई फूल नहीं, नीचे कोई सौंदर्य न कसी जवानी से,
दिल्ली की सुषमाओं का कौन बखान करे? कम नहीं कड़ी कोई भी स्वप्न कहानी से।

गंदगी, गरीबी, मैलेपन को दूर रखो, शुद्धोदन के पहरेवाले चिल्लाते हैं,
है कपिलवस्तु पर फूलों का शृंगार पड़ा, रथ-समारूढ़ सिद्धार्थ घूमने जाते हैं।

सिद्धार्थ देख रम्यता रोज ही फिर आते, मन में कुत्सा का भाव नहीं, पर, जगता है,
समझाये उनको कौन, नहीं भारत वैसा दिल्ली के दर्पण में जैसा वह लगता है।

भारत धूलों से भरा, आंसुओं से गीला, भारत अब भी व्याकुल विपत्ति के घेरे में।
दिल्ली में तो है खूब ज्योति की चहल-पहल, पर, भटक रहा है सारा देश अँधेरे में।


रेशमी कलम से भाग्य-लेख लिखनेवालों, तुम भी अभाव से कभी ग्रस्त हो रोये हो?
बीमार किसी बच्चे की दवा जुटाने में, तुम भी क्या घर भर पेट बांधकर सोये हो?

असहाय किसानों की किस्मत को खेतों में, कया जल मे बह जाते देखा है?
क्या खाएंगे? यह सोच निराशा से पागल, बेचारों को नीरव रह जाते देखा है?

देखा है ग्रामों की अनेक रम्भाओं को, जिन की आभा पर धूल अभी तक छायी है?
रेशमी देह पर जिन अभागिनों की अब तक रेशम क्या? साड़ी सही नहीं चढ़ पायी है।

पर तुम नगरों के लाल, अमीरों के पुतले, क्यों व्यथा भाग्यहीनों की मन में लाओगे?
जलता हो सारा देश, किन्तु, होकर अधीर तुम दौड़-दौड़कर क्यों यह आग बुझाओगे?

चिन्ता हो भी क्यों तुम्हें, गांव के जलने से, दिल्ली में तो रोटियां नहीं कम होती हैं।
धुलता न अश्रु-बुंदों से आंखों से काजल, गालों पर की धूलियां नहीं नम होती हैं।

जलते हैं तो ये गांव देश के जला करें, आराम नयी दिल्ली अपना कब छोड़ेगी?
या रक्खेगी मरघट में भी रेशमी महल, या आंधी की खाकर चपेट सब छोड़ेगी।

चल रहे ग्राम-कुंजों में पछिया के झकोर, दिल्ली, लेकिन, ले रही लहर पुरवाई में।
है विकल देश सारा अभाव के तापों से, दिल्ली सुख से सोयी है नरम रजाई में।

क्या कुटिल व्यंग्य! दीनता वेदना से अधीर, आशा से जिनका नाम रात-दिन जपती है,
दिल्ली के वे देवता रोज कहते जाते, `कुछ और धरो धीरज, किस्मत अब छपती है।´

किस्मतें रोज छप रहीं, मगर जलधार कहां? प्यासी हरियाली सूख रही है खेतों में,
निर्धन का धन पी रहे लोभ के प्रेत छिपे, पानी विलीन होता जाता है रेतों में।

हिल रहा देश कुत्सा के जिन आघातों से, वे नाद तुम्हें ही नहीं सुनाई पड़ते हैं?
निर्माणों के प्रहरियों! तुम्हें ही चोरों के काले चेहरे क्या नहीं दिखाई पड़ते हैं?

तो होश करो, दिल्ली के देवो, होश करो, सब दिन तो यह मोहिनी न चलनेवाली है,
होती जाती है गर्म दिशाओं की सांसें, मिट्टी फिर कोई आग उगलनेवाली है।

हों रहीं खड़ी सेनाएं फिर काली-काली मेंघों-से उभरे हुए नये गजराजों की,
फिर नये गरुड़ उड़ने को पांखें तोल रहे, फिर झपट झेलनी होगी नूतन बाजों की।

वृद्धता भले बंध रहे रेशमी धागों से, साबित इनको, पर, नहीं जवानी छोड़ेगी,
सिके आगे झुक गये सिद्धियों के स्वामी, उस जादू को कुछ नयी आंधियां तोड़ेंगी।

ऐसा टूटेगा मोह, एक दिन के भीतर, इस राग-रंग की पूरी बर्बादी होगी,
जब तक न देश के घर-घर में रेशम होगा, तब तक दिल्ली के भी तन पर खादी होगी।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ!


