महक उठे गांव गांव!

स्वर्गीय किशन सरोज जी मेरे अत्यंत प्रिय गीतकार थे, मैंने पहले भी उनके बहुत से गीत शेयर किए हैं, उनसे जो स्नेह मुझे प्राप्त करने को सौभाग्य मिला उसका उल्लेख भी मैंने किया है|

अधिकतर मैंने किशन जी के वे गीत शेयर किए हैं जो मंचों पर वे पढ़ते थे| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक नवगीत, जिसमें सावन ऋतु का वर्णन करते हुए बताया गया है कि किस प्रकार विरहिन के मामले में सावन और जेठ एक साथ अपना प्रभाव दिखाते हैं–


महक उठे गांव-गांव
ले पुबांव से पछांव
बहक उठे आज द्वार, देहरी अँगनवा।

बगियन के भाग जगे
झूम उठी अमराई
बौराए बिरवा फिर
डोल उठी पुरवाई
उतराए कूल-कूल
बन-बन मुरिला बोले, गेह में सुअनवा।

घिर आए बदरा फिर
संग लगी बीजुरिया
कजराई रातें फिर
बाज उठी बांसुरिया
अन्धियरिया फैल-फैल
गहराये गैल-गैल
छिन- छिन पै काँप उठत, पौरि में दियनवा।


प्रान दहे सुधि पापिन
गली-गली है सूनी
पाहुना बिदेस गए
पीर और कर दूनी
लहराए हार-हार
मन हिरके बार-बार
जियरा में जेठ तपे, नैन में सवनवा।

(आभार- यहाँ उद्धृत करने के लिए कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध – ‘कविता कोश‘ तथा ‘Rekhta‘ से लेता हूँ)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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हमेशा की तरह!

एक बार फिर से मैं आज श्रेष्ठ गीत कवि और बहुत अच्छे इंसान, मेरे लिए बड़े भाई की तरह रहे स्वर्गीय किशन सरोज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| किशन सरोज जी के कुछ गीत तो ऐसे हैं कि उनको सुनकर आँखों में आँसू आ जाते हैं और हम बहुत कुछ सोचने को मजबूर हो जाते हैं|
लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी की यह ग़ज़ल जो सामाजिक सरोकार से जुड़ी है –

गालियाँ, गोलियाँ सब ओर हमेशा की तरह,
और चुपचाप हैं कमज़ोर हमेशा की तरह ।

काली मारूति में उठा ले गए फिर एक लड़की,
झुग्गियों में, लो मचा शोर हमेशा की तरह ।

गांव जा पाऊँ तो पूछूँ कि छत्तों पर अब भी,
नाचने आते हैं क्या मोर हमेशा की तरह ।

बेटियों से भी हमें आँख मिलाने की न ताब,
दिल में बैठा है कोई चोर हमेशा की तरह ।

कैसी घड़ियों में लड़ी प्रीति तुम्हारी ऐ किशन !
आज तक गीले हैं दृग-कोर हमेशा की तरह ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बादल-बादल भटकाया हमको!

आज फिर से मैं एक श्रेष्ठ गीतकार, सरल व्यक्तित्व के धनी और मेरे लिए बड़े भाई जैसे स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| किशन जी प्रेम के अनूठे कवि थे, यह रचना कुछ अलग तरह की है लेकिन उतनी ही प्रभावशाली है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी का यह गीत, जो यह अभिव्यक्त करता है कि प्रेम के वशीभूत होकर इंसान क्या-क्या नहीं करता है –

दो बूंदें दृग से ढलका तुमने,
बादल-बादल भटकाया हमको|

खजुराहो, कोणार्क, एलिफेंटा,
ताज, अजंता, ऐलोरा-दर्शन
हरिद्वार, तिरुपति, प्रयाग,
काशी वैष्णो देवी, मथुरा-वृन्दावन
एक नदी-भर प्यास जगा
तुमने मृगजल-मृगजल भटकाया हमको|

आग लगी मन-प्राणों में ऐसी
सिवा राख के कुछ भी नहीं बचा
लिखना था क्या-क्या लेकिन हमने
सिवा गीत के कुछ भी नहीं रचा,
गीतों की सौगात सौँप तुमने
पागल-पागल भटकाया हमको|

हर प्रात: पुरवा संग हम घूमे
दिन-दिन भर सूरज के साथ चले,
हर संध्या जुगनू-जुगनू दमके
रात-रात भर बनकर दिया जले|
झलक दिखा घूंघट-पट की तुमने
आंचल-आंचल भटकाया हमको|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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त्रिया–चरित्र हवाओं का!

