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मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो !

आज मैं फिर से अपने प्रिय शायरों में से एक स्व. निदा फाज़ली जी की एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ। निदा साहब बड़ी सादगी से बहुत बड़ी बात कह देते थे। यह गज़ल को भी उनकी इस अनूठी प्रतिभा का परिचय देती है।

इसमें बताया गया है कि ज़िंदगी में चुनौतियां तो आती ही रहेंगी, लेकिन साहस के साथ हम हर चुनौती का मुक़ाबला कर सकते हैं।
लीजिए प्रस्तुत है यह बेहतरीन गज़ल-

 

 

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो,
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो।

 

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं,
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो।

 

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता,
मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो ।

 

कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा,
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो।

 

यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें,
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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