सर न कांधे से सहेली के उठाया होगा!

आज जिस गीत के बोल शेयर कर रहा हूँ, वह युद्ध की पृष्ठभूमि में बनी प्रसिद्ध फिल्म- ‘हक़ीक़त’ से है और इसको चार श्रेष्ठ पुरुष गायकों- मोहम्मद रफ़ी साहब, मन्ना डे साहब, भूपेन्द्र जी और तलत महमूद जी ने बड़े खूबसूरत अन्दाज़ में गाया है| कैफ़ी आज़मी साहब का लिखा यह गीत, अपने बोलों, श्रेष्ठ अदायगी, मदन मोहन जी के लाजवाब संगीत और मोर्चे पर फौजी जवान बने कलाकारों द्वारा अदायगी के कारण एक धरोहर की तरह है|

लीजिए प्रस्तुत हैं फिल्म- ‘हक़ीक़त’ के इस यादगार गीत के बोल :


होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा,
ज़हर चुपके से दवा जानके खाया होगा|
होके मजबूर मुझे …

दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़साने सुनाए होंगे,
अश्क़ आँखों ने पिये और न बहाए होंगे,
बन्द कमरे में जो खत मेरे जलाए होंगे,
एक इक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा|

उसने घबराके नज़र लाख बचाई होगी,
दिल की लुटती हुई दुनिया नज़र आई होगी,
मेज से जब मेरी तस्वीर हटाई होगी,
हर तरफ़ मुझको तड़पता हुआ पाया होगा|
होके मजबूर मुझे …

छेड़ की बात पे अरमाँ मचल आए होंगे,
ग़म दिखावे की हँसी ने न छुपाए होंगे,
नाम पर मेरे जब आँसू निकल आए होंगे,
सर न कांधे से सहेली के उठाया होगा|

ज़ुल्फ़ ज़िद करके किसी ने जो बनाई होगी,
और भी ग़म की घटा मुखड़े पे छाई होगी,
बिजली नज़रों ने कई दिन न गिराई होगी,
रंग चेहरे पे कई रोज़ न आया होगा|
होके मजबूर मुझे …

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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समुंदर नज़र आया होगा!

अपने जंगल से जो घबरा के उड़े थे प्यासे,
हर सराब उन को समुंदर नज़र आया होगा|

कैफ़ी आज़मी

जंगल तो पराया होगा!

बिजली के तार पे बैठा हुआ हँसता पंछी,
सोचता है कि वो जंगल तो पराया होगा|

कैफ़ी आज़मी

लहू अपना पिलाया होगा!

बानी-ए-जश्न-ए-बहारां ने ये सोचा भी नहीं,
किसने कांटों को लहू अपना पिलाया होगा|

कैफ़ी आज़मी

जब सर पे न साया होगा!

पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था,
जिस्म जल जाएंगे जब सर पे न साया होगा|

कैफ़ी आज़मी

आखिर यही होता क्यों है!



भारतीय शायरों में अपनी एक खास पहचान रखने वाले ज़नाब कैफ़ी आज़मी साहब की लिखी एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| इस ग़ज़ल को जगजीत सिंह जी ने कुलदीप सिंह जी के संगीत निर्देशन में गाया है और फिल्म ‘अर्थ’ में इसे बड़ी खूबसूरती के साथ फिल्माया गया है|

ज़िंदगी में कब कौन और कैसे अकेलापन महसूस करता है, इसका अनुभव दूसरों को होना मुश्किल होता है और इसको बयान भी आसानी से नहीं किया जा सकता|

लीजिए प्रस्तुत है कैफ़ी आज़मी साहब की यह ग़ज़ल –


कोई ये कैसे बता ये के वो तन्हा क्यों है ?
वो जो अपना था वोही और किसी का क्यों है ?
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों है ?
यही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों है ?

एक ज़रा हाथ बढ़ा, दे तो पकड़ले दामन
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन
इतनी कुर्बत हैं तो फिर फ़ासला इतना क्यों है ?

दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
एक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोई
आस जो टूट गयी फिर से बंधाता क्यों है ?

तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता
हैं जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है ?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए!

आज एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ ज़नाब कैफी आज़मी साहब की लिखी हुई, कैफी आज़मी साहब हमारे देश के जाने माने और मशहूर शायर रहे हैं और उनकी बहुत सी रचनाओं का फिल्मों में भी सदुपयोग किया गया है|


कैफी आज़मी साहब की इस ग़ज़ल को फिल्म ‘हँसते जख्म’ के लिए मदन मोहन जी के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर जी ने बड़े प्रभावी ढंग से गाया था|

लीजिए प्रस्तुत है कैफी आज़मी साहब की यह ग़ज़ल –

आज सोचा तो आँसू भर आए,
मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए|

हर कदम पर उधर मुड़ के देखा,
उनकी महफ़िल से हम उठ तो आए|

दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं,
याद इतना भी कोई न आए|

रह गई ज़िंदगी दर्द बनके,
दर्द दिल में छुपाए छुपाए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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कोई शहर से आया होगा!

आज विख्यात अभिनेत्री शबाना आज़मी के पिता और हमारे देश के जाने माने शायर ज़नाब कैफ़ी आज़मी साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूं| कैफ़ी आज़मी साहब को एक विद्रोही शायर के रूप में भी जाना जाता है| एक अनोखा ही अंदाज़ था उनका बात कहने का, जैसे ‘तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो‘|

लीजिए आज प्रस्तुत है कैफ़ी आज़मी साहब की यह ग़ज़ल :



शोर यूँ ही न परिंदों ने मचाया होगा
कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा|

पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा|

बानी-ए-जश्न-ए-बहाराँ ने ये सोचा भी नहीं
किस ने काँटों को लहू अपना पिलाया होगा|

बिजली के तार पे बैठा हुआ हँसता पंछी
सोचता है कि वो जंगल तो पराया होगा|

अपने जंगल से जो घबरा के उड़े थे प्यासे
हर सराब उन को समुंदर नज़र आया होगा|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तुझे भी अपने पे ये ऐतबार है कि नहीं!

आज बिना किसी भूमिका के जनाब कैफ़ी आज़मी साहब की एक प्रसिद्ध ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जो एक फिल्म में उनकी ही बेटी शबाना आज़मी पर फिल्माई गई थी|


मन की स्थितियों को, भावनाओं को किस प्रकार ज़ुबान दी जाती है ये कैफ़ी साहब बहुत अच्छी तरह जानते थे और शायरी के मामले में वो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं|

लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारी सी ग़ज़ल-



झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं,
दबा दबा ही सही दिल में प्यार है कि नहीं |

तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता,
मेरी तरह तेरा दिल बे-क़रार है कि नहीं |

वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है,
उस एक पल का तुझे इंतज़ार है कि नहीं|


तेरी उमीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को,
तुझे भी अपने पे ये ऐतबार है कि नहीं
|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार

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