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वो कुछ इस सादगी से मिलता है!

आज मैं उर्दू के प्रसिद्ध शायर जिगर मुरादाबादी साहब की एक गज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ| उस्ताद शायरों का अंदाज़ ए बयां क्या होता है, ये ऐसे माहिर शायरों की शायरी को सुन कर मालूम होता है, मामूली सी बात उनके अशआर में ढलकर लाजवाब बन जाती है|


आइए आज इस गज़ल का आनंद लेते हैं-



आदमी आदमी से मिलता है,
दिल मगर कम किसी से मिलता है|

भूल जाता हूँ मैं सितम उसके,
वो कुछ इस सादगी से मिलता है|

आज क्या बात है कि फूलों का,
रंग तेरी हँसी से मिलता है|

मिल के भी जो कभी नहीं मिलता,
टूट कर दिल उसी से मिलता है|

कारोबार-ए-जहाँ सँवरते हैं,
होश जब बेख़ुदी से मिलता है|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|



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