झूठ बोलता ही नहीं

जड़ दो चांदी में चाहे सोने में,
आईना झूठ बोलता ही नहीं।

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

मिल जाना क्या, न मिलना क्या!

उसका मिल जाना क्या, न मिलना क्या
ख्वाब-दर-ख्वाब कुछ मज़ा ही नहीं।

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

अब ख़ुदा ही नहीं!

कैसे अवतार कैसे पैग़म्बर
ऐसा लगता है अब ख़ुदा ही नहीं।

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं!

धन के हाथों बिके हैं सब क़ानून
अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं।

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

कोई अता-पता ही नहीं!

जिसके कारण फ़साद होते हैं
उसका कोई अता-पता ही नहीं।

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

कोई इन्तहा ही नहीं!

सच घटे या बढ़े तो सच न रहे,
झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं।

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

दूसरा कोई रास्ता ही नहीं!

ज़िन्दगी! मौत तेरी मंज़िल है
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं।

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

कुछ बचा ही नहीं!

इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं,
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं|

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

क्या जुर्म है पता ही नहीं!

ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,
और क्या जुर्म है पता ही नहीं।

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है!

आज ज़नाब कृष्ण बिहारी ‘नूर’ जी की एक खूबसूरत सी गज़ल शेयर करने का मन हो रहा है। ‘नूर’ साहब उर्दू अदब के जाने-माने शायर थे, इस गज़ल में कुछ बेहतरीन फीलिंग्स और जीवन का फल्सफा भी है।

वैसे इस गज़ल को जगजीत सिंह जी ने गाया भी है, इसलिए कभी तो आपने इसको सुना ही होगा, लीजिए आज इसको दोहरा लेते हैं-

 

 

बस एक वक़्त का ख़ंजर मेरी तलाश में है,
जो रोज़ भेस बदल कर मेरी तलाश में है।

 

ये और बात कि पहचानता नहीं मुझको,
सुना है एक सितमग़र मेरी तलाश में है।

 

अधूरे ख़्वाबों से उकता के जिसको छोड़ दिया,
शिकन नसीब वो बिस्तर मेरी तलाश में है।

 

ये मेरे घर की उदासी है और कुछ भी नहीं,
दिया जलाये जो दर पर मेरी तलाश में है।

 

अज़ीज़ मैं तुझे किस कदर कि हर एक ग़म,
तेरी निग़ाह बचाकर मेरी तलाश में है।

 

मैं एक कतरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है,
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है।

 

मैं देवता की तरह क़ैद अपने मंदिर में,
वो मेरे जिस्म के बाहर मेरी तलाश में है।

 

मैं जिसके हाथ में इक फूल देके आया था,
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है।

 

वो जिस ख़ुलूस की शिद्दत ने मार डाला ‘नूर,’
वही ख़ुलूस मुकर्रर मेरी तलाश में है।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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