इक पीर पली मीलों तक!

आज एक बार फिर मैं, मेरे लिए गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर कुँवर बेचैन जी अत्यंत सरल हृदय व्यक्ति और श्रेष्ठ रचनाकार थे| उनसे मिलने और उनका कविता पाठ सुनने का अनुभव स्मरणीय होता था|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की यह ग़ज़ल –

ज़िंदगी यूँ भी जली, यूँ भी जली मीलों तक,
चाँदनी चार क‍़दम, धूप चली मीलों तक|

प्यार का गाँव अजब गाँव है जिसमें अक्सर,
ख़त्म होती ही नहीं दुख की गली मीलों तक|

प्यार में कैसी थकन कहके ये घर से निकली,
कृष्ण की खोज में वृषभानु-लली मीलों तक|

घर से निकला तो चली साथ में बिटिया की हँसी,
ख़ुशबुएँ देती रही नन्हीं कली मीलों तक|

माँ के आँचल से जो लिपटी तो घुमड़कर बरसी,
मेरी पलकों में जो इक पीर पली मीलों तक|

मैं हुआ चुप तो कोई और उधर बोल उठा,
बात यह है कि तेरी बात चली मीलों तक|

हम तुम्हारे हैं ‘कुँअर’ उसने कहा था इक दिन,
मन में घुलती रही मिसरी की डली मीलों तक|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

वो खत जो तुम्हें दे न सके–

अब भी किसी दराज में मिल जाएंगे तुम्हें,
वो खत जो तुम्हें दे न सके लिख लिखा लिए।

कुंवर बेचैन

आग में बादल नहा लिए!

सुख, जैसे बादलों में नहाती हों बिजलियां,
दुख, बिजलियों की आग में बादल नहा लिए|

कुंवर बेचैन

कांटे चुभा लिए!

चाहा था एक फूल ने तड़पे उसी के पास,
हमने खुशी के पाँवों में कांटे चुभा लिए|

कुंवर बेचैन

हाथ में पत्थर उठा लिए!

दो चार बार हम जो कभी हँस-हँसा लिए,
सारे जहां ने हाथ में पत्थर उठा लिए|

कुंवर बेचैन

संबंध का काँवर न फेंक!

यह तेरी काँवर नहीं कर्तव्य का अहसास है,
अपने कंधे से श्रवण! संबंध का काँवर न फेंक|

कुंवर बेचैन

मचलती नाव पर पत्थर न फेंक!

फेंकने ही हैं अगर पत्थर तो पानी पर उछाल,
तैरती मछली, मचलती नाव पर पत्थर न फेंक|

कुंवर बेचैन

आँधियों का डर न फेंक

जो धरा से कर रही हैं कम गगन का फासला,
उन उड़ानों पर अंधेरी आँधियों का डर न फेंक|

कुंवर बेचैन