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कृष्णकली – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Krishnakali’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



कृष्णकली



गाँव में सब उसे साँवली लड़की कहते हैं,
परंतु मेरे लिए वह कृष्णकली का पुष्प है,
एक मेघाच्छादित दिन में, खेत में
मैंने देखीं, साँवली लड़की की गहरी, हिरनी जैसी आँखें|
उसका सिर ढका नहीं था,
उसके खुले केश उसकी पीठ पर झूल रहे थे|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

दो काली गायें रँभा रही थीं,
क्योंकि घने बादलों के कारण अंधेरा हो गया था|
इसीलिए चिंतित, त्वरित कदमों से,
साँवली लड़की अपनी झौंपड़ी से निकली|
उसने आकाश की ओर आँखें तरेर कर देखा,
एक क्षण उसने बादलों की गड़गड़ाहट को सुना|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

पुरवा के एक झौंके ने
चावलों के खेत को लहरा दिया|
मैं मेड़ के पास खड़ा था,
अकेला खेत में|
उसने मेरी तरफ देखा या नहीं
यह हम दोनों को ही मालूम है|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

ऐसे ही होता है जब जेठ के महीने में
उत्तर-पूर्व में काजल जैसे काले बादल छा जाते हैं;
कोमल गहन छाया
तमाल कुंजों पर पसर जाती है, आषाढ़ माह में;
और अचानक आनंद से हृदय भर जाता है,
श्रावण माह की रात में|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

मेरे लिए तो वह कृष्णकली का पुष्प है,
बाकी लोग उसे जिस भी नाम से पुकारते हों|
मयनापारा के गाँव में,
मैंने देखीं उस साँवली लड़की की हिरनी जैसी आँखें|
उसका सिर नहीं ढका था,
और उसके पास शर्मिंदा महसूस करने का समय ही नहीं था|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|





-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Krishnakali


In the village they call her the dark girl
but to me she is the flower Krishnakali
On a cloudy day in a field
I saw the dark girl’s dark gazelle-eyes.
She had no covering on her head,
her loose hair had fallen on her back.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelleeyes.

Two black cows were lowing,
as it grew dark under the heavy clouds.
So with anxious, hurried steps,
the dark girl came from her hut.
Raising her eyebrows toward the sky,
she listened a moment to the clouds’ rumble.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.

A gust of the east wind
rippled the rice plants.
I was standing by a ridge,
alone in the field.
Whether or not she looked at me
Is known only to us two.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.

This how the Kohldark cloud
rises in the northeast in Jaistha;
the soft dark shadow
descends on the Tamal grove in Asharh;
and sudden delight floods the heart
in the night of Sravan.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.

To me she is the flower Krishnakali,
whatever she may be called by others.
In a field in Maynapara village
I saw the dark girl’s dark gazelle-eyes.
She did not cover her head,
not having the time to feel embarrassed.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.




-Rabindranath Tagore


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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