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आँखों से आँसू की बिछुड़न, होंठों से बाँसुरियों की!

मेरे लिए गुरु तुल्य – डॉक्टर कुंवर बेचैन जी का एक गीत और आज शेयर कर रहा हूँ| कविता, गीत, ग़ज़ल आदि की यात्रा तो निरंतर चलती रहती है। डॉक्टर बेचैन एक सृजनशील रचनाकार हैं और कवि सम्मेलनों में खूब डूबकर अपने गीत पढ़ते हैं|

कुछ गीत जो बहुत शुरू में उनका सुने थे, आज भी स्मृतियों में टंके रहते हैं- ‘जितनी दूर नयन से सपना, जितनी दूर अधर से हँसना, बिछुए जितनी दूर कुँवारे पाँव से, उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से’, ऐसे अनेक गीत हैं, जैसे ‘आँखों में सिर्फ बादल, सुनसान बिजलियाँ हैं, अंगार हैं अधर पर, सब सांस आंधियाँ हैं, रग-रग दौड़ती सी एक आग की नदी है, ये बीसवीं सदी है’ आदि-आदि ।


आइए आज डॉक्टर बेचैन जी के इस गीत का आनंद लेते हैं-

मिलना और बिछुड़ना दोनों
जीवन की मजबूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।


शाखों से फूलों की बिछुड़न
फूलों से पंखुड़ियों की,
आँखों से आँसू की बिछुड़न
होंठों से बाँसुरियों की,
तट से नव लहरों की बिछुड़न
पनघट से गागरियों की,
सागर से बादल की बिछुड़न
बादल से बीजुरियों की|


जंगल जंगल भटकेगा ही
जिस मृग पर कस्तूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।


सुबह हुए तो मिले रात-दिन
माना रोज बिछुड़ते हैं,
धरती पर आते हैं पंछी
चाहे ऊँचा उड़ते हैं,
सीधे सादे रस्ते भी तो
कहीं कहीं पर मुड़ते हैं,
अगर हृदय में प्यार रहे तो
टूट टूटकर जुड़ते हैं|


हमने देखा है बिछुड़ों को
मिलना बहुत जरूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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