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कब तक प्रतीक्षारत रहें!

आज काफी समय बाद मैं अपने एक अत्यंत प्रिय कवि स्वर्गीय किशन सरोज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ, जिनका स्नेह पाने का भी अवसर मुझे मिला था|

यह रचना कवि सम्मेलनी रचनाओं से बिल्कुल अलग है और सामान्य जन के सपनों और अभिलाषाओं की बात करती है, जिनको राजनीति सिर्फ छलावा देती है| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी की यह रचना-

युग हुए संघर्ष करते
वर्ष को नव वर्ष करते
और कब तक हम प्रतीक्षारत रहें ?

धैर्य की अंधी गुफ़ा में
प्रतिध्वनित हो
लौट आईं
कल्पवृक्षी प्रार्थनाएँ,
श्वेत-वसना राज सत्ता
के महल में
गुम हुईं
जन्मों-जली सम्भावनाएँ|

अब निराशा के नगर में
पाशविक अंधियार-घर में
और कब तक दीप शरणागत रहें ?

मुठ्ठियाँ भींचे हुए
झण्डे उठाए
भीड़ बनकर रह गए हम
राजपथ की,
रक्त से बुझती मशालों
को जलाकर,
आहटें लेते रहे हम
सूर्य-रथ की

थक गए नारे लगाते
व्यर्थ ही ताली बजाते
और कब तक स्वप्न क्षत-विक्षत रहें ?

हारकर पहुँचे
इसी परिणाम पर हम,
धर्म कोई भी
न रोटी से बड़ा है,
काव्य-सर्जन हो
कि भीषण युद्ध कोई
आदमी हर बार
ख़ुद से ही लड़ा है

देह में पारा मचलता
पर न कोई बाण चलता
और कब तक धनुर्धर जड़वत रहें ?

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अभिनंदन के शाल-दुशाले!

स्वर्गीय भाई किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए और उनके एक गीत का सहारा लेते हुए कुछ बातें कहना चाहूँगा| यह गीत मैंने पहले भी एक से अधिक बार शेयर किया है, आज इसका सहारा लेकर कुछ बातें कहने का मन है|

किशन जी से कवि सम्मेलनों के सिलसिले में कुछ बार भेंट हुई और उस सहृदय इंसान को थोड़ा बहुत निकट से जानने का अवसर मिला| वैसे मैं आयोजनों के सिलसिले में जिन कवियों से मिला, केवल आयोजक के रूप में मिला’ कवि के रूप में नहीं|

हां तो आज जिस गीत के बहाने मैं बात करना चाहूंगा उसका मुखड़ा इस प्रकार है-

नागफनी आंचल में बांध सको तब आना,
धागों बिंधे गुलाब हमारे पास नहीं|


कवि सम्मेलन के मंच पर कविगण, इस उम्मीद के साथ आते हैं कि सामने बैठे श्रोताओं के मन में स्थान बना सकें और प्रशंसा प्राप्त कर लें| लेकिन मैंने मंचों पर अक्सर देखा है कि किशन जी, सोम ठाकुर आदि को श्रोतागण शांत रहकर सुन लें, यही बड़ी बात है| जो लोग ‘वाह’ करते हैं, विशाल भीड़ में उनकी नगण्य संख्या के कारण वह इतनी धीमी होती है कि मंच तक नहीं पहुँचती|

चलिए इस गीत का पहला अंतरा प्रस्तुत कर रहा हूँ-

हम तो ठहरे निपट अभागे
आधे सोये, आधे जागे,
थोड़े सुख के लिये उम्र भर
गाते फिरे भीड़ के आगे,
कहाँ-कहाँ हम कितनी बार हुए अपमानित,
इसका सही हिसाब, हमारे पास नहीं।


मैं यह भी बताना चाहूँगा कि सोम ठाकुर जी और किशन सरोज जी में एक दूसरे के प्रति बहुत गहरा सम्मान का भाव रहा है| मुझे याद है एक बार सोम जी कवि सम्मेलन का संचालन कर रहे थे और उन्होंने किशन सरोज जी को एक गीत के लिए आमंत्रित किया- ‘वो देखो कुहरे में चंदन वन डूब गया’, यह गीत श्रोता समुदाय सामान्यतः पचा नहीं पाता, लेकिन इससे पहले सोम जी ने जो भूमिका बांधी, और अंत में कहा इसको आप एक डाक्यूमेंट्री की तरह महसूस कीजिए, और इसके बाद श्रोताओं ने उस गीत का भरपूर आनंद लिया|

