वो बस्ती भी जल रही है!

न जलने पाते थे जिसके चूल्हे भी हर सवेरे,
सुना है कल रात से वो बस्ती भी जल रही है|

जावेद अख़्तर

तुम्हारी दीवार गल रही है!

मैं क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन,
मेरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है|

जावेद अख़्तर

ज़ंजीर धीरे-धीरे पिघल रही है!

जो मुझको ज़िंदा जला रहे हैं वो बेख़बर हैं,
कि मेरी ज़ंजीर धीरे-धीरे पिघल रही है|

जावेद अख़्तर

टूटे हुए खिलौने का!

है पाश-पाश मगर फिर भी मुस्कुराता है,
वो चेहरा जैसे हो टूटे हुए खिलौने का |

जावेद अख़्तर

कोई न रंज खोने का!

ये ज़िन्दगी भी अजब कारोबार है कि मुझे,
ख़ुशी है पाने की कोई न रंज खोने का|

जावेद अख़्तर

फिर दर्द कोई बोने का!

जो फ़स्ल ख़्वाब की तैयार है तो ये जानो,
कि वक़्त आ गया फिर दर्द कोई बोने का|

जावेद अख़्तर

अल्फ़ाज़ में पिरोने का!

अगर पलक पे है मोती तो ये नहीं काफ़ी,
हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का|

जावेद अख़्तर

शौक़ है क्या आस्तीं भिगोने का!

बहाना ढूँढते रहते हैं कोई रोने का,
हमें ये शौक़ है क्या आस्तीं भिगोने का|

जावेद अख़्तर

जैसा कहते हो सब वैसा वैसा होगा!

मेरे कुछ पल मुझको दे दो बाकी सारे दिन लोगो,
तुम जैसा जैसा कहते हो सब वैसा वैसा होगा|

जावेद अख़्तर

वो लम्हा कितना हसीं था मगर!

तुम्हें भी याद नहीं और मैं भी भूल गया,
वो लम्हा कितना हसीं था मगर फ़ुज़ूल गया|

जावेद अख़्तर