श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-1

जैसा मैंने कल लिखा था, चाहता हूँ कि अपनी रचनाएं, जितनी उपलब्ध हैं, और याद आ रही हैं, एक बार यहाँ शेयर कर लूं, जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। वैसे तो मेरा संपादकों से, कविता के संप्रभुओं से कभी कोई निकट का नाता नहीं रहा।

एक बात और, मैं हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

यह भी उल्लेख कर दूं कि मेरा जन्म दिल्ली में 23 अगस्त, 1950 को हुआ था, अधिकांश रचनाकर्म भी 1970 से 1980 के बीच दिल्ली-शाहदरा में हुआ, थोड़ा बहुत उसके बाद जयपुर, झारखंड, मध्य प्रदेश में लगभग 1990 तक हुआ। उसके बाद कविता लेखन बंद हो गया, गद्य कुछ मात्रा में लिखता रहा।

आज से मैं अपनी रचनाओं को विनम्रतापूर्वक शेयर कर रहा हूँ, ताकि रिकॉर्ड रह सके और आशा है कि आपको यह रचनाएं पसंद आएंगी। कविताओं को शेयर करने की शुरुआत उस गीत से कर रहा हूँ, जिसके आधार पर मैंने अपने ब्लॉग का नाम रखा था।

एक बात का उल्लेख और कर दूं कि दिल्ली-शाहदरा से अपनी यात्रा प्रारंभ करने के बाद, सेवा के दौरान देश में अनेक स्थानों पर रहने और 2010 में सेवानिवृत्ति के बाद, मैं पिछले लगभग 3 वर्षों से पणजी, गोआ में रह रहा हूँ।

लीजिए आज से रचनाओं को शेयर करना प्रारंभ कर रहा हूँ-

 

गीत

आसमान धुनिए के छप्पर सा!

 

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

यहाँ वहाँ चिपक गए बादल के टुकड़े
धुनिए के छप्पर सा आसमान हो गया।

 

मुक्त नभ में, मुक्त खग ने प्रेम गीत बांचे
थक गए निहारते नयन,
चिड़ियाघर में मोर नहीं नाचे,
छंदों में अनुशासित
मुक्त-गान खो गया॥

 

क्षितिजों पर लाली,
सिर पर काला आसमान
चिकनी-चुपड़ी, गतिमय
कारों की आन-बान,
पांवों पर चलने के
छींट-छींट विधि-विधान,
उमड-घुमड़ मेघ
सिर्फ कीच भर बिलो गया।
धुनिए के छप्पर सा आसमान हो गया॥

 

एक और अधूरी सी अभिव्यक्ति-

लिए चौथ का अपशकुनी चंदा रात
जाने हम पर कितने और ज़ुल्म ढाएगी,
कहने को इतना है, हर गूंगी मूरत पर
चुप रहकर सुनें अगर, उम्र बीत जाएगी।

 

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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कविता का मायाजाल!

एक समय था जब दिल्ली-शाहदरा में रहते हुए मैंने बहुत सी कवितायें, नवगीत आदि लिखे थे। मेरा जन्म 1950 में हुआ था दरियागंज, दिल्ली में लेकिन पढ़ाई शाहदरा में जाने के बाद ही शुरू हुई और 1980 तक, अथवा 30 वर्ष की आयु तक मैं शाहदरा में ही रहा। इस बीच शुरू की नौकरियां कीं, दिल्ली जंक्शन के सामने, दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी में कविता की शनिवारी सभा में भाग लेता रहा। दिल्ली में और आसपास होने वाली साहित्यिक गोष्ठियों में भाग लेता रहा और आकाशवाणी से कविताओं का प्रसारण भी थोड़ा-बहुत प्रारंभ हो गया था।

 

1980 में आकाशवाणी, जयपुर में नौकरी लग गई, प्रशासन विभाग में, अनुवादक के तौर पर तो वहाँ तो साहित्यिक गतिविधियों से सीधे तौर पर जुड़ गया। बहुत से साहित्यिक मित्र भी बने जयपुर में, जिनमें कृष्ण कल्पित भी एक थे।

जयपुर के बाद मेरी नई नौकरी थी आज के झारखण्ड में स्थित हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की मुसाबनी माइंस में, हिंदी अधिकारी के रूप में। इत्तफाक से मेरे जयपुर के कवि मित्र कृष्ण कल्पित भी आकाशवाणी, रांची मे कार्यकम निष्पादक बनकर आ गए थे और उन्होंने मुझे अनेक बार वहाँ रहते हुए कविताओं की रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया।