मेरे अत्यंत प्रिय कवि और हमेशा बड़े भाई की तरह स्नेह से मिलने वाले, श्रेष्ठ गीतकार स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ|

किशन सरोज जी को सुनना एक अलग ही तरह का दिव्य अनुभव प्रदान करता था, प्रेम के प्रति पूर्णतः समर्पित और अनोखी अनुभूतियों से हमारा साक्षात्कार कराने वाले किशन जी एक महान व्यक्ति और रचनाकार थे|

लीजिए प्रस्तुत है किशन सरोज जी का लिखा यह अलग किस्म का गीत–


बिखरे रंग, तूलिकाओं से
बना न चित्र हवाओं का
इन्द्रधनुष तक उड़कर पहुंचा
सोंधा इत्र हवाओं का|

जितना पास रहा जो, उसको
उतना ही बिखराव मिला
चक्रवात-सा फिरा भटकता
बनकर मित्र हवाओं का|

कभी गर्म लू बनीं जेठ की
कभी श्रावनी पुरवाई
फूल देखते रहे ठगे-से
ढंग विचित्र हवाओं का|

परिक्रमा वेदी की करते
हल्दी लगे पांव कांपे
जल भर आया कहीं दॄगों में
धुँआ पवित्र हवाओं का|


कभी प्यार से माथा चूमा
कभी रूठ कर दूर हटीं
भोला बादल समझ न पाया
त्रिया–चरित्र हवाओं का|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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अगले जनम की बात छोड़ो

स्वर्गीय किशन सरोज जी असाधारण प्रतिभा वाले परंतु अत्यंत सहज और शालीन व्यवहार वाले व्यक्ति थे| उनसे मिलना, उनसे बातें करना और सबसे ज्यादा उनका काव्य पाठ सुनना बहुत अच्छा लगता था| उनके अनेक गीत मैं दिल से पसंद करता हूँ और मैंने शेयर भी किए हैं|

एक ऐसे स्वाभिमानी रचनाकार जो कहते हैं ‘नागफनी आंचल में बांध सको तब आना, धागों बिंधे गुलाब हमारे पास नहीं’|

लीजिए आज भी मैं स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ-


बीत चला यह जीवन सब
प्रिय! न दो विश्वास अभिनव
मिल सको तो अब मिलो, अगले जनम की बात छोड़ो|

भ्रान्त मन, भीगे नयन
बिखरे सुमन, यह सान्ध्य-बेला
शून्य में होता विलय
यह वन्दना का स्वर अकेला
फूल से यह गन्ध, देखो!
कह चली, `सम्बंध, देखो!
टूटकर जुड़ते नहीं फिर, मोह-भ्रम की बात छोड़ो! ‘

यह कुहासे का कफ़न
यह जागता-सोता अंधेरा
प्राण-तरू पर स्वप्न के
अभिशप्त विहगों का बसेरा
योँ न देखो प्रिय! इधर तुम,
एक ज्योँ तस्वीर गुमसुम,
अनवरत, अन्धी प्रतीक्षा, के नियम की बात छोड़ो!


यह दिये की कांपती लौ,
और यह पागल पतंगा
दूर नभ के वक्ष पर
सहमी हुई आकाश-गंगा
एक-सी सबकी कथा है,
एक ही सबकी व्यथा है,
है सभी असहाय, मेरी या स्वयम् की बात छोड़ो!

हर घड़ी, हर एक पल है,
पीर दामनगीर कोई
शीश उठते ही खनकती
पाँव में जंज़ीर कोई
आज स्वर की शक्ति बन्दी,
साध की अभिव्यक्ति बन्दी,
थक गये मन-प्राण तक, मेरे अहम की बात छोड़ो!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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देर तक शैवाल सा हिलता रहा मन!

बांचते हम रह गए अंतर्कथा,
स्वर्णकेशा गीत वधुओं की व्यथा,
ले गया चुनकर कंवल, कोई हठी युवराज,
देर तक शैवाल सा हिलता रहा मन।

किशन सरोज

हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन!

तुम गए क्या जग हुआ अंधा कुआं
रेल छूटी रह गया केवल धुआं,
हम भटकते ही फिरे बेहाल,
हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन।

किशन सरोज

ताल सा हिलता रहा मन!

धर गए मेहंदी रचे, दो हाथ जल में दीप
जन्म-जन्मों ताल सा हिलता रहा मन।

किशन सरोज

चंदन वन डूब गया 4

दाह छुपाने को अब हर पल गाना होगा,
हंसने वालों में रहकर मुस्काना होगा,
घूंघट की ओट किसे होगा संदेह कभी,
रतनारे नयनों में एक सपन डूब गया।

किशन सरोज

चंदन वन डूब गया 3

सोने से दिन, चांदी जैसी हर रात गई,
काहे का रोना जो बीती सो बात गई,
मत लाओ नैनों में नीर कौन समझेगा,
एक बूंद पानी में एक वचन डूब गया।

किशन सरोज