सीनियर बच्चन जी, यानि अमित भइया के पापा स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी ने भी क्या कविता लिख डाली थी- ‘अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ’| दो-दो बार तो लोगों ने इस पर फिल्म बनाई, फिर उसके बाद अब आज की सरकार, जिसने यह जिद पकड़ रखी है कि वो कुछ न कुछ काम करती ही रहेगी| अच्छी सरकार वो होती है अपने देश में, जो कोई काम न करे, सिर्फ टाइम-पास करे|

अब आप कोई नया निर्णय लेंगे, कोई नया कानून बनाएंगे, कोई योजना लाएंगे तो लंबे समय से बेरोजगार बैठे अपने पॉलिटीशियन क्या ऐसे ही बैठे रहेंगे, या आपको सलाह देंगे कि ऐसा नहीं ऐसा करो जी| कुछ भी करने पर वो तो ऐसा दिखाएंगे कि जी उन्होंने तो लोगों को रोजगार दिया हुआ था आपने उसको छीन लिया| वो तो सीधे अपनी उपद्रव सेना के साथ मैदान में निकल जाएंगे, तोड़-फोड़ करेंगे, आग लगाएंगे! यही हो रहा है न जी| ऐसे में नीतीश भैया जैसे कुछ मुख्यमंत्री जिनको लगता है कि शायद उनको कल लालू जी के बेटे के साथ मिलकर सरकार बनानी पड़ जाए, वो इस तोड़-फोड़ आगजनी की तरफ से काफी समय तक अपनी आँखें मूँद लेंगे| सत्ता में बने रहना बड़ी बात है जी, सरकारी और प्रायवेट संपत्तियों का नुकसान तो होता रहता है| इसीलिए तो बीमा कराने की सलाह दी जाती है|

कभी-कभी तो आम नागरिक की नींद अचानक ही टूट जाती है| हम समझते हैं कि हम एक न्याय-प्रिय और सभ्य समाज में रह रहे हैं| अचानक हर तरफ से हिंसक जानवर, हत्यारे किस्म के लोग निकल आते हैं, आखिर ये जानवर कहाँ छिपे थे अब तक! कुछ पसंद नहीं है तो उसका विरोध करने का अधिकार सबको है, लेकिन क्या तोड़-फोड़, आगजनी- यही विरोध का तरीका है| कुछ बच्चों को देखकर तो लगता है कि ये जानते ही नहीं कि ये क्या और क्यों कर रहे हैं| और कुछ देखने में ही पेशेवर गुंडे लगते हैं| जो लोग ऐसी किसी योजना से प्रभावित हो रहे हों, वे इन उपद्रवियों में बहुत कम होते हैं|

मैं यही कहना चाहूँगा कि राजनैतिक दलों को मैच्योर होना चाहिए, ये गुंडागर्दी करने से तो आपको गद्दी मिलने वाली नहीं है! विरोध का अधिकार तो सबको है, लेकिन गुंडागर्दी का किसी को नहीं है|

मैं एक सामान्य परंतु जागरूक नागरिक के रूप में लोगों से अपील करना चाहूँगा कि वे जहां कहीं भी हैं इस प्रकार की गुंडागर्दी को रोकने में अपनी भूमिका निबाहें| जहां योजना में कमी की बात है सरकार उस पर कुछ ध्यान दे भी रही है और इसके लिए शांतिपूर्ण आंदोलन के माध्यम से और ध्यान दिलाया जा सकता है|

मैं ईश्वर से यह भी प्रार्थना करता हूँ कि इस प्रकार के विघटनकारी और तोड़ –फोड़ को बढ़ावा देने वाले राजनीतिज्ञों से मेरे देश को छुटकारा दिलाएं, यह समस्या शीघ्र हल हो जाए और हम सुख-शांति के साथ अपना जीवन बिताएं|

धन्यवाद|
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मातृभूमि !

