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ये बिल्ली जाने कब से मेरा रस्ता काट जाती है!

ज़नाब बेकल उत्साही जी भी किसी समय कवि-सम्मेलनों की शान हुआ कराते थे| आजकल तो लगता है कि उस तरह के कवि-सम्मेलन ही नहीं होते, वैसे भी मैं काफी समय पहले हिन्दी भाषी इलाका छोड़कर गोवा में आ गया हूँ, अब यहाँ कवि सम्मेलन की उम्मीद, वो भी इस कोरोना काल में! खैर पुराना समय याद आता है, जब विशेष रूप में दिल्ली में कवि सम्मेलनों का आनंद मिलता था|

आइए आज ज़नाब बेकल उत्साही जी की इस ग़ज़ल का आनंद लेते हैं-

ये दुनिया तुझसे मिलने का वसीला काट जाती है,
ये बिल्ली जाने कब से मेरा रस्ता काट जाती है|

पहुँच जाती हैं दुश्मन तक हमारी ख़ुफ़िया बातें भी,
बताओ कौन सी कैंची लिफ़ाफ़ा काट जाती है|

अजब है आजकल की दोस्ती भी, दोस्ती ऐसी,
जहाँ कुछ फ़ायदा देखा तो पत्ता काट जाती है|

तेरी वादी से हर इक साल बर्फ़ीली हवा आकर,
हमारे साथ गर्मी का महीना काट जाती है|

किसी कुटिया को जब “बेकल”महल का रूप देता हूँ,
शंहशाही की ज़िद्द मेरा अंगूठा काट जाती है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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चाँद से गिर के मर गया है वो!

आज गुलज़ार साहब की एक नज़्म शेयर कर रहा हूँ, जो उनके संकलन यार जुलाहे से ली गई है| गुलज़ार शायरी, रंगमंच और फिल्मों की दुनिया का जाना-माना नाम है| वे विशेष रूप से शायरी में एक्सपेरीमेंट के लिए जाने जाते हैं|

यह नज़्म भी कुछ अलग तरह की है| गुलज़ार साहब के संकलन ‘यार जुलाहे’ से लीजिए प्रस्तुत है ये नज़्म-

 

वो जो शायर था चुप सा रहता था
बहकी-बहकी सी बातें करता था,
आँखें कानों पे रख के सुनता था
गूंगी ख़ामोशियों की आवाज़ें|
जमा करता था चाँद के साए,
गीली-गीली सी नूर की बूंदें
ओक़ में भर के खड़खड़ाता था|
रूखे-रूखे से रात के पत्ते
वक़्त के इस घनेरे जंगल में,
कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था|
हाँ वही वो अजीब सा शायर
रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की ठोडी चूमा करता था|
चाँद से गिर के मर गया है वो,
लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है|

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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