यहाँ ये भी बता दूं कि दिल्ली में रहते हुए जिन श्रेष्ठ साहित्यकारों से परिचय हुआ उनमें स्व. श्री रमेश रंजक भी शामिल थे, उन्होंने मेरा एक गीत सुनकर कहा कि ये मुझे लिखकर दे दो, नचिकेता जी गीत संकलन ‘अंतराल-4’ निकाल रहे हैं, जिसमें देश के श्रेष्ठ नवगीतकार शामिल होंगे, तब मैंने एक गीत लिखकर दिया और वह उसमें प्रकाशित हुआ।

यह मैं इसलिए बता रहा हूँ कि छपने पर मेरा कभी जोर नहीं रहा, जो कविताएं प्रकाशित हुईं वे सामान्यतः लघु-पत्रिकाओं में ही प्रकाशित हुईं और निरंतर स्थान बदलते रहने के कारण मैं वे पत्र-पत्रिकाएं आदि भी संभालकर नहीं रख पाया। दिल्ली में हमारे एक संबंधी के यहाँ बहुत दिन तक मेरी मेरी पुस्तकें/पत्रिकाएं आदि पड़ी रहीं , जिनको उन्होंने बाद में किसी पुस्तकालय को दान कर दिया, क्योंकि चूहों की रुचि उस संग्रह में काफी बढ़ गई थी।

खैर आकाशवाणी से नाता मेरा, आकाशवाणी, रीवा तक रहा लेकिन पत्र-पत्रिकाओं से संपर्क दूरस्थ इलाकों में रहने के कारण नहीं रह पाया।

फिर दिल्ली की याद आ रही है, क्योंकि मेरा अधिकतर लेखन दिल्ली में रहते हुए ही हुआ था। दिल्ली में ही मेरे साहित्यकार मित्र – श्री योगेंद्र दत्त शर्मा जी, प्रकाशन विभाग की पत्रिका –‘आजकल’ का संपादन करते थे, उसमें उन्होंने मेरी कुछ कविताएं प्रकाशित कीं। मैं यह भी बताना चाहूंगा कि मेरे नवगीतों को वरिष्ठ रचनाकारों से काफी प्रशंसा प्राप्त हुई थी और नवगीत से संबंधित पुस्तकों, शोध में भी उनका कई बार उल्लेख किया गया है।

यह बात मुझे इसलिए याद आ रही है कि मैं देखता हूँ ऑनलाइन हिंदी कवियों और उनकी रचनाओं के संकलन उपलब्ध हैं और उनमें मेरा नाम नहीं आ पाया है। वैसे भी आज के समय में लोगों को अपना ढिंढोरा खुद ही पीटना पड़ता है।

इसी क्रम में मुझे एक घटना याद आ रही है। मेरे साहित्यकार-संपादक मित्र- श्री योगेंद्र दत्त शर्मा जब सेवानिवृत्त हुए, तब मुझे यह खबर मिली, असल में दुर्गम स्थानों पर पोस्टिंग रहने के कारण मैं ज्यादातर अपने मित्रों से संपर्क में नहीं रह पाया।

हाँ तो जब मैंने श्री योगेंद्र दत्त शर्मा जी को फोन कियाा, बताया कि मैं श्रीकृष्ण शर्मा बोल रहा हूँ, तो उन्होंने पूछा- शाहदरा वाले ना? मैंने कहा इसका मतलब? तब वे बोले कि इस नाम से लिखने वाले दो और लोगों को वह जानते हैं, एक जयपुर वाले और एक शायद आगरा वाले!

मुझे लगता है कि एक ही जैसे नाम होने पर तो पहचान का संकट हो जाता है, इसलिए मैं अपने नाम में ‘अशेष’ जोड़कर उनको, अपने फोटो के साथ अपनी कुछ रचनाएं ब्लॉग पोस्ट्स में शेयर करूंगा, इस प्रकार कविताएं भी एक बार दोहरा ली जाएंगी और शायद कहीं बाद में नाम रह जाने की संभावना बने, बाकी तो ऊपर वाला मालिक है।

आप ही बताइये, कैसा विचार है!
नमस्कार।

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