मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं!

इक ये घर जिस घर में मेरा साज़-ओ-सामाँ रहता है,
इक वो घर जिसमें मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं।

जावेद अख़्तर

सारी भोली बातें रहती थीं!

इक ये दिन जब ज़हन में सारी अय्यारी की बातें हैं,
इक वो दिन जब दिल में सारी भोली बातें रहती थीं।

जावेद अख़्तर

पलकें बोझल रहती थीं!

इक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं,
इक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझल रहती थीं।

जावेद अख़्तर

सारी सड़कें रूठी रूठी लगती हैं!

इक ये दिन जब सारी सड़कें रूठी रूठी लगती हैं,
इक वो दिन जब ‘आओ खेलें’ सारी गलियाँ कहती थीं|

जावेद अख़्तर

एक ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं!

इक ये दिन जब लाखों ग़म और काल पड़ा है आँसू का,
इक वो दिन जब एक ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं|

जावेद अख़्तर

इक ये दिन जब–

इक ये दिन जब अपनों ने भी हमसे रिश्ता तोड़ लिया,
इक वो दिन जब पेड़ की शाख़े बोझ हमारा सहती थीं|

जावेद अख़्तर

मुझको यक़ीं है!

मुझको यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं,
जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ रहती थीं|

जावेद अख्तर

उस शख़्स को भुलाए कौन!

अब सुकूं है तो भूलने में है,
लेकिन उस शख़्स को भुलाए कौन|

जावेद अख़्तर