आज एक बार फिर मैं राष्ट्र प्रेम, स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी और ईश्वर भक्ति- इन सभी विषयों पर अपनी लेखनी के माध्यम से अनेक अमर रचनाएं प्रदान करने वाले स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी की एक और अमर रचना आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए प्रस्तुत है यह रचना-

ऊँचा खड़ा हिमालय
आकाश चूमता है,
नीचे चरण तले झुक,
नित सिंधु झूमता है।

गंगा यमुन त्रिवेणी
नदियाँ लहर रही हैं,
जगमग छटा निराली
पग पग छहर रही है।

वह पुण्य भूमि मेरी,
वह स्वर्ण भूमि मेरी।
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।

झरने अनेक झरते
जिसकी पहाड़ियों में,
चिड़ियाँ चहक रही हैं,
हो मस्त झाड़ियों में।

अमराइयाँ घनी हैं
कोयल पुकारती है,
बहती मलय पवन है,
तन मन सँवारती है।

वह धर्मभूमि मेरी,
वह कर्मभूमि मेरी।
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।

जन्मे जहाँ थे रघुपति,
जन्मी जहाँ थी सीता,
श्रीकृष्ण ने सुनाई,
वंशी पुनीत गीता।

गौतम ने जन्म लेकर,
जिसका सुयश बढ़ाया,
जग को दया सिखाई,
जग को दिया दिखाया।

वह युद्ध–भूमि मेरी,
वह बुद्ध–भूमि मेरी।
वह मातृभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी।

सोहनलाल द्विवेदी

आज के लिए इतना ही| नमस्कार|

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मेरी दिल्ली!

आज फिर से लंबे समय बाद दिल्ली-गुड़गांव क्षेत्र में आया हूँ| कुछ लिख पाऊँगा तो लिखूँगा, फिलहाल दिल्ली की एक पुरानी यात्रा से जुड़ा आलेख शेयर कर रहा हूँ|

काफी लंबे समय के बाद दिल्ली आना हुआ, उस दिल्ली में जो लगभग डेढ़ वर्ष पहले तक मेरी थी, उसी तरह जैसे और भी लाखों, करोडों लोग इस या किसी भी महानगर को अपना मानते हैं। एक फिल्म जिसका मैंने पहले भी अपने ब्लॉग में ज़िक्र किया है- ‘कांकरर्स ऑफ दा गोल्डन सिटी’, इस फिल्म में एक आदमी आता है महानगर और कहता है कि एक दिन मैं इस शहर का मालिक बन जाऊंगा, लेकिन फिल्म के अंत में वह लुट-पिटकर वापस लौटता है।

हर कोई मुकेश अंबानी तो नहीं हो सकता, वैसे मुकेश अंबानी भी किसी महानगर का मालिक होने का दावा नहीं कर सकता। हद से हद उसका अपना परिवार बहुत सी मंज़िलों वाले घर में रह लेगा, जिसमें सोचना पड़े कि आज किस ‘फ्लोर’ को धन्य किया जाए! मुझे लगता है कि पुराने जमाने के महलों में भी इस तरह की दुविधा रहा करती होगी!

फिर दिल्ली में तो जहाँ आज के बहुत सारे नव धनाढ्य रहते हैं, वहीं बहुत से महल और किले भी हैं, जिनमें से कुछ तो खंडहर भी बन चुके हैं।

इस बार जब फिर से दिल्ली आया, किसी हद तक एक टूरिस्ट की हैसियत से तो यही खयाल आया कि वह कौन सी प्रमुख बात है जो दिल्ली को दिल्ली बनाती है!