वास्तव में कवि, विशेष रूप से भावुकता से भरे गीतकार, इतने संवेदनशील होते हैं कि उनको उपेक्षित होने पर बहुत चोट लगती है| लोगों के दिल तक पहुँचने के लिए वे क्या-क्या प्रयास नहीं करते, परंतु अक्सर सही वातावरण नहीं मिलता| आज के गीत का दूसरा छंद प्रस्तुत है-

हमने व्यथा अनमनी बेची,
तन की ज्योति कंचनी बेची,
कुछ न मिला तो अंधियारों को,
मिट्टी मोल चांदनी बेची।
गीत रचे जो हमने उन्हें याद रखना तुम
रत्नों मढ़ी किताब, हमारे पास नहीं।


कवि के पास इसके अलावा और क्या है, सब कुछ वह अपने पाठक / श्रोता के लिए समर्पित कर देता है, लेकिन उसके बाद भी जब अपमान और उपेक्षा मिलती है, तब उसका दिल टूट जाता है| रमानाथ अवस्थी जी अक्सर कहते थे कि मैं तो यही चाहूँगा कि मैं आपके पास न आऊँ, मेरे गीत ही आपके पास आएं|

मैं भी अक्सर ब्लॉगिंग के माध्यम से प्रयास करता हूँ, कि श्रेष्ठ रचनाएं आपके पास पहुँचें |
एक बात और बहुत से अन्य कवियों की तरह किशन सरोज जी भी पीते काफी थे, बहुत संवेदनशील और नाजुक हृदय वाले व्यक्ति थे, जिनको श्रोताओं की प्रतिक्रिया से बहुत फर्क पड़ता था| वो बोलते थे कि पीने के बाद श्रोताओं को ‘फेस’ करने की हिम्मत आ जाती है| लेकिन कविता में बेइमानी उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं थी| लीजिए यह छंद प्रस्तुत है-

झिलमिल करतीं मधुशालाएँ,
दिन ढलते ही हमें रिझाएँ,
घड़ी-घड़ी हर घूँट-घूँट हम,
जी-जी जाएँ, मर-मर जाएँ,
पीकर जिसको चित्र तुम्हारा धुंधला जाए,
इतनी कड़ी शराब, हमारे पास नहीं।


और अंत में यही कि ईमानदार कवि अपनी रचना में अपना सब कुछ समर्पित कर देता है और यह अपेक्षा करता है कि श्रोता / पाठक दिल से उसकी रचनाओं के साथ हों| इसकी उम्मीद सामान्य श्रोताओं/पाठकों से ज्यादा होती है, क्योंकि कविगण तो अक्सर इतने आत्म-मुग्ध होते हैं, कि वे दूसरों को आशीर्वाद ही देने की मुद्रा में रहते हैं, प्रशंसा नहीं| ऐसा कवि सम्मेलन में उनके नेपथ्य संवाद से भी समझा जा सकता है|

आखर-आखर दीपक बाले,
खोले हमने मन के ताले,
तुम बिन हमें न भाए पल भर,
अभिनन्दन के शाल-दुशाले,
अबके बिछुड़े कहाँ मिलेंगे, ये मत पूछो,
कोई अभी जवाब, हमारे पास नहीं।


इस बहाने मैंने आज एक बार फिर स्वर्गीय किशन सरोज जी का यह लाजवाब गीत शेयर कर लिया आशा है यह सामान्य पाठकों को तो पसंद आएगा|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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याद केवल आदेश!

आज फिर से मैं अपने बहुत प्रिय गीतकार स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मेरा सौभाग्य है कि मुझे अनेक बार उनका स्नेह और सानिध्य प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ था|

आज के गीत में उन्होंने बताया है कि जब व्यक्ति दफ्तर के रूटीन के हवाले हो जाता है, तब वह जीवन में आनंद की बहुत सी स्थितियों से दूर हो जाता है|
लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

झुके फाइलों पर अब, घुंघराले केश
बिसरे संदेश, याद केवल आदेश।

भोर ही निकलते हम
कांधे पर सूर्य लिए
दफ्तर से घर तक हम ढोते हैं शाम
अंधियारी गलियों में
दरवाजे पर अंकित
पढ़ा नहीं जाता फिर अपना ही नाम
मन नहीं भटकता अब परियों के देश
बिसरे सन्देश, याद केवल आदेश।


