सुरसा सा मुंह फाड़ रही है!

आज मैं मेरे लिए गुरु-तुल्य रहे हिन्दी के श्रेष्ठ कवि एवं गीतकार स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की एक सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत–


गलियों में
चौराहों पर
घर-घर में मचे तुफ़ैल-सी।
बाल बिखेरे फिरती है
महँगाई किसी चुड़ैल सी।

सूखा पेटों के खेतों को
वर्षा नयनाकाश को
शीत- हडि्डयों की ठठरी को
जीवन दिया विनाश को
भूखी है हर साँस
जुती लेकिन कोल्हू के बैल-सी।

जो भी स्वप्न संत हैं
वे तो अब भी कुंठाग्रस्त हैं
जो झूठे, बदमाश, लफंगे
वे दुनिया में मस्त हैं
हर वेतन के घर बैठी है
रिश्वत किसी रखैल-सी।

सुरसा-सा मुँह फाड़ रही है
बाजारों में कीमतें
बारूदी दीवारों पर
बैठी हैं जीवन की छतें
टूट रही है आज ज़िंदगी
इक टूटी खपरैल-सी।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अंधी दीवाली, गूँगी होली बाबू जी!

आज एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से अपने लिए गुरू तुल्य रहे स्वर्गीय डॉ कुँवर बेचैन जी को याद कर रहा हूँ | उनकी मृत्यु का दुखद समाचार मिलने पर पहली बार ये ब्लॉग पोस्ट मैंने उनको श्रद्धांजलि स्वरूप, उनकी दो रचनाएँ पुनः प्रस्तुत करते हुए लिखी थी|

डॉ कुँवर बेचैन जी मेरे अग्रजों में रहे हैं, उनके दो गीत आज शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी उस महानन्द मिशन कॉलेज, गाजियाबाद में प्रोफेसर रहे हैं जहां मैंने कुछ समय अध्ययन किया, यद्यपि मेरे विषय अलग थे|
दिल्ली में रहते हुए गोष्ठियों आदि में उनको सुनने का अवसर मिल जाता था, बाद में जब मैं अपनी नियोजक संस्था के लिए आयोजन करता तब उनको वहाँ आमंत्रित करने का अवसर भी मिला|

बेचैन जी कविता के लिए समर्पित व्यक्ति थे और एक से एक मधुर और प्रभावशाली गीत उन्होंने लिखे हैं| यह रचनाएँ भी अपने आप में अलग तरह की हैं|

लीजिए प्रस्तुत है डॉक्टर बेचैन जी की यह रचना –

प्यासे होंठों से जब कोई झील न बोली बाबू जी,
हमने अपने ही आँसू से आँख भिगो ली बाबू जी|

भोर नहीं काला सपना था पलकों के दरवाज़े पर,
हमने यों ही डर के मारे आँख न खोली बाबू जी|

दिल के अंदर ज़ख्म बहुत हैं इनका भी उपचार करो,
जिसने हम पर तीर चलाए मारो गोली बाबू जी|

हम पर कोई वार न करना हैं कहार हम शब्द नहीं,
अपने ही कंधों पर है कविता की डोली बाबू जी|

यह मत पूछो हमको क्या-क्या दुनिया ने त्यौहार दिए,
मिली हमें अंधी दीवाली, गूँगी होली बाबू जी|

सुबह सवेरे जिन हाथों को मेहनत के घर भेजा था,
वही शाम को लेकर लौटे खाली झोली बाबू जी|

एक और गीत, जो बिलकुल अलग तरह का है-

नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ।
मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ।।

मुझे ऊँचाइयों का वो अकेलापन नहीं भाया;
लहर होते हुए भी तो मेरा मन न लहराया;
मुझे बाँधे रही ठंडे बरफ की रेशमी काया।
बड़ी मुश्किल से बन निर्झर, उतर पाई मैं धरती पर;
छुपा कर रख मुझे सागर, पसीने की कमाई हूँ।।

मुझे पत्थर कभी घाटियों के प्यार ने रोका;
कभी कलियों कभी फूलों भरे त्यौहार ने रोका;
मुझे कर्तव्य से ज़्यादा किसी अधिकार ने रोका।
मगर मैं रुक नहीं पाई, मैं तेरे घर चली आई;
मैं धड़कन हूँ मैं अँगड़ाई, तेरे दिल में समाई हूँ।।

पहन कर चाँद की नथनी, सितारों से भरा आँचल;
नये जल की नई बूँदें, नये घुँघरू नई पायल;
नया झूमर नई टिकुली, नई बिंदिया नया काजल।
पहन आई मैं हर गहना, कि तेरे साथ ही रहना;
लहर की चूड़ियाँ पहना, मैं पानी की कलाई हूँ।|


एक बार फिर से मैं इस सुरीले कवि और महान इंसानकी स्मृतियों को मैं नमन करता हूँ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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उँगलियाँ थाम के खुद!