राजा-महाराजाओं के किले तो हैं ही, जिनमें मुगल काल और यहाँ तक कि महाभारत काल तक की यादें समेटी गई हैं। इसके बाद ब्रिटिश शासकों ने भी- आज का राष्ट्रपति भवन (जो शायद वायसराय हाउस था), संसद भवन, सचिवालय, बोट क्लब और ढ़ेर सारी इमारतें बनवाई थीं, जो स्थापत्य कला की बेजोड़ धरोहर हैं।

महल और सरकारी इमारतें तैयार कराने में जहाँ शासकों का हाथ होता है, वहीं कुछ मंदिर-मस्ज़िद भी शासक बनवाते हैं, इस काम में कुछ श्रद्धालु पूंजीपतियों का भी योगदान होता है, जैसे बहुत से स्थानों पर बने लक्ष्मी नारायण मंदिर आज ‘बिड़ला मंदिर’ के नाम से जाने जाते हैं, जिन्होंने उनको बनवाया है। इसमें भी प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। बिड़ला जी का अधिक जोर मंदिर बनवाने पर है तो टाटा जी का अस्पताल अथवा रोग-अनुसंधान संबंधी संस्थान बनाने पर ज्यादा ध्यान रहा है।

हाँ एक बात और कि बेशक कुछ पहल करने वाले तो रहते ही हैं, लेकिन आज के समय में भी बहुत सारे नए-नए मंदिर श्रद्धालु जनता के पैसे से बनते जाते हैं। इसमें भी यह देखना पड़ता है कि आजकल कौन से भगवान ज्यादा चल रहे हैं। आप स्वयं भी देखें तो मालूम हो जाएगा कुछ भगवान तो पिछले दस-बीस सालों में ही ज्यादा पॉपुलर हुए हैं! वैसे पिछले कुछ समय में ही दिल्ली में लोटस टेंपल और मयूर विहार के पास बना अक्षर धाम मंदिर आधुनिक समय की बड़ी उपलब्धि हैं।

खैर मैं भटकता हुआ कहाँ से कहाँ आ गया, मैं बात इस विषय पर करना चाह रहा था कि आखिर वह क्या है जो दिल्ली को दिल्ली बनाता है! दिल्ली देश की राजधानी तो है ही, देश भर के लोग यहाँ के लगभग सभी इलाकों में इस तरह रहते हैं कि इस महानगर की अपनी अलग कोई पहचान है ही नहीं। दिन-दहाड़े यहाँ कोई किसी को मारकर चला जाए, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता!

हाँ पहचान बनाने वाले तत्वों में एक तो देश की राजनैतिक सत्ता यहाँ पर है, ये देश की राजनैतिक राजधानी है, सांस्कृतिक राजधानी कहने में तो संकोच होता है, हालांकि कुछ ऐसे संस्थान यहाँ पर हैं, जैसे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, और भी बहुत हैं, जिनका योगदान इस बेदिल नगर को सांस्कृतिक केंद्र बनाने में है।

और बहुत सारी संस्थाएं आदि हैं, जैसे देश का सर्वोच्च न्यायालय यहाँ है, जो समय-समय पर देश में हलचल पैदा करता रहता है। बहुत बड़ी भूमिका इस संस्थान की है, लोकतंत्र को मजबूत बनाने में!

एक और स्थान है दिल्ली में जहाँ प्राचीनता की मिसाल- पुराना किला है और उसके बगल में ही प्रदर्शनी मैदान है, जहाँ आधुनिकतम विकास की मिसाल बहुत सी प्रदर्शनियों से मिलती है। यहाँ लगने वाले ‘पुस्तक मेले’ भी साहित्य-प्रेमियों के लिए बहुत उपयोगी होते हैं।

बस ऐसे ही कुछ स्थानों, संस्थानों, गतिविधियों के बारे में बात करने का मन था, जो इस बेदिल शहर को अच्छी पहचान दिलाते हैं। वैसे बुरी पहचान दिलाने वाले तत्व तो बड़े शहरों में होते ही हैं।

आगे अगर टाइम मिला और मूड भी हुआ तो इन स्थानों, संस्थानों और गतिविधियों के बारे में बात करूंगा, जो राजधानी दिल्ली की पहचान हैं।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार ।
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हिंदोस्ताँ कहां है अब!