तारे अब लगते हैं
चावल के दानों से
अनचाहे आस-पास बढ़ रहा है उधार
पहली तिथि, पन्द्रह दिन
पहले आ जाये तो
पन्द्रह दिन आयु घटाने को तैयार
फबता है साबुन से उजलाया वेश
बिसरे सन्देश, याद केवल आदेश।

इन्द्रधनुष को देखे
कितने ही बरस हुए
अर्थ नहीं रखता कुछ प्रात का समीर
जाने कितने पीछे
छूट गया वंशीवट
खो गया कुहासे में यमुना का तीर
हम न किसी राधा के द्वरिका-नरेश
बिसरे सन्देश, याद केवल आदेश।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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धागों बिंधे ग़ुलाब हमारे पास नहीं!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ| आज मन है कि अत्यंत सरल हृदय, प्रेम गीतों के बादशाह और स्वाभिमानी कवि स्वर्गीय किशन सरोज जी का स्मरण करूं|

प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनका एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ, वैसे तो उनका हर गीत बेमिसाल है| किशन सरोज जी प्रेम के और विरह के गीतों के सुकुमार बादशाह थे, अक्सर उन्होंने कवि सम्मेलनों में ईमानदार और सृजनशील कवियों की जो स्थिति होती है, हल्की-फुल्की कविताओं के माहौल में उनको क्या कुछ सहना पड़ता है, इस व्यथा को अभिव्यक्ति दी है, किशन सरोज जी का एक ऐसा ही गीत आज प्रस्तुत है-

नागफनी आँचल में बांध सको तो आना
धागों बिंधे ग़ुलाब हमारे पास नहीं।

हम तो ठहरे निपट अभागे
आधे सोये, आधे जागे,
थोड़े सुख के लिये उम्र भर
गाते फिरे भीड़ के आगे,
कहाँ-कहाँ हम कितनी बार हुए अपमानित,
इसका सही हिसाब, हमारे पास नहीं।


हमने व्यथा अनमनी बेची,
तन की ज्योति कंचनी बेची,
कुछ न मिला तो अंधियारों को,
मिट्टी मोल चांदनी बेची।
गीत रचे जो हमने उन्हें याद रखना तुम
रत्नों मढ़ी किताब, हमारे पास नहीं।


झिलमिल करतीं मधुशालाएँ,
दिन ढलते ही हमें रिझाएँ,
घड़ी-घड़ी हर घूँट-घूँट हम,
जी-जी जाएँ, मर-मर जाएँ,
पीकर जिसको चित्र तुम्हारा धुंधला जाए,
इतनी कड़ी शराब, हमारे पास नहीं।


आखर-आखर दीपक बाले,
खोले हमने मन के ताले,
तुम बिन हमें न भाए पल भर,
अभिनन्दन के शाल-दुशाले,
अबके बिछुड़े कहाँ मिलेंगे, ये मत पूछो,
कोई अभी जवाब, हमारे पास नहीं।

-किशन सरोज

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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थक गये हिरन चलते–चलते

आज एक बार फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय कवि रहे स्वर्गीय किशन सरोज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| किशन जी को अनेक बार सुनने और अनेक बार उनसे मिलने का अवसर मिला, ये मेरा सौभाग्य था, अत्यंत सरल, सौम्य और शालीन व्यक्ति थे|
 आज की रचना, में किशन सरोज जी ने जीवन की मृगतृष्णा को बहुत सुंदर  अभिव्यक्ति दी है- 

सैलानी नदिया के संग–संग
हार गये वन चलते–चलते|

फिर आईं पातियां गुलाबों की
फिर नींदें हो गईं पराई,
भूल सही, पर कब तक कौन करे
अपनी ही देह से लड़ाई|
साधा जब जूही ने पुष्प-बान
थम गया पवन चलते–चलते|

राजपुरुष हो या हो वैरागी
सबके मन कोई कस्तूरी,
मदिरालय हो अथवा हो काशी
हर तीरथ-यात्रा मजबूरी|
अपने ही पाँव, गंध अपनी ही,
थक गये हिरन चलते–चलते|
 