कल मैंने अपने अग्रज और गुरु तुल्य स्वर्गीय डॉक्टर कुंअर बेचैन जी का जिक्र किया था, उनके बहुत से गीत और कविताएं मैं पहले शेयर की हैं, जब कविता नई नई रुचि पैदा हुई थी तब हम डॉक्टर कुंअर बेचैन जी को बड़े चाव से सुनते थे और अक्सर कवि गोष्ठियों और कवि सम्मेलनों में इसका अवसर मिलता रहता था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुंअर बेचैन जी की यह ग़ज़ल –

उँगलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे
राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे

उसने पोंछे ही नहीं अश्क मेरी आँखों से
मैंने खुद रोके बहुत देर हँसाया था जिसे


बस उसी दिन से खफा है वो मेरा इक चेहरा
धूप में आइना इक रोज दिखाया था जिसे

छू के होंठों को मेरे वो भी कहीं दूर गई
इक गजल शौक से मैंने कभी गाया था जिसे

दे गया घाव वो ऐसे कि जो भरते ही नहीं
अपने सीने से कभी मैंने लगाया था जिसे

होश आया तो हुआ यह कि मेरा इक दुश्मन
याद फिर आने लगा मैंने भुलाया था जिसे

वो बड़ा क्या हुआ सर पर ही चढ़ा जाता है
मैंने काँधे पे `कुँअर’ हँस के बिठाया था जिसे


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बिके अभावों के हाथों !

आज फिर से मैं, मेरे लिए गुरु तुल्य रहे मधुर गीतकार और अत्यंत सरल हृदय व्यक्ति स्वर्गीय कुंअर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी के गीत मैं उस समय से गुनगुनाता रहा हूँ जब मेरी कविता में रुचि विकसित हुई थी|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुंअर बेचैन जी का यह नवगीत –

मन बेचारा एकवचन
लेकिन
दर्द हजार गुने ।

चाँदी की चम्मच लेकर
जन्में नहीं हमारे दिन
अँधियारी रातों के घर
रह आए भावुक पल-छिन
चंदा से सौ बातें कीं
सूरज ने जब घातें कीं
किंतु एक नक्कारगेह में
तूती की ध्वनि
कौन सुने ।

बिके अभावों के हाथों
सपने खील-बताशों के
भरे नुकीले शूलों से
आँगन-
खेल तमाशों के
कुछ को चूहे काट गए
कुछ को झींगुर चाट गए
नए-नए संकल्पों के
जो भी हमने जाल बुने।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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दिन दिवंगत हुए!

मेरे लिए बड़े भाई और गुरुतुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी ने बहुत सुंदर गीत लिखे हैं और हम युवावस्था में उनके गीत गुनगुनाते रहते थे, जैसे- ‘जितनी दूर नयन से सपना, जितनी दूर अधर से हँसना, बिछुए जितनी दूर कुँवारे पाँव से, उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की यह रचना –

रोज़ आँसू बहे रोज़ आहत हुए
रात घायल हुई, दिन दिवंगत हुए!

हम जिन्हें हर घड़ी याद करते रहे
रिक्त मन में नई प्यास भरते रहे
रोज़ जिनके हृदय में उतरते रहे
वे सभी दिन चिता की लपट पर रखे
रोज़ जलते हुए आख़िरी ख़त हुए
दिन दिवंगत हुए!

शीश पर सूर्य को जो सँभाले रहे
नैन में ज्योति का दीप बाले रहे
और जिनके दिलों में उजाले रहे
अब वही दिन किसी रात की भूमि पर
एक गिरती हुई शाम की छत हुए!
दिन दिवंगत हुए!


जो अभी साथ थे, हाँ अभी, हाँ अभी
वे गए तो गए, फिर न लौटे कभी
है प्रतीक्षा उन्हीं की हमें आज भी
दिन कि जो प्राण के मोह में बंद थे
आज चोरी गई वो ही दौलत हुए।
दिन दिवंगत हुए!

चाँदनी भी हमें धूप बनकर मिली
रह गई जिंन्दगी की कली अधखिली
हम जहाँ हैं वहाँ रोज़ धरती हिली
हर तरफ़ शोर था और इस शोर में
ये सदा के लिए मौन का व्रत हुए।
दिन दिवंगत हुए!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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गीत के जितने कफ़न हैं!

एक बार फिर मैं आज मेरे लिए गुरुतुल्य और बड़े भाई जैसे रहे, श्रेष्ठ रचनाकार और अत्यंत सरल हृदय गीतकार स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में भी डॉक्टर बेचैन जी ने जीवन पर एक अलग तरीके से निगाह डाली है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, जीवन पर एक अलग प्रकार की दृष्टि डालने वाला स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह गीत –

जिंदगी की लाश
ढकने के लिए
गीत के जितने कफ़न हैं
हैं बहुत छोटे।

रात की
प्रतिमा
सुधाकर ने छुई
पीर यह
फिर से
सितारों सी हुई
आँख का आकाश

ढकने के लिए
प्रीत के जितने सपन हैं
हैं बहुत छोटे।

खोज में हो
जो
लरजती छाँव की
दर्द
पगडंडी नहीं
उस गाँव की
पीर का उपहास
ढकने के लिए
अश्रु के जितने रतन हैं
हैं बहुत छोटे।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सूरज से निकलते रहिए!

हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए,
ज़िंदगी भोर है सूरज से निकलते रहिए|

कुँअर बेचैन

आपके भी दिल ने बात की!

राहों से जितने प्यार से मंज़िल ने बात की,
यूँ दिल से मेरे आपके भी दिल ने बात की|

कुँअर बेचैन

क़दमों पर मैं अपना सर रखूँ!

मौत तो आनी है तो फिर मौत का क्यूँ डर रखूँ,
ज़िंदगी आ तेरे क़दमों पर मैं अपना सर रखूँ |

कुँअर बेचैन

मद-मस्त पुरवाई सी तुम!

शोर की इस भीड़ में ख़ामोश तन्हाई सी तुम,
ज़िंदगी है धूप, तो मद-मस्त पुरवाई सी तुम|

कुँअर बेचैन