बुझते बुझते एक ज़माना लगता है!

आग का क्या है पल दो पल में लगती है,
बुझते बुझते एक ज़माना लगता है|

कैफ़ भोपाली

सीधा दिल पे निशाना लगता है!

तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं,
सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है|

कैफ़ भोपाली

तेरे आगे चाँद पुराना लगता है!

तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है,
तेरे आगे चाँद पुराना लगता है|

कैफ़ भोपाली

बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा!

‘कैफ़’ परदेस में मत याद करो अपना मकाँ,
अब के बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा|

कैफ़ भोपाली

बच्चे निकल आए होंगे!

खेलने के लिए बच्चे निकल आए होंगे,
चाँद अब उसकी गली में उतर आया होगा|

कैफ़ भोपाली

तितली को गिरा कर देखो!

गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो,
आँधियो तुम ने दरख़्तों को गिराया होगा|

कैफ़ भोपाली

लिक्खा था अंधेरा शायद!

दिल की क़िस्मत ही में लिक्खा था अंधेरा शायद,
वर्ना मस्जिद का दिया किस ने बुझाया होगा|

कैफ़ भोपाली

यही रीत है ऐ शाख़-ए-गुल!

इस गुलिस्ताँ की यही रीत है ऐ शाख़-ए-गुल,
तूने जिस फूल को पाला वो पराया होगा|

कैफ़ भोपाली

दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा!

कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा,
मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा|

कैफ़ भोपाली