आज के लिए इतना ही
नमस्कार

                         *********
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तुम्हारा मन नहीं छूते!

आज एक बार फिर से मैंने अपने एक प्रिय कवि स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर करना चाहा और किया भी, लेकिन मालूम हुआ की मैं कुछ महीने पहले ही उसे शेयर कर चुका था|


लीजिए अब प्रस्तुत कर रहा हूँ उनका यह गीत-

नीम तरू से फूल झरते हैँ
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है|

रीझ, सुरभित हरित -वसना
घाटियों पर
व्यँग्य से हँसते हुए
परिपाटियों पर
इँद्रधनु सजते- सँवरते हैँ
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है|


गहन काली रात
बरखा की झड़ी में
याद डूबी ,नींद से
रूठी घड़ी में
दूर वँशी -स्वर उभरते हैँ
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है|


वॄक्ष, पर्वत, नदी,
बादल, चाँद-तारे
दीप, जुगनू , देव–दुर्लभ
अश्रु खारे
गीत कितने रूप धरते हैँ
तुम्हारा मन नहीँ छूते
बड़ा आश्चर्य है|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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नैन में तिरता हुआ जल !

आज एक बार फिर से मैं अपने एक प्रिय कवि स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो गीतों के ऐसे सर्जक थे कि उनको बस सुनते ही जाने का मन होता था|

लीजिए प्रस्तुत है आंसुओं की मारक शक्ति से भरा हुआ यह गीत-

नींद सुख की
फिर हमें सोने न देगा
यह तुम्हारे नैन में तिरता हुआ जल ।

छू लिए भीगे कमल-
भीगी ॠचाएँ
मन हुए गीले-
बहीं गीली हवाएँ


बहुत सम्भव है डुबो दे
सृष्टि सारी
दृष्टि के आकाश में घिरता हुआ जल ।

हिमशिखर, सागर, नदी-
झीलें, सरोवर
ओस, आँसू, मेघ, मधु-
श्रम-बिंदु, निर्झर


रूप धर अनगिन कथा
कहता दुखों की
जोगियों-सा घूमता-फिरता हुआ जल ।

लाख बाँहों में कसें
अब ये शिलाएँ
लाख आमंत्रित करें
गिरि-कंदराएँ


अब समंदर तक
पहुँचकर ही रुकेगा
पर्वतों से टूटकर गिरता हुआ जल ।

आज के लिए इतना ही

नमस्कार|

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यह तुम्हारे नैन में तिरता हुआ जल!

एक बार फिर मैं आज बहुत ही प्यारे और भावुक गीतकार, स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मुझे यह स्मरण करके अच्छा लगता है कि मुझे कई बार उनसे गले मिलने का अवसर मिला था| बहुत ही सरल हृदय व्यक्ति, सृजनशील रचनाकार थे| आज के इस गीत में भी उन्होंने प्रेयसी की आँखों में आए आंसुओं के बहाने क्या-क्या बातें कह दीं, भावुकता की उड़ान में कहाँ-कहाँ पहुँच गए|


लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी का यह प्यारा सा गीत- –



नींद सुख की
फिर हमें सोने न देगा-
यह तुम्हारे नैन में तिरता हुआ जल ।

छू लिए भीगे कमल-
भीगी ॠचाएँ
मन हुए गीले-
बहीं गीली हवाएँ|


बहुत सम्भव है डुबो दे
सृष्टि सारी,
दृष्टि के आकाश में घिरता हुआ जल ।

हिमशिखर, सागर, नदी-
झीलें, सरोवर,
ओस, आँसू, मेघ, मधु-
श्रम-बिंदु, निर्झर|

रूप धर अनगिन कथा
कहता दुखों की,
जोगियों-सा घूमता-फिरता हुआ जल ।

लाख बाँहों में कसें
अब ये शिलाएँ,
लाख आमंत्रित करें
गिरि-कंदराएँ|


अब समंदर तक
पहुँचकर ही रुकेगा,
पर्वतों से टूटकर गिरता हुआ जल ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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वह अट्टहासों का धनी, अब मुस्कुराता तक नहीं!

