Categories
Poetry

सूरज सोख न लेना पानी!

डॉक्टर कुँवर बेचैन जी मेरे लिए गुरु तुल्य हैं, मैं भी कुछ समय उसी महाविद्यालय का छात्र रहा जिसमें वे प्रोफेसर थे| दिल्ली में रहते हुए कवि गोष्ठियों में तो उनसे भेंट होती ही रही, बाद में एक आयोजक की भूमिका निभाते हुए भी उनको कवि सम्मेलनों में आमंत्रित करने का सौभाग्य मुझे मिला| बहुत समर्थ रचनाकार और सरल हृदय व्यक्ति हैं, ईश्वर उनको लंबी उम्र दें|

लीजिए प्रस्तुत है डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह गीत-

सूरज !
सोख न लेना पानी !

तड़प तड़प कर मर जाएगी
मन की मीन सयानी !
सूरज, सोख न लेना पानी !

बहती नदिया सारा जीवन
साँसें जल की धारा,
जिस पर तैर रहा नावों-सा
अंधियारा उजियारा,
बूंद-बूंद में गूँज रही है
कोई प्रेम कहानी !

सूरज, सोख न लेना पानी !

यह दुनिया पनघट की हलचल
पनिहारिन का मेला,
नाच रहा है मन पायल का
हर घुंघुरू अलबेला|
लहरें बाँच रही हैं
मन की कोई बात पुरानी !
सूरज, सोख न लेना पानी !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
________________________________________

Categories
Uncategorized

आँखों से आँसू की बिछुड़न, होंठों से बाँसुरियों की!

मेरे लिए गुरु तुल्य – डॉक्टर कुंवर बेचैन जी का एक गीत और आज शेयर कर रहा हूँ| कविता, गीत, ग़ज़ल आदि की यात्रा तो निरंतर चलती रहती है। डॉक्टर बेचैन एक सृजनशील रचनाकार हैं और कवि सम्मेलनों में खूब डूबकर अपने गीत पढ़ते हैं|

कुछ गीत जो बहुत शुरू में उनका सुने थे, आज भी स्मृतियों में टंके रहते हैं- ‘जितनी दूर नयन से सपना, जितनी दूर अधर से हँसना, बिछुए जितनी दूर कुँवारे पाँव से, उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से’, ऐसे अनेक गीत हैं, जैसे ‘आँखों में सिर्फ बादल, सुनसान बिजलियाँ हैं, अंगार हैं अधर पर, सब सांस आंधियाँ हैं, रग-रग दौड़ती सी एक आग की नदी है, ये बीसवीं सदी है’ आदि-आदि ।


आइए आज डॉक्टर बेचैन जी के इस गीत का आनंद लेते हैं-

मिलना और बिछुड़ना दोनों
जीवन की मजबूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।


शाखों से फूलों की बिछुड़न
फूलों से पंखुड़ियों की,
आँखों से आँसू की बिछुड़न
होंठों से बाँसुरियों की,
तट से नव लहरों की बिछुड़न
पनघट से गागरियों की,
सागर से बादल की बिछुड़न
बादल से बीजुरियों की|


जंगल जंगल भटकेगा ही
जिस मृग पर कस्तूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।


सुबह हुए तो मिले रात-दिन
माना रोज बिछुड़ते हैं,
धरती पर आते हैं पंछी
चाहे ऊँचा उड़ते हैं,
सीधे सादे रस्ते भी तो
कहीं कहीं पर मुड़ते हैं,
अगर हृदय में प्यार रहे तो
टूट टूटकर जुड़ते हैं|


हमने देखा है बिछुड़ों को
मिलना बहुत जरूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


*********