ध्यान में लाते हुए मर जाते हैं!

किस तरह लोग चले जाते हैं उठ कर चुप-चाप,
हम तो ये ध्यान में लाते हुए मर जाते हैं|

अब्बास ताबिश

जिसे दरिया किनारे छोड़ देता है!

बिछड़ के तुझसे कुछ जाना अगर तो इस क़दर जाना,
वो मिट्टी हूँ जिसे दरिया किनारे छोड़ देता है|

वसीम बरेलवी

सूना किया न जाए!

उठने को उठ तो जाएँ तेरी अंजुमन से हम,
पर तेरी अंजुमन को भी सूना किया न जाए|

जाँ निसार अख़्तर

महफ़िले-जानाँ से उठ आए!

यार से हमको तगाफ़ुल का गिला है बेजा,
बारहा महफ़िले-जानाँ से उठ आए ख़ुद भी|

अहमद फ़राज़

इस नगरी क्यूँ आये थे!

रुख़्सत के दिन भीगी आँखों उसका वो कहना हाए “क़तील”,
तुम को लौट ही जाना था तो इस नगरी क्यूँ आये थे|

क़तील शि
फ़ाई