ये रोज कोई पूछता है मेरे कान में
हिंदोस्ताँ कहां है अब हिंदोस्तान में।

उदय प्रताप सिंह

वह मातृभूमि मेरी

आज फिर से मैं भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अभियान को अपने स्वर प्रदान करने वाले महान कवि , गांधी जी के लिए ‘चल पड़े जिधर दो डग मग में’, ‘वंदना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो आदि अनेक प्रेरक रचना करने वाले स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी की एक और, भारतवर्ष का गौरव गान करने वाली कविता शेयर कर रहा हूँ| |

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी की यह कविता-


ऊँचा खड़ा हिमालय
आकाश चूमता है,
नीचे चरण तले झुक,
नित सिंधु झूमता है।

गंगा यमुन त्रिवेणी
नदियाँ लहर रही हैं,
जगमग छटा निराली
पग पग छहर रही है।

वह पुण्य भूमि मेरी,
वह स्वर्ण भूमि मेरी।
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।

झरने अनेक झरते
जिसकी पहाड़ियों में,
चिड़ियाँ चहक रही हैं,
हो मस्त झाड़ियों में।

अमराइयाँ घनी हैं
कोयल पुकारती है,
बहती मलय पवन है,
तन मन सँवारती है।

वह धर्मभूमि मेरी,
वह कर्मभूमि मेरी।
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।

जन्मे जहाँ थे रघुपति,
जन्मी जहाँ थी सीता,
श्रीकृष्ण ने सुनाई,
वंशी पुनीत गीता।

गौतम ने जन्म लेकर,
जिसका सुयश बढ़ाया,
जग को दया सिखाई,
जग को दिया दिखाया।


वह युद्ध–भूमि मेरी,
वह बुद्ध–भूमि मेरी।
वह मातृभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सार्वजनिक ज़िंदगी!

आज मैं स्वर्गीय सुदामा प्रसाद पांडे जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जिनको कविता की दुनिया में ‘धूमिल’ नाम से जाना जाता था| धूमिल जी के पास चीजों और घटनाओं को देखने का अलग ही नजरिया था, एक अलग मुहावरा था, जिसमें वे आम आदमी की स्थितियों का बड़ा सटीक वर्णन करते थे|


लीजिए आज प्रस्तुत है धूमिल जी की यह कविता –

मैं होटल के तौलिया की तरह
सार्वजनिक हो गया हूँ
क्या ख़ूब, खाओ और पोंछो,
ज़रा सोचो,
यह भी क्या ज़िन्दगी है
जो हमेशा दूसरों के जूठ से गीली रहती है।
कटे हुए पंजे की तरह घूमते हैं अधनंगे बच्चे
गलियों में गोलियाँ खेलते हैं
मगर अव्वल यह कि
देश के नक़्शे की लकीरें इन पर निर्भर हैं
और दोयम यह कि
न सही मुझसे सही आदमी होने की उम्मीद
मगर आज़ादी ने मुझे यह तो सिखलाया है
कि इश्तहार कहाँ चिपकाना है
और पेशाब कहाँ करना है

और इसी तरह ख़ाली हाथ
वक़्त-बेवक़्त मतदान करते हुए
हारे हुओं को हींकते हुए
सफलों का सम्मान करते हुए
मुझे एक जनतान्त्रिक मौत मरना है।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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उधर रास्ता न था!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

हमारे एक प्रसिद्ध फिल्मी अभिनेता, निर्माता, निर्देशक हुए हैं, अभी वे सक्रिय नहीं हैं, ईश्वर उनको लंबी उम्र दे, वे हैं- श्री मनोज कुमार।

फिल्म निर्माता के रूप में उन्होंने एक विशेष विषय पर फिल्में बनाई- देशप्रेम और देशभक्ति। उनकी फिल्म के एक गीत की पंक्ति है-


है प्रीत जहाँ की रीत सदा,
मैं गीत उसी के गाता हूँ,
भारत का रहने वाला हूँ,
भारत की बात सुनाता हूँ।


अचानक यह गीत याद आया तो खयाल आया कि देश, देशप्रेम एक बहुत अच्छा विषय है, लेकिन कवियों / शायरों के लिए मूलभूत विषय तो ज़िंदगी है। असल में उसके बाद ही, उससे जुड़कर ही बाकी सभी विषय आगे आते हैं।

श्रेष्ठ कवि श्री रामावतार त्यागी जी की पंक्तियां हैं-


एक हसरत थी कि आंचल का मुझे प्यार मिले,
मैंने मंज़िल को तलाशा, मुझे बाज़ार मिले,
ज़िंदगी और बता, तेरा इरादा क्या है!


