चलो मयकदे चलें!

यारो घिर आई शाम, चलो मयकदे चलें,
याद आ रहे हैं जाम, चलो मयकदे चलें|

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

उस निगाह के बाद!

जनाब कृष्ण बिहारी ‘नूर’ साहब भारत के प्रसिद्ध उर्दू शायरों की फेहरिस्त में शामिल हैं| उनकी बहुत सी ग़ज़लें जगजीत सिंह जी ने और अन्य प्रमुख ग़ज़ल गायकों ने गाई हैं| जैसे ‘ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं, और क्या जुर्म है पता भी नहीं’ और ‘बस एक वक़्त का खंजर मेरी तलाश में है’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कृष्ण बिहारी नूर साहब की यह ग़ज़ल-

नज़र मिला न सके उससे उस निगाह के बाद।
वही है हाल हमारा जो हो गुनाह के बाद।

मैं कैसे और किस सिम्त मोड़ता ख़ुद को,
किसी की चाह न थी दिल में, तेरी चाह के बाद।

ज़मीर काँप तो जाता है, आप कुछ भी कहें,
वो हो गुनाह से पहले, कि हो गुनाह के बाद।

कहीं हुई थीं तनाबें तमाम रिश्तों की,
छुपाता सर मैं कहाँ तुम से रस्म-ओ-राह के बाद।

गवाह चाह रहे थे, वो मेरी बेगुनाही का,
जुबाँ से कह न सका कुछ, ‘ख़ुदा गवाह’ के बाद।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जीना न हो हराम, चलो मयकदे चलें!

ज़नाब कृष्ण बिहारी ‘नूर’ साहब की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| ‘नूर’ साहब उस समय शायरी के क्षेत्र में सक्रिय गिने-चुने हिन्दू शायरों में से एक थे| कई बार ऐसी प्रतियोगिता भी होती थीं, जिनमें एक मिसरे को लेकर ग़ज़ल के शेर लिखने को कहा जाता था|


एक बार ग़ज़ल लिखने के लिए मिसरा दिया गया था- ‘क़ाफिर हैं वो लोग जो कायल नहीं इस्लाम के’| इस पर नूर साहब ने शेर इस प्रकार लिखा था- ‘लाम के मानिंद हैं, गेसू मेरे घनश्याम के, क़ाफ़िर हैं वो लोग जो कायल नहीं ‘इस लाम’ के| खैर ये कहीं पढ़ा था अचानक याद आ गया|


लीजिए नूर साहब की ग़ज़ल का आनंद लीजिए-


यारो घिर आई शाम, चलो मयकदे चलें,
याद आ रहे हैं जाम, चलो मयकदे चलें|

दैरो-हरम पे खुल के जहाँ बात हो सके,
है एक ही मुक़ाम, चलो मयकदे चलें|

अच्छा, नहीं पियेंगे जो पीना हराम है,
जीना न हो हराम, चलो मयकदे चलें|


यारो जो होगा देखेंगे, ग़म से तो हो निजात,
लेकर ख़ुदा का नाम, चलो मयकदे चलें|

साक़ी भी है, शराब भी, आज़ादियाँ भी हैं,
सब कुछ है इंतज़ाम, चलो मयकदे चलें|

ऐसी फ़ज़ा में लुत्फ़े-इबादत न आएगा,
लेना है उसका नाम, चलो मयकदे चलें|


फ़ुरसत ग़मों से पाना अगर है तो आओ ‘नूर’,
सबको करें सलाम, चलो मयकदे चलें||


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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और फिर मानना पड़ता है, ख़ुदा है मुझ में

आज उर्दू शायरी के एक और सिद्धहस्त हस्ताक्षर स्वर्गीय कृष्ण बिहारी ‘नूर’ जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| नूर साहब भी अपने अलग अंदाज़ के लिए जाने जाते थे|

आइए आज इस अलग क़िस्म की ग़ज़ल का आनंद लेते हैं-



आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझ में|
और फिर मानना पड़ता है , ख़ुदा है मुझ में|

अब तो ले-दे के वही शख़्स बचा है मुझ में,
मुझको मुझ से जुदा करके जो छुपा है मुझ में|

मेरा ये हाल उभरती सी तमन्ना जैसे,
वो बड़ी देर से कुछ ढूंढ रहा है मुझ में|

जितने मौसम हैं सभी जैसे कहीं मिल जायें,
इन दिनों कैसे बताऊँ जो फ़ज़ा है मुझ में|

आईना ये तो बताता है कि मैं क्या हूँ लेकिन,
आईना इस पे है ख़मोश कि क्या है मुझ में|

अब तो बस जान ही देने की है बारी ऐ “नूर”,
मैं कहाँ तक करूँ साबित कि वफ़ा है मुझ में|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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