हमने अपना सब कुछ खोया!

आज फिल्म- ‘सरस्वतीचन्द्र’ के लिए इंदीवर जी का लिखा एक प्रसिद्ध गीत शेयर कर रहा हूँ जिसे मुकेश जी ने अपने अनूठे अंदाज़ में गाया था| फिल्म- सरस्वतीचन्द्र के लिए कल्याणजी आनंदजी द्वारा संगीतबद्ध किए गए कई गीत काफी प्रसिद्ध हुए थे, जिनमें – ‘फूल तुम्हें भेजा है खत में’, ‘मैं तो भूल चली बाबुल का देश‘ भी शामिल हैं|

मुकेश जी को विशेष रूप से ऐसे दर्द भरे गीतों के लिए जाना जाता है , यद्यपि उन्होंने मस्ती भरे गीत भी बहुत गाये हैं, लेकिन उनकी पहचान दर्द भरे गीतों से ज्यादा बनी है|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस मुकेश जी के द्वारा गाये गए इस मधुर गीत के बोल:

हमने अपना सब कुछ खोया
प्यार तेरा पाने को,
छोड़ दिया क्यों प्यार ने तेरे
दर-दर भटकाने को|
प्यार तेरा पाने को|
हम ने अपना …

वो आँसू जो बह नहीं पाए,
वो बातें जो कह नहीं पाए,
दिल में छुपाए फ़िरते हैं अब,
घुटकर मर जाने को|
प्यार तेरा पाने को|
हम ने अपना …

उसकी रहे तू जिसकी हो ली,
तुझको मुबारक़ प्यार की डोली,
बैठ गए हम ग़म की चिता पर,
ज़िन्दा जल जाने को|
प्यार तेरा पाने को
हम ने अपना …

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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संगीत अमर कर दो!

आकाश का सूनापन,
मेरे तनहा मन में|
पायल छनकाती तुम,
आजाओ जीवन में|
साँसें देकर अपनी,
संगीत अमर कर दो|
होंठों से छूलो तुम …

इंदीवर

जीत अमर कर दो!

जग ने छीना मुझसे,
मुझे जो भी लगा प्यारा|
सब जीता किये मुझसे,
मैं हर दम ही हारा|
तुम हार के दिल अपना,
मेरी जीत अमर कर दो|
होंठों से छूलो तुम …

इंदीवर

तो देखे केवल मन!

न उम्र की सीमा हो,
न जनम का हो बंधन|
जब प्यार करे कोई,
तो देखे केवल मन|
नई रीत चलाकर तुम,
ये रीत अमर कर दो|
होंठों से छूलो तुम …

इंदीवर

प्रीत अमर कर दो!

होंठों से छू लो तुम,
मेरा गीत अमर कर दो|
बन जाओ मीत मेरे,
मेरी प्रीत अमर कर दो|

इंदीवर

जिगर मा बड़ी आग है!

ओंकारा फिल्म का एक गीत याद आ रहा जो गुलज़ार साहब ने लिखा, एक तरह से एक्स्प्रेशन के मामले में एक्सपेरीमेंट है| इस गीत का संगीत दिया है विशाल भारद्वाज जी ने और इसे गाया है सुनिधि चौहान और सुखविंदर सिंह ने| लीजिए इस गीत की कुछ पंक्तियाँ देख लेते हैं-

 

 

ना गिलाफ, ना लिहाफ,
ठंडी हवा भी खिलाफ ससुरी,
इत्ती सर्दी है किसी का लिहाफ लै ले,
जा पड़ौसी के चूल्हे से आग लै ले|

 

बीड़ी जलाई ले, जिगर से पिया,
जिगर मा बड़ी आग है!

अब बात ये है कि हमारे विभिन्न अंगों की अलग-अलग भूमिका होती हैं जिन्हें चिकित्सक अच्छी तरह जानते हैं| लेकिन इन अंगों की दूसरी भूमिका भी होती है, जिसको कवि-शायर ज्यादा अच्छी तरह जानते हैं| इन अंगों में से सबसे खराब हालत बेचारे दिल की होती है, जिसके बारे में मैंने पहले भी अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में लिखा है| उसे बेचारे को बार-बार टूटना पड़ता है, कभी खिलौना बनना पड़ता है| अब उर्दू शायरी में दिल का काम तो टूटना होता ही है, परंतु हृदय में तो पहले ठेस ही लगती थी, लेकिन पूरब-पश्चिम के गीत में इंदीवर जी ने बेचारे हृदय को भी तोड़ ही डाला|

 

कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे
तड़पता हुआ जब कोई छोड दे, 
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
मेरा दर खुला है, खुला ही रहेगा, 
तुम्हारे लिए|

 

ऐसे बहुत से उदाहरण खोजे जा सकते हैं जिनमें हमारे अंगों को शायरों की कल्पना को रूपायित करने के लिए अजीब भूमिकाएँ निभानी पड़ती हैं| जैसे ऊपर जिस गीत का उल्लेख किया गया है, उसमें जिगर को एक अलग तरह की भूमिका दी गई है| वैसे चिकित्सकों की निगाह में जिगर की जो भी भूमिका हो, हम ऐसा कहते हैं- उसमें बहुत जिगरा है, यानि हिम्मत है|

लेकिन ऊपर उल्लिखित फिल्म- ओंकारा के गीत में तो जिगर बेचारे को लाइटर या अंगीठी की भूमिका दे दी गई, भला जिगर बेचारा क्या बीड़ी जलाने के काम आएगा| लेकिन जब शायर ऐसा चाहते हैं, तो ऐसा ही सही| वैसे गीत यह बड़ा मजेदार है| आज इसके बहाने ही कुछ बात करने का मन हुआ सो कर ली, हमको भी तो कुछ क्रिएटिव आज़ादी है न जी|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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