इस गीत में वे ज़िंदगी को चुनौती देते हुए दिखाई देते हैं। बस इस ज़िंदगी के सफर से जुड़ी एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसे श्री हरिहरन, पंकज उधास और शायद और भी कई गायकों ने गाया है। इस खूबसूरत गज़ल के लेखक हैं- श्री मुमताज़ राशिद।

लीजिए इस गज़ल का आनंद लीजिए-


पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था
हम जिस तरफ़ चले थे उधर रास्ता न था।


परछाइयों के शहर की तनहाइयां न पूछ,
अपना शरीक-ए-ग़म कोई अपने सिवा न था।


पत्तों के टूटने की सदा घुट के रह गई,
जंगल में दूर-दूर, हवा का पता न था।


राशिद किसे सुनाते गली में तेरी गज़ल,
उसके मकां का कोई दरीचा खुला न था।


पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था,
हम उस तरफ़ चले थे जिधर रास्ता न था।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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कोरोना संकट- जनता, सरकार और विपक्ष!

आज एक बार फिर से मैं कोरोना संकट और लॉक डाउन के अनुभव के बारे में बात कर रहा हूँ| मैं वैसे पणजी, गोवा में रहता हूँ लेकिन लॉक-डाउन की पूरी अवधि बंगलौर में गुज़री है| लगे हाथ यहाँ के एक विशेष अनुभव का भी ज़िक्र कर दूँ| बंगलौर के हेगड़े नगर में एक विशाल रिहायशी कॉम्प्लेक्स में रह रहा हूँ, 17वीं मंज़िल पर और लॉक-डाउन के दौरान 17वीं मंज़िल से नीचे नहीं उतरा हूँ| हाँ तो एक विशेष अनुभव जिसका मैं ज़िक्र कर रहा था, वो यह कि हमारी सोसायटी में, दिन में सामान्यतः 20-25 बार बिजली जाती है, कुछ ही देर में वापस आ जाती है, शायद ‘बैक अप’ के कारण, परंतु इन्टरनेट जाता है तो उसके आने में अधिक टाइम लग जाता है| होता यह है कि कई बार जब रात में बिजली जाती है तो यह सोचकर संतोष होता है कि बिजली विभाग वाले अभी भी काम कर रहे हैं!

 

 

खैर मैं बात कर रहा था भारतवर्ष में लॉक डाउन के अनुभव के बारे में| हमारे देश ने एक सच्चे जन नायक के नेतृत्व में लॉक डाउन का प्रारंभ किया तथा क्रमशः इसके विभिन्न चरणों में हम इस महा संकट का मुक़ाबला कर रहे हैं| मोदी जी परिस्थितियों के संबंध में मुख्य मंत्रियों और विशेषज्ञों की सलाह लेने के बाद आगामी कदमों का निर्णय लेते हैं तथा समय-समय पर जनता के साथ एक सच्चे जन-नायक, एक अभिभावक की तरह संवाद करते हैं| परंतु उनके राजनैतिक विरोधी तो स्वाभाविक रूप से उनमें एक तानाशाह को ही देखते हैं, क्योंकि मोदी जी के कारण ही जनता ने उन्हें कचरे के डिब्बे में फेंक दिया है|

लॉक डाउन लागू होने के समय यह आवश्यक था कि जो जहां है, वहीं रहे और हम इस बीच चिकित्सा व्यवस्था और अन्य आवश्यक ढांचे का निर्माण कर सकें, तब तक संक्रमण अधिक न फैल पाए और हम इसमें व्यापक रूप से सफल हुए हैं, इसका प्रमाण अनेक बड़े देशों के मुक़ाबले हमारी स्थिति देखकर समझा जा सकता है|

कुछ लोग शायद ये कह सकते हैं कि हमारा वर्तमान नेतृत्व कोरोना के खतरे के बारे में पहले से नहीं जानता था, इसलिए वह परिस्थितियों का अध्ययन करने के बाद ही उनका उपाय खोजता है| शायद कोई राहुल गांधी जैसा महाज्ञानी और त्रिकालदर्शी नेता होता तो वह कोरोना को यहाँ बिलकुल पनपने ही नहीं देता| खैर मैं इस विषय में अधिक चर्चा नहीं करना चाहूँगा!

