इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें!

ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें,
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं|

जाँ निसार अख़्तर

फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं!

देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ,
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं|

जाँ निसार अख़्तर

ख़्वाब पलकों पे सजाने के लिए हैं!

आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे,
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं|

जाँ निसार अख़्तर

फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं!

सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की,
वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं|

जाँ निसार अख़्तर

दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं!

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें,
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं|

जाँ निसार अख़्तर

फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं!

अशआ’र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं,
कुछ शेर फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं|

जाँ निसार अख़्तर

रात गए कोई किरन मेरे बराबर!

जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर,
चुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो|

जाँ निसार अख़्तर

नद्दी कोई बल खाए तो लगता है!

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर,
नद्दी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो|

जाँ निसार अख़्तर

महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का!

संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का,
झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो|

जाँ निसार अख़्तर

लचक जाए तो लगता है कि तुम हो!

जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में,
शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो|

जाँ निसार अख़्तर