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हम सिगार से जला किए!

आज स्वर्गीय कुमार शिव जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें उन्होंने बड़े खूबसूरत तरीके से कहा है कि किस प्रकार ज़िंदगी ने हमारी हालत, राखदान में पड़े सिगार जैसी कर दी है| राखदान में सुलगता सिगार, जो मदिरा पान, संगीत और राजनैतिक गतिविधियों तथा बहस आदि का भी साक्षी बनता है|

लीजिए आज कुमार शिव जी की इस रचना का आनंद लेते हैं-

राखदान में पड़े हुए
हम सिगार से जला किए ।

उँगलियों में दाबकर हमें
ज़िन्दगी ने होंठ से छुआ
कशमश में एक कश लिया
ढेर सा उगल दिया धुआँ


लोग मेज़ पर झुके हुए
आँख बाँह से मला किए ।

बुझ गए अगर पड़े-पड़े
तीलियों ने मुख झुलस दिया
फूँक गई त्रासदी कभी
और कभी दर्द ने पिया


झण्डियाँ उछालते हुए
दिन जुलूस में चला किए ।

बोतलों-गिलास की खनक
आसपास से गुज़र गई
बज उठे सितार वायलिन
इक उदास धुन बिखर गई
|

राख को उछालते रहे
हम बुलन्द हौसला किए ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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काले कपड़े पहने हुए सुबह देखी!

कल मैंने अपने एक संस्मरण में, एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से अन्य लोगों के साथ स्वर्गीय कुमार शिव जी को भी याद किया था और उनके एक-दो गीतों का उल्लेख किया था| आज उनको श्रद्धांजलि स्वरूप उनका एक पूरा गीत यहाँ दे रहा हूँ| इस गीत में उन्होंने अपनी खुद्दारी की प्रभावी अभिव्यक्ति की है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय कुमार शिव जी का यह गीत –

काले कपड़े पहने हुए
सुबह देखी
देखी हमने अपनी
सालगिरह देखी !

हमको सम्मानित होने का
चाव रहा,
यश की मंडी में पर मंदा
भाव रहा|
हमने चाहा हम भी बनें
विशिष्ट यहाँ,
किन्तु हमेशा व्यर्थ हमारा
दाँव रहा|
किया काँच को काला
सूर्यग्रहण देखा,
और धूप भी हमने
इसी तरह देखी !


हाथ नहीं जोड़े हमने
और नहीं झुके,
पाँव किसी की अगवानी में
नहीं रुके|
इसीलिए जो बैसाखियाँ
लिए निकले,
वो भी हमको मीलों पीछे
छोड़ चुके|
वो पहुँचे यश की
कच्ची मीनारों पर,
स्वाभिमान की हमने
सख़्त सतह देखी !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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