आज हम कोरोना संकट से निपटने की दृष्टि से बेहतर स्थिति में हैं और हमें धीरे-धीरे सावधानी के साथ सामान्य स्थितियाँ बहाल करने की ओर आगे बढ़ना है| इस बीच प्रवासी मजदूरों की घर वापसी का एक बड़ा संकट आया| इस संकट में कुछ स्थानों पर विपक्षी सरकारों द्वारा न केवल प्रवासी मजदूरों पर ध्यान न दिया जाना अपितु उनको वापस जाने के लिए उकसाना भी शामिल था|

इस संदर्भ में यह प्रश्न भी उठाया जाता है कि क्यों उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूर इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर के रूप में कार्य करते हैं| इस संदर्भ में हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि इन दो प्रदेशों में लंबे समय तक ऐसी क्षेत्रीय पार्टियों ने शासन किया है, जिनके पास केवल जातिवादी राजनीति थी, यह हिसाब था कि किनको ‘चार जूते’ मारने हैं| विकास तो उनका एजेंडा था ही नहीं, बस कुछ जाति और संप्रदायों को साथ लेकर उनको सत्ता में बने रहना था| वे चाहे यू पी में मुलायम सिंह, मायावती और अखिलेश यादव हों या बिहार में चारा घोटाले के महानायक- लालू प्रसाद यादव हों|

मैं आशा करता हूँ कि यूपी और बिहार की वर्तमान सरकारें ऐसी व्यवस्था करेंगी कि इन प्रदेशों से मजदूरों का पलायन भविष्य में कम से कम हो| क्योंकि वैसे तो एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में रोजगार के लिए जाना कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी संख्या में लोग विदेशों में भी जाते हैं|

अंत में एक प्रसंग याद आ रहा है, लालू प्रसाद जी के जमाने के बिहार का| मैं उन दिनों जमशेदपुर के पास, हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की मुसाबनी माइंस में काम करता था, जो अब झारखंड में हैं, उस समय बिहार में ही था, क्योंकि झारखंड राज्य बाद में बना था| हाँ तो हिंदुस्तान कॉपर की माइंस और कारखाने के बीच 8 किलोमीटर लंबी सार्वजनिक सड़क थी, जो जर्जर हालत में थी| उस कंपनी की तरफ से बिहार सरकार को पत्र लिखकर इस बात की अनुमति मांगी गई कि वे अपने खर्च पर उस सड़क की मरम्मत कर दें| इसके उत्तर में तब की बिहार सरकार से अनेक शर्तें लगाई गईं, जैसे कि सड़क पर पूरा अधिकार सरकार का रहेगा, सरकार कुछ खर्च नहीं करेगी और एक शर्त यह भी कि सरकार का एक इंजीनियर कंपनी का मेहमान बनकर काम को सुपरवाइज़ करेगा| हिंदुस्तान कॉपर प्रबंधन द्वारा यह शर्त स्वीकार नहीं की गई कि घोटालेबाज सरकार का प्रतिनिधि उनके काम को सुपरवाइज़ करे, उसमें अनावश्यक अड़ंगे लगाए और इस प्रकार वह काम नहीं हुआ|

फिर से, कोरोना संकट के बारे में बात करते हुए इतना ही कहूँगा कि हम इस अभूतपूर्व संकट का पूरी हिम्मत और विश्वास के साथ मुकाबला कर रहे हैं, और हमे विश्वास है कि हम अवश्य सफल होंगे|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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कोरोना के खतरे के बीच!

