घर में कई आफ़्ताब रखते हैं!

हमें चराग़ समझ कर बुझा न पाओगे,
हम अपने घर में कई आफ़्ताब रखते हैं|

राहत इन्दौरी

सजाने को मुसीबत नहीं मिलती!

निकला करो ये शम्अ लिए घर से भी बाहर,
कमरे में सजाने को मुसीबत नहीं मिलती|

निदा फ़ाज़ली

हवा से कहो बुझाए मुझे!

अजब चराग़ हूँ दिन रात जलता रहता हूँ,
मैं थक गया हूँ हवा से कहो बुझाए मुझे|

बशीर बद्र

चराग़ नहीं हूँ कि फिर जला लेगा!

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा,
कोई चराग़ नहीं हूँ कि फिर जला लेगा|

वसीम बरेलवी

शम-ए-तरब बुझी नहीं है!

दिल में जो जलाई थी किसी ने,
वो शम-ए-तरब* बुझी नहीं है|
*Lamp Of Joy
अली सरदार जाफ़री

बुझ गया दिल चराग़ जलते ही!

आ गई याद शाम ढलते ही,
बुझ गया दिल चराग़ जलते ही|


मुनीर नियाज़ी

गुमनाम से जल जाते हैं!

शम्अ’ जिस आग में जलती है नुमाइश के लिए,
हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं|

क़तील शिफ़ाई

शाम से जल जाते हैं!

गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं,
हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं|

क़तील शिफ़ाई

जलती है सहर होते तक!

ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़मर्ग इलाज,
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक |

मिर्ज़ा ग़ालिब

सजाने को मुसीबत नहीं मिलती!

निकला करो ये शम्अ लिए घर से भी बाहर,
तन्हाई सजाने को मुसीबत नहीं मिलती|

निदा फ़ाज़ली