सजाने को मुसीबत नहीं मिलती!

निकला करो ये शम्अ लिए घर से भी बाहर,
तन्हाई सजाने को मुसीबत नहीं मिलती|

निदा फ़ाज़ली

मेरे नाम से जलते क्यों हैं!

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ न कोई तारा हूँ,
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं|

राहत इन्दौरी

गुमनाम से जल जाते हैं!

शमा जिस आग में जलती है नुमाइश के लिये,
हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं|

क़तील शिफ़ाई

हम चराग़ों की तरह!

गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं,
हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं|

क़तील शिफ़ाई

लौ को ज़रा सा कम कर दे!

चमकने वाली है तहरीर मेरी क़िस्मत की,
कोई चिराग़ की लौ को ज़रा सा कम कर दे|

बशीर बद्र

भीगी हुई बाती तो है!

एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो,
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है|

दुष्यंत कुमार

अँधेरों को दिए जाते हैं!

हम हैं एक शम्अ मगर देख के बुझते बुझते,
रौशनी कितने अँधेरों को दिए जाते हैं|

शमीम जयपुरी

सूर्य और दीपनिष्ठा

एक श्रेष्ठ व्यक्ति और कवि जो सांसद भी रहे हैं और संसदीय राजभाषा समिति का एक सदस्य होने के नाते उन्होंने राजभाषा हिन्दी की प्रगति हेतु भी प्रयास किए हैं, ऐसे स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की तीन छोटी छोटी रचनाएं आज शेयर कर रहा हूँ| बैरागी जी का कविता पढ़ने का अपना अनूठा अंदाज़ था, जो सभी श्रोताओं को बरबस अपनी ओर आकर्षित करता था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की यह रचनाएं–


सूर्य उवाच

आज मैंने सूर्य से बस ज़रा सा यूँ कहा
‘‘आपके साम्राज्य में इतना अँधेरा क्यूँ रहा ?’’
तमतमा कर वह दहाड़ा—‘‘मैं अकेला क्या करूँ ?
तुम निकम्मों के लिए मैं ही भला कब तक मरूँ ?
आकाश की आराधना के चक्करों में मत पड़ो
संग्राम यह घनघोर है, कुछ मैं लड़ूँ कुछ तुम लड़ो।’’

हैं करोड़ों सूर्य

हैं करोड़ों सूर्य लेकिन सूर्य हैं बस नाम के
जो न दें हमको उजाला वे भला किस काम के ?
जो रात भर लड़ता रहे उस दीप को दीजे दुआ
सूर्य से वह श्रेष्ठ है तुच्छ है तो क्या हुआ ?
वक्त आने पर मिला ले हाथ जो अँधियारे से
सम्बन्ध उनका कुछ नहीं है सूर्य के परिवार से।।

दीपनिष्ठा को जगाओ

यह घड़ी बिल्कुल नहीं है शांति और संतोष की
‘सूर्यनिष्ठा’ सम्पदा होगी गगन के कोष की
यह धरा का मामला है घोर काली रात है
कौन जिम्मेदार है यह सभी को ज्ञात है
रोशनी की खोज में किस सूर्य के घर जाओगे
‘दीपनिष्ठा’ को जगाओ अन्यथा मर जाओगे।।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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चराग़ जलाने इधर न आएगा!

‘वसीम’ अपने अँधेरों का ख़ुद इलाज करो,
कोई चराग़ जलाने इधर न आएगा।

वसीम बरेलवी

मैदान साफ़ है, जानी!

हवा खुद अब के हवा के खिलाफ है, जानी,
दिए जलाओ के मैदान साफ़ है, जानी|

राहत इन्दौरी