आजकल दुनिया भर में फैली कोरोना की महामारी, हजारों लोग इस भयावह रोग की भेंट चढ़ चुके हैं, ऐसे में  आज के वातावरण के बारे में कुछ बात करने का मन है। यह एक ऐसा वातावरण है, जिसका अनुभव मुझे तो अपने जीवन-काल में कभी नहीं हुआ है। ऐसी महामारी जो पूरी दुनिया में बुरी तरह फैली है और जिसका प्रसार भी इतनी तेजी से होता है कि ऐसा उदाहरण कोई दूसरा ध्यान में नहीं है।

 

 

चीन से प्रारंभ हुई इस महामारी के दुनिया पर पड़े प्रभाव को देखते हुए, भारतवर्ष में इसके लिए ऐसे उपाय किए गए जिन्हें काफी प्रभावी कहा जा सकता है, परंतु ये देश इतना बड़ा है, इतनी जटिलताएं हैं यहाँ कि कोई भी उपाय प्रभावी रूप से लागू करना संभव नहीं है।

आज हमने अपने देश को पूरी दुनिया से काट लिया है, जैसा कि अनेक देशों ने किया हुआ है, विदेशों से भारतीय लोगों को भी यहाँ लाया गया, सभी जगह लॉकडाउन को प्रभावी रूप से लागू करने का प्रयास किया गया है। सभी स्कूल, कॉलेज, दफ्तर आदि बंद हैं, लोग ‘वर्क फ्रॉम होम’ कर रहे हैं, जहाँ संभव है। ये सब संभावना है कि व्यापार को, हमारी और पूरी दुनिया की इकॉनोमी को गंभीर नुकसान होगा, वो सब देखा जाएगा बाद में, लेकिन पहले लोगों को इस महामारी से बचाना है। सबसे बड़ी समस्या है उन दैनिक मजदूरों की जो रोज कुंआ खोदते है और रोज पानी पीते हैं। उनके जो नियोजक हैं, उनसे अनुरोध किया गया है कि वे उनको वेतन आदि दें, लेकिन असंगठित क्षेत्र में यह सुनिश्चित करना लगभग असंभव है।

दिल्ली में मैंने देखा है, गुड़गांव बॉर्डर के पास और अन्य स्थानों पर भी, दैनिक मजदूर इस प्रकार रहते हैं जैसे पिंजरे में, एक कमरे में 2-3 से लेकर 7-8 लोग तक, वे लोग आज के समय में ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ का पालन तो अपने कमरों में रहते हुए भी नहीं कर सकते। उन लोगों पर इस लॉक आउट का सबसे ज्यादा असर पड़ा, क्योंकि उनके नियोजक उनको इस हालत में कुछ नहीं देने वाले। सरकार द्वारा जो व्यापक पहल की गई है उसका भी उनको शायद ठीक से संदेश नहीं पहुंच पाया और अचानक भारी भीड़ दिल्ली से और अन्य महानगरों से पैदल ही निकल पड़ी; उनके लिए बीमारी से ज्यादा बड़ा सवाल भूख का था। देखिए अब कितनों को प्रशासन के लोग रोक पाते हैं, जहाँ भी शेल्टर होम में उनको रखा जा सके।

वैसे लॉक डाउन को इस भगदड़ ने भारी नुकसान पहुंचाया है और इससे हमारे प्रयासों पर काफी बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

यही कामना है कि हमारे सम्मिलित प्रयास इस महामारी पर विजय पाने में सफल होंगे और वे लोग जो ऐसे में सामूहिक रूप से पलायन कर रहे हैं और वे लोग जो कोरोना के मरीजों को कहीं भी छिपाकर इस समस्या को और गंभीर बनाने में योगदान कर रहे हैं, उनसे अनुरोध है कि यह देशद्रोह ही नहीं मानवता के साथ अन्याय है।

इन परिस्थितियों में हमारे चिकित्सक, पुलिस और सेना, अर्धसैनिक बलों के जो लोग जनहित में अपनी ड्यूटी कर रहे हैं और मीडियाकर्मी आदि-आदि, जो भी लोग अपनी जान को जोखिम में डालकर अपना कर्त्तव्य निभा रहे हैं, वे आदर के पात्र हैं। मैंने कहीं पढ़ा था आज दुनिया में जितने कोरोना पीड़ित हैं, उनमें से लगभग 15% स्वास्थ्य कर्मी हैं। वे विशेष रूप से हमारे लिए आदरणीय हैं।

आइए हम सभी मिलकर आज इंसानियत के दुश्मन के रूप में उभरकर आई इस कोरोना महामारी को परास्त करें।

 

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

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