आज मैं एक बार फिर से अपने प्रिय कवियों में से एक रहे, स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, ये बात मुझे बार-बार बतानी अच्छी लगती है कि मैंने कई बार उनको अपने आयोजनों में बुलाया था और वे बड़े आत्मीय भाव से गले मिलते थे| एक बात और बता दूँ, मैं अपने एक निकट संबंधी की मृत्यु का समाचार पाकर वहाँ जा रहा था| तभी ट्रेन में यात्रा करते समय मुझे किशन जी की मृत्यु का समाचार ज्ञात हुआ, कुमार विश्वास जी के द्वारा लिखा गया पोस्ट पढ़कर| यह पढ़कर मेरी स्थिति ऐसी हो गई कि मुझे लगा कि अगर मैं यहाँ ट्रेन में ही रोने लगा तो लोग क्या कहेंगे|

 

खैर आप किशन सरोज जी का, गीत कवि की व्यथा से जुड़ा यह भावुक सा गीत पढ़िए-

 

इस गीत कवि को क्या हुआ,
अब गुनगुनाता तक नहीं|

 

इसने रचे जो गीत जग ने
पत्रिकाओं में पढ़े,
मुखरित हुए तो भजन जैसे
अनगिनत होंठों चढ़े|

 

होंठों चढ़े, वे मन बिंधे,
अब गीत गाता तक नहीं|

 

अनुराग, राग विराग
सौ सौ व्यंग-शर इसने सहे,
जब जब हुए गीले नयन
तब तब लगाये कहकहे|

 

वह अट्टहासों का धनी
अब मुस्कुराता तक नहीं|

 

मेलों तमाशों में लिये
इसको फिरी आवारगी,
कुछ ढूँढती सी दॄष्टि में
हर शाम मधुशाला जगी|

 

अब भीड़ दिखती है जिधर,
उस ओर जाता तक नहीं|

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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रतनारे नयनों में एक सपन डूब गया- किशन सरोज

प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनके कुछ गीत शेयर कर रहा था, वैसे तो किशन जी ने इतने सुंदर गीत लिखे हैं कि लगता है कि उनको शेयर करता हि जाऊं। लेकिन फिलहाल इस क्रम में मैं इस गीत के साथ यह क्रम समाप्त करूंगा।

मुझे याद है कि किशन सरोज जी जब भी मिलते थे एक दोस्त की तरह मिलते थे, इतने सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। वे प्रेम के और विरह के गीतों के सुकुमार बादशाह थे, आज का उनका गीत, जिसे आजकल ‘ब्रेक-अप’ कहा जाता है उसके संबंध में है। लेकिन उस समय यह ‘ब्रेक-अप’ कोई फैशन का हिस्सा नहीं था और इसका कारण समाज के बंधन होते थे। यह उनका एक अलौकिक गीत है, लीजिए आज प्रस्तुत है, फिलहाल इस कड़ी का अंतिम गीत-

 

छोटी से बड़ी हुईं तरुओं की छायाएं
धुंधलाईं सूरज के माथे की रेखाएं
मत बांधो‚ आंचल मे फूल चलो लौट चलें
वह देखो! कोहरे में चंदन वन डूब गया।

 

माना सहमी गलियों में न रहा जाएगा
सांसों का भारीपन भी न सहा जाएगा
किन्तु विवशता यह यदि अपनों की बात चली
कांपेंगे आधर और कुछ न कहा जाएगा।
वह देखो! मंदिर वाले वट के पेड़ तले
जाने किन हाथों से दो मंगल दीप जले
और हमारे आगे अंधियारे सागर में
अपने ही मन जैसा नील गगन डूब गया।

 

कौन कर सका बंदी रोशनी निगाहों में
कौन रोक पाया है गंध बीच राहों में
हर जाती संध्या की अपनी मजबूरी है
कौन बांध पाया है इंद्रधनुष बाहों में।
सोने से दिन चांदी जैसी हर रात गयी
काहे का रोना जो बीती सो बात गयी
मत लाओ नैनों में नीर कौन समझेगा
एक बूंद पानी में‚ एक वचन डूब गया।

 

भावुकता के कैसे केश संवारे जाएं?
कैसे इन घड़ियों के चित्र उतारे जाएं?
लगता है मन की आकुलता का अर्थ यही
आगत के आगे हम हाथ पसारे जाएं।
दाह छुपाने को अब हर पल गाना होगा
हंसने वालों में रह कर मुसकाना होगा
घूंघट की ओट किसे होगा संदेह कभी
रतनारे नयनों में एक सपन डूब गया।

 

-किशन सरोज

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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